Friday, 17 February 2012

राजस्‍थान : अवसरों की भूमि - समीर पुष्‍प

राजस्‍थान एक जोशीला, मोहक राज्‍य है जहां परंपरा और राजसी शान के मि‍ले‑जुले रंग‑चि‍त्र रेत और मरुभूमि‍ में बि‍खरे हुए हैं। अपने पूरे परि‍वेश में यह राज्‍य वि‍भि‍न्‍नताओं से भरा हुआ है जहां के लोगों, रि‍वाजों, संस्‍कृति‍, पोशाक, संगीत, व्‍यवहार, बोलि‍यों, खानपान और लोगों की कद‑काठी में रंगारंग वि‍भि‍न्‍नताएं मौजूद हैं। राज्‍य के इति‍हास की अनगि‍नत गाथाएं हैं – सड़क कि‍नारे बसे हर गांव की शौर्य और बलि‍दान की अपनी कहानि‍यां हैं। ये कहानि‍यां हवाएं सुनाती हैं और रेत उन्‍हें उड़ाकर एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान तक पहुंचा देती है। राज्‍य का वि‍हंगम दृश्‍य सच में बहुत जादुई है। एक तरफ दुनि‍या की प्राचीनतम पर्वत श्रृंखला अरावली है, तो दूसरी तरफ महान भारतीय रेगि‍स्‍तान का सुनहरा साम्राज्‍य मौजूद है। यह उपमहाद्वीप का एकमात्र रेगि‍स्‍तान है।
     राजस्‍थान को हमेशा एक ऐसे राज्‍य के रूप में देखा जाता रहा है जहां आर्थि‍क और व्‍यापारि‍क वि‍कास की अपार क्षमताएं मौजूद हैं। यहां के नि‍वासि‍यों, खासतौर पर मारवाड़ के लोगों को उनकी उद्यमशीलता के लि‍ए राष्‍ट्रीय और अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर जाना जाता है। भूमि‍, खान, खनि‍ज और सौर्य प्रकाश जैसे प्राकृति‍क संसाधनों के वि‍स्‍तृत भंडारण के बावजूद राज्‍य की वि‍कास संभावनाओं के सामने संरचना तथा समृद्ध कौशल की खोज का अभाव उसकी उन्‍नति‍ में बाधक है। हालि‍या महीनों में केंद्रीय वाणि‍ज्‍य एवं उद्योग मंत्रालय ने राजस्‍थान सरकार और वहां के नि‍वासि‍यों के सहयोग से कई परि‍योजनाएं शुरू की हैं ताकि‍ राजस्‍थान के लोगों के कौशल, उद्यमि‍ता और व्‍यापारि‍क सूझबूझ को सामने लाया जा सके। इन प्रयासों को सांस्‍थानि‍क वि‍कास और कौशल उन्‍नयन के तौर पर समझा जा सकता है जि‍समें औद्योगि‍क तथा नि‍वेश वि‍कास की सीमांकि‍त पारि‍स्‍थि‍ति‍की‑प्रणाली का सृजन सम्‍मि‍लि‍त है।

