Friday, 30 September 2011

राजस्थान की प्रमुख कला एवं सांस्कृतिक इकाइयां

नाम, स्थान, स्थापना

राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृत अकादमी, बीकानेर 25 जनवरी, 1983
राजस्थान ब्रजभाषा अकादमी,जयपुर, 19 जनवरी 1986
राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, जयपुर, 15 जुलाई 1969
राजस्थान संस्कृत अकादमी, जयपुर, 1981
अरबी फारसी शोध संस्थान, टोंक, दिसम्बर 1978
राजस्थान सिन्धी अकादमी, जयपुर, 1979
विद्या भवन संस्थान, उदयपुर, 1931
राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर, 23 जनवरी 1958
राजस्थान अभिलेखागार, बीकानेर
रुपायन संस्थान बोरुंदा, जोधपुर, 1960
रवीन्द्र रंगमंच, जयपुर, 15 अगस्त 1963
जयपुर कथक केन्द्र, जयपुर, 1978
राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, जोधपुर
पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग, जयपुर
राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट्स, जयपुर, 1866
राजस्थान ललित कला अकादमी, जयपुर, 1957
राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर, 1950

Sunday, 25 September 2011

राजस्थान प्रश्नोत्तरी 7

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1. गलताजी के बाद रामानंद संप्रदाय की दूसरी महत्वपूर्ण पीठ कहाँ है ?
  • सलेमाबाद
  • जोधपुर
  • ✓​ रेवासा
  • जालोर
भक्तमाल में रामानंद जी के बारह शिष्य कहे गए हैं अनंतानंद, सुखानंद, सुरसुरानंद, नरहर्यानंद, भावानंद, पीपा, कबीर, सेन, धाना, रैदास, पद्मावती और सुरसरी। राजस्थान में रामानंन्दी संप्रदाय का श्रीगणेश संत श्री कृष्णदासजी पयहारी ने किया, जो अनन्तानंद जी के परमशिष्य थे। पयहारी ने गलताजी, जयपुर ( जो तत्समयनाथियों का प्रमुख केन्द्र था ) में नाथपंथियों को शास्त्रार्थ में पराजित कर रामानंदी संप्रदाय की पीठ स्थापित की, जो राजस्थान में प्रमुख पीठ है। पयहारीजी के शिष्य उग्रदासजी नें सीकर के पास रेवासा में इस संप्रदाय की अन्य पीठ स्थापित की थी।


2. जयपुर के शासक रहे कछवाहा मध्यप्रदेश के नरवर से आये थे। उस समय लगभग संपूर्ण पूर्वी राजस्थान पर, यानि चम्बल के पश्चिमी तरफ किस जातीय समूह का शासन था, जिसके एक शासक के साथ धोखा कर दूल्हा राय कछवाहा ने अपने राज्य की नींव रखी थी ?

  • ✓​ मीणा
  • गुर्जर
  • ब्राह्मण
  • जाट
जयपुर में प्राथमिक रुप से जागीरदारों का विभाजन 'बारह कोटड़ी 'से आधारित था, सरदारों में सबसे मुख्य राजपूत कछवाहा थे, जो राजा के निकट सम्बन्धी होते थे। जयपुर के समीप स्थित आमेर का किला कछवाहा राजपूतों के गौरवशाली इतिहास का गवाह है। आमेर की घाटी में मीणाओं को फतह कर उन्होंने जब आमेर नगरी बसाई तो वहीं एक पहाडी पर उन्होंने भव्य किले का निर्माण कराया था। वही किला आज आमेर फोर्ट के नाम से विख्यात है।


3. संगम योजना का सम्बन्ध है-

  • ✓​ विकलांगों से
  • पहाड़ियों से
  • नदियों से
  • विधवाओं से
संगम योजना का उद्देश्य विकलांगों के कल्याण में वृद्धि है।


4. ब्राह्मण और भील पुजारी मिल कर इनकी पूजा करते हैं। राजसमन्द के केलवाडा के पास रीछडा में इन लोक देवी का भव्य मंदिर है। ज्येष्ठ शुक्ल अष्टमी को यहाँ भीलों का विशाल मेला भरता है। कौनसी देवी हैं ?

  • ✓​ आमजा माता
  • घेवर माता
  • बाण माता
  • सुगाली माता

5. " साँझी लीला" भी किशनगढ़ शैली का प्रतिनिधि चित्र है , जो निहालचंद ने बनाया था। इस शैली के अन्य चित्रों "बनी ठनी", "दीपावली चित्र", "चाँदनी रात की संगोष्ठी" आदि से इस चित्र को अलग करने वाली बात है -

  • शुक नासिका
  • ✓​ राधा की पोशाक में कृष्ण
  • कमान जैसी भवें
  • मत्स्याकार आँखें

6. जंगी ढोल की तान पर शेर और शिकारी शाम को नृत्य शुरू करते हैं, जो देर रात तक चलता रहता है। शेर और कोई नहीं , रुई लपेटे पुरुष ही होते हैं। बच्चे इस बिखरी रुई को इकट्ठा कर घर ले जाते है। मानते हैं कि बीमार होने पर बच्चों के गले में इस रुई का धागा बांधने से बीमारी ठीक हो जाती है। किस कस्बे में यह स्वांग होता है ?

  • ✓​ मांडल
  • भिनाय
  • नसीराबाद
  • ब्यावर

7. सीता से जुड़े स्थान राजस्थान में कई जगह हैं। बारां में सीता बाड़ी का स्थान अपने विशाल मेले के लिए प्रसिद्ध है , तो इस ज़िले में सीता माता का नाम मशहूर अभयारण्य से जुड़ा है –

  • ✓​ प्रतापगढ़
  • बूंदी
  • बांसवाडा
  • उदयपुर

8. उन्होंने उम्र भर गांधारी की तरह आँखों पर पट्टी बाँधे रखी थी। गांधारी अपने पति की अन्धता में सहभागी बनी थी, परन्तु राजस्थान की इन महिला संत ने पट्टी इस लिए बांधी थी, ताकि अपने आराध्य कृष्ण के सिवा किसी अन्य को देखना इन्हें गवारा नहीं था। इन्हें जानते हैं ?

  • सहजोबाई
  • ज्ञानमतीबाई
  • ✓​ समानबाई
  • भूरीबाई

9. मारवाड़ जंक्शन से मावली जंक्शन जब आप रेल से जाते हैं तो रास्ते में अरावली को पार करना होता है। मारवाड़ को मेवाड़ से जोड़ने वाले इस महत्वपूर्ण मार्ग पर स्थित पर्वतीय घाट का नाम क्या है ?

  • केवड़ा की नाल
  • ✓​ गोरम घाट
  • रतनपुरा घाट
  • चीरवा घाट
झीलवाड़ा की नाल , जिसे देसूरी की नालया पगल्या नाम से भी जाना जाता है, मेवाड़ को मारवाड़ से जोड़ती है। मुगलों के समय हल्दीघाटी के युद्ध के पश्चात् मुगलों ने अधिकांश आक्रमण इसी नाल से घुस कर किये। इसके अतिरिक्त मेवाड़ को मारवाड़ से जोडऩे वाली अन्य नाल सोमेश्वर की नाल, हाथीगुड़ा की नाल, भाणपुरा की नाल (राणकपुर का घाटा), कामली घाट, गोरम घाट व काली घाटी है। 


10. बाणगंगा पर जब अजान बाँध बनाया गया तो, उसके लिए खोदी गयी मिट्टी के कारण एक छिछला तालाब सा बन गया। फिर यहाँ पानी भरा तो घने पेड़ उग आये और पंछियों का बसेरा भी बन गया। पंछियों ने इस जगह का नाम रोशन कर दिया।

  • ✓​ केवलादेव
  • रामसागर
  • तालाबशाही
  • जमवारामगढ़

11. मंडरायल के किले को ग्वालियर की कुंजी कहा जाता था. यह किस जिले में स्थित है?

  • ✓​ सवाई माधोपुर
  • करौली
  • धोलपुर
  • बारां

12. थेवा कला में कांच और सोने की जुगलबंदी देखते ही बनती है। कांच की ज़मीन पर सोने का काम करने वाले सुनारों को कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं। इस कला में कांच का रंग अधिकतर होता है ?

  • लाल
  • पीला
  • सफेद
  • ✓​ हरा
थेवा कला में पहले कांच पर सोने की बहुत पतली वर्क या शीट लगाकर उस पर बारीक जाली बनाई जाती है, जिसे थारणा कहा जाता है। दूसरे चरण में कांच को कसने के लिए चांदी के बारीक तार से फ्रेम बनाया जाता है, जिसे "वाडा" कहा जाता है। तत्पश्चात इसे तेज आग में तपाया जाता है। फलस्वरूप शीशे पर सोने की कलाकृति और खूबसूरत डिजाइन उभर कर एक नायाब और लाजवाब कृति का आभूषण बन जाती है।


13. शासक को भी कोई देशनिकाला देते हैं ? लेकिन अँग्रेज़ों ने इन सीकर के इन महाशय को चार वर्षों के लिए 1937 में सीकर से बाहर भेज कर जनता को बता दिया कि असली शासक कौन था –

  • ✓​ कल्याण सिंह
  • राम सिंह
  • फ़तेह सिंह
  • शिव सिंह

14. यह इमारती लकड़ी राजस्थान के दक्षिणी भाग में मिलती है और अँग्रेजों ने इसके दोहन के लिए रेल लाइनें तक बिछा दी थी। इसमें मौजूद तेल की खुशबू के कारण दीमक इससे दूर रहती है।

  • ✓​ सागवान
  • सेमल
  • धोक
  • साल

15. राजस्थान का यह स्थान देहली और मुंबई के ठीक बीच में होने से यहाँ एयरपोर्ट ऑथोरिटी ऑफ़ इंडिया ने अपना केंद्र बना रखा है।

  • उदयपुर
  • ✓​ प्रतापगढ़
  • जयपुर
  • कोटा
 मुंबई और दिल्ली के हवाई मार्ग के लगभग एकदम बीच में होने की वजह से प्रतापगढ़ शहर के नज़दीक धरियावद मार्ग पर 'एयरपोर्ट ऑथोरिटी ऑफ इंडिया' ने एक 'वी ओ आर स्टेशन' (वायुयान संकेतक केंद्र) स्थापित किया है. राजस्थान सरकार ने अप्रैल २०११ में लगभग २ किलोमीटर लंबी,बड़े जेट विमानों तक के उतरने लायक एक हवाई पट्टी गांव वरमंडल में ( जो मुख्यालय से १२ कि.मी. दूर है ) मंज़ूर की है


16. इस जाति के लोग खुद को कहते तो हिन्दू हैं , परन्तु किसी व्यक्ति के मरने पर उसके शव को जलाने की बजाय गाड़ते हैं। यही नहीं मृतक के मुँह में गंगा जल की जगह शराब की बूँदें भी डालते हैं !

