Thursday, 25 August 2011

स्वतन्त्रता पूर्व राजस्थान का शैक्षिक परिदृश्य

शिक्षा मानव विकास को धरातल प्रदान करता है इस दृष्टि से शिक्षा का इतिहास सभ्यता और संस्कृति को विभिन्न चरणों से अवगत कराता है। राजपूताना में भी शिक्षा विभिन्न काल क्रमों से गुजरी है। 1818 से पूर्व प्रचलित शिक्षा के ब्रिटिश दस्तावेजों में देशी शिक्षा (इंडिजिनियस एज्यूकेशन) सम्बोधित किया हैं और उसके बाद में विकसित होने वाली शिक्षा प्रणाली को अंग्रेजी, शिक्षा, पाश्चात्य शिक्षा या आधुनिक शिक्षा के नाम से सम्बोधित किया है लेकिन इसमें अंग्रेजी पाश्चात्य और भारतीय शिक्षा तत्वों के तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण के समावेश होने के कारण इसे आधुनिक शिक्षा कहना उपयुक्त होगा।

देशी शिक्षा :
  • अर्थ एवं उद्देश्य : प्रचलित मान्यताओं और ब्रिटिश दस्तावेजों के अनुसार देशी शिक्षा से तात्पर्य धर्म से प्रभावित शिक्षा से लिया जाता है लेकिन यह उपयुक्त नहीं है क्योंकि प्राचीन काल से ही धर्म के साथ-साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण अर्थात तर्क पर आधारित शिक्षा का प्रचलन था, निसंदेह कालान्तर में वैज्ञानिक दृष्टिकोण सीमित हो गया। अब धर्म, ज्ञानार्जन, व्यक्तिगत कल्याण, और जीवन निर्वाह के साधन उपलब्ध कराने से शिक्षा प्रेरित थी। राजपूताना में हिन्दू, जैन और मुस्लिम जनसंख्या की बहुलता थी, अतः शिक्षण व्यवस्था भी अपने व्यवसाय, धर्म और जाति से प्रभावित थी, परिवार ही शिक्षा का प्रमुख केन्द्र था।

  • विभिन्न देशी शिक्षण संस्थायें : देशी शिक्षा के उद्देश्यों की पूर्ति का साधन विभिन्न शिक्षा के केन्द्र थे। परिवार अनौपचारिक शिक्षा का प्रमुख केन्द्र था। औपचारिक शिक्षा धार्मिक संस्कार-हिन्दुओं में उपनयन और मुसलमानों मंें बिस्मिल्लाह रस्म के बाद प्रारम्भ होती थी अभिलेखागार सामग्री और प्राच्य विद्यमान प्रतिष्ठानों की पाण्डुलिपियों के अध्ययन के आधार पर शिक्षा व्यवस्था को दो भागों में विभक्त करके अध्ययन किया जा सकता हैं : पहला प्राथमिक और दूसरा उच्च शिक्षा। प्राथमिक शिक्षा के रूप मंे हिन्दुआंे की पाठशाला, चटशाला, जैनियों के उपाशरा, वानिका और मुसलमानों के मकतब थे। इनके अतिरिक्त मंदिर, मस्जिद के आंगन, चैपाल, किसी विशिष्ट शिक्षक एवं व्यक्ति का घर, बरामदा कुछ स्थानों पर दुकाने आदि शिक्षण केन्द्र थी। उच्च शिक्षा के केन्द्र के रूप में हिन्दुओं के मठ, जैनियों के उपाशरा और मुसलमानों के मदरसे प्रमुख स्थल थे।
                               पाठशाला और चटशाला आदि के शिक्षक को गुरू एवं जोशी जी, तथा मठ एवं अस्थल के आचार्या व महन्त, उपाशरा के भट्टारक एवं जाति तथा मकतब एवं मदरसे के शिक्षक मौलवी एवं उलेमा कहलाते थे। परिवार प्राथमिक और व्यवसायिक शिक्षा के प्रमुख केन्द्र होते थे, वंशानुगत आधार पर माता-पिता व परिवार के वरिष्ठ सदस्य बालक को शिक्षित करते थे।