सांस्‍थानि‍क वि‍कास
      राजस्‍थान के लि‍ए कोई भी योजना बनाते समय उसमें बुनि‍यादी वि‍चार यह होता है कि‍ प्रस्‍तावि‍त योजना और घरेलू भौति‍क व मानव संसाधनों के बीच तालमेल हो। इस वि‍चार को ध्‍यान में रखते हुए वाणि‍ज्‍य एवं उद्योग मंत्रालय ने जोधपुर में फुटवि‍यर डि‍जाइनिंग एंड डेवलपमेन्‍ट इंस्‍टीट्यूट (एफडीडीआई) संबंधी 100 करोड़ रुपये की लागत वाली परि‍योजना का काम शुरू कि‍या है। यह संस्‍थान 15 एकड़ में फैला है और एक हजार छात्रों को प्रशि‍क्षण देने की क्षमता रखता है। राजस्‍थान को चर्म उद्योग में एक पारंपरि‍क लाभ प्राप्‍त है क्‍योंकि‍ इसका मजबूत अतीत है, मवेशि‍यों के भारी संख्‍या में मौजूद होने से चमड़़े की उपलब्‍धता है और क्षेत्र में समृद्ध दस्‍तकारी परंपरा है। एफडीडीआई द्वारा उपलब्‍ध पाठ्यक्रम की भारी मांग है क्‍योंकि‍ फैशन व्‍यापार, खुदरा प्रबंधन, पादुका प्रौद्योगि‍की, कच्‍चा माल और सहायक सामग्री के क्षेत्र में रोजगार की भारी संभावनाएं हैं। एफडीडीआई के अन्‍य परि‍सरों में शत प्रति‍शत नि‍योजन का रि‍कॉर्ड है। इसीलि‍ए इस परि‍योजना से रोजगार में बढ़ोतरी होगी और राजस्‍थान देश का प्रमुख चर्म उद्योग केंद्र बन जाएगा। परि‍सर की अभी हाल में आधारशि‍ला रखते हुए वाणि‍ज्‍य एवं उद्योग मंत्री श्री आनन्‍द शर्मा ने कहा, ‘संस्‍थान की स्‍थापना से राजस्‍थान के प्रति‍भाशाली युवाओं को अपना कौशल बढ़ाने और रोजगार के बाजार में पूरी ताकत से प्रति‍स्‍पर्धा करने का अवसर मि‍लेगा।’
     इसके अलावा एक और उल्‍लेखनीय पहल यह है कि‍ जोधपुर में 18 करोड़ रुपये की लागत से स्‍पाइस पार्क बनाया जा रहा है जो वहां के घरेलू परि‍वेश के अनुरूप है। पार्क को 60 एकड़ भूभाग में बनाया जा रहा है जि‍समें धनि‍या और मेथी जैसे दानेदार मसालों के लि‍ए प्रसंस्‍करण सुवि‍धाएं उपलब्‍ध होंगी। जीरे और सौंफ जैसे दानेदार मसालों का भी प्रसंस्‍करण कि‍या जाएगा। जल्‍द ही इस मसाला पार्क को राजस्‍थान के नि‍वासि‍यों को समर्पि‍त कर दि‍या जाएगा। इसी तरह का एक और मसाला पार्क कोटा के नि‍कट रामगंज मंडी में भी स्‍थापि‍त किया जाएगा। इस तरह के संस्‍थानों की स्‍थापना से व्‍यावसायि‍क समृद्धि‍ का पुनर्सृजन होगा जि‍ससे राज्‍य के लि‍ए बेहतर उद्यम अवसर पैदा होंगे।

