Saturday, 27 August 2011

भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में राजस्थान की भूमिका

राहुल तनेगारिया



१८५७ ई० के विप्लव में राजस्थान के राजा - महाराजाओं ने अंग्रेजों का सहयोग किया था। अत: अंग्रेजों ने राजस्थानी शासकों की सहायता से विपल्व को निर्ममतापूर्वक कुचल दिया। इतना होने पर भी ब्रिटिश विरोधी भावनाएँ नहीं कुचली जा सकीं। विप्लव की समाप्ति के बाद सुधारों के नाम पर पोलिटिकल एजेन्टों ने राजस्थानी शासकों के साथ आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करना आरम्भ कर दिया , जिसके गम्भीर परिणाम हुए। विप्लव के बाद राजस्थान के शासकों ने अपने - अपने राज्यों में प्रशासनिक, सामाजिक और आर्थिक सुधार किए और अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार किया, जिसके कारण राजस्थान में राजनीतिक चेतना जागृत हुई। इस राजनीतिक जागृति के विकास में स्वामी दयानन्द सरस्वती का योगदान अविस्मणीय रहा। १८८३ ई० में स्वामी दयानन्द ने उदयपुर में परोपकारिणी सभा की स्थापना की, जो कुछ समय बाद अजमेर स्थानान्तरित कर दी गई। इसके सदस्यों में शाहपूरा का शासक, उदयपुर के दीवान श्यामजी कृष्ण वर्मा और महादेव गोविन्द रानाडे प्रमुख थे। स्वामी दयानन्द ने १८६५ ई० में राजस्थान की यात्रा के दौरान शासकों से जो बातचीत की, उसमें मुख्यत: चार बातों पर बल दिया गया - स्वधर्म, स्वराज्य, स्वदेशी और स्वभाषा। स्वामी जी की शिक्षाओं से राजस्थान में राजनीतिक चेतना का विकास हुआ तथा ब्रिटिश विरोधी भावनाओं का प्रादुर्भाव हुआ।

१८८५ ई० में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई, जिसने भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्व किया था। धीरे - धीरे कांग्रेस का प्रभाव राजस्थान में बढ़ने लगा, तो १८८७ में राजकीय महाविद्यालय अजमेर के कुछ छात्रों ने मिलकर एक कांग्रेस कमेटी की स्थापना की। १८८८ ई०में कांग्रेस का जो इलाहाबाद (प्रयाग) में अधिवेशन हुआ, उसमें पहली बार अजमेर का प्रतिनिधित्व गोपीनाथ माथुर और कृष्णलाल ने किया। इस समय राजस्थान में पत्रकारिता भी आरम्भ हुई। उदयपुर में 'सज्जन कीर्ति, सुधारक' नामक समाचार पत्र प्रकाशित हुआ जो पाक्षिक था। १८८५ में अजमेर से 'राजस्थान टाइम्स' और उसका हिन्दी संस्करण 'राजस्थान पत्रिका' का प्रकाशन आरम्भ हुआ।
इन समाचार पत्रों ने जनता में राष्ट्रीय चेतना जागृत करने में अच्छा योगदान दिया। परिणामस्वरुप दो वर्ष बाद ही ब्रिटिश सरकार ने इन दोनों समाचार पत्रों  के प्रकाशन पर प्रतिबन्ध लगा दिया। इसके सम्पादक बख्शी लक्ष्मणदास पर मुकदमा चलाकर डेढ़ वर्ष के कारावास की सजा दी गई। १८८९ ई० में मुन्शी समरथदास चारण ने 'राजस्थान समाचार 'का प्रकाशन शुरु किया।
