फारसी तवारिखे : राजस्थान इतिहास में योगदान

राजस्थान के इतिहास को जानने, राजस्थान के शिलालेखों, ऐतिहासिक काव्य ग्रंथों, कथा साहित्य आदि के ऐतिहासिक विवरणों के क्रम बद्ध करने सत्यापित करने अथवा तथ्यों को लिखने के लिए ऐतिहासिक साहित्य के रुप में फारसी तवारिखें एक महत्वपूर्ण और विश्वसनीय स्थान रखती हैं।
यह तवारिखें दो प्रकार की हैं :
(१) प्रथम - स्वामी की आज्ञा द्वारा लिखी गई
(२) द्वितीय - आत्म-प्रेरणा युक्त लिखी गई।
प्रथम प्रकार की सभी तवारिखें परोक्ष अथवा उपरोक्ष रुप में राजस्थान के इतिहास पर प्रकाश डालती हैं और द्वितीय प्रकार तवारिखें - क्षेत्रीय तवारिखे हैं।

अलबेरुनी का "तहकीक-ए-हिन्दू' नामक इतिहास १०-११वीं शताब्दी के भारत वर्ष की राजनीति का सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक दशाओं का विस्तृत वर्णन करता है। इस संदर्भ में यह ग्रन्थ गुजरात और मालवा के सोलंकी और परमार शासकों का हवाला प्रदान करता है। १०-११वीं शताब्दी का राजस्थान-राजनीतिक दृष्टि से दोनों राजवंशों के प्रभाव क्षेत्र में था अत: राजस्थान की सामाजिक, आर्थिक दशा को जानने हेतु अलबेरुनी का ग्रन्थ सहायक है। यह ग्रन्थ १०४३ ई. में पूर्ण किया गया था।
महमूद गजनवी और मोहम्मद गौरी के राजस्थान सम्बन्धित अन्य तवारिखों में अबू सईद बिन अब्दुल हई कृत "किताब जैनुल अखबार', अलउतबी की "तारीख-ए-यामीनी' राजपूत गजनवी संघर्ष पर प्रकाश डालती है। इसके पश्चात् मिनहाज-उ-सिराज की "तबकात-ए-नासिरी' भी उपयोगी है, चौहान-गौरी संघर्ष और अजमेर, रणथम्भौर, नागौर, जालोर और मेवातियों पर मुस्लिम अधिशासन अथवा सैनिक कार्यवाहियों हेतु इसका प्रयोग किया जाता रहा है। १२ शताब्दी से राजस्थान मुस्लिम सम्बन्धों और राजस्थान के विविध वर्णनों को उल्लेखित करने वाले फारसी-स्रोत अध्धयन की दृष्टि से तीन काल-क्रमों में वर्गीकृत किये जा सकते हैं :-
(१) सल्तनत कालीन स्रोत
(२) मुगल कालीन स्रोत
(३) परवर्ती स्रोत
(१) सल्तनत कालीन स्रोत

