Friday, May 28, 2021

बाबा रामदेवजी || BABA RAMDEVJI

बाबा रामदेवजी || BABA RAMDEVJI

समय - समय पर उत्कृष्ट कार्य ,बलिदान या परोपकार करने वाले महापुरुषों को ''लोकदेवता'' या ''पीर'' कहा जाता है |

राजस्थान के पंचपीर - पाबू जी ,हड़बू जी,रामदेव जी ,मेहा जी मांगलिया |

बाबा रामदेव जी 


बाबा रामदेव का जन्म - 1352 ई. ( विक्रम सम्वत 1409 ) ''उण्डूकाश्मीर'' ( बाड़मेर ) में भाद्रपद शुक्ल द्वितीया ( बाबेरी बीज ) को तँवर वंशीय राजपूत परिवार था | इनके पिता का नाम अजमाल जी व माता का नाम मैणादे  व बड़े भाई का नाम वीरमदेव ( बलराम का अवतार ) था | इनका विवाह अमरकोट ( वर्तमान पाकिस्तान में ) के सोढ़ा दलेसिंह की पुत्री ''निहालदे / मेतलदे'' के साथ हुआ |
बाबा रामदेव मल्लिनाथ जी के समकालीन थे | माना जाता है की ,मल्लिनाथ जी ने इन्हे पोकरण क्षेत्र जागीर में दिया | जिसे रामदेव जी ने अपनी भतीजी को दहेज़ में देकर ''रुणेचा'' ( रामदेवरा ) नामक नया स्थान बनाया | इन्होने बचपन की अवस्था में ही पोकरण ( जैसलमेर ) में गोधन का नाश करने वाले ''भैरव''नामक राक्षस का वध किया |

बाबा रामदेव को साम्प्रदायिक सद्भावना के लोक देवता, रुणेचा रा धणिया ,पीरो का पीर और हिन्दू धर्म में इन्हे ''कृष्ण का अवतार'' मुस्लिम सम्प्रदाय में ''रामसापीर'' आदि उपनामों से जाना जाता है | 
रामदेव जी बालीनाथ जी के शिष्य थे ,जिन्होंने कामङिया पंथ की स्थापना की तथा कामड़ जाति के लोग रामदेव जी के प्रिय भक्त है | रामदेव जी मेले पर कामड़ जाति की महिलाएं तेरह मंजीरों के साथ ''तेरहताली नृत्य'' करती है |

-: ये भी जानें :-
  • रामदेवजी के जीवन की चमत्कारी घटनाओं को ''परचा / परचे'' कहलाते है | 
  • रामदेवजी के धार्मिक स्थल पर इनकी पॉँच रंग की पताका / ध्वजा ''नेज़ा'' कहलाती है |
  • इनका प्रमुख वाहन "नीला घोड़ा" |
  • इनका प्रतीक चिन्ह "चरण चिन्ह / पगल्या" |
  • कदंब के वृक्ष के निचे स्थापिय किए स्थान को "थान" कहते है |
  • रामदेवजी के मन्दिर को "देवरा" कहते है | 
  • रामदेव के प्रिय भक्त यात्री "जातरू" कहलाते है | 
  • रामदेवजी के द्वारा चलाया गया जनजागरण अभियान "जम्मा जागरण" कहा जाता  है | 
  • रामदेवजी के किए जाने वाले रात्रिजागरण "जम्मा" कहलाता है |
रामदेवजी एकमात्र ऐसे लोक देवता थे जो कवि थे | इनके द्वारा रचित "चौबीस वाणिया" प्रसिद्ध है |
इन्होने मेघवाल जाति डाली बाई को अपनी धर्म बहन बनाया | मेघवाल जाति के भक्त "रिखिया" कहलाते है | रामदेवजी के मंदिरो में कपड़े का घोड़ा बनाकर अर्पित किया जाता है |
डाली बाई कंगन

इन्होने "रामसरोवर की पाल" ( रुणेचा ) में समाधी ली तथा इनकी धर्म बहन "डाली बाई" ने यहाँ पर उनकी आज्ञा से एक  पहले जलसमाधि ली थी | डाली बाई का मन्दिर इनकी समाधि के समीप स्थित है | 
रामदेवजी की वास्तविक बहन सुगणा बाई जिनका विवाह पुंगलगढ़ के परिहार राव किशन सिंह से हुआ | 
रामदेवजी की फड़ बीकानेरजैसलमैर में "ब्यावले भक्तों" के द्वारा बाँची जाती है | रामदेव जी के वंशज मृतक व्यक्ति को दफ़नाते है |  

रामदेवजी का मेला
:- रुणेचा ( रामदेवरा में )प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल द्वितीया से एकादशी तक लगता है | 

रामदेवजी के प्रमुख मन्दिर :- 

( अ ) रामदेवरा ( जैसलमेर ) - यहाँ रामदेवजी व डाली बाई की समाधी स्थित है |

जहाँ प्रतिवर्ष भाद्रपक्ष शुक्ल को मेला भरता है | ( छोटा रामदेवरा गुजरात में स्थित है )

( ब ) बराठिया का मन्दिर ( अजमेर ) :- यह अजमेर जिले में "बर" नामक स्थान स्थित है | यहाँ प्रतिवर्ष भाद्रपद शुल्क एकादशी को मेला लगता है |
( स ) सुरता खेड़ा ( चितौड़गढ़ ) :- प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल प्रथमा  तृतीया है |
( द ) मसूरिया ( जोधपुर )
( य ) अधरशिला मन्दिर ( जोधपुर ) 


रामदेवराजी के कार्य - कलाप
 - रामदेवजी के कार्य -कलापों से आश्चर्यचकित होकर मक्का से पाँच पीर परीक्षा लेने राजस्थान आये ,रामदेवजी ने उन्हें भोजन करने का आमंत्रण दिया | पर पीरों ने शर्त रखी के वे अपने बर्तनों 
में ही भोजन कर सकते है और हमारे बर्तन मक्का में रह गये है | कहते है ,बाबा ने पीरों को सामने बिठा कर आँखें बंद करने को कहाँ और अपने हाथ फैला कर मक्का से पीरों के बर्तन लाकर उनके सामने रख दिए | यह देख कर पाँचो पिरो ने कहा की "हम तो पीर ही है बाबा रामदेव तो पीरों है" | 

Post a Comment

Whatsapp Button works on Mobile Device only

Start typing and press Enter to search