राजस्थान में अजमेर पत्रकारिता का केन्द्र बना और राजस्थान की जनता में राष्ट्रीय चेतना जागृत करता रहा। दुर्भाग्य से राजस्थानी शासकों ने राजस्थान की जनता में राजनीतिक जागृति को पसन्द नहीं किया। उन्हें यह भय था कि राजनीतिक जागृति का विकास होने पर उनके राज्य की जनता भी अधिकारों की मांग करेगी, जिससे उनके निरंकुश शासन को खतरा उत्पन्न हो जाएगा।
राजस्थान में स्वदेशी आन्दोलन

१९०५ ई० में लार्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन कर दिया। इस विभाजन के विरुद्ध राष्ट्रीय आन्दोलन उठ खड़ा हुआ। इस आन्दोलन के दौरान स्वदेशी प्रयोग और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया। इस प्रकार बंगाल विभाजन के विरुद्ध जो स्वदेशी आन्दोलन आरम्भ हुआ, उससे राजस्थान अछूता नहीं रहा। राजस्थान में स्वदेशी आन्दोलन का आरम्भ सिरोही, डूंगरपूर और मेवाड़ में हुआ। सिरोही में 'सम्प सभा' नामक एक संस्था स्थापित की गई। स्वामी गोविन्दगिरी के नेतृत्व में विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया और नागरिकों से शराब छोड़ने और अपने राजनीतिक अधिकारों के लिए संधर्ष करने का आह्मवान किया।सम्प सभा की गतिविधियों से ब्रिटिश सरकार का चिन्तित होना स्वाभाविक था। अत: १९०८ में ब्रिटिश सरकार ने एक आदेश जारी कर सम्प सभा को गैरकानूनी घोषित कर दिया और राजस्थानी शासकों से कहा गया कि वे अपने - अपने राज्य में स्वदेशी आन्दोलन को कुचल दें। फलस्वरुप सभी शासकों ने अपने - अपने राज्य में आदेश जारी किये कि किसी प्रकार के क्रान्तिकारी संगठन में शामिल होना या क्रान्तिकारी साहित्य पढ़ना या रखना बिना सरकार के अनुमति के किसी भी सार्वजनिक सभा में उपस्थित होना दण्डनीय अपराध है। यही नहीं, आर्य समाज के साहित्य को भी जब्त करने के आदेश जारी किये गये। राजस्थान के समस्त राज्यों में ब्रिटिश विरोधी प्रचार पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। इस प्रकार सरकार की दमन कारी नीति के फलस्वरुप आन्दोलन समाप्त हो गया।



राजस्थान में क्रान्तिकारी आन्दोलन
विभिन्न प्रकार के प्रतिबन्धों के बावजूद राजस्थान में क्रान्तिकारी आन्दोलन पल्लवित होने लगा। उत्तर भारत में कार्यरत अनेक क्रान्तिकारी दलों से राजस्थान के क्रान्तिकारियों का सम्बन्ध था। श्यामजी कृष्ण वर्मा, स्वामी दयानन्द सरस्वती के शिष्य थे। उन्होंने आॅक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में बी० ए० की परीक्षा पास कर अजमेर में वकालत शुरु की और बाद में वे मेवाड़ राज्य के दीवान नियुक्त हुए। श्यामजी कृष्ण वर्मा महान् क्रान्तिकारी थे और स्वराज्य तथा स्वदेशी वस्तुओं के कट्टर समर्थक थे। १८९७ में महाराष्ट्र के पूना नगर में दो अंग्रेज अधिकारियों - रेण्ड एवं आयस्टर् की हत्या करके दामोदर चापलेकर ने क्रान्ति की बिगुल बजा दिया था। सरकार को यह सन्देह था कि इस घटना में श्यामजी कृष्ण वर्मा का भी हाथ था। किन्तु वे किसी तरह बचकर इंग्लैण्ड पहुँच गये, जहाँ उन्होंने 'इण्डिया हाऊस' की स्थापना की और क्रान्तिकारी गतिविधियों का संचालन किया। इस प्रकार उन्होंने राजस्थान में क्रान्तिकारी आन्दोलन की आधारशीला रखी। राजस्थान में क्रान्तिकारियों का नेतृत्व अर्जुनलाल सेठी, केसरीसिंह बारहठ और राव गोपालसिंह ने किया। 