  • सहरिया
  • भील
  • सांसी
  • ✓​ कंजर

17. सटका शरीर के किस अंग का आभूषण है ?

  • गला
  • ✓​ कमर
  • नाक
  • पैर

18. बलदेव, डालू राम और सालिगराम इस चित्र शैली के माने हुए कलाकार रहे हैं। बलदेव ने गुलाम अली के साथ मिल कर प्रसिद्ध चित्र "गुलिस्ताँ" बनाया था, जिस पर उस समय में एक लाख रुपये खर्च हुए थे। सुनहरे रंगों वाली इस चित्र शैली को पहचानिए -

  • मेवाड़ी
  • बूंदी
  • मारवाड़ी
  • ✓​ अलवर

19. जयपुर रियासत ने 1924 में एक कानून बनाकर इस जाति के प्रत्येक परिवार के 12 वर्ष से ऊपर के स्त्री पुरुषों को नजदीक के पुलिस थाने पर रोजाना हाजिरी देना अनिवार्य कर दिया था। कभी इस क्षेत्र के मूल शासक रहे लोगों के लिए यह एक अमानवीय स्थिति थी। 1946 में जाकर इस कानून से बड़े आंदोलनों के बाद छुटकारा पाया जा सका था। कौनसी अभागी जाति थी ?

  • गुर्जर
  • भील
  • ✓​ मीणा
  • जाट

20. कांच की तरह पारदर्शी संगमरमर का यह झूमर गुम्बद से लटकता रहता है। वास्तव में शिल्पी शोभनदेव ने कमाल ही कर दिया था। पूरे में मंदिर में अर्ध विकसित कमल के फूलों सी संगमरमर की ऐसी ही कलाकृतियाँ नजर आती हैं। कहाँ पर देख पाएंगे इस मंदिर को ?

  • चारभुजा
  • रणकपुर
  • ✓​ आबू
  • चित्तौड़

21. विन्ध्य की घाटियों में विचरण करती यह बकरी आपको राजस्थान के पूर्वी भागों में मिलेगी। प्रदेश की आकर में यह सबसे छोटी बकरी है , लेकिन काम चारा खाकर भी यह तुलनात्मक रूप से दूध की मात्रा अधिक देती है। कौनसी नस्ल की हम बात कर रहे हैं ?

  • जखराना
  • लोही
  • जमनापारी
  • ✓​ बारबरी

22. तलवार की नोक को क्या कहते है ?

  • ✓​ अणी
  • फाल
  • बाढ़
  • मूठ

23. इंदिरा गाँधी नहर के बाईं तरफ की जमीन ऊँची होने से उस तरफ पानी पहुँचाने के लिए पानी को लिफ्ट किया जाता है. ऐसी अभी तक सात लिफ्ट नहरें हैं. इनमें सबसे लंबी नहर है?

  • वीर तेजाजी नहर
  • कंवरसेन नहर
  • ✓​ गुरु जम्भेश्वर नहर
  • जयनारायण व्यास नहर

24. मेगा हाई वे परियोजना के संचालन के लिए गठित उपक्रम है-

  • ✓​ रिडकोर
  • रेडा
  • सिडको
  • रीको
मेगा हाइवे परियोजना के क्रियान्वन हेतु राजस्थान सरकार एवं मैसर्स आईएल एंड एफएस के मध्य 50:50 की भगीदारी से एक संयुक्त उपक्रम रोड इन्फास्ट्रक्चर डवलपमेंट आॅफ राजस्थान लिमिटेड ( रिडकोर ) की स्थापना अक्टूबर, 2004 में की गई थी।


25. जेलर मगन राज व्यास के कहने पर उम्र कैदी अब्दुल रहमान और उसके साथियों ने भूख हड़ताल पर बैठे इन स्वतंत्रता सेनानी की इतनी पिटाई की कि उनकी पसली ही टूट गयी. पिटाई और तेज गर्मी के कारण इन्हें आये तेज बुखार और दस्त ने आखिर १९ जून १९४२ को इनकी जान ही ले ली, क्योंकि निर्दयी शासन ने उपचार भी नहीं करवाया. कौन थे यह महान सेनानी ?

  • सागरमल गोपा
  • जय नारायण व्यास
  • बीरबल सिंह
  • ✓​ बालमुकुंद बिस्सा  

Sunday, 18 September 2011

राजस्थान प्रश्नोत्तरी 6



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1. 1920 में भीलों व किसानों में पूर्ण एकता स्थापित करने के मुख्य उद्देश्य को लेकर एक्की आंदोलन प्रारम्भ करने वाले थे -
  • विजय सिंह पथिक
  • गोविन्द गुरु
  • ✓​ मोतीलाल तेजावत
  • माणिक्य लाल वर्मा
यह आंदोलन 1920 में माद्री पट्टा तथा जलसा में अनुचित लाग-बागों और बैठ-बेगार के विरोध में आरंभ किया गया था। भील आंदोलन का दूसरा चरण मोतीलाल तेजावत के नेत्रत्व में चले एकी आंदोलन के रूप में चला। यह आंदोलन भील क्षेत्र भोमट में चलाया गया था अतः इसे भोमट भील आंदोलन के आंदोलन के नाम से जाना जाता है। भीलों में एकता स्थापित करने के इस अभियान को ही एकी आंदोलन कहा जाता है। 


2. 'लांगूरिया' का संबंध किस देवी से है ?
  • शीतला माता 
  • औसियां माता 
  • शाकम्भरी माता 
  • ✓​ कैलादेवी 
करोली स्थित कैलादेवी मंदिर के सामने प्रांगण में गणेशजी व भैरवजी की मूर्तियां हैं जिन्हे प्राकृत बृज भाषा में 'लांगूरिया' कहते है। इनके भक्त इनकी अराधना में 'लांगूरिया' गीत गाते है।


3. इस पेड़ का सिर तपती आग में और पैर बहते पानी में डूबे होने चाहिए । राजस्थान में इस पेड़ के विकास की संभावनाओं को देखते हुए 1955 से ही बीकानेर में अनुसंधान केन्द्र स्थापित कर दिया गया था। यह पेड़ है -
  • नीम
  • ✓​ खजूर
  • शहतूत
  • आम

4. राजस्थान में 1857 के विद्रोह की शुरूआत इस दिन और इस स्थान से हुई - 
  • 03 जून, नीमच
  • 23 अगस्त, एरिनपुरा
  • 09 अगस्त, अजमेर
  • ✓​ 28 मई, नसीराबाद
सबसे पहले नसीराबाद में इस विद्रोह की शुरू आत हुई थी। इसके पीछे मुख्य कारण यह था कि ब्रिटिश सरकार ने अजमेर की 15वीं बंग़ाल इन्फ़ेन्ट्री को नसीराबाद भेज दिया था क्योंकि सरकार को इस पर विश्‍वास नहीं था। सरकार के इस निर्णय से सभी सैनिक नाराज हो गये थे और उन्होंने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ़ क्रांति का आगाज कर दिया। इसके अतिरिक्त ब्रिटिश सरकार ने बम्बई के सैनिकों को नसीराबाद में बुलवाया और पूरी सेना की जंाच पड़ताल करने को कहा। ब्रिटिश सरकार ने नसीराबाद में कई तोपे तैयार करवाई। इससे भी नसीराबाद के सैनिक नाराज हो गये और उन्होंने विद्रोह कर दिया। सेना ने कई ब्रितानियों को मौत के घाट उतार दिया साथ ही साथ उनकी सम्पत्ति को भी नष्ट कर दिया। इन सैनिकों के साथ अन्य लोग भी शामिल हो गये।


5. मीरां की तरह यह शहजादी भी कृष्ण की उपासिका थी । शहजादी ताज बेगम के गुरु विट्ठल नाथ थे। कहाँ की शहजादी थी, ताज बेगम -
  • टोंक
  • झुंझुनूं
  • ✓​ फतेहपुर
  • तिजारा

6. अलवर जिले में स्थित ऊँची पर्वत चोटियां हैं -
  • ✓​ भैराच, बैराठ
  • बैराठ, मनोहरपुर
  • बबई, रघुनाथगढ़
  • बरवाड़ा, नाहरगढ़
भैराच (७९२ मीटर), बैराठ (७०४ मीटर) अलवर जिले में स्थित है।


7. जर्मनी की एक संस्था के.एफ.डब्ल्यू के सहयोग से राजस्थान के इस जिले में ‘आपणी योजना’ से जनता लाभान्वित हो रही है। पेयजल की इस योजना में जन भागीदारी से प्रबन्ध को सुगम बनाया गया है -
  • ✓​ चुरू
  • जोधपुर
  • पाली
  • बीकानेर
चूरू व हनुमानगढ जिले के 345 गांवों में जर्मनी की एक संस्था के.एफ.डब्ल्यू के सहयोग से राजस्थान के इस जिले में ‘आपणी योजना’ से जनता लाभान्वित हो रही है। इस योजना के तहत हनुमानगढ जिले की नोहर तहसील के 119 और चूरू जिले की चार तहसीलों सरदारशहर, तारानगर, चूरू व राजगढ के 226 गांव जुडे हुए हैं।


