Sunday, May 30, 2021

लोक देवता भाग 2

लोक देवता भाग 2

वीर तेजाजी  

वीर तेजाजी का जन्म 1074 ई.( विक्रम सम्वत 1131 ) "खड़नाल" ( नागौर ) में "धौल्या" गोत्र के नागवंशीय जाट परिवार में हुआ | इनके पिता का नाम "ताहड़" माता का नाम "राज कुँवरी" और इसकी पत्नी का नाम "पैमल दे" ( पन्हेर गाँव -अजमेर के रायच्नद्र की पुत्री ) था | तेजाजी को साँपो के देवता, गायों का मुक्ति दाता, काला बाला का देवता, कृषि कार्यो का उपकारक देवता,धौलिया वीर आदि नामो से जाना जाता है | 

LOKDEVTA VEER TEJAJI
LOKDEVTA VEER TEJAJI 

तेजाजी की कथा   

तेजाजी के संबंध में प्रचलित जनश्रुतियों के अनुसार, एक बार तेजाजी की माँ ने तेजाजी को आदेश दिया, हल लेकर खेत जोतने जाओ | माँ की आज्ञा के अनुसार तेजाजी हल लेकर खेत पर चले गये और दिन भर हल जोतते रहे | वो पूरा दिन काम करते रहे पर घर से उनके लिए कोई भोजन लेकर नहीं आये जब शाम होने को आयी तब उनकी भाभी उनके लिए भोजन लेकर खेत पर आयी ,तब तेजाजी ने अपनी भाभी से कहा की इतनी देर से क्यों आई हो ? तो उनकी भाभी ने झूट बोला के घर पर काम था, और अभी भी बच्चो को घर पर रोता छोड़कर आयी हूँ | भाभी के इस झूट पर तेजाजी को बहोत गुस्सा आया , और कहा की ये भोजन पक्षियों को डाल दो | भाभी को तेजाजी का गुस्सा अच्छा नहीं लगा और कहा की "इतना क्रोध किस पर कर रहे हो में तो परायी स्त्री हूँ | अपनी पत्नी को तो पीहर में छोड़ रखा है ,जो अपने माँ-बाप के काम करती है और तुम मुझसे कड़वे बोल बोलते हो |" भाभी की बाते सुनकर घर पहुंचे और अपनी घोड़ी लीलण को कसकर सुसराल पन्हेर के लिए चलने लगे तभी अपशगुन हुआ तो ज्योतिषियों को बुलाया और पूछा गया | 
लोकदेवता तेजाजी
लोक देवता तेजी खेत में हल जोतते हुये 
ज्योतिषियों ने बताया की इस यात्रा में तेजाजी की मृत्यु होगी | माँ ने उन्हें रोकने की कोशिश की पर वह नहीं माने और ससुराल की और चल दिये | जब वे अचानक ससुराल पहुंचे तो उनकी सासु माँ गायों का दूध निकल रही थी तो गायों ने दूध की बाल्टी के लात मारकर उनका दूध गिरा दिया तो उनकी सास ने बिना देखे ही उनको गालियां देने लगी ,इससे तेजाजी क्रोधित होकर लौटने लगे तो उनकी पत्नी ने उनको पहचान लिया और उन्हें रोकने के लिए अपनी सहेली लाछा गुर्जरी को भेजा | लाछा ( हीरा ) ने उन्हे ससुराल वापस चलने को कहा पर उन्होंने मना कर दिया इस पर लाछा गुर्जरी ने उन्हें अपने घर चलने के लिए मना लिया | उसी रात लाछा गुर्जरी की गाँये मेर के मीणा चुरा कर ले गए तो तेजाजी गायों को छुड़ाने निकल गये और मंडावरिया गाँव के पास भीषण युद्ध करके गायों को छुड़ा भी लाये पर घर आकर पता चला की एक गाय का बछड़ा वही रह गया तो तेजाजी को पुनः युद्ध में जाना पड़ा | 
रास्ते में एक जगह उन्होंने सांप को जलते हुए देखा | तेजाजी ने सर्प को अग्नि से बाहर निकाल दिया जिससे सर्प नाराज हो गया और क्रोधित होकर बोला "सुण क मोटा सिरदार,जुल्म कर दीनो,म्हारी छूटती जूण बचा म्हाने क्यों बचा लीनो |" इस पर तेजाजी ने जवाब दिया "थारी बजादि ज्यान,बुरो काम कई किणो, तू जस के बदले अपजस किणतर दीनो |" इस पर सर्प क्रोधित होकर फुरफुराने लगा और उनको डसने की बात कही, लेकिन तेजाजी ने कहा "अभी में गायों के बछड़े को छुड़ाने जा रहा हूँ वहा से लौट आउ तब डस लेना | " तेजाजी सर्प देवता को ये वचन देकर बछड़े को बचाने चले दिये |