सीमांकि‍त पारि‍स्‍थि‍तिकी‑प्रणाली
      अपनी स्‍थि‍ति‍ और आकार के कारण राजस्‍थान सेज़, औद्योगि‍क गलि‍यारों या नि‍र्माण/नि‍वेश अंचल के लि‍ए महत्‍वपूर्ण क्षेत्र है। इसमें हैरानी नहीं होनी चाहि‍ए कि‍ प्रस्‍तावि‍त दि‍ल्‍ली‑मुंबई औद्योगि‍क गलि‍यारे (डीएमआईसी) का 40 प्रति‍शत हि‍स्‍सा राजस्‍थान में आता है। डीएमआईसी का पहला बि‍न्‍दु खुशखेड़ा‑भि‍वाड़ी‑नीमराना नि‍वेश क्षेत्र अपने अंति‍म चरण में है और परि‍वर्ति‍त संकल्‍पना योजनाएं प्रस्‍तुत कर दी गई हैं। राज्‍य के अपने हालि‍या दौरे पर श्री आनन्‍द शर्मा ने घोषणा की है कि‍ द्वि‍तीय बि‍न्‍दु (नगर) जोधपुर‑मारवाड़ क्षेत्र में होगा। उन्‍होंने कहा, ‘यदि‍ भारत को एक औद्योगि‍क और नि‍र्माण महाशक्‍ति‍ संबंधी अपनी भावी भूमि‍का नि‍भानी है तो इस प्रयास में राजस्‍थान को केंद्रीय भूमि‍का नि‍भानी होगी।’
       राजस्‍थान में कुल 10 सेज़ अधि‍सूचि‍त कि‍ए गए हैं जि‍नमें 1105 करोड़ रुपये का नि‍वेश कि‍या गया है। इनमें राज्‍य के कम से कम दस हजार लोगों को रोजगार प्राप्‍त है। वर्ष 2010‑11 में राज्‍य स्‍थि‍त सेज का नि‍र्यात 900 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। ये सेज जि‍न क्षेत्रों में सक्रि‍य हैं, उनमें सूचना प्रौद्योगि‍की और सूचना प्रौद्योगि‍की आधारि‍त सेवाएं, रत्‍न व आभूषण तथा दस्‍तकारी शामि‍ल हैं। ये सीमांकि‍त पारि‍स्‍थि‍ति‍की‑प्रणालि‍यां इसलि‍ए महत्‍वपूर्ण हैं क्‍योंकि‍ यहां संरचना, श्रम, कौशल और नि‍वेशक अनुकूल माहौल के संबंध में उद्यमी नि‍वेशकों की जरूरतों के मुताबि‍क समस्‍याओं का नि‍दान समेकि‍त रूप में उपलब्‍ध है। स्‍पष्‍ट है कि‍ इस तरह की पहलों से राज्‍य में उद्योग और उद्यमशीलता की एक मजबूत संस्‍कृति‍ पैदा होगी। घोषणा करते हुए मंत्री महोदय ने कहा, ‘प्रस्‍तावि‍त राष्‍ट्रीय नि‍र्माण और नि‍वेश क्षेत्रों सहि‍त डीएमआर्इसी और वि‍भि‍न्‍न सेज़ केंद्र राज्‍य को प्रगति‍ की राह पर तेजी से आगे बढ़ाने में सहायक होंगे।’
      नीति‍ के अंतर्गत नीमराना में राष्‍ट्रीय नि‍र्माण एवं नि‍वेश क्षेत्र (एनएमआर्इजेड) की स्‍थापना, व्‍यापार नि‍यमावली का सरलीकरण और उसे तर्कसंगत बनाने, बीमार इकाईयों को बंद करने का साधारण और शीघ्रगामी तरीका तैयार करने, हरि‍त प्रौद्योगि‍की सहि‍त प्रौद्योगि‍की के वि‍कास के लि‍ए वि‍त्‍तीय और सांस्‍थानि‍क संरचना का नि‍र्माण, औद्योगि‍क प्रशि‍क्षण और कौशल उन्‍नयन के उपाय करने तथा नि‍र्माण इकाईयों व संबंधि‍त गति‍वि‍धि‍यों में हि‍स्‍सेदार और पूंजी नि‍वेश प्रोत्‍साहन को प्रस्‍तावि‍त कि‍या गया है।