  • पाठ्यक्रम : पाठ्यक्रम भी दो भागों में विभक्त था धार्मिक एवं गैर धार्मिका प्राथमिक शिक्षा लिखना, पढ़ना और हिसाब (गणित) तक सीमित थी। पाठषाशाला में हिन्दी एवं संस्कृत, उपाशरा में हिन्दी एवं प्राकृत, और मकतब में फारसी एवं उर्दू पढ़ाई जाती थी, इसके अतिरिक्त राजस्थान महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग होने के कारण स्थानीय भाषा और फारसी प्रशासनिक भाषा होने के कारण उर्दू को अध्ययन का प्रचलन भी शिक्षण संस्थाओं में था। गणित के अन्तर्गत 01 से 100 तक गिनती और 1/2 (आधा) से 11 तक के पहाड़े पढ़ाते तथा दूसरे सोपान में ढ़य्या (2=1/2) एवं सवाया 1=1/4 और दस के आगे के पहाड़े, माप-तोल, गुणा ब्याज, राशि, लब्धि वर्गीकरण के सूत्र तथा बही-खाता रखने की विधि सिखाई जाती थी। बही-खाता विधि को महाजनी लिपि या वाणियावाटी लिपि गणित भी कहा जाता था क्योंकि इसमें व्याकरण की कठिनाईयों से बचने के लिये संकेत भाषा का प्रयोग किया जाता था। उदाहरणार्थ संवत के लिये (झ्) निशान होता था। पाठ्यक्रम का दूसरा भाग धार्मिक शिक्षा से प्रेरित था, जिसमें देवी देवताओं की कथा, त्योहार, जीवनापयोगी वस्तुएँ, पूजा सामग्री विधि, खान-पान, श्रंृगार, वस्त्रों के फलों के नाम, नैतिक शिक्षा आदि मदरसों में कुरान, फातिहा (दफनाने के समय पढ़ा जाता है) हकीकत, करीमा, तारीखे आदि पाठ्यक्रम का भाग थे। उस समय पढ़ाने की विधि आज के समान चित्रात्मक नहीं थी वरन् लयात्मक पढ़ती थी।

  • देशी-उच्च शिक्षा : उच्च शिक्षा का पाठ्यक्रम भी धार्मिक और गैर धार्मिक में विभाजित था। धार्मिक शिक्षा उच्च आध्यात्मिक शिक्षा से सम्बद्ध थी मठ में कर्मकान्ड, अस्थल में धर्म की किसी विषेश शाखा का अध्ययन, वेदांे और ग्रंथों का मदरसों में इस्लामिक कानून, इलाही आदि का अध्ययन कराया जाता था। धर्म के अतिरिक्त उच्च शिक्षा केन्द्रों पर भूगोल, इतिहास, भाषा विज्ञान, अंक गणित, बीज गणित, रेखा गणित, खगोल विद्या, आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा का भी ज्ञान दिया जाता था। तकनिकी शिक्षा के क्षेत्र में जयपुर स्थित जन्तर मन्तर महत्वपूर्ण उपलब्धि थी, कृषि केन्द्र क्षेत्र में हराईयां जुताई के चिन्ह्, अभियांत्रिक क्षेत्र में विशाल महल, किले, जलमहल, नहरों, पुल, कुआंे, बावडि़यों का निर्माण तकनीकी शिक्षा का परिणाम था। धातु पिघलाने की तकनीकी भी महत्वपूर्ण ज्ञानार्जन था। कर्नल टोड को दक्षिणी राजस्थान जावर क्षेत्र में जस्ता, धातु, ताम्बे, टिन और लोहा पिघलवाने वाले बकयंत्र या भमके मिट्टी के बने नदी के किनारे मिले थे।

  • महिला शिक्षा : महिलाओं की शिक्षा औपचारिक और अनोपचारिक दोनों ही प्रकार की थी अधिकांशतः राजपरिवार, कुलीन वर्ग, चारण महिलाओं, जैन साधाब्यिों उपाशरों में और राजपरिवार से सम्बद्ध दास दासियों में शिक्षा का प्रचलन था, राजकीय अभिलेखागार में जनानी ड्योढ़ी तहरीर नाम से पृथक वर्ग का संग्रह है जिससे पता चलता है कि राजपरिवारों से सम्बन्ध महिलायें सांस्कृतिक मूल्यों और सैन्य शिक्षा लेती थी। अनेक विदुशी चारण महिलायें हुई है। महिला शिक्षा का सबसे मजबूत स्तम्भ उपाशरा में अध्ययनरत जैन महिलायें साध्वियां थी, वे भाषा, साहित्य एवं अनुवाद के कार्य में निपुर्ण होती थी। व्यवसायिक परिवारों से सम्बन्द्ध महिलायें परिवार में ही रहते हुये अपने पारिवारिक व्यवसाय की शिक्षा ग्रहण करती थी।