8. कांतली नदी के तट पर स्थित इस सभ्यता में पत्थर के मकान बनाये जाते थे, ईंटों से नहीं। उत्खनन में यहां पर चित्रित कपिष वर्णी मृद् पात्र, ताबें आयुध, उपकरण, आभूषण आदि प्राप्त हुए हैं। यह सभ्यता है -
  • बैराठ
  • जोधपुर
  • कालीबंगा
  • ✓​ गणेश्वर
गणेश्वर, राजस्थान के सीकर ज़िला के अंतर्गत नीम-का-थाना तहसील में ताम्रयुगीन संस्कृति का एक महत्त्वपूर्ण स्थल है। गणेश्वर से प्रचुर मात्रा में जो ताम्र सामग्री पायी गयी है, वह भारतीय पुरातत्त्व को राजस्थान की अपूर्व देन है। ताम्रयुगीन सांस्कृतिक केन्द्रों में से यह स्थल प्राचीनतम स्थल है। खेतड़ी ताम्र भण्डार के मध्य में स्थित होने के कारण गणेश्वर का महत्त्व स्वतः ही उजागर हो जाता है। यहाँ के उत्खनन से कई सहस्त्र ताम्र आयुध एवं ताम्र उपकरण प्राप्त हुए हैं। इनमें कुल्हाड़ी, तीर, भाले, सुइयाँ, मछली पकड़ने के काँटे, चूड़ियाँ एवं विविध ताम्र आभूषण प्रमुख हैं। इस सामग्री में 99 प्रतिशत ताँबा है। ताम्र आयुधों के साथ लघु पाषाण उपकरण मिले हैं, जिनसे विदित होता है कि उस समय यहाँ का जीवन भोजन संग्राही अवस्था में था। यहाँ के मकान पत्थर के बनाये जाते थे। पूरी बस्ती को बाढ़ से बचाने के लिए कई बार वृहताकार पत्थर के बाँध भी बनाये गये थे। कांदली उपत्यका में लगभग 300 ऐसे केन्द्रों की खोज़ की जा चुकी हैं, जहाँ गणेश्वर संस्कृति पुष्पित-पल्लवित हुई थी।


9. इस देश का क्षेत्रफल राजस्थान के क्षेत्रफल के लगभग बराबर है -
  • इजराइल
  • ब्रिटेन
  • ✓​ जर्मनी
  • जापान
राजस्थान का क्षेत्रीय विस्तार 3,42,239 वर्ग किलोमीटर में है जो भारत के कुल क्षेत्र का 10.43 प्रतिशत है। अतः क्षेत्रफल की दृष्टि से यह भारत का सबसे बड़ा राज्य है। क्षेत्रफल की दृष्टि से यह विश्व के अनेक देशों से बड़ा है,  उदाहरण के लिये इजराइल20,700 किलोमीटर  से 17 गुना, श्रीलंका से पांच गुना तथा ग्रेट ब्रिटेन  ( 229848 वर्ग किलोमीटर  नार्वे, पोलैण्ड, इटली से भी अधिक विस्तार रखता है। जापान ( 374,834 वर्ग किलोमीटर (भूमी) ) और जर्मनी ( 357,021 वर्ग किलोमीट) का क्षेत्रफल राजस्थान के क्षेत्रफल से थोड़ा अधिक है। इसप्रकार जर्मनी सही जवाब है। 


10. ये देश उन्हीं अक्षांशों पर स्थित हैं, जिन पर राजस्थान प्रदेश है -
  • स्वीटजरलैंड, बेल्जियम, स्वीडन
  • थाइलैण्ड, मलेशिया, सिंगापुर
  • ✓​ अल्जीरिया, लीबिया,मिश्र
  • सोमालिया, इथोपिया, घाना

11. रसोईघर में काम आने वाले बर्तन ‘हाटड़ो’ (हटड़ी) में क्या संग्रह करके रखा जाता है -
  • दही
  • आटा
  • दूध
  • ✓​ नमक-मिर्च मसाले

12. ऊन की गुणवत्ता एवं उपयोगिता का विश्लेषण करने के लिए इसके अध्ययन एवं नमूनों की जांच करने की सुविधा केन्द्रीय ऊन विश्लेषण प्रयोगशाला में है। यह प्रयोग शाला प्रदेश में कहां स्थापित की गई है -
  • ✓​ बीकानेर
  • जोधपुर
  • टोंक
  • ब्यावर

13. निर्यात को बढ़ावा देने के लिए प्रदेश में निर्यात संवर्द्धन औद्योगिक पार्कों की स्थापना की गई है। सीतापुरा (जयपुर) बोरानाडा (जोधपुर) तथा नीमराना (अलवर) में स्थापित इन पार्कों के लिए प्रदेश को सहायता दी है -
  • विश्व बैंक ने
  • जापान ने
  • ✓​ केन्द्र सरकार ने
  • भारतीय औद्योगिक विकास बैंक ने
सीतापुर (जयपुर) में देश का पहला निर्यात संवर्द्धन पार्क है।


14. हमीदुदीन चिश्ती को मिट्ठे साहब के नाम से जनमानस में प्रसिद्धि मिली थी। इनकी दरगाह किस दुर्ग के भीतर स्थित है -
  • मांडलगढ़
  • तारागढ़
  • चित्तौड़गढ़
  • ✓​ गागरोन

15. परमारों के शासन का प्रमाण बसन्तगढ़ का जीणशीर्ण दुर्ग इस जिले में स्थित है -
  • जालोर
  • अजमेर
  • टोंक
  • ✓​ सिरोही

16. राष्ट्रीय राजमार्ग 8,79,89 किस स्थान पर मिलते हैं ?
  • जोधपुर
  • जयपुर
  • उदयपुर
  • ✓​ अजमेर

17. चित्रकला संग्रह सरस्वती भंडार कहां स्थित है -
  • ✓​ उदयपुर
  • जोधपुर
  • जयपुर
  • अलवर

18. DOTS कार्यक्रम विश्व बैंक और विश्व स्वास्थ्य संगठन के सहयोग से इस रोग को नियंत्रित करने के लिए 1995 से संचालित है -
  • एड्स
  • नारू
  • ✓​ क्षय रोग
  • कैन्सर
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO ) द्वारा मान्यता प्राप्त टी.बी. या तपेदिक उपचार के कार्यक्रम को ‘डॉट्स’ (DOTS- Directly Observed Treatment Short-course) कहते हैं ।


19. कंकड़-पत्थर से ढक़े मरूस्थलीय भाग को कहते हैं -
  • मरहो
  • अर्ग
  • हम्मादा
  • ✓​ रेग
रेग चट्टानी मरुस्थल के लिए प्रयुक्त अरबी शब्द है। यह पवन द्वारा निक्षेपित बजरी से आच्छादित मरुस्थलीय मैदान होता है। केशिका क्रिया द्वारा सतह पर आने वाले लवणों से संयुक्त होकर बजरी प्रायः सतह पर चिपकी रहती है। इसके उदाहरण लीबिया, अल्जीरिया, मिश्र आदि के मरुस्थलों में मिलते हैं। इसे बजरी मरुस्थल (gravel desert) भी कहते हैं।


20. मारवाड़ के किसानों को लागतों तथा बेगारों के विरूद्ध जाग्रत करने के लिए ‘मारवाड़ हितकारिणी सभा’ की स्थापना 1923 में की गई थी। इसके संस्थापक थे -
  • बलदेव राम मिर्धा
  • ✓​ जयनारायण व्यास
  • कुंभा राम आर्य
  • विजय सिंह पथिक
जयनारायण व्यास के नेतृत्व में मारवाड़ हितकारिणी सभा ने जोधपुर में उत्तरदायी शासन की माँग की तथा दो पुस्तकों- जैसे मारवाड़ की अवस्था और पोपनबाई की पोल प्रकाशित की, जिसमें राज्य सरकार की आलोचना की गई थी। जयनारायण व्यास व आनन्दराज सुराणा को बन्दी बनाकर राज्य सरकार ने दमनचक्र चलाया। १९३१ में इन नेताओं को रिहा कर दिया गया। सविनय अवज्ञा आंदोलन आरंभ होने पर इन नेताओं ने जोधपुर युवक लीग का गठन किया और स्वदेशी का प्रचार व हड़तालें कीं। नेताओं को पुनः बन्दी बना कर मारवाड़ हितकारिणी सभा को अवैध घोषित कर दिया गया।


21. राज्य की पहली पवन ऊर्जा परियोजना जैसलमेर में शुरू की गई थी। दूसरी परियोजना इस जिले में स्थापित की गई थी -
  • जोधपुर
  • बाड़मेर
  • ✓​ प्रतापगढ़
  • सीकर

22. गैर परम्परागत ऊर्जा स्रोतों के विकास, परिवहन तथा विद्युत सयंत्रों की स्थापना हेतु राजस्थान अक्षय ऊर्जा निगम की स्थापना किस वर्ष में की गई थी -
  • 2007
  • 1980
  • ✓​ 2002
  • 1990

23. बूंदी के कजली तीज माता मेले का मुख्य आकर्षण यह नृत्य रहता है -
  • भवई
  • ✓​ चकरी
  • घूमर
  • हाथीमना
यह नृत्य हाड़ौती अंचल (कोटा,बारां और बूंदी) की कंजर जाति की बालाओं द्वारा विभिन्न अवसरों विशेषकर विवाह के आयोजन पर किया जाता है। इसमें नर्तकी चक्कर पर चक्कर घूमती हुई नाचती है तो उसके घाघरे का लहराव देखते लायक होता है। लगभग पूरे नृत्य में कंजर बालाएं लट्टू की तरह घूर्णन करती है। इसी कारण इस नृत्य को चकरी नृत्य कहा जाता है। इस नृत्य में ढफ, मंजीरा तथा नगाड़े वाद्य का प्रयोग होता है।


24. गाढ़े अपारदर्शक रंगों के प्रयोग की चित्रण पद्धति को कहते हैं -
  • ✓​ टैम्परा पद्धति
  • तेल रंग पद्धति
  • जल रंग पद्धति
  • पेस्टल पद्धति

25. नाग पंचमी का त्योहार विक्रम संवत् के किस महीने में मनाया जाता है -
  • ✓​ श्रावण
  • भाद्रपद
  • वैशाख
  • चैत्र 
नाग पंचमी हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है । हिन्दू पंचांग के अनुसार सावन माह की शुक्ल पक्ष के पंचमी को नाग पंचमी के रुप में मनाया जाता है । इस दिन नाग देवता या सर्प की पूजा की जाती है और उन्हें दूध पिलाया जाता है।

राजस्थान : सन् 1857



1857 के समय राजस्थान के कई राजपूत ब्रिटिश सरकार के खिलाफ़ थे। ये ब्रितानियों के शासन से संतुष्ट नहीं थे जिससे इनके मन में सरकार के खिलाफ़ क्रांति के बीज उत्पन्न होने लगे। इन लोगों के साथ आम जनता भी शामिल हो गई। राजस्थान के कई इलाकों में इस विद्रोह की ज्वाला भड़की थी जिनमें निम्न नाम उल्लेखनीय हैं।