उल्लेखित ऐतिहासिक फारसी साहित्य के ग्रन्थों में सर्वप्रथम सदरउद्दीन हसन निजामी द्वारा लिखी फारसी तवारिख "ताज उल मासिर' का महत्वपूर्ण स्थान है। यद्यपि इस तवारिख की भाषा बड़ी अलंकारिक है फिर भी यह भारतीय इतिहास के गौरी आक्रमण, कुतुबुद्दीन के राजस्थान से सम्बन्ध तथा सुल्तान इल्तुमिश की राजस्थान में की गई सैन्य कार्यवाहियों का हवाला प्रदान करती हैं।
अमीर खुसरों : पूर्व मध्यकालीन राजस्थान के इतिहास हेतु अमीर खुसरों द्वारा लिखित ऐतिहासिक मसनबीयां उल्लेखनीय है। यह कवि जहां फारसी का विद्वान था वहां हिन्दी का भी लेखक था। १२५२ ई. में पटियाली (उ.प्र.) नामक स्थान पर खुसरों का जन्म हुआ और १३२५ ई. में इसकी दिल्ली में मृत्यु हुई थी। ७३ वर्ष के जीवनकाल में वह सुल्तान बलबन से गयासुद्दीन तुगलक तक के इतिहास का स्वयं साक्षी रहा था। इस समय को राजस्थान से सम्बन्धित घटनाओं में खुसरों द्वारा उल्लेखित खलजी कालीन अभियान मुक्य है। "मिफताहुल फुतूह' नामक मसनवी (१२९१ ई.) में खुसरों ने सुल्तान जलालुद्दीन खलजी के राजस्थान अभियानों में झाईन और रणथंभोर की असफलताओं का वर्णन किया है। १३११ ई. में खुसरों द्वारा लिखी कृति "खजाइनुल फूतुह' (विजयों का कोष) में सुल्तान अलाउद्दीन खलजी की विजयों का वर्णन है। इस ग्रन्थ में राजस्थान के रणथंभोर, चित्तोड़, जालोर, सीवाना आदि पर आक्रमणों का हवाला दिया हुआ है। चित्तोड़ अभियान में वह सुल्तान के साथ था। इन अभियानों का वर्णन १३१६ ई. में लिखित अन्य खुसरों कृति "देवल-रानी खिज खाँ' और १३२० ई. में रचित "तुगलक नामा' में गयासुद्दीन तुगलक के द्वारा रणथंभोर का वर्णन हे। अत: खुसरों की यह कृतियां राजस्थान के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
जियाउद्दीन बरनी
जियाउद्दीन बरनी का जन्म १२८५ ई. में बलवन के शासनकाल में हुआ और मृत्यु सुल्तान फिरोज तुगलक के काल १३५७ ई. में हुई थी। इस प्रकार बरनी भी गुलाम वंश, खलजी वंश तथा तुगलक वंश के सुल्तानों की कार्यवाहियों का अच्छा गवाह था। जियाउद्दीन बरनी ने फारसी में "तवारीख-ए-फिरोज शाही' और "तबकात-ए-नासीरी' (१२६० ई.) में लिखी, जो कि राजस्थान के इतिहास हेतु आधार स्रोत के रुप में अपना महत्व रखती हैं।
तुगलक कालीन एक अन्य इतिहासकार "एसामी' ने अपने ग्रंथ "फुतूहुर-सलातीन' अथवा शाहनामा हिन्दी में खलजी-सुल्तान एवं राजस्थान के मध्य राजनीतिक सम्बन्धों का विवरण दिया है। तैमूर काल तथा उसके पश्चात् सैयद वंश कालीन राजस्थान के इतिहास को बतलाने वाले फारसी संदर्भों के लिए "तुजुक-ए-तिमुरी' अथवा "मुलफुजत-ई-तिमुरी' और शरफुद्दीन अली याजदी का "जफरनामा' (१४२४-२५ ई. कृत) उल्लेखनीय है। लोदी कालीन राजस्थान हेतु १५८१ ई. में लिखा गया "वाकयात-ए-मुश्ताकी' नामक ग्रंथ शेख रिज्कुल्लाह मुश्ताकी द्वारा लिखी गई कहानियों का संग्रह होते हुए भी बहुत उपयोगी सिद्ध हुए हैं।
अफगान-राजस्थान के समबन्धों को व्यक्त करने वाले फारसी ग्रंथों में अब्दुल्लाह कृत "तवारीख-ए-खानेजहां' जो कि "मखजन-ए-अफगानी' और जहांगीर के काल की "तवारीख-ए-दाऊदी' (१५७२-७६ ई.) तथा अहमद यादगार रचित "तवारीख-ए-शाही' अथवा "तवारीख-ए-सलातीन-ए-अफगान' मुख्य हैं।
शेरखाह की राजस्थान में की गई कार्यवाहियों को लेखा देने वाला ग्रंथ अब्बास खाँ सरवानी का "तावारिख-ए-शेरशाही' है। इस ग्रंथ की रचना १५८८ ई. के पश्चात् हुई थी। इसमें मेवाड़ के उदय सिंह, मारवाड़ के मालदेव आदि के शेरशाह से समबन्धों का विवरण प्राप्त होता है।
(२) मुगल कालीन स्रोत
 
