वीरता और स्वाभिमान की अमर ज्योति - महाराणा प्रताप : एम.सी. कटरपंच


एम.सी. कटरपंच
यह राजस्थान है, जहाँ वीरता बोलती है और गौरव गूँजता है। जी हाँ, यह राजस्थान की वीर प्रसुता भूमि है, जहाँ रणबांकरे, कुम्भा की बहादुरी के गीत कहे जा रहे हैं, आजादी के दीवाने जयमल और पन्ना के त्याग और सूरवीरता के प्रसंगों की कहानियाँ सुनाई जाती हैं। अपनी समस्त देह पर तलवारों के घाव खाकर भी न घबराने वाले राणा सांगा का पराक्रम इतिहास का एक अद्वितीय पृष्ठ बन गया है तो अपने सम्मान और सतीत्व की रक्षा के लिये अग्नि की प्रज्जवलित ज्वालाओं में कूदकर अपने प्राणों का जौहर कर देने वाली राजपूती वीरांगना महारानी पद्‌मनी का बलिदान भारतीय नारियों के लिये चिर प्रेरणा का स्रोत बन गया है। और हाँ, महाराणा प्रताप का नाम तो जैसे राजस्थान का गौरव और इसकी महानता के साथ ही वीरता का पर्याय बन गया है।
राजस्थान के सिसोदिया राजपूत परिवार में जन्में महाराणा प्रताप की रंगों में क्षत्रिय रक्त था, महाराणा उदय सिंह का तथा भावना थी, त्याग, बलिदान और अथक परिश्रम की, जो उन्हें अपनी माता (कृषक महिला) से मिली थी। राजगद्दी पर बैठते ही महाराणा प्रताप को अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता और रक्षा के लिये संघर्ष करना पड़ा । मुगल सम्राट अकबर की विस्तारवादी नीति का शिकार राजस्थान के अनेक राजा और महाराजा हो गये थे। परन्तु चित्तौड़ और उदयपुर को प्राप्त करना अकबर के लिये आसान नहीं था। महाराणा प्रताप ने सुख और वैभव का मोह छोड़कर मातृभूमि का मोह अपनाया। राजमहलों का आराम त्यागकर पर्वतों और जंगलों में बसेरा किया और कंदमूल फलकर उदरपूर्ति की। यहाँ तक कि उनके बेटे नन्हें अमर सिंह के हाथों से घास की रोटियाँ भी जंगली बिलाव लेकर भाग गया। कठोर से कठोर सामना किया था ’प्रताप’ ने, लेकिन उनका धैर्य नहीं डगमगाया, स्वाभिमान नहीं हिला। कठिन से कठिन यातनाओं का सामना करने के लिये ही मानो वह उत्पन्न हुए थे।

हल्दीघाटी में अकबर से कई बार उनका युद्ध हुआ और उन्होंने मुगल सेना के छक्के छुड़ा दिये। महाराणा प्रताप के नेतृत्व में राजस्थानी गौरव को आँच न आने देने के लिये राजपूती रक्त खौल रहा था। स्वामीभक्त भामाशाह का त्याग, झाला का शौर्य और चेतक की अदम्य वीरता महाराणा प्रताप को प्रेरित करते रहे और स्वयं प्रताप युद्धस्थल में अपने करतब दिखा रहे थे - मुगल सेना को वह करारा उत्तर दे रहे थे - हमसे टकराना आसान नहीं है। हमें मातृभूमि प्यारी है और उसकी स्वतंत्रता हमें दुलारी है। हम लड़ते-लड़ते मर जायेंगे, परन्तु जीते-जी अपनी और अपने जन्मभूमि पर गुलामी की छाया भी नहीं देख सकेंगे। मातृभूमि के खातिर हम सब कुछ बलिदान कर देंगे। और हाँ, हम सब इसके लिये सदैव तत्पर हैं।
इतिहासकारों के साथ ही महाराणा प्रताप की महानता, वीरता और कुर्बानी को राजस्थानी कवियों ने भी स्वरबद्ध किया है, उनके गौरव के गीत आज राजस्थान के मिट्टी के कण-कण में मुखरित हो रहे हैं। किसी कवि ने कहा - ’ये महाराणा कभी भी तेरा पंजा एड़ी की जगह न आ जाए, पीछे तनिक भी मत हटना, आगे ही बढ़ते जाना’ और सचमुच आगे ही बढ़ता गया। देश की खातिर मर जाना कितना महान है। जन्म भूमि की स्वाधीनता के लिये अपने प्राणों का उत्सर्ग कर देने से बढ़कर और क्या बात हो सकती है -

घर जातां, घूम पलटतां, त्रिया पड़तां तांव,
ए तीनह दिन मरण रां, कहां रंक कहां रांव।