नसीराबाद 
सबसे पहले नसीराबाद में इस विद्रोह की शुरू आत हुई थी। इसके पीछे मुख्य कारण यह था कि ब्रिटिश सरकार ने अजमेर की 15वीं बंग़ाल इन्फ़ेन्ट्री को नसीराबाद भेज दिया था क्योंकि सरकार को इस पर विश्‍वास नहीं था। सरकार के इस निर्णय से सभी सैनिक नाराज हो गये थे और उन्होंने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ़ क्रांति का आगाज कर दिया। इसके अतिरिक्त ब्रिटिश सरकार ने बम्बई के सैनिकों को नसीराबाद में बुलवाया और पूरी सेना की जंाच पड़ताल करने को कहा। ब्रिटिश सरकार ने नसीराबाद में कई तोपे तैयार करवाई। इससे भी नसीराबाद के सैनिक नाराज हो गये और उन्होंने विद्रोह कर दिया। सेना ने कई ब्रितानियों को मौत के घाट उतार दिया साथ ही साथ उनकी सम्पत्ति को भी नष्ट कर दिया। इन सैनिकों के साथ अन्य लोग भी शामिल हो गये।

नीमच 
नसीराबाद की घटना की खबर मिलते ही 3 जून 1857 को नीमच के विद्रोहियों ने कई ब्रितानियों को मौत के घाट उतार दिया। फ़लस्वरू प ब्रितानियों ने भी बदला लेने की योजना बनाई। उन्होंने 7 जून को नीमच पर अपना अधिकार कर लिया। बाद में विद्रोही राजस्थान के दूसरे इलाकों की तरफ़ बढ़ने लगे।

जोधपुर 
यहाँ के कुछ लोग राजा तख्त सिंह के शासन से रुष्ट थे। जिसके कारण एक दिन यहाँ के सैनिकों ने इनके खिलाफ़ विद्रोह कर दिया। उनके साथ आउवा के ब्रिटिश विरोधी कुशाल सिंह भी थे। 
कुशाल सिंह का सामना करने के लिये लेफ़्टिनेंट हीथकोट के साथ जोधपुर की सेना आई थी लेकिन कुशाल सिंह ने इन को परास्त कर दिया। बाद में ब्रितानी सेना ने आउवा के किले पर आक्रमण किया लेकिन उनको भी हार का मुँह देखना पड़ा लेकिन ब्रिगेडियर होम्स उस पराजय का बदला लेना चाहता था इसलिये उसने आउवा पर आक्रमण किया अब कुशाल सिंह ने किले को छोड़ दिया और सलुम्बर चले गये। कुछ दिनों बाद ब्रितानियों ने आउवा पर अधिकार कर लिया और वहा आतंक फ़ैलाया ।

मेवाड़ 
मेवाड़ के सामंत ब्रितानियों व महाराणा से नाराज थे। इन सामन्तों में आपसी फ़ूट भी थी । महाराणा ने मेवाड़ के सामन्तों को ब्रितानियों की सहायता करने की आज्ञा दी। इसी समय सलुम्बर के रावत केसरी सिंह ने उदयपुर के महाराणा को चेतावनी दी कि यदि आठ दिन में उनके परम्पराग़त अधिकार को स्वीकार न किया गया तो वह उनके प्रतिद्वंदी को मेवाड़ का शासक बना देंगे। सलुम्बर के रावत केसरी सिंह ने आउवा के ठाकुर कुशाल सिंह को अपने यहा यहा शरण दी। इसी समय तांत्या टोपे ने राजपूताने की ओर कूच किया। 1859 में नरवर के मान सिंह ने उसके साथ धोखा किया और उसे गिरफ़्तार कर लिया। यद्यपि सामंतों ने प्रत्यक्ष रू प से ब्रिटिश सरकार का विद्रोह नहीं किया परन्तु विद्रोहियों को शरण देकर इस क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

कोटा 
ब्रिटिश अधिकारी मेजर बर्टन ने कोटा के महाराजा को बताया यहां के दो चार ब्रिटिश विरोधी अधिकारियों को ब्रिटिश सरकार को सौंप देना चाहिये। लेकिन महाराजा ने इस काम में असमर्थता जताई तो ब्रितानियों ने महाराजा पर आरोप लगाया कि वह विद्रोहियों से मिले हुए हैं। इस बात की खबर मिलते ही सैनिकों ने मेजर बर्टन को मार डाला। विद्रोहियों ने राजा के महल को घेर लिया, फ़िर राजा ने करौली के शासक से सैनिक सहायता मांगी। करौली के शासक ने सहयोग किया और विद्रोहियों को महल के पीछे खदेड़ा। इसी समय जनरल एच.जी.राबर्टस अपनी सेना के साथ चम्बल नदी के किनारे पहँुचा। उसे देखकर विद्रोही कोटा से भाग गये।

राज्य के अन्य क्षेत्रों में विद्रोह 
इस विद्रोह में अलवर के कई नेताओ ने हिस्सा लिया। जयपुर में उस्मान खां और सादुल्ला खां ने विद्रोह कर दिया। टोंक में सैनिकों ने विद्रोह कर दिया ओर नीमच के विद्रोहियों को टोंक आने का निमंत्रण दिया। इन्होने टोंक के नवाब का घेरा डाल कर उनसे बकाया वेतन वसूल किया। इसी तरह बीकानेर के शासक ने नाना साहब को सहायता का आश्‍वासन दिया था। और तांत्या टोपे की सहायता के लिये द्स हजार घुड़सवार सैनिक भेजे। यद्यपि राजस्थान के अधिकांश शासक पूरे विद्रोह काल में ब्रितानियों के प्रति वफ़ादार रहे, फ़िर भी विद्रोहियों के दबाव के कारण उन्हें यत्र-तत्र विद्रोहियों को समर्थन प्रदान करना पड़ा।

राजस्थान में विद्रोह का घटनाक्रम

क्र.स.विद्रोहकास्थानविद्रोहकीतारीख
 1नसीराबाद28 मई 1857
 2नीमच3 जून 1857
 3एरिनपुरा21 अगस्त 1857
 4आउवाअगस्त 1857
 5देवली छावनीजून 1857
 6भरतपुर31 मई 1857
 7अलवर11 जूलाई 1857
 8धौलपुरअक्टूबर 1857
 9टोंकजून 1857
 10कोटा15 अक्टूबर 1857
 11अजमेर की केंद्रीय जेल9 अगस्त 1857
 12जोधपुर लीजियन8 सितम्बर 1857

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में राजस्थान

कोटा के शहीद लाल जयदयाल   
रचनाकार : कन्हैया लाल जी
ब्रितानियों को भारत से बाहर निकालने के लिए युगाब्द 4659 (सन् 1857) में हुआ स्वतंत्रता का युद्ध भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता है। देखा जाए तो स्वतंत्रता के संघर्ष की शुरुआत महाराणा हम्मीर सिंह ने की थी। वीरों में वीरोत्तम महाराणा हम्मीर ने मुस्लिम आक्रमणकारियों का बढ़ाव काफ़ी समय तक रोके रखा। वस्तुतः सिसोदिया वंश का पूरा इतिहास ही भारत की स्वतंत्रता के लिए किए गए संघर्ष का इतिहास है। लेकिन ब्रितानियों के ख़िलाफ़ पूरे भारत में एक साथ और योजनाबद्ध युद्ध सन् 1857 में लड़ा गया, इसीलिए इतिहासकारों ने इसे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम बताया।
क्रांति के इस महायज्ञ को धधकाने की योजना अजीमुल्ला खाँ तथा रंगोबापूजी ने लंदन में बनाई थी। योजना बनाकर ये दोनों उत्कट राष्ट्र-भक्त पेशवा के पास आए और उन्हें इस अद्भुत समर का नेतृत्व करने को कहा। सैनिक अभियान के नायक के रूप में तात्या टोपे को तय किया गया। संघर्ष के लिए संगठन खड़ा करने तथा जन-जागरण का काम पूरे दो साल तक किया गया।
मौलवी, पंडित और संन्यासी पूरे देश में क्रांति का संदेश देते हुए घूमने लगे। नाना साहब तीर्थ-यात्रा के बहाने देशी रजवाड़ों में घूमकर उनका मन टटोलने लगे। आल्हा के बोल, नाटक मंडलियाँ और कठपुतलियों के खेल के द्वारा स्वधर्म और स्वराज्य का संदेश जन-जन में पहुँचाया जाने लगा। क्रांति का प्रतीक लाल रंग का कमल सैनिक छावनियों में एक से दूसरे गाँव में घूमते पूरे देश की यात्रा करने लगा। इतनी ज़बरदस्त तैयारी के बाद संघर्ष की रूप-रेखा बनी। यह सब काम इतनी सावधानी से हुआ कि धूर्त ब्रितानियों को भी इसका पता तोप का पहला गोला चलने के बाद ही लगा।

राजस्थान में पहली चिंगारी 
इस अपूर्व क्रांति-यज्ञ में राजसत्ता के सपूतों ने भी अपनी समिधा अर्पित की। देश के अन्य केंद्रों की तरह राजस्थान में भी सैनिक छावनियों से ही स्वतंत्रता-संग्राम की शुरुआत हुई। उस समय ब्रितानियों ने राजपूताने में 6 सैनिक छावनियाँ बना रखी थी। सबसे प्रमुख छावनी थी नसीराबाद की। अन्य छावनियाँ थी- नीमच, ब्यावर, देवली (टोंक), एरिनपुरा (जोधपुर) तथा खैरवाड़ा (उदयपुर से 100 कि.मी. दूर)। इन्हीं छावनियों की सहायता से ब्रितानियों ने राजपूताना के लगभग सभी राजाओं को अपने वश में कर रखा था। दो-चार राजघरानों के अतिरिक्त सभी राजवंश ब्रितानियों से संधि कर चुके थे और उनकी जी हजूरीमें ही अपनी शान समझते थे। इन छावनियों में भारतीय सैनिक पर्याप्त संख्या में थे तथा रक्त कमल और रोटी का संदेश उनके पास आ चुका था।
राजपूताने (राजस्थान) में क्रांति का विस्फोट 28 मई 1857 को हुआ। राजस्थान के इतिहास में यह तिथि स्वर्णाक्षरों में लिखी जानी चाहिए तथा हर साल इस दिन उत्सव मनाया जाना चाहिए। इसी दिन दोपहर दो बजे नसीराबाद में तोप का एक गोला दाग़ कर क्रांतिकारियों ने युद्ध का डंका बजा दिया। संपूर्ण देश में क्रांति की अग्नि प्रज्जवलित करने के लिए 31 मई, रविवार का दिन तय किया गया था, किंतु मेरठ में 10 मई को ही स्वातंत्र्य समर का शंख बज गया। दिल्ली में क्रांतिकारियों ने ब्रितानियों के ख़िलाफ़ शस्त्र उठा लिए। ये समाचार नसीराबाद की छावनी में भी पहुँचे तो यहाँ के क्रांति वीर भी ग़ुलामी का कलंक धोने के लिए उठ खड़े हुए। नसीराबाद में मौजूद '15 वीं नेटिव इन्फेन्ट्री' के जवानों ने अन्य भारतीय सिपाहियों को साथ लेकर तोपख़ाने पर कब्जा कर लिया। इनका नेतृत्व बख्तावर सिंह नाम के जवान कर रहे थे। वहाँ मौजूद अँग्रेज़ सैन्य अधिकारियों ने अश्वारोही सेना तथा लाइट इन्फेन्ट्री को स्वतंत्रता सैनिकों पर हमला करने का आदेश दिया। आदेश माने के स्थान पर दोनों टुकड़ियों के जवानों ने अँग्रेज़ अधिकारियों पर ही बंदूक तान दी। कर्नल न्यूबरी तथा मेजर स्पाटवुड को वहीं ढेर कर दिया गया। लेफ्टिनेण्ट लॉक तथा कप्तान हार्डी बुरी तरह घायल हुए।
छावनी का कमांडर ब्रिगेडियर फेनविक वहाँ से भाग छूटा और उसने ब्यावर में जाकर शरण ली. नसीराबाद छावनी में अब भारतीय सैनिक ही बचे। वे सबके सब स्वातंत्र्य सैनिकों के साथ हो गए। छावनी को तहस-नहस कर स्वातंत्र्य सैनिकों ने दिल्ली की ओर कूच किया।