इस बार युद्ध में तेजाजी गंभीर रूप से घायल हो गए पर बछड़े कको बचा कर लाछा के पास छोड़
लोकदेवता वीरा तेजाजी
कर वापस सर्प के पास पहुँचते है | मीणाओं से लड़ते लड़ते तेजाजी का शरीर पूर्ण रूप से क्षत-विक्षत हो गया और उनके अंग से खून निकलने रहा था | तेजाजी के सम्पूर्ण शरीर पर खून देख कर सर्प ने डसने से मना कर दिया ,लेकिन तेजाजी कहाँ मानने वाले थे | 
उन्होंने कहा की आपके लिए शरीर का एक अंग सुरक्षित अपने वचन के अनुसार आपके लिए लाया हूँ ,वहां डस लीजिये ,यह कहकर उन्होंने अपनी जीभ बाहर निकल दी | द्रवित सर्प देवता ने डसने से पहले भविष्यवाणी की जहाँ कही भी सर्पदंश पीड़ित तेजाजी का स्मरण करेगा तथा पप्रार्थना करेगा वह पीड़ित विष से मुक्त हो जायेगा | इसलिए वे नागों के देवता के रूप में प्रसिद्ध हो गये | इनकी मृत्यु के बाद इनकी पत्नी पेमल दे इनके साथ सती हो गयी थी | तेजाजी का मृत्यु का समाचार उनकी घोड़ी लीलण द्वारा उनके घर पहुंचाया गया | 


( तेजाजी को अजमेर जिले के ब्यावर कस्बे से 10 किमी दूर "सेदरिया गाँव" में सर्प ने डसा ,और उनकी मृत्यु सुरसुरा किशनगढ़ अजमेर में हुई )
पहले लोक देवता जिन्हे सर्पदंश के इलाज के लिए आयुर्वेद का प्रयोग किया | आज भी भावता ( अजमेर ) में स्तिथ तेजाजी के मन्दिर में सर्पदंश से पीड़ित व्यक्ति का गोमूत्र से निःशुल्क इलाज किया जाता है | तेजाजी अजमेर जिले के सर्वप्रमुख इष्ट देवता है तो उनकी कर्मस्थली डूंगारी गाँव ( बूँदी ) है | 

तेजाजी को कृषि के देवता के रूप में भी माना जाता है और किसान हल जोतते वक्त तेजाजी की जीवनी गाते है | 
सुरसुरा ( अजमेर ) में इनका मंदिर था जिसकी मूर्ति की मारवाड़ के महाराजा अभयसिंह के कल में परबतसर का हाकिम परबतसर ( नागौर ) ले गया तब से तेजाजी का प्रमुख स्थल परबतसर ( नागौर ) में स्थापित हो गया | तेजाजी के नाम पर परबतसर नागौर में प्रतिवर्ष भाद्रपद शुल्कपक्ष दशमी को राजस्थान का सबसे बड़ा पशु मेला लगता है | 
सहरिया जनजाति का आराध्य देव-वीर तेजाजी जिनके नाम पर बारा जिले में सीताबाड़ी ( सहरिया जनजाति का कुम्भ ) तेजाजी का मेला आयोजित किया जाता है | 


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