Tuesday, 13 September 2011

आलेख : राजस्थान की खनिज संपदा - डॉ.प्रभात कुमार सिंघल




रंग रंगीले राजस्थान की परम्पराएं जितनी समृद्ध हैं उतनी ही यहां की धरती खनिज सम्पदाओं से भरपूर है। आजादी के बाद खनिज दोहन के लिए किए गए प्रयासों का परिदृश्य अंचभित कर देता है। राजस्थान को खनिजों का अजायबघर कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। खनिज उत्पादन की दृष्टि से आज राजस्थान को देश का सर्वाधिक समृद्धशाली राज्य होने का गौरव प्राप्त है तथा खनन क्षेत्रों से प्राप्त आय का राष्ट्रीय आय में राज्य का पांचवा स्थान है।

अलौह धातु सीसा, जस्ता एवं ताबां के उत्पादन मूल्य की दृष्टि से देश में राजस्थान का प्रथम स्थान है तथा लौह खनिज टंगस्टन आदि के उत्पादन मूल्य में प्रदेश का चौथा स्थान बन गया है। ईमारती एवं सजावटी पत्थरों के उत्पादन में देश में 95 प्रतिशत उत्पादन कर राजस्थान ने महत्वपूर्ण स्थान बनाया है तथा पिछले वर्षो में ग्रेनाईट के उत्पादन में भी तेजी आई है।

एमरॉल्ड, टंगस्टन, केडमियम आदि खनिज राजस्थान के अलावा अन्य किसी राज्य में उपलब्ध नहीं है। जिप्सम, फलोर्सपार, संगमरमर, केडमियम, चांदी, तामडा, पन्ना, घिया पत्थर, रॉक फॉस्फेट, जास्पर एवं वोल्टोनाइट राजस्थान के प्रमुख एकाधिकार प्राप्त खनिज है।

राजस्थान के खनिज दोहन का बदलता परिदृश्य इसी से आंका जा सकता है कि राज्य में समस्त भारत के उत्पादन का वोलस्टोनाईट एवं जास्पर का 100 प्रतिशत, जस्ता कन्सन्ट्रेट का 99 प्रतिशत, फलोराईट का 96 प्रतिशत, जिप्सम का 93 प्रतिशत, संगमरमर एवं चांदी का 90 प्रतिशत, एस्बेटस का 89 प्रतिशत, सोप स्टोन का 87 प्रतिशत, सीसा कन्सन्ट्रेट का 80 प्रतिशत, रॉक फास्फेट का 75 प्रतिशत, टंगस्टन का 75 प्रतिशत, कोटा स्टोन, फेल्सापार एवं कैल्साइट का 70 प्रतिशत का हिस्सा है।

महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि जहां वर्ष 1950 51 में 17 प्रकार के खनिजों का उत्पादन होता था वहीं वर्तमान में राज्य में 42 प्रधान एवं 23 अप्रधान खनिजों का दोहन किया जा रहा है। लगभग पांच लाख से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रूप से खनन कार्यों में तथा इतने ही व्यक्तियों को अप्रत्यक्ष रुप से रोजगार उपलब्ध हो रहा है। यह कहा जा सकता है कि खनिज खनन एवं खनिज आधारित उद्योग राज्य की अर्थ व्यवस्था के आधार स्तम्भ होने के साथ साथ रोजगार सृजन का प्रमुख स्रोत है।

राज्य में उपलब्ध महत्वपूर्ण खनिज भण्डार उद्योगों के लिए विकसित रीको की आधारभूत सुविधाएं, नई खनिज नीति, सी डॉस (सेंटर फॉर द डवलपमेंट ऑफ द स्टोन) की स्थापना, एकल खिडकी सुविधा, राज्य के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

खनिज दोहन यात्राः

यद्यपि प्राचीन समय से ही राजस्थान की रत्नगर्भा धरती में विविध खनिजों का विपुल भण्डार पाया जाता है तथापि खनिजों की खोज एवं वैज्ञानिक व यांत्रिक तरीके से दोहन का कार्य आजादी के बाद राजस्थान निर्माण के साथ शुरु हुआ और खनिज दोहन की यात्रा अविरल तेजी से जारी है।लौह धातु के अंतर्गत तांबा खनिज की खोज सिरोही के बसंतगढ एवं पिपेला में, उदयपुर के अंजनी व नान्दवेल में तथा जस्ता सीसा खनिज की खोज भीलवाडा के मंजर आगूचा में की गई। ईमारती सजावटी पत्थर में ग्रेनाईट की खोज अजमेर, बांसवाडा, बाडमेर, भीलवाडा, डूंगरपुर, जालोर, जयपुर, सिरोही, पाली, राजसमंद, टोंक, सीकर, सवाईमाधोपुर, दौसा, झुंझुन एवं उदयपुर जिलों में की गई। सोना बांसवाडा में, हीरा प्रतापगढ चित्तौडगढ के केसरपुरा में, टंगस्टन नागोर के डेगाना में, जिप्सम नागौर में, रॉकफास्फेट उदयपुर के झामरकोटडा में तथा फलोर्सपार डूंगरपुर के मांडो की पाल में खोजे गए।

