Tuesday, June 1, 2021

राजस्थान के लोक देवता

राजस्थान के लोक देवता

LOKDEVTA PABUJI RATHOR
पाबूजी राठौड़ जीवन चित्र 
 पाबूजी :-

पाबूजी का जन्म 1239 ई. ( विक्रम सम्वत 1296 ) कोलू / कोलुमण्ड ( जोधपुर ) में राठौड़ राजवंश में हुआ | इनके पिता का नाम "धांधल जी राठौड़" माता का नाम "कमला दे" एवं पत्नी का नाम "फुलम दे" ( अमरकोट के सोढ़ा राजा सूरजमल की पुत्री ) था | पाबूजी के घोड़ी का नाम "केसर कालमी" था | 

पाबूजी को ऊँटो के देवता, गोरक्षक देवता, प्लेग रक्षक देवता, हाड़-फाड़ देवता, लक्ष्मण जी अवतार, मेहर जाति के मुसलमान "पीर" आदि नामो से जाना जाता है |

रेबारी / रायका ( ऊँटो की पशुपालक जाति ) जाति के आराध्य देव पाबूजी है ,इसी कारण ऊँट बीमार जाने पर भोपे पाबूजी की फड़ ( सबसे लोकप्रिय फड़ ) बांचते है | आसिया मोड़ जी द्वारा लिखी पुस्तक "पाबू प्रकाश" में पाबूजी के जीवन चरित्र  उल्लेख हुआ हैं |

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पाबूजी की फड़ को बांचते समय "रावणहत्था" वाद्य यंत्र का प्रयोग किया जाता है, तो पाबूजी के "पवाड़े" गाते समय "माठ" वाद्य यंत्र का प्रयोग किया जाता है | 

पाबूजी की कथा :- 

पाबूजी की घोड़ी "केसर कालमी" देवल चारणी द्वारा दी गई थी तथा देवल चारणी ने घोड़ी के बदले उनसे यह वचन लिया की वह उनकी गायों  रक्षा करेगें | लेकिन इस पर पाबूजी ने कहा की उन्हें कैसे पता चलेगा की तुम्हारी गायों पर संकट आया है | इस पर देवल चारणी ने कहा की जब भी मेरी घोड़ी हिनहिनाए तो समझ लेना की मेरी गायों पर संकट आया हैं और आप रक्षा लिये चले आना | पाबूजी के बहनोई जीन्दराव खींची इस घोड़ी को देवल चारणी से मांग चुके थे लेकिन देवल चारणी ने यह घोड़ी जीन्दराव खींची को न देकर पाबूजी की दी इसी कारण वो इस बात से क्रोधित था और देवल चारणी से बदले की ताक में थे | 
जब पाबूजी विवाह के लिए फ़ेरे में बैठे तभी देवल चारणी की घोड़ी "केसर कालमी" जोर से हिनहिनाई जिससे पाबूजी समझ गये की चारणी की गायों पर संकट आया हैं और वे विवाह के साढ़े तीन फेरे में ही गायों को बचाने पहुँच गये | बहनोई जायल ( नागौर के शासक ) जीन्दराव खींची से लड़ते हए 1276 ई. देचू गांव ( जोधपुर ) में 24 वर्ष की आयु में वीरगति को प्राप्त हुए | इसलिए पाबूजी के अनुयायी आज भी विवाह के अवसर पर साढ़े तीन फेरे लेते है | 

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  • मारवाड़ में सर्वप्रथम ऊँट लेन का श्रेय पाबूजी को है | 
  • पाबूजी का प्रतीक चिन्ह "भाला लिए हुए अश्वरोही"
  • पाबूजी के सहयोगी "चांदा डेमा व हरमल"
  • पाबूजी के उपासकों द्वारा पाबूजी  स्मृति में "थाली नृत्य" करते है |
पाबूजी बाई व झुकी पाग ( पगड़ी ) प्रसिद्ध है | जिनका मंदिर कोलुमण्ड ( फलौदी जोधपुर ) में है जहाँ प्रतिवर्ष अमावस्या को मेला लगता है |     

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