कमांडर गुरेस राम 
नसीराबाद के स्वतंत्रता संग्राम का समाचार तुरंत-फुरत नीमच पहुँच गया। 3 जून की रात नसीराबाद से तीन सौ कि. मी. की दूरी पर स्थित नीमच सैनिक छावनी में भी भारतीय सैनिको ने शस्त्र उठा लिए। रात 11 बजे 7वीं नेटिव इन्फेण्ट्री के जवानों ने तोप से दो गोले दागे। यह स्वातंत्र्य सैनिकों के लिए संघर्ष शुरू करने का संकेत था। गोलों की आवाज़ आते ही छावनी को घेर लिया गया तथा आग लगा दी गई। नीमच क़िले की रक्षा के लिए तैनात सैनिक टुकड़ी भी स्वातंत्र्य-सैनिकों के साथ हो गई। अँग्रेज़ सैनिक अधिकारियों ने भागने में ही अपनी कुशल समझी। सरकारी ख़ज़ाने पर क्रांतिकारियों का अधिकार हो गया।
आक्रमणकारी फ़िरंगियों के विरुद्ध सामान्य जनता तथा भारतीय सैनिकों में काफ़ी ग़ुस्सा था। इसके बावजूद क्रांतिकारियों ने हिंदू-संस्कृति की परंपरा निभाते हुए न तो व्यर्थ हत्याकांड किए, नहीं अँग्रेज़ महिलाओं व बच्चों को परेशान किया। नसीराबाद से भागे अँग्रेज़ सैनिक अधिकारियों के परिवारों को सुरक्षित रूप से ब्यावर पहुँचाने में भारतीय सैनिकों व जनता ने पूरी सहायता की। इस तरह नीमच से निकले अंग्रेज महिलाओं व बच्चों को डूंगला गाँव के एक किसान रूंगाराम ने शरण प्रदान की और उनके भोजन आदि की व्यवस्था की। ऐसे ही भागे दो अँग्रेज़ डाक्टरों को केसून्दा गाँव के लोगों ने शरण दी। इसके उलट जब स्वातंत्र्य सैनिकों की हार होलने लगी तो ब्रितानियों ने उन पर तथा सामान्य जनता पर भीषण और बर्बर अत्याचार किए।
नीमच के क्रांतिकारियों ने सूबेदार गुरेसराम को अपना कमांडर तय किया। सुदेरी सिंह को ब्रिगेडियर तथा दोस्त मोहम्मद को ब्रिगेड का मेजर तय किया। इनके नेतृत्व में स्वातंत्र्य सैनिकों ने देवली को ओर कूच किया। रास्तें में चित्तौड़, हम्मीरगढ़ तथा बनेड़ा पड़ते थे। स्वातंत्र्य सेना ने तीनों स्थानों पर मौजूद अँग्रेज़ सेना को मार भगाया तथा शाहपुरा पहुँचे। शाहपुरा के महाराज ने क्रांतिकारियों का खुले दिल से स्वागत किया। दो दिन तक उनकी आवभगत करने के बाद अस्त्र-शस्त्र व धन देकर शाहपुरा नरेश ने क्रांतिकारियों को विदा किया। इसके बाद सैनिक निम्बाहेडा पहुँचे, जहाँ की जनता तथा जागीरदारों ने भी उनकी दिल खोलकर आवभगत की।

देवली की सेना जंग में शामिल 
देवली ब्रितानियों की तीसरी महत्वपूर्ण छावनी थी। नसीराबाद तथा नीमच में भारतीय सैनिकों द्वारा शस्त्र उठा लेने के समाचार देवली पहुँच गए थे, अतः अँग्रेज़ पहले ही वहाँ से भाग छूटे। वहाँ मौजूद महीदपूर ब्रिगेड आज़ादी के सेनानियों की प्रतीक्षा कर रही थी। निम्बाहेड़ा से जैसे ही भारतीय सेना देवली पहुँची, यह ब्रिगेड भी उनके साथ हो गई। उनका लक्ष्य अब टोंक था, जहाँ का नवाब ब्रितानियों का पिट्ठु बने हुए थे। मुक्तिवाहिनी टोंक पहुँची तो वहाँ की जनता उसके स्वागत के लिए उमड़ पडी। टोंक नवाब की सेना भी क्रांतिकारियों के साथ हो गई। जनता ने नवाब को उसके महल में बंद कर वहाँ पहरा लगा दिया। भारतयीय सैनिकों की शक्ति अब काफ़ी बढ़ गई थी। उत्साहित होकर वह विशाल सेना आगरा की ओर बढ़ गई। रास्त में पड़ने वाली अँग्रेज़ फ़ौजों को शिकस्त देते हुए सेना दिल्ली पहुँच गई और फ़िरंगियों पर हमला कर दिया।

कोटा के दो सपूत 
1857 के स्वतंत्रता संग्राम का एक दुःखद पक्ष यह था कि जहाँ राजस्थान की जनता और अपेक्षाकृत छोटे ठिकानेदारों ने इस संघर्ष में खुलकर फ़िरंगियों का विरोध किया, वहीं अधिकांश राजघरानों ने ब्रितानियों का साथ देकर इस वीर भूमि की परंपरा को ठेस पहुँचाई।
कोटा के उस समय के महाराव की भी ब्रितानियों से संधि थी पर राज्य की जनता फ़िरंगियों को उखाड़ फैंकने पर उतारू थी। कोटा की सेना भी महाराव की संधि के कारण मन ही मन ब्रितानियों के ख़िलाफ़ हो गई थी। भारतीय सैनिकों में आज़ादी की भावना इतनी प्रबल थी कि घ् कोटा कण्टीजेंट ' नाम की वह टुकड़ी भी गोरों के ख़िलाफ़ हो गई, जिसे ब्रितानियों ने ख़ास तौर पर अपनी सुरक्षा के लिए तैयार किया था। कोटा में मौजूद भारतीय सैनिकों तथा जनता में आज़ादी की प्रबल अग्नि प्रज्जवलित करने वाले देश भक्तों के मुख्य थे लाला जयदलाय तथा मेहराब खान। भारत माता के इन दोनों सपूतों के पास क्रांति का प्रतीक घ् रक्त-कमल ' काफ़ी पहले ही पहुँच चुका था तथा छावनियों में घ् रोटी ' के जरिये फ़िरंगियों के ख़िलाफ़ उठ खड़े होने का संदेश भी भेजा जा चुका था।
गोकुल (मथुरा) के रहने वाले लाला जयदयाल को महाराव ने हाड़ौती एजेंसी के लिए अपना वकील नियुक्त कर रखा था। ब्रितानियों को 35 वर्षीय लाला जी की गतिविधियों पर कुछ संदेह हो गया, अतः उन्होंने उनको पद से हटवा दिया। जयदयाल अब सावधानी से जन-जागरण का काम करने लगे। इस बीच नीमच, नसीराबाद और देवली के संघर्ष की सूचना कोटा पहुँच चुकी थी। मेहराब खान राज्य की सेना की एक टुकड़ी घ् पायगा पलटन ' में रिसालदार थे। सेना को क्रांति के लिए तैयार करने में मुख्य भूमिका मेहराब खान की ही थी।