१५६२ ई. के पश्चात् मुगल सम्राट बाबर का राणा सांगा से सम्पर्क (फरवरी १५२७ ई.) राजस्थान के खानवा मैदान में हुआ था। इसके पश्चात् उसके उत्तराधिकाराओं में हुमायूं, अकबर, जहांगीर, शाहजहां, औरंगजैब, बहादुरशाह, फर्रुखशीयर, मुहम्मदशाह आदि राजस्थान की राजनीति में हस्तक्षेप अथवा शासन करते रहे थे। मुगल कालीन स्रोत में जहीरुद्दीन बाबर द्वारा लिखा गया आत्मचरित्र "बाबरनामा' राजस्थान के राजनीतिक जीवन के साथ-साथ भौगोलिक वर्णन, सामाजिक आर्थिक परिस्थितियों को जानने, उसके काल के महत्वपूर्ण चरित्रों, व्यक्तियों और जीवनियों को समझने के लिए महत्वपूर्ण ग्रंथ है। उसने अपने ग्रंथ को दैनन्दिनी और वार्षिकी के आधार पर तैयार किया था अत: तथ्य जानने के लिए यह ग्रंथ सल्तनत और मुगलकालीन लिखे गए सभी फारसी-संदर्भ ग्रंथों से अधिक स्पष्ट और तिथीवार है।
बाबरकाल की घटनाओं की सूचना देने वाले फारसी स्रोतों में "नफ़ायसूल मआसिर' नामक ग्रंथ अलाउद्दौला द्वारा १५६५-१५६६ ई. में प्रारम्भ हुआ तथा १५८९ ई. ९० ई. में समाप्त किया गया। यद्यपि यह कृति अकबर के काल में लिखी गई थी किन्तु उसने अपने कवित्व वर्णन में पूर्व की कृतियों का संदर्भ के रुप में प्रयोग किया अत: उसका वर्णन इस दृष्टि से वैज्ञानिक है।
हुमायूं और अकबर कालीन फारसी इतिहास ग्रंथकारों में बाबर की पुत्री और हुमायूं की बहिन गुलबदन लिखित "हुमायूंनामा' भी राजस्थानी इतिहास जानने का अच्छा साधन है।
अकबर के काल में लिखे गए महत्वपूर्ण फारसी स्रोतों में राजकुमार से सम्बन्धित इतिहास पर विस्तृत प्रकाश डालने वाले ग्रंथों में दो मुख्य है :
(१) अबुल फजल कृत "अकबरनामा' तीन भागों में (अन्तिम भाग "आईन-ए-अकबरी' के नाम से प्रसिद्ध है)
(२) मुहम्मद कासिम हिन्दूशाह फरिश्ता कृत "तवारीख-ए-फरिश्ता'
प्रथम ग्रंथ अकबर के दरबारी इतिहासकार के रुप में तथा दूसरा प्रान्तीय इतिहासकार के रुप में बीजापुर में लिखा गया।
"अकबरनामा' के संदर्भ इतिहास के रुप में और महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि इसे लिखवाने के पूर्व अकबर जो स्रोत कराये, उनमें राजस्थानी चारण-भाटों और ख्यातों बहियों, शिलालेखों आदि की सूचनाएं भी सम्मिलित थी। इनमें से कई स्रोंत कालक्षय हो चुके हें अत: अबुल फजल के वर्णन राजस्थान के लिए भी उपयोगी हैं।
जहांगीर के काल में लिखी गई और तत्कालीक कालावलोकन हेतु स्वयं जहांगीर द्वारा लिखित आत्मचरित्र "तुजुक-ए-जहांगीरी' या "तवारीख-ए-सलीमशाही', "कारनामा-ए-जहांगीरी', "वाकेयात-ए-जहांगीरी', "इकबाल नामा', "जहांगीर नामा' आदि नामों से पुकारी जाने वाली कृति मुक्य है। इसमें जहांगीर के सिंहासन पर बैठने (१६०५ ई.) से १२वे वर्ष तक का इतिहास जहांगीर और उसके पश्चात् ७ वर्ष तक का हाल मुतमिद खाँ द्वारा इकबालनामा जहांगीर की आज्ञा से लिखा गया है। मुहम्मदशाह के काल में मुहम्मदहादी द्वारा पुन: सम्पादित कर बादशाह के पूर्ण शासन का हाल लिखा गया जो कि जहांगीर की जीवनी के रुप में विद्यमान है। ख्वाजा कामगार की "मसीर-ए-जहांगीरी' में सलीम (जहांगीर) तथा खुर्रम (शाहजहां) के मेवाड़ अभियान पर प्रकाश डालती हैं। जहांगीर के शासन काल में लिखी गई एक अन्य प्रान्तीय कृति "मीरात-ए-सिकंदरी' (१६११ ई.) में राणा सांगा और गुजरात के संबन्धों की व्याख्या प्राप्त होती है।
शाहजहां के काल में लिखी गई तवारीखी से काजविनी कृत "पादशाहनामा', अब्दुलहमीद लाहोरी कृत "पादशाहनामा', मुहम्मद वारीस कृत "पादशाहनामा', शाहजहां के शासन के १०, २० वर्ष तक शेष काल का हवाला है। तीनों इतिहासकार राजकीय सेवा में गटनाक्रमों को लिखने हेतु नियुक्त थे। अत: इनका वर्णन शाहजहां राजपूत सम्बन्धों के लिए ही नहीं अपितु इनमें उदृत आर्थिक-सामाजिक दशा हेतु भी उपयोगी है। इसी क्रम में १६५७-८८ई. में तैयार किया गया ग्रंथ इनायत खाँ का "शाहजहांनामा' सरल भाषा में लिका शाहजहां कालीन स्रोतों का पूरक है।
औरंगजेब काल में इतिहास लिखने पर मनाही थी, फिर भी कुछ, लेखक छिपेतौर पर घटनाक्रमों को लिखते रहे थे, उनमें खाफी खाँ का "मुन्तखब-उल-तुवाब' मुख्य है। प्रथम भाग में शाहजहां तक तथा दूसरे भाग में औरंगजेब से मुहम्मदशाह तक विभाजित मुन्तखब का दूसरा भाग लेखक की गवाही के रुप में अधिक उपयोगी है। मिर्जा मुहम्मद कासीम कृत "आलमगीरनामा' औरंगजैब के प्रारंभिक १० वर्ष का (१६५८-१६६८ ई.) इतिहास तथा प्रान्तीय इतिहासकार के रुप में ईश्वरदास नागर का "फुतूहात-इ-आलमगीरी' मूलत: राठौड़-मुगल सम्बन्धों के लिए महत्वपूर्ण स्रोत है। ईश्वरदास नागर जोधपुर में मुगल अधिकारी था अत: राजस्थान के वर्णन में उसका लेखन प्रत्यक्ष गवाह के रुप प्रयुक्त किया जा सकता है। इस काल की राजस्थान की राजनीति पर प्रकाश डालने वाले ग्रंथों में भीमसेन बुरहारानपुरी कृत "नुस्ख-इ-दिलकुश' १६७० से १७०७ ई. तक दक्षिणी वृतान्तों को स्पष्ट करता है। शाहनवाज खाँ लिखित संदर्भ ग्रंथ "मासीर-उल-उमरा' ३ भागों में बाबर से औरंगजैब काल के २२ वर्ष तक मुगल सामन्तों का परिचय है। राजपूत-मुगल सामंतों के चित्रण हेतु यह ग्रंथ राजस्थान के इतिहास का उपयोगी स्रोत है।
औरंगजेब के पश्चात् उनके उत्तराधिकारियों और राजस्थान के संबन्धों को व्यक्त करने वाली कृतियों में दानिशमन्द खाँ का "पादशाह नामा' अथवा "बहादुरशाह नामा' बहादुरशाह के प्रथम दो वर्षों का वर्णन करती है। इरादत खाँ की "तवारीख-ए-इरादतखान' औरंगजेब की मृत्यु और उत्तराधिकार युद्ध में राजपूतों के व्यवहार, मुहम्मद शफी वारीद के "मीरात-उल-वारदात' या तवारीख-ए-चगताई में फर्रुखशीयर के काल तक का इतिहास है। सवाई जयसिंह और मराठाओं के सम्बन्ध तथा फर्रुखशीयर - अजीत सिंह सम्बन्धों पर यह कृति अच्छा विवरण प्रदान करती है।

