Thursday, June 3, 2021

राजस्थान : लोकदेवता गोगाजी

राजस्थान : लोकदेवता गोगाजी

गोगाजी :- 

गोगाजी का जन्म विक्रम संवत 1003 ददरेवा ( चूरू ) में नागवंशीय चौहान परिवार में हुआ | इनके पिता का

लोकदेवता गोगाजी,lokdevta gogaji
लोकदेवता गोगाजी 

नाम "जेवर सिंह" माता का नाम "बाछल दे" गुरु का नाम "गोरखनाथ जी" पत्नी का नाम "केलमदे" ( किलमद्र  कोलुमण्ड के राठौड़ बुड़ोजी की पुत्री ) था | 

गोगाजी को नागों का देवता, जाहरपीर ,हिन्दू धर्म में नागराज का अवतार ,मुस्लिम धर्म में गोगापीर आदि नामों से जाना जाता है | 

कर्म सिंह या कायम सिंह गोगाजी की 17वीं पीढ़ी में हुए थे | जिन्हे मुसलमानो ने बलपूर्वक मुसलमान ( कायमखानी मुसलमान ) बनाया था | जिनके वंशज आज भी गोगाजी को अपना पूर्वज मानते है | 

गोगाजी की कथा :-

जन्म से संबधित जनश्रुति के अनुसार गोगाजी की माता बाछल दे की शादी के कई वर्षो बाद भी संतान नहीं हुई | अनेक देवी देवताओं की शरण में जाने के बाद उनके परिवार के ईष्ट देव गुरु गोरखनाथ जी के आशीर्वाद व खाने में दिए सुगंधित पदार्थ "गूगल" से गोगाजी का जन्म हुआ था | इसलिए इनका नाम "गोगा" गुरु गोरखनाथ के आशीर्वाद होने के कारण "गो" तथा गाय माता का प्रथम अक्षर "गा" को सम्मिलित कर "गोगा" रखा गया | 

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जन्म से पहले बाछल की ननद को अपनी भाभी पर शंका हुई ननद ने अपने भाई के कान गलत बातों से भर दिये | जेवरसिंह जी ने अपनी पत्नी की आलोचना की और अपनी पत्नी को बेलगाड़ि से पीहर पहुँचा दिया | रास्ते में गोगाजी ने माँ के उदर से प्रार्थना की, कि मेरा जन्म पितृग्रह में होना चाहिये अन्यथा में "नाडिया" कहलाऊ गा | इसी बिच बैलगाड़ी के एक बेल को सांप से डस लिया बाछल जी को वापस ददरेवा ( चूरू ) आना पड़ा जहाँ वीर गोगाजी का जन्म हुआ | 

गोगाजी की पत्नी का नाम कमलदे था जिसे विवाह के समय एक सांप ने डस लिया था ,इससे क्रोधित होकर गोगाजी ने आग पर कढ़ाई रखकर उसमे तेल डाल कर मंत्रो का उच्चारण करने लगे जिससे संसार के सभी सर्प आकर गर्म कढ़ाई में गिरने लगे तब सांपो के रक्षक "तक्षक नाग" ने गोगाजी से मांफी मांगी व कमलदे के जहर को चूस कर पुनः जीवित किया और सर्पो के देवता के रूप में पूज्य होने का आशीर्वाद दिया | 


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मृत्यु के संबंध में कहा जाता है की इनके चचरे भाई अर्जुन-सुर्जुन ने भूमि बटवारें को लेकर हुये विवाद के कारण इनके इलाके की सारी गाँये घेर कर मुस्लिम आक्रांता गजनवी दे दी जिससे गोगाजी गायों को बचाने जाये | इस पर गोगाजी अपने 47 पुत्रों व 60 भतीजों के साथ "चिनाब नदी" पार कर गजनवी से युद्ध कर गायों  मुक्त कराया ( महमूद गजनवी ने इनके युद्ध शौर्य को देखकर इन्हे जाहरपीर अर्थात जिन्दा पीर कहा ) लेकिन वापस आकर इनके चचेरे भाईयो ने इनसे युद्ध किया जिसमे ये वीरगति को प्राप्त हुए थे | गुजराती पुस्तक श्रावक वृतादि - अतिचार, रणकपुर प्रशस्ति व दयालदास रि ख्यात के अनुसार इन्होने अपने चचेरे भाई अर्जुन-सुर्जन के साथ भूमि विवाद पर युद्ध करते हुये वीरगति पाई थी | 