कोटा में स्वराज्य स्थापित हुआ 
15 अक्टूबर 1857 को कोटा राज्य की 'नारायण पलटन' तथा 'भवानी पलटन' के सभी सैनिकों ने तोपें व अन्य हथियार लेकर कोटा में मौजूद अँग्रेज़ सैनिक अधिकारी मेजर बर्टन को घेर लिया। संख्या में लगभग तीन हज़ार स्वराज्य सैनिकों का नेतृत्व लाला जयदयाल और मेहराब खान कर रहे थे। स्वातंत्र्य सेना ने रेजीडेंसी (मेजर बर्टन का निवास) पर गोलाबारी शुरू कर दी। संघर्ष में मेजर बर्टन व उसके दोनों पुत्रों सहित कई अँग्रेज़ मारे गए। रेजीडेन्सी पर अधिकार कर क्रांतिकारियो ने राज्य के भंडार, शस्त्रागारों तथा कोषागारों पर कब्जा करते हुए पूरे राज्य को ब्रितानियों से मुक्त करा लिया। पूरे राज्य की सेना, अधिकारी तथा अन्य प्रमुख व्यक्ति भी स्वराज्य स्वधर्म ' के सेनानियों के साथ हो गए।
राज्य के ही एक अन्य नगर पाटन के कुछ प्रमुख लोग ब्रितानियों से सहानुभूति रखते थे। स्वातंत्र्य सैनिकों ने पाटन पर तोपों के गोले बरसाकर वहाँ मौजूद ब्रितानियों को हथियार डालने को बाध्य कर दिया। अब पूरे राजतंत्र पर लाला जयदयाल और मेहराब खान का नियंत्रण था। छह महीनों तक कोटा राज्य में स्वतंत्रता सैनानियों का ही अधिकार रहा।
इस बीच कोटा के महाराव ने करौली के शासन मदन सिंह से सहायता माँगी तथा स्वराज्य सैनिकों का दमन करने को कहा। हमारे देश का दुर्भाग्य रहा कि स्वतंत्रता संग्राम के योद्धाओं को अपने ही देशवासियों से युद्ध करना पड़ा। करौली से पन्द्रह सौ सैनिकों ने कोटा पर आक्रमण कर दिया। उधर मेजर जनरल राबर्ट्स भी पाँच हज़ार से अधिक सेना के साथ कोटा पर चढ़ आया। राजस्थान और पंजाब के कुछ राज घरानों की सहायता से अँग्रेज़ अब भारतीय योद्धाओं पर हावी होने लगे थे।
विकट परिस्थिति देख कर मेहराब खान तथा उनके सहयोगी दीनदयाल सिंह ने ग्वालियर राज के एक ठिकाने सबलगढ के राजा गोविन्दराव विट्ठल से सहायता माँगी। पर लाला जयदयाल को कोई सहायता मिलने से पहले ही मेजर जनरल राबर्ट्स तथा करौली और गोटेपुर की फ़ौजों ने 25 मार्च 1858 को कोटा को घेर लिया। पाँच दिनों तक भारतीय सैनिकों तथा फ़िरंगियों में घमासान युद्ध हुआ। 30 मार्च को ब्रितानियों को कोटा में घुसने में सफलता मिल गई। लाला जयदयाल के भाई हरदयाल युद्ध में मारे गए तथा मेहराब खान के भाई करीम खाँ को पकड़कर ब्रितानियों ने सरे आम फाँसी पर लटका दिया।
लाला जयदयाल और मेहराब खान अपने साथियों के साथ कोटा से निकलकर गागरोन पहुँचे। अँग्रेज़ भी पीछा करते हुए वहाँ पहुँच गए तथा गागरोन के मेवातियों का बर्बरता से कल्ते आम किया। ब्रितानियों की बर्बरता यहीं नहीं रुकी, भँवर गढ़, बड़ी कचेड़ी, ददवाडा आदि स्थानों पर भी नरसंहार तथा महिलाओं पर अत्याचार किए गए। उक्त सभी स्थानों के लोगों ने पीछे हटते स्वातंत्र्य-सैनिकों की सहायता की थी। ब्रितानियों ने इन ठिकानों के हर घर को लूटा और फ़सलों में आग लगा दी।

देशभक्तों का बलिदान 
अब सभी स्थानों पर स्वतंत्रता सेनानियों की हार हो रही थी। लाला जयदयाल तथा मेहराब खान भी अपने साथियों के साथ अलग-अलग दिशाओं में निकल गए। अँग्रेज़ लगातार उनका पीछा कर रहे थे। डेढ़ साल तक अंग्रजों को चकमा देने के बाद दिसंबर, 56 में गुड़ गाँव में मेहराब खान ब्रितानियों की पकड़ में आ गए। उन पर देवली में मुकदमा चलाया गया तथा मृत्युदंड सुनाया गया।
इस बीच लाला जयदयाल की गिरफ़्तारी के लिए ब्रितानियों ने 12 हज़ार रू. के इनाम की घोषणा कर दी थी। जयदयाल उस समय फ़क़ीर के वेश में अलवर राज्य में छिपे हुए थे। रुपयों के लालच में एक देशद्रोही ने लाला जी को धोखा देकर गिरफ़्तार करवा दिया। उन पर भी देवली में ही मुकदमा चलाया गया। 17 सितम्बर 1860 को लाला जयदयाल और मेहराब खान को कोटा एजेंसी के बग़लें के पास उसी स्थान पर फाँसी दी गई जहाँ उन्होंने मेजर बर्टन का वध किया था। इस तरह दो उत्कट देशभक्त स्वतंत्रता के युद्ध में अपनी आहुति दे अमर हो गए। उनका यह बलिदान स्थान आज भी कोटा में मौजूद है पर अभी तक उपेक्षित पड़ा हुआ है।

सन सत्तावन के सैनानी ठाकुर कुशाल सिंह  
रचनाकार : पूना राम जी चौधरी

जिस तरह से वीर कुँवर सिंह ने भारत की आज़ादी के लिए अपना रण-रंग दिखाया उसी तरह राजस्थान में आउवा ठाकुर कुशाल सिंह ने भी अपनी अनुपम वीरता से ब्रितानियों का मान मर्दन करते हुए क्रांति के इस महायज्ञ में अपनी आहुति दी। पाली ज़िले का एक छोटा सा ठिाकाना था घ् आउवा ' , लेकिन ठाकुर कुशाल सिंह की प्रमुख राष्ट्रभक्ति ने सन् सत्तावन में आउवा को स्वातंत्र्य-संघर्ष का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना दिया। ठाकुर कुशाल सिंह तथा मारवाड़ का संघर्ष प्रथम स्वतंत्रता का एक स्वर्णिम पृष्ठ है।
जोधपुर के देशभक्त महाराजा मान सिंह के संन्यासी हो जाने के बाद ब्रितानियों ने अपने पिट्ठु तख़्त सिंह को जोधपुर का राजा बना दिया। तख़्त सिंह ने ब्रितानियों की हर तरह से सहायता की। जोधपुर राज्य उस समय ब्रितानियों को हर साल सवा लाख रुपया देता था। इस धन से ब्रितानियों ने अपनी सुरक्षा के लिए एक सेना बनाई, जिसका नाम घ् जोधपुर लीजन ' रखा गया। इस सेना की छावनी जोधपुर से कुछ दूर एरिनपुरा में थी। अँग्रेज़ सेना की राजस्थान की छह प्रमुख छावनियों में यह भी एक थी। राजस्थान में स्वाधीनता संग्राम की शुरुआत 28 मई, 1857 को नसीराबाद से हुई थी। इसके बाद नीमच और देवली के भारतीय सैनिक भी संघर्ष में कूद चूके थे। अब बारी थी एरिनपुरा के घ् जोधपुर लीजन ' की, जिसे फ़िरंगियों ने ख़ासकर अपनी सुरक्षा के लिए बनाया था। 

सूबेदार गोजन सिंह का आबू पर हमला 
जोधपुर के महाराज तख़्त सिंह ब्रितानियों की कृपा से ही सुख भोग रहे थे, अतः स्वतंत्रता यज्ञ की जवाला भड़कते ही उन्होंने तुरंत ब्रितानियों की सहायता करने की तैयार कर ली। जोधपुर की जनता अपने राजा के इस आचरण से काफ़ी ग़ुस्से में थी। राज्य की सेना भी मन से स्वाधीनता सैनानियों के साथ थी तथा घ् जोधपुर लीजन ' भी सशस्त्र क्रांति के महायज्ञ में कूद पड़ना चाहती थी। नसीराबाद छावनी में क्रांति की शुरुआत होते ही जोधपुर-नरेश ने राजकीय सेना की एक टुकड़ी गोरों की मदद के लिए अजमेर भेद दी। इस सेना ने ब्रितानियों का साथ देने से इंकार कर दिया। कुशलराज सिंघवी ने सेनापतित्व में जोधपुर की एक और सेना नसीराबाद के भारतीय सैनिकों को दबाने के लिए भेजी गई। इस सेना ने भी ब्रितानियों का साथ नहीं दिया। हिण्डौन में जयपुर राज्य की सेना भी जयपुर नरेश की अवज्ञा करते हुए क्रांतिकारी भारतीय सेना से मिल गई। इस सब घटनाओं का अंग्रेजों की विशेष सेना घ् जोधपुर लीजन ' पर भी असर पड़ा। इसके सैनिकों ने स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़ने का निश्चय कर लिया।
अगस्त 1857 में इस 'लीजन ' की एक टुकड़ी को रोवा ठाकुर के ख़िलाफ़ अनादरा भेजा गया। इस टुकड़ी के नायक हवलदार गोजन सिंह थे। रोवा ठाकुर पर आक्रमण के स्थान पर 21 अगस्त की सुबह तीन बजे यह टुकड़ी आबू पहाड़ पर चढ़ गई। उस समय आबू पर्वत पर काफी संख्या में गोरे सैनिक मौजूद थे। गोजन सिंह के नेतृत्व में जोधपुर लीजन के स्वतंत्रता सैनिकों ने दो तरफ़ से फ़िरंगियों पर हमला कर दिया। सुबह के धुंधलके में हुए इस हमले से अँग्रेज़ सैनिकों में भगदड़ मच गई। आबू से ब्रितानियों को भगा कर गोजन सिंह एरिनपुरा की और चल पड़े। गोजन सिंह के पहुँचते ही लीजन की घुड़सवार टुकड़ी तथा पैदल सेना भी स्वराज्य-सैनिकों के साथ हो गई। तोपखाने पर भी मुक्ति-वाहिनी का अधिकार हो गया। एरिनपुरा छावनी के सैनिकों ने मेहराब सिंह को अपना मुखिया चुना। मेहराब सिंह को घ् लीजन ' का जनरल मान कर यह सेना पाली की ओर चल पड़ी।

आउवा में स्वागत 
आउवा में चम्पावत ठाकुर कुशाल सिंह काफ़ी पहले से ही विदेशी (अँग्रेज़ी) शासकों के ख़िलाफ़ संघर्ष करने का निश्चय कर चुके थें। अँग्रेज़ उन्हें फूटी आँखों भी नहीं सुहाते थे। नाना साहब पेशवा तथा तात्या टोपे से उनका संपर्क हो चूका था। पूरे राजस्थान में ब्रितानियों को धूल चटाने की एक व्यापक रणनीति ठाकुर कुशाल सिंह ने बनाई थी।
सलूम्बर के रावत केसरी सिंह के साथ मिलकर जो व्यूह-रचना उन्होंने की उसमें यदि अँग्रेज़ फँस जाते तो राजस्थान से उनका सफाया होना निश्चित था। बड़े राजघरानों को छोड़कर सभी छोटे ठिकानों के सरदारों से क्रांति के दोनों धुरधरों की गुप्त मंत्रणा हुई। इन सभी ठिकानों के साथ घ् जोधपुर लीजन ' को जोड़कर कुशाल सिंह और केसरी सिंह ब्रितानियों के ख़िलाफ़ एक अजेय मोर्चेबन्दी करना चाहते थे।
इसीलिए जब जनरल मेहरबान सिंह की कमान में जोधपुर लीजन के जवान पाली के पास आउवा पहुँचे तो ठाकुर कुशाल सिंह ने स्वातंत्र्य-सैनिकों का क़िले में भव्य स्वागत किया। इसी के साथ आसोप के ठाकुर शिवनाथ सिंह, गूलर के ठाकुर बिशन सिंह तथा आलयनियावास के ठाकुर अजीत सिंह भी अपनी सेना सहित आउवा आ गए। लाम्बिया, बन्तावास तथा रूदावास के जागीरदार भी अपने सैनिकों के साथ आउवा आ पहुँचे। सलूम्बर, रूपनगर, लासाणी तथा आसीन्द के स्वातंत्र्य-सैनिक भी वहाँ आकर ब्रितानियों से दो-दो हाथ करने की तैयारी करने लगे। स्वाधीनता सैनिकों की विशाल छावनी ही बन गया आउवा। दिल्ली गए सैनिकों के अतिरिक्त हर स्वातंत्रता-प्रेमी योद्धा के पैर इस शक्ति केंद्र की ओर बढ़ने लगे। अब सभी सैनिकों ने मिलकर ठाकुर कुशाल सिंह को अपना प्रमुख चुन लिया।