  • प्रशासनिक व्यवस्था : व्यवस्था में एक निश्चित प्रशासनिक व्यवस्था का अभाव था। संस्था में प्रवेश, समय सारणी, परीक्षा, उत्तीर्ण प्रमाण पत्र शुल्क की आज के समान व्यवस्था नही थी। शुल्क के रूप में सीधा प्रथा अर्थात् शिक्षक के लिये अन्न व अन्य भोजन सामग्री लाते थे, शिक्षा पूर्ण होने पर गुरू दक्षिणा भेंट की जाती थी। शासक शिक्षा को प्रोत्साहन देने के लिये विधि द्वारा बाध्य नहीं था, वह अपनी स्व-प्रेरणा से शिक्षण कार्य करने वालों को भू-अनुदान करते थे, जिसे हिन्दुओं की माफी जागीर और मुस्लमानों की मदद ए माश जागीर कहलाती थीं, यह कर मुक्त जागीर होती थी।


आधुनिक शिक्षा :
  • आधुनिक शिक्षा से तात्पय : ब्रिटिश सर्वोच्चता काल 1818 - 15 अगस्त 1947 में संस्थाओं के पारस्परिक स्वरूप में परिवर्तन आया, इस क्रम में देशी शिक्षा भी आधुनिक शिक्षा का स्वरूप ग्रहण करने लगी। आधुनिक शिक्षा से तात्पर्य हम उस शिक्षा पद्धति से लेते हैं तो तर्क पर आधारित वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करें, जिसमें एक निश्चित कक्षाक्रम, परीक्षा प्रणाली, निश्चित पाठ्यक्रम, योग्यता के आधार पर नियुक्त शिक्षक आदि व एक निश्चित प्रशासनिक व्यवस्था लिये हो। सर्वोच्चता काल में विकसित व्यवस्था को केवल अंग्रेजी या केवल पाश्चात्य शिक्षा कहना उपयुक्त नहीं है, क्योंकि इसमें अंग्रेजी, पाश्चात्य और भारतीय तत्व मौजूद थे इसे आधुनिक शिक्षा कहना ही उपयुक्त होगा।

  • आधुनिक शिक्षा की आवश्यकता : औपनिवेशिक साम्राज्य के लोगों को सभ्य बनाना इस्ट इण्डिया कम्पनी का एक लक्ष्य था। 1824 में कम्पनी ने कोलकाता में जनरल कमेटी आॅफ पब्लिक इंस्ट्रकशन को राजपूताना में चार स्कूल खोलने के निर्देष दिये। राजपूताना को सभ्य बनाने की नीति के अन्तर्गत रियासतों के शासकों को पत्र लिखकर यह निर्देष दिये कि सामाजिक और आर्थिक सुधार केवल सरकारी तन्त्र से सम्भव नहीं है बल्कि शिक्षा द्वारा जन-चेतना के माध्यम से ही सम्भव है लेकिन विभिन्न अभिलेखों के अध्ययन से कम्पनी का अप्रत्यक्ष लक्ष्य भी उभरता है जिसके अनुसार एक तो उन्हें व्यवहारिक प्रशासनिक कठिनाईयाँ आ रही थीं उन्हें शासकों से पत्र व्यवहार, वार्तालाप, गुण मंत्रणा में कठिनाई आती थी दूसरा प्रशासनिक परिवर्तन के कारण कार्यालयों में ऐसे कर्मचारी चाहिये थे जो कि उनकी भाषा, रीति नीति को समझ कर क्रियांवित करने में सहायक हो। तीसरा कारण यह भी था कि राजपूताना एक प्रमुख व्यापारिक केन्द्र था एवं सुरक्षा की दृष्टि से एक सम्पर्क भाषा की आवश्यकता थी। जिससे औनिवेशिक हित पूरे हो सकें, चैथा मनोवैज्ञानिक कारण भी था जिसके अनुसार विजेता के सिद्धान्तों पर आधारित शिक्षा का प्रचलन, सांस्कृतिक सुगमता का सरल मार्ग होता है, पाँचवा कारण स्थानीय नागरिकों को नई व्यवस्था से उत्पन्न स्थितियों का लाभ उठाना था। अब नियुक्तियां वंशानुगत को स्थान पर योग्यता के आधार पर होने लगी। अतः आधुनिक शिक्षा के प्रति स्वाभाविक आकर्षण बढ़ने लगा।