      एनएमआईजेड की स्‍थापना औद्योगि‍क रणनीति‍ के लि‍ए प्रमुख अस्‍त्र होगा। इन क्षेत्रों को एकीकृत औद्योगि‍क टाउनशि‍प के रूप में वि‍कसि‍त कि‍या जाएगा जहां शानदार संरचनाएं और क्षेत्र आधारि‍त भूमि‍ उपयोग उपलब्‍ध होगा। इन क्षेत्रों का क्षेत्रफल दो हजार एकड़ का होगा और इन्‍हें अपेक्षि‍त पारि‍स्‍थि‍ति‍की‑प्रणाली के साथ वि‍शेष प्रयोजन वाहकों (एसपीवी) द्वारा वि‍कसि‍त तथा प्रबंधि‍त कि‍या जाएगा। प्रत्‍येक एसपीवी एनएमआईजेड के वि‍कास, वृद्धि‍, संचालन और प्रबंधन का काम देखेगा। सरकार एनएमआईजेड का वि‍कास इस तरह करना चाहती है जहां आवश्‍यक संरचना उपलब्‍ध हो और देश में नि‍र्माण गति‍वि‍धि‍यों में तेजी लाने का वातारण मौजूद हो।
कौशल उन्‍नयन
      देश में युवाओं की तादाद सबसे अधि‍क है और इसका लाभ लेने के लि‍ए कौशल उन्‍नयन तथा शि‍क्षा को रोजगारपरक बनाने का कार्य राष्‍ट्र की प्राथमि‍कता बन गया है। घरेलू संस्‍कृति‍ और संसाधन घटकों को मद्देनजर रखते हुए, इस दि‍शा में कि‍ए जाने वाले प्रयासों में राज्‍य की शक्‍ति‍ परि‍लक्षि‍त होती है। ग्रामीण चर्म कारीगर समूहों को प्रोत्‍साहि‍त करने के लि‍ए राज्‍य में एक योजना चल रही है जि‍सका नाम ‘कारीगरों का समर्थन है।’ योजना की लागत 40 करोड़ रुपये है। ग्रामीण चर्म कारीगर राज्‍य की ग्रामीण अर्थव्‍यवस्‍था का अटूट अंग हैं। इस तरह के कार्यक्रमों का उद्देश्‍य स्‍थानीय रोजगार सृजन और नि‍र्यात के अवसर पैदा करना है। चमड़े के कारीगरों के डि‍जाइन कौशल को बढ़ाने तथा कच्‍चा माल और वि‍पणन सहयोग करने के लि‍ए सरकार उपाय करती है। यह आमूल सहयोग है जि‍समें केंद्रीय संसाधन केंद्रों की स्‍थापना, उत्‍पाद और डि‍जाइन वि‍कास, ब्रांड प्रोत्‍साहन तथा तैयार माल को बाजार में बेचने के लि‍ए संपर्कों का वि‍कास शामि‍ल है। इसी तरह नीमराना क्र्यू बोस अकादमी नामक परि‍योजना है जि‍सका स्‍पष्‍ट लक्ष्‍य है क्षेत्र के नि‍वासि‍यों में से 6,500 से अधि‍क नि‍वासि‍यों को रोजगार मुहैया करवाना। पि‍छले छह माह में अकादमी ने 700 लोगों को प्रशि‍क्षण दि‍या और उनमें से अधि‍कतर लोगों को रोजगार प्राप्‍त हुआ।
      वैश्‍वि‍क आर्थि‍क मंदी के बावजूद भारत ने अपनी वि‍कास दर को सतत कायम रखा। इस गति‍ को बनाए रखने के लि‍ए समन्‍वि‍त प्रयास करने की आवश्‍यकता है ताकि‍ औद्योगि‍क वि‍कास, संरचना में प्रति‍बद्ध नि‍वेश और कौशल उन्‍नयन संभव हो सके। राजस्‍थान जैसे राज्‍यों की भूमि‍का बहुत अहम है क्‍योंकि‍ वे इस गति‍ को बनाए रखने के लि‍ए ऊर्जा प्रदान कर सकते हैं। इस महत्‍वपूर्ण राज्‍य में वि‍कास और वृद्धि‍ संबंधी अहम क्षेत्रों पर ध्‍यान देना सही दि‍शा में उठाया गया कदम है। युवाओं के रोजगार और उन्‍नति‍ के लि‍ए केवल सहायक अवसरों द्वारा ही राज्‍य अपनी वास्‍तवि‍क जातीयता, करि‍श्‍मे और जीवन में व्‍याप्‍त पारंपरि‍क सहनशीलता को सार्थक कर सकता है।