अर्जुनलाल सेठी
अर्जुनलाल सेठी का जन्म ९ सितम्बर, १८८० ई० को जयपुर में एक जैन परिवार में हुआ था। १९०२ में उन्होंने इलाहाबाद से बी० ए० की परीक्षा पास की। इसके बाद वह चौमू के ठाकुर देवीसिंह के शिक्षक नियुक्त हुए। इसके बाद उन्होंने लोगों को राजनीतिक शिक्षा देने के लिए जयपुर में वर्द्धमान विद्यालय की स्थापना की। प्रत्यक्ष रुप से वह एक धार्मिक विद्यालय था, किन्तु वास्तव में यहाँ क्रान्तिकारियों को प्रशिक्षण दिया जाता था। इस विद्यालय में न केवल राजस्थान से, बल्कि देश के अन्य भागों से भी क्रान्तिकारी प्रशिक्षण लेने आते थे। धीरे - धीरे अर्जुनलाल सेठी का स्कूल राजस्थान में क्रान्तिकारियों की गतिविधियों का अड्डा बन गया। क्रान्तिकारी आन्दोलन को चलाने के लिए धन की आवश्यकता थी। अत: अर्जुनलाल सेठी ने मुगल सराय स्थित एक धनी महंत की हत्या कर उसका धन प्राप्त करने की योजना बनाई। सेठी ने वर्द्धमान विद्यालय के शिक्षक विष्णुदत्त के नेतृत्व में चार विद्यार्थियों को बनारस भेजा। इस दल ने २० मार्च, १९१३ ई० को महन्त और उसके नौकर की हत्या कर दी, लेकिन दुर्भाग्य से उनके हाथ कुछ भी नहीं लगा। हत्याकाण्ड में भाग लेने वाले सभी क्रान्तिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया और उनमें से एक छात्र मोतीचन्द को फाँसी दे दी गयी और विष्णुदत्त को आजीवन कारावास की सजा दी गई। सबूत के अभाव में सेठी को गिरफ्तार नहीं किया जा सका।
२३ दिसम्बर, १९१२ को भारत के गवर्नर जनरल लार्ड हार्किंडग का जुलूस दिल्ली में जब चाँदनी चौक से गुजरा, तभी उस पर बम फेंका गया। सामान्यत: यह माना जाता है कि बम फेंकने वाले प्रसिद्ध क्रान्तिकारी रासबिहारी बोस थे, किन्तु वास्तव में यह बम राजस्थान के क्रान्तिकारी ठाकुर जोरावरसिंह बारहठ ने बुर्का ओढ़कर चाँदनी चौक में स्थित मारवाड़ी लाइब्रेरी से फेंका था। हार्किंडग बमकाण्ड के सिलसिले में जो व्यक्ति बन्दी बनाये गये, उनमें राजस्थान के प्रमुख क्रान्तिकारी बाल मुकुन्द, मोतीचन्द और विष्णुदत्त भी थे। इस मुकदमे में मुखबिर श्री अमीरचन्द ने अपनी गवाही देते समय यह रहस्योद्घाटन किया कि षडयन्त्र की योजना अर्जुनलाल सेठी के द्वारा तैयार की गई थी। अत: सेठी को गिरफ्तार कर लिया गया। सेठी के खिलाफ कोई सबूत न मिलने से उन्हें सजा तो नहीं दी जा सकी, फिर भी बिना मुकदमा चलाये सेठी को जेल में बन्द रखा गया। बाद में ५ अगस्त, १९१४ ई० को जयपुर महाराजा के आदेश से उन्हें पाँच वर्ष के कारावास की सजा दे दी गई। सरकार को भय था कि जयपुर जेल में सेठी की उपस्थिती से जयपुर की शान्ति और व्यवस्था खतरे में पड़ सकती है, इसलिये सेठी को बेल्लोर (मद्रास) जेल में भेज दिया गया।