धरती, धर्म और स्त्री जाति पर आपत्ति आने पर मर मिटना महान है। इसी कारण राजस्थानी वीरों ने अपनी मातृभूमि के स्वतंत्र अस्तित्व को चुनौती मिलने पर पने जीवन की आहुति दी है। प्रताप ने अपना मस्तक ऊँचा रखा है, अपनी मातृभूमि का नाम ऊँचा रखा है।
अकबर से लोहा लिया प्रताप ने और ऐसा लोहा लिया कि स्वयं अकबर भी मान गया था कि यदि एक तो प्रताप और हो गये होते तो उसे लौटना पड़ सकता था। हिन्दू समाज क्रमशरू अकबर के अधिकार में जा रहा था, परन्तु प्रताप तो प्रताप ही था, जिसने कभी झुकना सीखा न था -

सुख हित स्याल समाज, हिन्दू अकबर वश हुआ,
रोसीलो मृगराज पडोना राणा प्रताप सो।

गीदड़ रूपी हिन्दू समाज सुख के मोह में अकबर के काबू में हो गया, परन्तु रोसीला एवं क्रोधी सिंह रूपी राणाप्रताप उसके वश में नहीं आ पाया। कोई आसान काम नहीं था, वह तो पारस था, जिसे कोई पा ही नहीं सकता था। अकबर ने चाहे और कितने अनेक पत्थर एकत्रित कर लिये हों, परन्तु वह प्रताप जैसे पारस पत्थर को नहीं ले पाया -

अकबर पथर अनेक, के भूपत भेला किया,
हाथ न लागो हेक, पारस राणा प्रताप सी।

महाराणा प्रताप हिन्दु कुल के यश थे। उन्होंने हिन्दुओं की लाज रखी थी, उस संकट काल में -

लो पै हिन्दू लाज सगपण रौ पै तुरक सूं,
आरज कुल री आज पूंजी राणा प्रताप सी।
कदे न नामें कंध, अकबर ढिंग आवे न ओ,
सुरज बंश संबंध, पालय राणा प्रताप सी।

महाराणा प्रताप उस मणीधारी सर्प के समान हैं, जो अपने प्रकाश से अकबर के साम्राज्य को चका-चैंधित कर रहे थे। अकबर उन्हें अपने पिटारे में कैसे रख सकता था? यही तो एक प्रश्न था -

कल्पय अकबर काय, गुण पुंगीधर गोडिया
मिणधर छावड मांय, पडे न राणा प्रताप सी।

वह अडिग रहे और अटल रहे। सागर अपनी मर्यादा छोड़े तो छोड़ दे, हिमालय हिले तो हिल जो, परन्तु महाराणा प्रताप अपने स्वाभिमान में तनिक भी डगमगाने वाले नहीं थे। अकबर तो क्या किसी के समक्ष भी वह नहीं झुक सकते थे। सूरवीर प्रताप का यश और उनकी कीर्ति अमर रहेगी। शताब्दियां व्यतीत हो जायेंगी, परन्तु भारत के गौरवमयी पक्षतिज पर प्रताप का दैदित्यमान नक्षत्र चिरप्रकाशित रहेगा -

अकबर जासी आप, दिल्ली पासी दूसरा,
पुनरासी परता, सुजस न जासी सूरमा।

अकबर इस संसार से चला जाएगा, दिल्ली दूसरे को मिल जाएगी, परन्तु  प्रताप तेरी वीरता का सुयश नहीं जाएगा, वह तो अमर रहेगा। उनकी अमरता के प्रसंग में प्रसिद्ध इतिहासज्ञ कर्नल जेम्स टाड ने महाराणा प्रताप के विषय में कहा है ष्आलप्स पर्वत की तरह अरावली में भी कोई भी घाटी ऐसी नहीं है, जो महाराणा प्रताप के किसी न किसी वीर कार्य और उज्जवल विजय से पवित्र न हुई हो।


                                                            लेखक परिचय                                  



एम.सी. कटरपंच का जन्म भरतपुर (राजस्थान) में हुआ। एम.ए. (अंग्रेज़ी साहित्य) की शिक्षा जयपुर और दिल्ली से प्राप्त करने के पश्चात्‌ जन सम्पर्क अधिकारी (राजस्थान सरकार), मध्यप्रदेश सरकार में प्रशासनिक कमर्शियल टैक्स अधिकारी के पद से सेवानिवृत हुए। इसके अतिरिक्त पत्रकारिता एवं साहित्य लेखन में भी व्यस्त रहे। टाईम्स ऑफ़ इण्डिया समूह सहित दिल्ली व जयपुर से प्रकाशित देश के अनेक प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के सम्पादकीय मण्डल में शामिल रहे।
    लेख व कविताओं के लिए राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर अनेक बार पुरस्कृत व सम्मानित, राष्ट्रीय समरसता सम्मान से भी सम्मानित व इन्टरनेशल लायन्स क्लब के एक्सीलेंट प्रेजीडेन्टस सम्मान से भी सम्मानित हुए।

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