बैंकों का बैंक रिज़र्व बैंक : झलक इतिहास की - समीर पुष्‍प

भारतीय रिज़र्व बैंक एक ही दिन में देश भर के बैंकों का बैंक नहीं बना है। क्रमिक विकास, एकीकरण, नीतिगत बदलावों और सुधारों की एक लम्‍बी और कठिन यात्रा रही है, जिसने भारतीय रिज़र्व बैंक को एक अलग संस्‍थान के रूप में पहचान दी है। रिज़र्व बैंक की स्‍थापना के लिए सबसे पहले जनवरी, 1927 में एक विधेयक पेश किया गया और सात वर्ष बाद मार्च, 1934 में यह अधिनियम मूर्त रूप ले सका। विकासशील देशों के सबसे पुराने केन्‍द्रीय बैंकों में से रिज़र्व बैंक एक है। इसकी निर्माण यात्रा काफी घटनापूर्ण रही है। केन्‍द्रीय बैंक की कार्य प्रणाली अपनाने की इसकी कोशिश न तो काफी गहरी और न ही चौतरफा रही है। द्वितीय विश्‍व युद्ध छिड़ जाने की स्थिति में अपनी स्‍थापना के पहले ही दशक में रिज़र्व बैंक के कंधों पर विनिमय नियंत्रण सहित कई विशेष उत्तरदायित्व निभाने की जिम्‍मेदारी आ गई। एक निजी संस्‍थान से राष्‍ट्रीय कृत संस्‍थान के रूप में बदलाव और स्‍वतंत्रता प्राप्ति के बाद  अर्थव्‍यवस्‍था में इसकी नई भूमिका दुर्जेय थी। रिज़र्व बैंक के साल-दर-साल विकास की राह पर चलते हुए कई कहानियां बनीं, जो समय के साथ इतिहास बनती चली गई।
    1935 में रिज़र्व बैंक की स्‍थापना से पहले केन्‍द्रीय बैंक के मुख्‍य कार्यकलाप प्राथमिक तौर पर भारत सरकार द्वारा संपन्‍न किये जाते थे और कुछ हद तक ये कार्य 1921 में अपनी स्‍थापना के बाद भारतीय इम्‍पीरियल बैंक द्वारा संपन्‍न होते थे। नोट जारी करने का नियमन, विदेशी विनिमय का प्रबंधन एवं राष्‍ट्र की अभिरक्षा और विदेशी विनिमय भंडार जैसे कार्यों की जिम्‍मेदारी भारत सरकार की हुआ करती थी। इम्‍पीरियल बैंक सरकार के बैंक के रूप में काम करता था और व्‍यावसायिक बैंक के रूप अपनी प्राथमिक गतिविधियों के अलावा यह एक सीमित हद तक बैंकों के बैंक के रूप में भी काम करता था। जब रिज़र्व बैंक की स्‍थापना हुई, तब भारत में एक हद तक संस्‍थागत बैंकिंग का विकास हुआ और विदेशी बैंकों को सामान्‍य तौर पर विनिमय बैंक के रूप में पहचान मिली।

राजस्थान की प्रशासनिक इकाईयाँ



प्रशासनिक इकाईयाँ
स्वतत्रंता के पश्चात् 1956 में राजस्थान राज्य के गठन के प्रक्रिया पूर्ण हुई। वर्तमान में राज्य को प्रशासनिक दृष्टि से सात संभागों, 33 जिलों और 241 तहसीलों में विभक्त किया गया है।
    1. जयपुर संभाग  
जयपुर, दौसा, सीकर, अलवर एवं झुन्झुँनू जिले।
    2. जोधपुर संभाग
जोधपुर, जालौर, पाली, बाड़मेर, सिरोही एवं जैसलमेर जिले।
    3. भरतपुर संभाग
भरतपुर, धौलपुर, करौली एवं सवाई माधोपुर जिले।
    4. अजमेर संभाग
अजमेर, भीलवाड़ा, टोंक एवं नागौर जिले।
    5. कोटा संभाग
कोटा, बूंदी, बारां एवं झालावाड़ जिले।
    6. बीकानेर संभाग
बीकानेर, गंगानगर, हनुमानगढ़ एवं चूरू जिले।
    7. उदयपुर संभाग
उदयपुर, राजसमंद, डूंगरपुर, बाँसवाड़ा, चित्तौड़गढ़ एवं प्रतापगढ़ जिले।


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राजस्थान में वर्षा जल संरक्षण की शब्दावली


शब्द
शाब्दार्थ
आगौर (पायतान)
वर्षा जल को नाड़ी या तालाब में उतारने के लिए उसके चारों ओर मिट्टी को दबाकर आगोर (पायतान) बनाया जाता है।
टांका
वर्षाजल एकत्रित करने के लिए बनाया गया हौद।
नाडी
छोटी तलैया जिसमें वर्षा का जल भरा जाता है।
नेहटा (नेष्टा)
नाडी या तालाब से अतिरिक्त जल की निकासी के लिए उसके साथ नेहटा बनाया जाता है जिससे होकर अतिरिक्त जल निकट स्थित दूसरी नाड़ी, तालाब या खेत में चला जाये।
पालर पाणी
नाडी या टांके में जमा वर्षा का जल।
बावड़ी
वापिका, वापी, कर्कन्धु, शकन्धु आदि नामों से उद्बोधित। पश्चिमी राजस्थान में इस तरह के कुएं (बावडी) खोदने की परम्परा ईसा की प्रथम शताब्दी के लगभग शक जाति अपने साथ लेकर आई थी। जोधपुर व भीनमान में आज भी 700-800 ई. में निर्मित बावडियां मौजूद है।
बेरी
छोटा कुआं, कुईयां, जो पश्चिमी राजस्थान में निर्मित हैं।
मदार 
नाडी या तालाब में जल आने के लिए निर्धारित की गई धरती की सीमा को मदार कहते हैं। मदार की सीमा में मल-मूत्र त्याग वर्जित होता है।