वहाँ उन्होंने राजनीतिक कैदियों के साथ किये जाने वाले दुर्व्यवहार के खिलाफ ७० दिन की भूख हड़ताल रखी। १९२० में जब राजनीतिक बन्दियों को क्षमादान दिया गया, तो सेठी को भी मुक्त कर दिया गया। जेल से मुक्त होने के बाद श्री सेठी का कार्यस्थल अजमेर हो गया। यहाँ उनके पास प्रसिद्ध क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आजाद और उनके दल के लोग मार्गदर्शन के लिए आया करते थे। सेठी ने मेरठ षड्यन्त्र काण्ड के अभियुक्त शौकत उस्मानी और काकोरी केस के फरार अभियुक्त अशफाक उल्ला खाँ को अपने यहाँ शरण दी थी। गाँधीवादी - खादीवादी कांग्रेसियों के षड्यन्त्र के कारण वे कांग्रेस से अलग हो गये। उनकी आर्थिक स्थिति बड़ी खराब थी। अत: उन्होंने अपना जीवन निर्वाह करने के लिए अजमेर में ही ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में मुसलमान बच्चों को अरबी, फारसी पढ़ाना आरम्भ कर दिया और वहीं २३ दिसम्बर कब्र, १९४१ ई० को उनका देहान्त हो गया। दरगाह के लोगों ने उन्हें मुसलमान समझकर कब्र में दफना दिया। वस्तुत: राजस्थान में राजनीतिक चेतना जागृत करने वालों में अर्जुनलाल सेठी अग्रगण्य माने जा सकते हैं।
केसरीसिंह बारहठ
केसरीसिंह बारहठ का जन्म २१ नवम्बर, १८७२ ई० में कोटा में एक प्रतिष्ठित चारण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम कृष्णसिंह था, जो उदयपुर रियासत के मन्त्री थे। केसरीसिंह पर स्वामी दयानन्द सरस्वती के विचारों का बड़ा प्रभाव पड़ा। फिर भी उनका सम्पर्क अजमेर में श्यामजी कृष्ण वर्मा से हुआ, जो क्रान्तिकारी विचारों के थे। केसरीसिंह, स्वयं संस्कृत, ज्योतिष, वेदान्त, इतिहास एवं राजनीति के उच्चकोटी के विद्वान थे और डिंगल तथा खड़ी बोली में अच्छी काव्य रचना करते थे। उन्होंने कोटा में एक क्रान्तिकारी दल की स्थापना की; जिनमें डॉ० गुरुदत्त लक्ष्मीनारायण और हीरालाल लहरी प्रमुख थे। केसरी सिंह की इच्छा थी कि स्वराज्य प्राप्ति के लिए बंगाल की गुप्त क्रान्तिकारी समितियों की भाँति राजस्थान में भी क्रान्तिकारी संगठनों की स्थापना की जाये, लेकिन इस प्रकार के संगठनों के लिए धन की आवश्यकता थी। अत: डकैती एवं हत्या द्वारा धन प्राप्त करने की योजना बनाई गई। जोधपुर के धनिक प्यारेलाल साधु को बद्रीनाथ की यात्रा के बहाने कोटा लाया गया और २५ जून, १६१२ ई० को उसकी हत्या कर दी गई। पुलिस इस सम्बन्ध में किसी भी क्रान्तिकारी को न पकड़ सकी, लेकिन रामकरण द्वारा केसरीसिंह को गुप्त भाषा में लिखा हुआ पत्र पुलिस के हाथ लग गया। फलत: केसरीसिंह बारहठ, हीरालाल लाहिरी, रामकरण और हीरालाल जालोरी आदि को बन्दी बनाकर मुकदमा चलाया गया। केसरीसिंह, हीरालाल लाहिरी और रामकरण को २० - २० वर्ष के कारावास की सजा दी गई, जबकि एक अन्य क्रान्तिकारी हीरालाल जालोरी को ७ वर्ष कारावास का दण्ड दिया गया।