मॉक मेसन का सर काटा 
आउवा में स्वाधीनता- सैनिकों के जमाव से फ़िरंगी चिंतित हो रहे थे अतः लोहे से लोहा काटने की कूटनीति पर अमल करते हुए उन्होंने जोधपुर नरेश को आउवा पर हमला करने का हुक्म दिया। अनाड़सिंह की अगुवाई में जोधपुर की एक विशाल सेना ने पाली से आउवा की ओर कूच किया। आउवा से पहले अँग्रेज़ सेनानायक हीथकोटा भी उससे मिला। 8 सितम्बर को स्वराज्य के सैनिकों ने घ् मारो फ़िरंगी को ' तथा घ् हर-हर महादेव ' के घोषों के साथ इस सेना पर हमला कर दिया। अनाड़सिंह तथा हीथकोट बुरी तरह हारे। बिथौड़ा के पास हुए इस युद्ध में अनाड़ सिंह मारा गया और हीथकोट भाग खड़ा हुआ। जोधुपर सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा। इस सेना की दुर्गति का समाचार मिलते ही जार्ज लारेंस ने ब्यावर में एक सेना खड़ी की तथा आउवा की ओर चल पड़ा। 18 सितम्बर को फ़िरंगियों की इस विशाल सेना ने आउवा पर हमला कर दिया। ब्रितानियों के आने की ख़बर लगते ही कुशाल सिंह क़िले से निकले और ब्रितानियों पर टूट पड़े। चेलावास के पास घमासान युद्ध हुआ तथा लारेन्स की करारी हार हुई। मॉक मेसन युद्ध में मारा गया। क्रांतिकारियों ने उसका सिर काट कर उसका शव क़िले के दरवाज़े पर उलटा लटका दिया। इस युद्ध में ठाकुर कुशाल सिंह तथा स्वातंत्र्य-वाहिनी के वीरों ने अद्भूत वीरता दिखाई। आस-पास से क्षेत्रों में आज तक लोकगीतों में इस युद्ध को याद किया जाता है। एक लोकगीत इस प्रकार है ढोल बाजे चंग बाजै, भलो बाजे बाँकियो। 

एजेंट को मार कर, दरवाज़ा पर टाँकियो।
झूझे आहूवो ये झूझो आहूवो, मुल्कां में ठाँवों दिया आहूवो।


इस बीच डीसा की भारतीय सेनाएँ भी क्रांतिकारियों से मिल गई। ठाकुर कुशाल सिंह की व्यूह-रचना सफ़ल होने लगी और ब्रितानियों के ख़िलाफ़ एक मजूबत मोर्चा आउवा में बन गया। अब मुक्ति-वाहिनी ने जोधपुर को ब्रितानियों के चंगुल से छुड़ाने की योजना बनाई। उसी समय दिल्ली में क्रांतिकारियों की स्थिति कमज़ोर होने के समाचार आउवा ठाकुर को मिले कुशल सिंह ने सभी प्रमुख लोगों के साथ फिर से अपनी युद्ध-नीति पर विचार किया। सबकी सहमति से तय हुआ कि सेना का एक बड़ा भाग दिल्ली के स्वाधीनता सैनिकों की सहायता के लिऐ भेजा जाए तथा शेष सेना आउवा में अपनी मोर्चेबन्दी मज़बूत कर ले। दिल्ली जाने वाली फ़ौज की समान आसोप ठाकुर शिवनाथ सिंह को सौंपी गई।
शिवनाथ सिंह आउवा से त्वरित गति से निकले तथा रेवाड़ी पर कब्जा कर लिया। उधर ब्रितानियों ने भी मुक्ति वाहिनी पर नज़र रखी हुई थी। नारनौल के पास ब्रिगेडियर गेरार्ड ने क्रांतिकारियों पर हमला कर दिया। अचानक हुए इस हमले से भारतीय सेना की मोर्चाबन्दी टूट गई। फिर भी घमासान युद्ध हुआ तथा फ़िरंगियों के कई प्रमुख सेनानायक युद्ध में मारे गए।

बड़सू का भीषण संग्राम  
जनवरी में मुम्बई से एक अंग्रेज फौज सहायता के लिए अजमेर भेजी गई। अब कर्नल होम्स ने आउवा पर हमला करने की हिम्मत जुटाई। आस-पास के और सेना इकट्ठी कर कर्नल होम्स अजमेर से रवाना हुआ। 20 जनवरी, 1858 को होम्स ने ठाकुर कुशाल सिंह पर धावा बोला दिया। दोनों ओर से भीषण गोला-बारी शुरू हो गई। आउवा का किला स्वतंत्रता संग्राम के एक मजबूत स्तंभ के रूप में शान से खड़ा हुआ था। चार दिनों तक ब्रितानियों और मुक्ति वाहिनी में मुठभेड़ें चलती रहीं। ब्रितानियों के सैनिक बड़ी संख्या में हताहत हो रहे थे। युद्ध की स्थिति से चिंतित होम्स ने अब कपट का सहारा लिया। आउवा के कामदार और क़िलेदार को भारी धन देकर कर्नल होम्स ने उन्हें अपनी ही साथियों की पीठ में छुरा घौंपने के लिए राज़ी कर लिया। एक रात क़िलेदार ने कीलें का दरवाजा खोल दिया। दरवाज़ा खुलते ही अँग्रेज़ क़िले में घुस गए तथा सोते हुए क्रांतिकारियों को घेर लिया। फिर भी स्वातंत्र्य योद्धाओं ने बहादुरी से युद्ध किया, पर अँग्रेज़ क़िले पर अधिकार करने में सफल हो गए। पासा पटलते देख ठाकुर कुशाल सिंह युद्ध जारी रखने के लिए दूसरा दरवाज़े से निकल गए। उधर ब्रितानियों ने जीत के बाद बर्बरता की सारी हदें पार कर दी। उन्होंने आउवा को पुरी तरह लूटा, नागरिकों की हत्याएँ की तथा मंदिरों को ध्वस्त कर दिया। क़िले कि प्रसिद्ध महाकाली की मूर्ति को अजमेर ले ज़ाया गया। यह मूर्ति आज भी अजमेर के पुरानी मंडी स्थित संग्रहालय में मौजूद है।
इसी के साथ कर्नल होम्स ने सेना के एक हिस्से को ठाकुर कुशाल सिंह का पीछा करने को भेजा। रास्ते में सिरियाली ठाकुर ने अंग्रेजों को रोका। दो दिन के संघर्ष के बाद अंग्रेज सेना आगे बढ़ी तो बडसू के पास कुशाल सिंह और ठाकुर शिवनाथ सिंह ने अंग्रेजों को चुनौती दी। उनके साथ ठाकुर बिशन सिंह तथा ठाकुर अजीत सिंह भी हो गए। बगड़ी ठाकुर ने भी उसी समय अंग्रेजों पर हमला बोल दिया। चालीस दिनों तक चले इस युद्ध में कभी मुक्ति वाहीनी तो कभी अंग्रेजों का पलड़ा भारी होता रहा। तभी और सेना आ जाने से अंग्रेजों की स्थिति सुधर गई तथा स्वातंत्र्य-सैनिकों की पराजय हुई। कोटा तथा आउवा में हुई हार से राजस्थान में स्वातंत्र्य-सैनिकों का अभियान लगभग समाप्त हो गया। आउवा ठाकुर कुशाल सिंह ने अभी भी हार नहीं मानी थी। अब उन्होंने तात्या टोपे से सम्पर्क करने का प्रयास किया। तात्या से उनका सम्पर्क नहीं हो पाया तो वे मेवाड़ में कोठारिया के राव जोधसिंह के पास चले गए। कोठारिया से ही वे अंग्रेजों से छुट-पुट लड़ाईयाँ करते रहे।

जन-नायक कुशाल सिंह 
ठाकुर कुशालसिंह के संघर्ष ने मारवाड़ का नाम भारतीय इतिहास में पुनः उज्ज्वल कर दिया। कुशाल सिंह पूरे मारवाड़ में लोकप्रिय हो गए तथा पूरे क्षेत्र के लोग उन्हें स्वतंत्रता संग्राम का नायक मानने लगे। जनता का उन्हें इतना सहयोग मिला था कि लारेंस तथा होम्स की सेनाओं पर रास्ते में पड़ने वाले गाँवों के ग्रामीणों ने भी जहाँ मौक़ा मिला हमला किया। इस पूरे अभियान में मुक्ति-वाहिनी का नाना साहब पेशवा और तात्या टोपे से भी संपर्क बना हुआ था। इसीलिए दिल्ली में स्वातंत्र्य-सेना की स्थिति कमज़ोर होने पर ठाकुर कुशाल सिंह ने सेना के बड़े भाग को दिल्ली भेजा था। जनता ने इस संघर्ष को विदेशी आक्रान्ताओं के विरुद्ध किया जाने वाला स्वाधीनता संघर्ष माना तथा इस संघर्ष के नायक रूप में ठाकुर कुशाल सिंह को लोक-गीतों में अमर कर दिया। उस समय के कई लोक-गीत तो आज भी लोकप्रिय हैं। होली के अवसर पर मारवाड़ में आउवा के संग्राम पर जो गीत गाया जाता है, उसकी बानगी देखिये -

वणिया वाली गोचर मांय कालौ लोग पड़ियौ ओ 
राजाजी रे भेळो तो फिरंगी लड़ियो ओ काली टोपी रो! 