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राजस्थान की प्रमुख नदियों का विवरण


1) चम्बल नदी
   
इस नदी का प्राचीन नाम चर्मावती है। कुछ स्थानों पर इसे कामधेनु भी कहा जाता है। यह नदी मध्य प्रदेश के मऊ के दक्षिण में मानपुर के समीप जनापाव पहाड़ी (616 मीटर ऊँची) के विन्ध्यन कगारों के उत्तरी पार्श्व से निकलती है। अपने उदगम् स्थल से 325 किलोमीटर उत्तर दिशा की ओर एक लंबे संकीर्ण मार्ग से तीव्रगति से प्रवाहित होती हुई चौरासीगढ़ के समीप राजस्थान में प्रवेश करती है। यहां से कोटा तक लगभग 113 किलोमीटर की दूरी एक गार्ज से बहकर तय करती है। चंबल नदी पर भैंस रोड़गढ़ के पास प्रख्यात चूलिया प्रपात है। यह नदी राजस्थान के कोटा, बून्दी, सवाई माधोपुर व धौलपुर जिलों में बहती हुई उत्तर-प्रदेश के इटावा जिले मुरादगंज स्थान में यमुना में मिल जाती है। यह राजस्थान की एक मात्र ऐसी नदी है जो सालभर बहती है। इस नदी पर गांधी सागर, राणा प्रताप सागर, जवाहर सागर और कोटा बैराज बांध बने हैं। ये बाँध सिंचाई तथा विद्युत ऊर्जा के प्रमुख स्रोत हैं। चम्बल की प्रमुख सहायक नदियों में काली, सिन्ध, पार्वती, बनास, कुराई तथा बामनी है। इस नदी की कुल लंबाई 965 किलोमीटर है। यह राजस्थान में कुल 376 किलोमीटर तक बहती है।
2) काली सिंध
यह चंबल की सहायक नदी है। इस नदी का उदगम् स्थल मध्य प्रदेश में देवास के निकट बागली गाँव है। कुध दूर मध्य प्रदेश में बहने के बाद यह राजस्थान के झालावाड़ और कोटा जिलों में बहती है। अंत में यह नोनेरा (बरण) गांव के पास चंबल नदी में मिल जाती है। इसकी कुल लंबाई 278 किलोमीटर है।
3) बनास नदी
   
बनास एक मात्र ऐसी नदी है जो संपूर्ण चक्र राजस्थान में ही पूरा करती है। बनअआस अर्थात बनास अर्थात (वन की आशा) के रुप में जानी जाने वाली यह नदी उदयपुर जिले के अरावली पर्वत श्रेणियों में कुंभलगढ़ के पास खमनौर की पहाड़ियों से निकलती है। यह नाथद्वारा, कंकरोली, राजसमंद और भीलवाड़ा जिले में बहती हुई टौंक, सवाई माधोपुर के पश्चात रामेश्वरम के नजदीक (सवाई माधोपुर) चंबल में गिर जाती है। इसकी लंबाई लगभग 480 किलोमीटर है। इसकी सहायक नदियों में बेडच, कोठरी, मांसी, खारी, मुरेल व धुन्ध है। (i )बेडच नदी 190 किलोमीटर लंबी है तथा गोगंडा पहाड़ियों (उदयपुर) से निकलती है। (ii )कोठारी नदी उत्तरी राजसमंद जिले के दिवेर पहाड़ियों से निकलती है। यह 145 किलोमीटर लंबी है तथा यह उदयपुर, भीलवाड़ा में बहती हुई बनास में मिल जाती है। (iii) खारी नदी 80 किलोमीटर लंबी है तथा राजसामंद के बिजराल की पहाड़ियों से निकलकर देवली (टौंक) के नजदीक बनास में मिल जाती है।