  • आधुनिक शिक्षा का विकास : आधुनिक शिक्षा का विकास मूलतः तीन संस्थाओं के माध्यम से हुआ पहला ब्रिटिश सर्वोच्चता, मिशनरी, तीसरा निजी एवं सार्वज्निक संस्थाऐं थी, सर्वोच्च काल दो अवधियों में विभक्त रहा, पहला 1818-1857 तक ईस्ट इण्डिया कम्पनी का और 1858-15 अगस्त 1947 तक ब्रिटिश ताज का शासन काल रहा। प्रान्तों पर इनका सीधा प्रशासन था लेकिन देशी रियासतों में वे परामर्शदाता थे, वस्तुतः राजाओं की स्थिति अधीनस्थ सहयोग की थी अतः ब्रिटिश सरकार के नियमों की क्रियान्विति शासकों के माध्यम से होती थी। अभिलेखागार दस्तावेजों में राजस्थान की रियासतों के लिये राजपूताना और अजमेर मेरवाड़ा के लिये केन्द्र शासित क्षेत्र उल्लेखित किया गया है। 1932 से पूर्व तक कुछ रियासतें मध्य भारत रेजीडेन्ट के अधीन थी, 1932 में सभी रियासतें अजमेर मेरवाड़ा के अधीन कर दी गई, अब अजमेर में सुपरिंटेडेन्ट के स्थान पर एजेन्ट टू द गर्वनर जनरल (ए.जी.जी.) नियुक्त किया गया और उसके अधीन सभी रियासतों में रेजीडेन्ट की नियुक्ति हुई जो कि शासकों को परामर्श देते थे, सर्वोच्चता काल में विकसित शिक्षा प्रणाली उपरोक्त प्रशासनिक तन्त्र से प्रभावित हुई। नई शिक्षा में जो कक्षाक्रम व्यवस्था बनी वह थी स्कूल शिक्षा और दूसरा काॅलेज शिक्षा। प्रथम स्कूल शिक्षा तीन सोपानों में विभक्त थी। प्राथमिक मिडल और हाई स्कूल प्राथमिक स्कूल वह वर्नाकुलर स्कूल थे, ग्रामीण और तहसील स्तर पर वर्नाकुलर मिडल स्कूलों का उल्लेख किया गया है, दूसरे स्तर पर एंगलों वर्नाकुलर थे, यह भी दो भागों में विभक्त थे एक मिडल स्कूल एवं दूसरा हाईस्कूल था, प्राईमरी में 1 से 5 तक मिडल में 6 से 8 वीं तक और हाई स्कूल में 9 वीं और 10 वीं कक्षा तक पढ़ाया जाता था। दूसरा भाग काॅलेज शिक्षा का था जिसमें 11 वीं एवं 12 वीं इंटरमीजिएट और तैरहवी एवं स्नातक (बी.ए) और 15 वीं एवं 16 वीं स्नातकोत्तर (एम.ए.) कक्षाओं का पाठ्यक्रम एवं परीक्षा व्यवस्था थी। इस प्रकार कक्षा क्रम व्यवस्था 10+2+2+2 की थी। इसके अतिरिक्त व्यावसायिक एवं तकनीकी शिक्षा भी एक व्यवस्थित स्वरूप में विकसित होने लगी।


राजपूताना में आधुनिक शिक्षा का प्रारम्भ :