हाँ रे काली टोपी रो। फिरंगी फेलाव कीधौ ओ काली टोपी रो! 
बारली तोपां रा गोळा धूडगढ़ में लागे ओ मांयली तोपां रा गोळा तम्बू तोड़े ओ झल्लै आउवौ! मांयली तोपां तो झूटे, आडावली धूजै ओ आउवा वालौ नाथ तो सुगाली पूजै ओ झगड़ौ आदरियौ! 
हां रे झगड़ौ आदरियो, आउवौ झगड़ा में बांकौ ओ झगडौ आदरियौ! राजाजी रा घेड़लिया काळां रै लारे दोड़ै ओ आउवौ रा घेड़ा तो पछाड़ी तोड़े ओ झगड़ौ होवण दो! 
हाँ रे झगड़ौ होवण दो, झगड़ा में थारी जीत व्हैला ओ झगड़ौ होवण दो!

 पूनम किराणा स्टोर्स, ग्राम-बूसी (पाली)
1857 राजस्थानी लोकगीतों में
रचनाकार : राज चतुर्वेदी
संदर्भ : विचार दृष्टि (हिंदी पत्रिका) 

दिनांक : 9 अक्टूबर-दिसंबर 2007
अंक : 33, पेज न. 36

राजस्थानी धरती पर उत्पन्न 1857 की क्रांति से संबंधित अनेक लोक गीत-गाथाएँ मिलती हैं। 1857 की आजादी की पहली लडाई से पूर्व राजस्थान में जिन लोगों ने ब्रितानियों से टक्कर ली उसमें राजस्थान के भरतपुर रियासत प्रमुख थी। इसके साथ ही जोधपुर के राजा मानसिंह का चरित्र भी राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत था। महाराव डूंगरपुर जसवंत सिंह नरसिंहगढ़, राजकुंवर चैन सिंह, डूंगजी जवारजी और उमरकोट के रतन राणा, राव गोपाल सिंह खरवा के कार्य 1857 की क्रांति की भूमिका बने। भरतपुर के घेरे से संबंधित लोकगीत अभी भी होली के अवसर पर गाए जाते हैं। जिसके बोल में जनता का विरोध झलकता है-

गोरा हट जा! 
राज भरतपुर के रे गोरा हट जा 

भरतपुर गढ़ बंका रे गेरा हट जा। 
यूं मत जाणै गोरा लड़ै बेटौ जाट के 
ओ तो कुंवर लड़ै रे राजा दशरथ को गोरा हट जा।

इसके साथ ही डुंगरजी की गाथा बी कवियों ने गाई है, जिसके पद-पद में ब्रितानियों का विरोध है-

सन् सत्तावन सूं पैलीई, ए जोत जगावण वाण्ठा रहा। 
आजादी बाण्ठै दिवलैरी, वण्ठरी लौ का रखवाला हा।

इस जंगे आजादी की आहट लोक और कवियों ने सुन ली थी इसीलिए महाराज मानसिंह के आश्रितकवि बाँकी दास ने लिखा था-

आयौ इंगरेज मुलक है ऊपर आहंस लीथा खैंचि उरा,
धणियं मरै नदीधी धरती, धणियां ऊभां गई धरा।


इसी तरह मानसिंह से जोधपुर की संधि में सांभरझील ब्रितानियों के हड़प ली थी। उसकी पीड़ा एक लोकगीत में व्यक्त हुई है-

म्हारौ राजा भोण्ठौ, सांभर तौ दे दीनी रे 
अँगरेज नै म्हारौ राजा मोण्ठौ


बाँकीदास ने तत्कालीन मारवाड़ के चौहटन ठिकाने के ठाकुर की प्रशंसा में गीत लिखा है, जिन्होंने गोरी सत्ता के विस्तार को रोका था तथा वीरतापूर्वक लड़ते हुए ठाकुर श्याम सिंह चौहान शहीद हुए थे-
हट वदी जद नहर हो फरिया,
 सादी जिसड़ा साथ सिपाइ,
मेरी जदीमंड बाहड़ मेरै, 
गोरां सू रचियौ गज गज-गाह।


डिंगल के सुप्रसिद्ध कवि सूर्यमल्ल मिश्रण तो स्पष्ट लिखते हैं-

जिण बन भूल नजावता गैंदगवय गिडराज। 
तिणबन जंबुक तारवड़ा, ऊधम मंडै आज।

अर्थात् राजस्थानी रूपी जिस वन में गेंडे, हाथी और सूकर सिंधों के भय से भूलकर भी नहीं जाते थे आज उस जंगल में अँग्रज रूपी लोमड़ियाँ और सियार उत्पात मचा रहे हैं। क्रांतिकारी वीरों 1857 के नायक तात्या टोपे के बारे में डिंगल के कवि शंकर दान सामोर का एक गीत देखें -

मचायौ हिंद में आखी तइलकौ तांतिय-मोटो,
घोम जेम घुमायो लंक में हणु घोर। 
रचायौ रूण्ठंती राजपूती रौ 
आखरी जंग जंग में दिखायौ सुवायौ अभाग जोर।


शंकरदान सामोर ने ही 1857 की नायिका रानी लक्ष्मीबाई के लिए इस तरह अपने भाव व्यक्त किए हैं -

हुयौ जाण बेहाल, भाल हिंदरी मोम ठरे। 
झगड़ौ निज भुज झाल, लिछमी झांसी री लड़ी।


जोधपुर मारवाड़ में 1857 की क्रांति के अग्रदूत थे आऊवा के ठाकुर खुशाल सिंह, जिन्होंने ब्रितानियों और रियासत की सेना से जबरदस्त लोहा लिया था। जिसे तत्कालीन कवियों- महाकवि सूर्य मल्ल मिश्रण, गिरवरदान और तिलोकदान व शंकर दाने सामोर जैसे कवियों ने अनेक डिंगल गीतों में बखाना है, परंतु 'भाऊवा' और ठाकुर खुशाल सिंह के बलिदान को लोकगीतों में आज तक गाया जा रहा है-

वणिया वाली गोचर मांय, रालौ पड़ियौ ओ 
राजाजी रै मेलौ तो फिरंगी लड़ियौ ओ काली टोपी रो।
हां रै काली टोपी रो। 
फिरंगी फैलाव कीधौ ओ काली टोपी रो।


इस संबंध में एक और लोकगीत दृष्टव्य है, जिसमें ब्रितानियों संबंधी उद्गार व लोक धारणाएँ इतनी स्पष्ट है कि लोक की नफरत साफ दिखाई देती है -

देस में अंगरेज आयो, कोई कांई चीजां लायो रे। 
फूट जाली भायां में, बेगार लायो रे काली टोपी रौ। 
हां रे काली टोपी रो अंगेरज देस में छावनियां नांखै रे काली टोपी रौ।


आऊवा के युद्ध में अँग्रेज सेनापति मारा गया जिसे गढ़ के दरवाजे पर टांग दिया गया था, इसे एक लोकगीत में इस तरह गाया गया है-

ढोल बाजै, थाली बाजै, मेलौ बाजै बां कियौ 
अजंट नै भार नै दरवाजै नांखियौ जूंझे आऊवौ। 
हां रे जूंझै आऊवौ, आऊवौ, मुल्का में चावौं ओ। जूंझे आऊवौ।


1857 के संघर्ष की वाणी राजस्थानी-किंगल कविता का अद्भूत अध्याय है, जिस पर राष्ट्र को नाज है। इस लोकगीतों के प्रकरण में एक लोकगीत की यह शब्दावली कितनी व्यंग्यपूर्ण हैं जो ब्रितानियों की प्रवृतियों को समाने लाती हैं-

गिटपिट गिटपिट बोली बोलै बातां मारै घूणा की 
मत मूडै लगाऔ ई नै मत बतलाऔ।


1857 के संघर्ष के एक नायक का बखान एक फाग में इस तरह किया गया है -

देखो मेड़तिया और डावै कांन मुस्की रे 
बारै बरस दिखा में रिया आँख फुटकी रे लौगो आऊवौ। 
हां रे लेणौ आऊवौ, झगड़ां में थारी जीत होती मो लेणौ आऊवौ।


और अंत में ये लोकगीत आज भी 1857 की याद दिलाते हैं-

मुजरौ ले बोनीं बाबलिया होली रंच राची। 
मुजरौ ले लोनीं। 
टोली रे टीकायत माथै थारा हाकम चढ़िया 
ओ गोली रा लोगाड़ा भाई भाखर मिलिया हो झड़ी झंगा में।


राजस्थानी, भोजपुरी, मगही, मैथिली, बघेली, बुंदेली, ब्रजी, मालवी, अवधी की तरह कुछ वाह धारी बोली में कवियों ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम-सेनानियों के बलिदानों को बड़ी श्रद्धा और भक्ति के साथ लोकगीतों में उनके शौर्य गान कर स्मरण किया है। कुछवाहधर अर्थात् भिण्ड (म.प्र.) अंचल की बोली में आज तक प्रचलित कतिपय लोकगीत द्रष्टव्य हैं-

राखो पुरखन को सम्मान 
इन भइया बाब को तनिक न जानों,
इन भइया बाबो को तनिक मानों 
गोरा आए इनकी भूमि में 
तेगन सौं काटे थो फरमान। 
राखो पुरखन को सम्मान। 
भुतहाकछार जो बजत है 
बिलाव गाँव से जो लगत है
 मूंडन के खरियान बनाए, 
गोरा छोड़ गण मैदान। 
वीर भूमि के वीर हैं 
भइया वीर भूमि के सूर हैं 
भइया दिल दहलाए जिन गोरन के, 
राखो आपनों मान। 
राखो पुरखन को सम्मान।


इसी प्रकार होली के अवसर पर शहीदों के स्मारकों पर ग्रामीण जन अबीर लगाकर होली खेलते हैं और साज-बाज के साथ होली आनराय गीत गाते हैं। उन्नीसवीं सदी के इस गीत को आप देखें -

मैने ढूढ़े चारहुँ ओर में, बिछुरे भइया न मिले,
कै भइया बन को गए हा ऽऽ
कै गए ससुराल,मैंने ढूढ़े चारहुँ ओर में...........।
 ना भइया वन कों गए न गए ससुराल। 
मैंने ढूँढ़े चरहुँ ओर में.............। 
घोड़ा बँधा न घुड़साल में हाऽऽ 
ना खूँटी टंगी तलवार मैंने ढूढ़े चारहुँ ओर में...........। 
युद्धन में मइया गए सो भारत, माँ के मये दुलार। 
मैंने ढूढ़े चारहुँ ओर में, बिछुरे भइया ना मिले।

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