युद्ध में लड़ते हुए इनका शीश ददरेवा ( चूरू ) में गिरा इसी कारण शीर्षमेड़ी ( ददरेवा तालाब की मिट्टी से सर्पदंश ज़हर उतारने की लोकमान्यता है ) और कपंध ( बिना शीश का धड़ ) गोगामेड़ी ( नोहर हनुमानगढ़ ) में गिरा इसी कारण इसे धूरमेड़ी कहते है | 


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किवदंती है, कि गोगाजी का पौत्र सामंत चौहान उनके जैसा ही था | उसने गजनवी सेना को कई बार धुल चटाई और सोमनाथ मन्दिर पर हुये आक्रमण को विफल बनाने का प्रयास किया | लोगों ने समझा के वीर गोगाजी की आत्मा है जो गजनवी की सेना से सोमनाथ मन्दिर की रक्षा कर रही है | उसी समय गोगा बापा लोकदेवता के रूप में पुजे जाने लगे | 

गोगाजी के चरण चिन्ह ( थान ) खेजड़ी के वृक्ष के नीचे बना होता है,जहाँ मूर्ति स्वरूप एक पत्थर पर सर्प की आकृति अंकित होती है | गोगाजी के लिए राजस्थान में यह कहावत प्रसिद्ध है | 

"गाँव-गाँव खेजड़ी ने ,गाँव-गाँव गोगाजी |"

गोगाजी की घोड़ी नीली घोड़ी जिसे "गोगा बापा" कहते है , तो गोगाजी की पूजा घरों में मिट्टी का घोड़ा बनाकर अश्वरोही योद्धा के रूप में की जाती है | गोगाजी के प्रिय भक्त "डेरु" वाद्य यंत्र का प्रयोग करते है | गोगाजी के भक्त नृत्य करते वक्त नगाड़ा या ढोल वाद्य यंत्र का प्रयोग करते है उसे "माठ" कहते है | 

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मारवाड़ में मान्यता है, की किसान खेत हाँकना प्रारम्भ करते समय हल व हाली को "गोगा राखड़ी" ( गोगाजी का धागा जिसमे नौ गाँठे होती है ) बाँधते है | रक्षा बन्धन पर बाँधी गयी राखिया घोड़े के पास रखकर इन्हे लापसी व चूरमे का भोग लगाया जाता है | गोगाजी राजस्थान के ऐसे लोकदेवता है जिन्हे राज्य के आलावा पंजाब ,हरियाणा ,मध्यप्रदेश ,उत्तरप्रदेश हिमाचल प्रदेश में भी पूजा जाता है | 

गोगाजी से संबधित स्थल :-

गोगाजी का मन्दिर गोगामेड़ी / धूरमेड़ी - नौहर ( हनुमानगढ़ ) में स्थित है जहाँ प्रतिवर्ष भाद्रपद कृष्ण नवमी ( गोगा नवमी ) को मेला भरता है | गोगामेड़ी का निर्माण फिरोजशाह तुगलक के द्वारा मक़बरानुमा आकृति में किया गया जिसके मुख्य दरवाजे पे बिस्मिलाह का चिन्ह अंकित है | गुरु गोरखनाथ का तपस्या स्थल नौलाब बांग गोगामेड़ी में ही स्थित है | 
गोगामेड़ी के चारों और जंगल को, जो गोगाजी की "पणी रोपण" एवं "जोड़" नाम से पुकारा जाता है |
गोगाजी (  झौपड़ी ) सांचोर ( जालौर ) - इसकी स्थापना पाटम के दो भाइयों के द्वारा की गई तथा केरियाँ गांव के राजाराम कुम्हार ने यहाँ मन्दिर का निर्माण किया | 

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