(३) परिवर्तिकालीन स्रोत
 
मराठों के अभ्युदय और अहमदशाह अब्दाली के आक्रमण के पश्चात् मुगल बादशाह और राजपूतों के सम्बन्ध को बतलाने वाले फारसी स्रोंतो में खेरुद्दीन इलाहबादी का "इबरतनामा' शाहआलम द्वितीय (१७५९-१८०६ ई.) मुगल मराठा राजपूत सम्बन्धो और "तवारीख-ई-मुज्जफरी' मुहम्मद अली खाँ अंसारी द्वारा लिखा गया मुगलकाल के प्रारम्भ से शाह आलम (आलमगीर द्वितीय) तक का इतिहास है।
"बालमुकन्दनामा' - बालमुकन्दकृत में शाहआलम का वर्णन मिलता है। हरचरनदास की "चहर गुलजार-ए-शुजाई' (१७८४ ई. में पर्ण) मराठों के राजस्थान का वर्णन करती है। "मुर्सलात-इ-अहमदशाह' में राजपूतों द्वारा अत्पाली से किए गए पत्र व्यवहारों का हाल है, वहां "तवारीख-ए-अहमदशाही' से बादशाह (१७४८-५६ ई.) और राजपूतों के सम्बन्धों का हाल ज्ञात होता है। "वाकये अजमेर वा रणथंभोर' में ६७८ से १६८० ई. के मध्य के स्थानीय हालों का विवरण प्राप्त होता है। कालीराम कायस्थ का "तवारीख-ए-राजस्थान' में तथा मौलवी मुहम्मद उबेदुल्लाह फरहती लिखित "तवारीख-तुहुफ-ए-राजस्थान' में राजस्थान के इतिहास पर लिखा गया है। अत: यह सभी स्रोत फारसी। उर्दू के राजस्थानी इतिहास को जानने में उपयोगी आधार हैं।

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