केसरीसिंह का पुत्र प्रतापसिंह भी प्रसिद्ध क्रान्तिकारी था। प्रतापसिंह ने भारत सरकार के गृह सदस्य क्रंैडोक की हत्या करने की योजना बनाई, किन्तु निश्चित समय पर क्रंैडोक के न पहुँचने के कारण यह योजना सफल न हो सकी। प्रतापसिंह के नाम गिरफ्तारी का वारन्ट निकल गया, लेकिन वह हैदराबाद चला गया और एक अस्पताल में कम्पाउण्डर बन गया। परन्तु पुलिस भय से पुन: राजस्थान आ गया, किन्तु जोधपुर के पास आसानाडा स्टेशन पर स्टेशन मास्टर ने उन्हें धोखे से पकड़वा दिया। प्रतापसिंह को पकड़कर ब्रिटिश सरकार का गुप्तचर विभाग बहुत प्रसन्न हुआ। उनको बरेली जेल में रखा गया। बरेली जेल में गुप्तचर विभाग के निदेशक क्लीवलैण्ड ने प्रतापसिंह को भाँति-भाँति के प्रलोभन दिये और क्रान्तिकारी दल का भेद जानने की कोशिश की। इतना ही नहीं प्रतापसिंह को तरह-तरह की यातनाएँ भी दी गईं, परन्तु प्रतापसिंह टस से मस नहीं हुआ। निर्दयी अंग्रेज सरकार ने उन्हें सता-सता कर मार डाला, परन्तु क्रान्तिकारियों के सम्बन्ध में किंचित भेद भी न जान सकी । केसरीसिंह को हजारीबाग (बिहार) जेल में रखा गया। बाद में कोटा लाया गया। १९१९ में अन्य राजनीतिक बन्दियों के साथ केसरीसिंह को भी जेल से मुक्त कर दिया गया। राजस्थान में जागृति उत्पन्न करने वालों में केसरीसिंह बारहठ का नाम आज भी श्रद्धा से लिया जाता है।
राव गोपालसिंह
अजमेर - मेरवाड़ा में खरवा ठिकाने के राव गोपालसिंह राजस्थान के क्रान्तिकारी आन्दोलन से घनिष्ठ रुप से सम्बन्धित थे। कृष्णा मिल्स लि० ब्यावर के सेठ दामोदर राठी उनके सहयोगी थे और वे क्रान्तिकारियों को आर्थिक सहायता देते थे। राव गोपालसिंह, भूपसिंह (जो बाद में विजयसिंह पथिक के नाम से प्रसिद्ध हुआ) की सहायता से क्रान्तिकारियों के लिये अस्र - शस्र की व्यवस्था करते थे। राव गोपालसिंह का बंगाल के प्रसिद्ध क्रान्तिकारी रास बिहारी बोस तथा केसरीसिंह से भी सम्पर्क था। कोटा के साधु हत्याकाण्ड के सिलसिले में सरकार को इस क्रान्तिकारी दल के बारे में जानकारी मिली थी। इस समय एजेन्ट गवर्नर ने राव को क्रान्तिकारी दल से दूर रहने की चेतावनी दी, परन्तु राव पर इस चेतावनी का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान रासबिहारी बोस और सतीशचन्द्र सान्याल ने उत्तर भारत में सशस्र क्रान्ति की योजना बनाई थी, राव गोपालसिंह उस योजना से घनिष्ठ रुप से सम्बन्धित थे। इस योजनाके अनुसार यह निश्चय किया गया कि मुल्तान, लाहौर एवं मेरठ के सैनिक रासबिहारी बोस की सहायता करेंगे और जोधपुर तथा बीकानेर के सैनिक रामगोपाल सिंह के नेतृत्व में अजमेर पर आक्रमण कर देंगे, लेकिन क्रान्तिकारियों के एक सहयोगी माणिक्यलाल ने इस योजना की सूचना पुलिस को दे दी। अत: योजना विफल हो गई।