राज्य में खनिजों की खोज और खनन कार्य में आई तेजी का ही परिणाम है कि जहां वर्ष 1950 51 में प्रधान खनिजों के 50 पट्टे, अप्रधान खनिजों के 150 पट्टे तथा 1200 क्वारी लाईसेंस जारी किए गए थे अब बढकर प्रधान खनिजों के 2577 पट्टे, अप्रधान खनिजों के 10 हजार 526 पट्टे एवं 17 हजार 386 क्वारी लाइसेंस तक पहुंच गए हैं।

खनिज व खनन से वर्ष 1950 51 में जहां मात्र 48 लाख रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ था वहीं अब इसमें आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि हुई और वर्ष 2009 10 में खनिज राजस्व बढकर 1612.26 करोड रुपये तक पहुंच गया। चालू वित्तीय वर्ष 2010 11 में 1800 करोड रुपये राजस्व अर्जित करने का लक्ष्य रखा गया है जिसके विपरीत जनवरी माह तक 1380.72 करोड रुपये का खनिज राजस्व अर्जित किया गया है। वर्तमान राज्य सरकार के कार्यकाल में जनवरी 2011 तक कुल 2992.98 करोड रुपये का खनिज राजस्व अर्जित किया गया तथा अवैध खनन व निर्गम की रोकथाम के लिए की गई जांच से 82.55 लाख रुपये की वसूली की गई।

खनिज सम्पदा के दोहन में कई संस्थान क्रियाशील है। केन्द्र सरकार का प्रतिष्ठान हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड सीसा जस्ता के दोहन में, हिन्दुस्तान कॉपर लिमिटेड तांबा के दोहन में एवं भारतीय उर्वरक निगम जिप्सम के दोहन में लगे हैं। राजस्थान सरकार के प्रतिष्ठान राजस्थान राज्य माईन्स एण्ड मिनरल लिमिटेड रॉक फॉस्फेट, जिप्सम, लाईम स्टोन स्टील ग्रेड का, मार्बल के खनन में तथा राजस्थान राज्य खनिज विकास निगम रॉक फॉस्फेट, ग्रेफाइट, लाईमस्टोन, फलूओराइट, स्लेट, बैण्टोनाईट, लिग्नाईट आदि के खनन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

उदयपुर का योगदानः

राज्य की खनिज सम्पदा एवं दोहन में उदयपुर जिले का महत्वपूर्ण योगदान है। जिले की सराडा तहसील में नाथरा की पाल नामक स्थान के पास एक किलोमीटर लंबाई में अरावली की चट्टानों में पाए गए लौह खनिज में 48 से 52 प्रतिशत लौह अंश वाला हेमेटाईट लौहा प्राप्त होता है। अल्प मात्रा में चंादी उदयपुर के जावर एवं राजपुरा दरीबा से मिलती है।

उदयपुर से 40 किलोमीटर दूर दक्षिण पूर्व जावर खानों में सीसा जस्ता का प्रमुख उत्पादन होता है। यहां 20 किलोमीटर लंबाई में खनिज पट्टी फैली हुई है। जिसमें मोचिया, बलारिया, जावरमाला एवं बोराई की खाने प्रमुख हैं। जस्ते के परिशोधन के लिए उदयपुर के देबारी में जिंक स्मेल्टर प्लान्ट स्थापित किया गया है। वर्ष 1963 में उदयपुर के राजपुरा दरीबा क्षेत्र में सीसे जस्ते के भण्डारों का पत्ता लगाया गया। जावर खानों में केडमियम के अयस्क सीसा जस्ता सल्फाईड अयस्कों के साथ मिलते हैं। उदयपुर जिले में बूबानी, राजगढ, कालागुमान, टिक्की, गुढा, गोगुन्दा गांवों में पन्ना (एमरॉल्ड) पाया गया है। उदयपुर में संगमरमर, टैल्क, लाईमस्टोन तथा बैराइट भी पाया जाता है।

हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेडः

जस्ता प्रदावण प्रौद्योगिकी को अंगीकार करते हुए हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड 10 जनवरी 1966 को अपनी स्थापना से लेकर निरन्तर खनिज उत्पादन में अपना महत्वपूर्ण योगदान कर रहा है। स्थापना के समय सयंत्र की क्षमता 500 टन प्रति दिन सीसा जस्ता अयस्क खनन थी जो अब बढकर 10 हजार अयस्क टन से अधिक हो गई है। राजस्थान में इस कम्पनी की खानें जावर, राज दरीबा, रामपुरा आगूचा भीलवाडा, उदयपुर, डेगाना नागर में हैं। कम्पनी के 2 प्रदावक सयंत्र देबारी जिंक स्मेल्टर उदयपुर में तथा चंदेरिया लेड जिंक स्मेल्टर चित्तौडगढ में हैं। हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड में प्रति वर्ष केडमियम, चांदी, गंधक, फास्फोरिक एसिड व कोबाल्ट का उत्पादन किया जाता है। कम्पनी ने जस्ता धातु के निर्यात क्षेत्र में भी अपने कदम बढाये हैं।

झामरकोटडा खनन क्षेत्र

उदयपुर से दक्षिण पूर्व में 26 किलोमीटर दूर झामरकोटडा में वर्ष 1968 में खान एवं भूगर्भ विभाग द्वारा की गई रॉक फॉस्फेट खनिज की खोज ने राजस्थान का देश में अपना विशिष्ट स्थान बना दिया। यहां करीब 16 किलोमीटर लम्बी रॉक फास्फेट की पट्टी खोजी गई जिसमें 16 से 35 प्रतिशत फास्फेट की मात्रा पाई जाती है। रॉक फास्फेट परत की औसतन चौडाई 5 से 15 फीट है। यहां करीब 750 लाख टन रॉक फास्फेट का भण्डार होने का आंकलन किया गया है। देश में रॉक फॉस्फेट का यह सबसे बडा भण्डार है जो देश के उर्वरक एवं रासायनिक कारखानों की सीधी आपूर्ति सुनिश्चित करता है। कृषि प्रधान भारत देश में उर्वरक उत्पादन में रॉक फास्फेट का उत्पादन महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यहां से 11 लाख मेट्रिक टन से अधिक रॉक फॉस्फेट का विपणन किया जा रहा है।

रॉक फॉस्फेट के खनन, परिशोधन एवं विपणन का कार्य राज्य सरकार के प्रतिष्ठान राजस्थान स्टेट माईन्स एण्ड मिनरल्स लिमिटेड द्वारा किया जाता है। खनन का कार्य ऑपन कॉस्ट पद्धति से पूर्ण वैज्ञानिक एवं यांत्रिक रुप से होता है। उत्खनन का कार्य का कम्पनी हर वर्ष एक नया रिकॉर्ड स्थापित करती है। निम्न श्रेणी के रॉक फास्फेट का परिशोधन कर उच्च श्रेणी का रॉक फास्फेट तैयार करने के लिए झामरकोटडा खान स्थल पर ही आधुनिक तकनीक पर आधारित एक परिशोधन सयंत्र वर्ष 1992 93 में स्थापित किया गया है जिसकी परिशोधन क्षमता 3 हजार टन प्रतिदिन हैं। वर्तमान में खान के पश्चिमी पिट एवं केन्द्रीय पिट में छिद्रण, ब्लास्टिंग कर रॉक फास्फेट दोहन का कार्य किया जा रहा है।

झामरकोटडा के खनन क्षेत्र में पर्यावरण सरंक्षण पर भी विशेष ध्यान दिया गया हैं तथा चरणबद्ध रुप से यहां 202.44 हैक्टेयर में वृक्षारोपण किया गया हैं। जटरोफा का व्यापक बीजारोपण कर बॉयो डीजल बनाने का यहां सफल प्रयोग किया गया हैं। यहां की खदानों से निकलने वाले पानी का शुद्धिकरण कर इसे समीपस्थ आबादी के साथ साथ उदयपुर के उपनगरीय क्षेत्रों केा पेयजल के रुप में उपलब्ध कराया जा रहा है।

उदयपुर से 66 किलोमीटर दूर केशरियाजी क्षेत्र में आधुनिक यांत्रिकी पद्धति से ग्रीन मार्बल का खनन भी राजस्थान राज्य माईन्स एण्ड मिनरल्स लिमिटेड द्वारा किया जा रहा है। राजस्थान में खनिज उत्पादन का तेजी से आगे बढता परिदृश्य निशिचत ही अब राज्य सरकार के नई खनिज नीति से ओर अधिक सुदृढ बनेगा। आशा की जा सकती हैं कि खनिजों की खोज ओर खनन में हाल ही में घोषित नई खनिज नीति वरदान बनेगी।

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