राजस्थान की प्रमुख झीलें व बांध


जिला
झीलें/बांध
अजमेर
आना सागर, फाई सागर, पुष्कर, नारायण सागर बांध
अलवर
राजसमन्द, सिलीसेढ़
बाँसवाड़ा  
बजाज सागर बांध, कहाणा बांध
भरतपुर
शाही बांध, बारेण बांध, बन्ध बरेठा बांध
भीलबाड़ा
सरेपी बांध, उन्मेद सागर, मांड़लीस, बखड़ बांध, खाड़ी बांध, जैतपुर बांध
बीकानेर  
गजनेर, अनुप सागर, सूर सागर, कोलायतजी
बूंदी  
नवलखाँ झील
चित्तौड़गढ़
भूपाल सागर, राणा प्रताप सागर
चुरु  
छापरताल
धौलपुर
तालाबशाही
डूंगरपुर
गौरव सागर
जयपुर
गलता, रामगढ़ बांध, छापरवाड़ा
जैसलमेर
धारसी सागर, गढ़ीसर, अमर सागर, बुझ झील
जोधपुर
बीसलपुर बांध, बालसमन्द, प्रताप सागर, उम्मेद सागर, कायलाना, तख्त सागर, पिचियाक बांध
कोटा
जवाहर सागर बांध, कोटा बांध
पाली
हेमा बास बांध, जवाई बांध, बांकली, सरदार समन्द
सिरोही
नक्की झील (आबू पर्वत)
उदयपुर
जयसमन्द, राजसमन्द, उदयसागर, फतेह सागर, स्वरुप सागर और पिछोला

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Thursday, 16 February 2012

जिलानुसार राजस्थान की नदियां

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जिला
प्रवाहित होने वाली नदियां
अजमेर
सागरमती, सरस्वती, खारी, डाई, बनास
अलवर
साबी, रूपारेल, काली, गौरी, सोटा
उदयपुर
बनास, बेड़च, वाकल, सोम, जाखम, साबरमती
कोटा
चम्बल, काली, सिंध, पार्वती, आउ, नवेजा, परबन
गंगानगर
घग्घर
चित्तौड़गढ़
बनास, बेड़च, बामणी, बागली, बागन, औराई, गम्भीरी, सीबना, जाखम, माही
चूरू
कोई नदी नहीं
जयपुर
बाणगंगा, बांडी, ढूंढ, मोरेल, साबी, डाई, सखा, माशी
जालौर
लूनी, बांडी, जवाई, सूकड़ी
जैसलमेर
काकनेय, लाठी, चांघण, धडआ, धोगड़ी
जोधपुर
लूनी, माठड़ी, जोजरी
झालावाड़
कालीसिंध, पार्वती, छोटी कालीसिंध, निववाज
झुंझुनू
कांतली
टोंक
बनास, माशी, बांडी
डूंगरपुर
सोम, माही, सोनी
नागौर
लूनी
पाली
लीलड़ी, बांडी, सूकड़ी, जवाई
बाड़मेर
लूनी, सूकड़ी
बांसवाड़ा
माही, अन्नास, चैनी
बीकानेर
कोई नदी नहीं
बूंदी
कुराल
भरतपुर
चम्बल, बरहा, बाणगंगा, गंभीरी, पार्वती
भीलवाड़ा
बनास, कोठारी, बेड़च, मेनाली, मानसी, खारी
सवाई माधोपुर
चम्बल, बनास, मोरेल
सिरोही
पं. बनास, सूकड़ी, पोसालिया, खाती, खिशनावती, भूला और सुखदा
सीकर
कान्तली, मन्था, पावटा, कावंत
धौलपुर
चम्बल
दौसा
मोरेल, बाणगंगा
बारां
पार्वती, कुकू, परवान
राजसमंद
बनास, चंद्रभागा, खारी

Rajasthan GK Fact Set 06 - "Geographical Location and Extent of the Districts of Rajasthan" (राजस्थान के जिलों की भौगोलिक अवस्थिति एवं विस्तार)

Its sixth blog post with new title and topic- "Geographical Location and Extent of the Districts of Rajasthan" (राजस्थान के ...