ब्रिटिश सरकार ने २६ जून, १९१५ को राव गोपालसिंह को २४ घण्टे के अन्दर - अन्दर खरवा छोड़ने को आदेश दिया और यह भी कहा कि टाडगढ़ पहुँचने पर ३६ घण्टे के अन्दर अपने आने की सूचना तहसीलदार को दे। यह आदेश दिया गया कि टाडगढ़ निवास के दौरान बिना तहसीलदार की अनुमति के वह किसी भी व्यक्ति से सम्पर्क नहीं कर सकेंगे और उनके सभी पत्र उन्हें तहसीलदार के द्वारा दिये जायेंगे। दिन में एक बार तहसीलदार के समक्ष उपस्थित होना पड़ेगा। इतना ही नहीं, वे बिना तहसीलदार की अनुमति के टाडगढ़ की सीमा से बाहर नहीं जा सकेंगे। इस आदेश के मिलने पर राव गोपालसिंह टाडगढ़ के लिये रवाना हुए। रवाना होते समय उन्होंने अपने पुत्र गणपतसिंह को यही बहुमूल्य सीख दी कि - "अपने देश के प्रति वफादार रहना"।
१० जुलाई, १९१५ को राव गोपालसिंह टाडगढ़ के किले से भाग निकले। अगस्त १९१५ में किशनगढ़ के पास सलामाबाद में पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार करने का प्रयत्न किया, तो उन्होंने कड़ा मुकाबला किया। १९ अगस्त, १९१५ को सलामाबाद के एक शिव मन्दिर में राव ने पुलिस के समक्ष आत्म - समपंण कर दिया। राव ने इस आश्वासन पर आत्म - समपंण कर दिया कि उन्हें राजनीतिक अभियुक्त माना जायेगा। इसके बाद राव गोपालसिंह को दो वर्ष के कारावास का दण्ड दिया गया और कुछ समय बाद उन्हें शाहजहाँपुर (बिहार) स्थित जेल में भेज जिया गया। राव गोपालसिंह स्वतन्त्रता के अनन्य प्रेमी थे। वे हर देश के लिये हर प्रकार का त्याग और बलिदान करने को तैयार थे। सरकार ने उनकी जागीर खरवा को जब्त कर लिया, लेकिन उन्होंने अपने जीवनकाल में सरकार के सामने अपना सिर कभी नहीं झुकाया।
रामनारायण चौधरी
अजमेर के रामनारायण चौधरी भी राजस्थान के क्रान्तिकारी आन्दोलन से घनिष्ठ रुप से सम्बन्धित थे, जिनका भारत के गृह सदस्य क्रंैडोक की हत्या की असफल योजना में हाथ था। प्रतापसिंह बारहठ भागकर हैदःराबाद (सिन्ध) गये। पुलिस उनके पीछे पड़ी हुई थी, तब रामनारायण चौधरी उन्हें सुरक्षित स्थान पर लाने के लिये सिन्ध की ओर रवाना हुए। प्रतापसिंह बारहठ वहाँ से राजस्थान आये और जोधपुर के निकट आसानाड़ा के स्टेशन मास्टर से मिलने के लिये ठहर गये क्योंकि वह उन्हीं के दल का सदस्य था। जिस समय प्रतापसिंह आसानाड़ा रेलवे स्टेशन पहुँचे, तभी यह तय किया गया कि रामनारायण चौधरी बीकानेर में उनकी प्रतीक्षा करेगा। जब प्रतापसिंह बारहठ बीकानेर नहीं पहुँचे, तो रामनारायण चौधरी ने स्टेशन मास्टर को एक पत्र लिखा। यह पत्र पुलिस के हाथ पड़ गया और सी० आई० डी० इन्सपैक्टर मगनराज व्यास पुलिस को लेकर चौधरी को गिरफ्तार करने के लिए बीकानेर पहुँचे। रामनारायण चौधरी पुलिस की निगाह से बचकर जयपुर पहुँच गये और साँभर के कृष्ण सोढ़ानी नामक एक क्रान्तिकारी के साथ गुप्त रुप से रहने लगे। जब प्रतापसिंह को पाँच वर्ष की सजा दे दी गई, तो रामनारायण चौधरी अपने निवास स्थान नीम का थाना लौट आये, लेकिन सी० आई० डी० इन्सपैक्टर मगनराज व्यास को गोली से मारने की योजना बनाई, जो सफल नहीं हो सकी। इसके बाद रामनारायण चौधरी रामगढ़ शेखावटी के एक मिडिल स्कूल में अध्यापक हो गये और वहाँ क्रान्तिकारी दल संगठित किया। रामनारायण चौधरी आजीवन स्वतन्त्रता संग्राम के एक आदर्श योद्धा रहे।



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