                          (आधुनिक शिक्षा की ओर प्रारम्भिक कार्य केन्द्र शासित अजमेर मेरवाड़ा क्षेत्र से प्रारम्भ हुआ) 1819 में रेजीडेन्ट आक्टरलोनी के निर्देश पर जेवन कैरी ने पहले अजमेर में और बाद में पुष्कर भीनाय, और केकड़ी में अंग्रेजी भाषा के स्कूल खोले, लेकिन 1931 में जनता के विरोध के कारण ये स्कूल बन्द करने पडे़। 1835 ई. में कम्पनी ने अंग्रेजी को राजकीय भाषा के रूप में मान्यता दी, परिणामस्वरूप अंग्रेजी ज्ञान की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुये 1836 में अजमेर में पहला सरकारी स्कूल खोला गया। यह 1868 में इन्टरमीडिट और 1869 में स्नात्तक काॅलेज बना। रियासतों की दृष्टि से सर्वप्रथम अलवर महाराज बन्ने सिंह की प्रेरणा से प. रूपनारायण ने 1842 ई. में और कुछ समय बाद भरतपुर के महाराज बलवन्त सिंह ने स्कूल खोले। 1844 में सर्वप्रथम इसी स्कूल ने आधुनिक परीक्षा प्रणाली को अपनाया। 1847 में यह इंटरमीजिएट, 1888 मंे स्नातक और 1900 में स्नात्तकोत्तर काॅलेज के रूप में क्रमोन्नत हुआ। 1844 में जयपुर 1867 में जोध्ापुर में दरबार स्कूल और 1883 में टोंक नवाब ने सरकारी स्कूल प्रारम्भ किये। 19वीं सदी के अन्त तक जैसलमेर को छोड़कर राजपूताना की सभी रियासतों में राजकीय शिक्षण संस्थायें प्रारम्भ हो चुकी थी।
                         प्राथमिक और मिडल स्कूल क्रमोन्नत होते हुये हाई स्कूल बने इनमें सबसे पहले 1836 में अजमेर का सरकारी स्कूल 1851 मे हाई स्कूल बना, रियासतों में जयुपर 1844 में हाई स्कूल की पढ़ाई प्रारम्भ हुई, यह हवामहल के सामने मदन मोहन मंदिर में संचालित होता था, इसमें हिन्दू मुस्लिम सभी विद्यार्थी अध्ययन करते थे 1870 मे अलवर, भरतपुर 1876 में सर प्रताप हाई स्कूल जोधपुर और 1882 मे उदयपुर में हाई स्कूल कक्षाओं की पढ़ाई प्रारम्भ हो गई थी। यह क्रम राजपूताना की रियासतों में वहां की जागीरों और ग्रामीण क्षेत्र तक 1947 तक निरन्तर बढ़ता रहा स्कूल शिक्षा क्रमोन्नत होते हुये महाविद्यालय स्तर पर पहुंची। महाविद्यालय शिक्षा का प्रथम सोपान इंटरमीडियट, कक्षाएं, ग्यारहवी एवं बारहवीं सबसे पहले केन्द्रषासित अजमेर में 1868 और इसी वर्ष रियासतों में जयपुर के महाराजा काॅलेज (स्कूल) इंटरमीडिएट काॅलेज बना, 1853 में जोधपुर इंटरमीडिएट काॅलेज 1922 में उदयपुर और 1928 में बीकानेर का डूंगर
                          काॅलेज इंटरमीजिएट काॅलेज और भरतपुर में 1941 में महारानी जया काॅलेज क्रमोन्नत हुये।
काॅलेज शिक्षा के दूसरे सोपान, स्नातक शिक्षा में भी अजमेर गवर्मेन्ट इंटरमीजिएट काॅलेज स्नातक काॅलेज में क्रमोन्नत हुआ। रियासतों में जयपुर का महाराजा काॅलेज 1888 में जोधपुर में 1893 में जसवन्त काॅलेज, बीकानेर में 1928 में और उदयपुर में 1935 में स्नातक काॅलेज के रूप में क्रमोन्नत हुए। काॅलेज शिक्षा का तीसरा सोपान स्नातकोत्तर (पी.जी) की पढ़ाई सर्वप्रथम 1900 ई. में जयपुर रियासत में प्रारम्भ हुई। तत्पश्चात् 1942 व बीकानेर में उदयपुर में स्नातकोत्तर कक्षाएँ प्रारम्भ हुई। प्राथमिक से उच्च शिक्षा तक की प्रारम्भिक स्वरूप कालान्तर में विशाल स्वरूप ग्रहण करता गया, शिक्षा का विकास का क्रम विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न संस्थाओं के माध्यम से हुआ। विभिन्न क्षेत्रों में अर्थात् महिला शिक्षा, कमजोर वर्ग की शिक्षा, शासक वर्ग की शिक्षा, शासक एवं सामन्तों (नोवल्स) की शिक्षा में हुआ।
  • महिला शिक्षा : 1861 में मिशनरी संस्था कन्या वर्नाकुलर स्कूल प्रारम्भ किया। सरकार द्वारा 1866 ई. में पुष्कर अजमेर मेरवाड़ा केन्द्र शासित क्षेत्र में प्रथम सरकारी कन्या स्कूल खुला। सरकारी प्रयत्न उत्तर-पश्चिम प्रान्त के डायरेक्टर (पब्लिक इंस्ट्रक्शन) के उस पत्र से प्रेरित थे जिसमें उन्होंने पीसागन स्कूलों का निरीक्षण करते समय वहां दो ओसवाल छात्राओं को लगन पूर्वक पढ़ते हुये देखने का उल्लेख किया और उसी से प्रेरित होकर राजपूताना मंें पृथक महिला शिक्षण संस्थाएं खोलने को प्रोत्साहित किया। देशी रियासतों में महिला शिक्षा को प्रोत्साहित करने का प्रथम कदम जयपुर महाराजा रामसिंह ने 7 मई 1866 को कान्तिचन्द्र मुखर्जी के परामर्श पर कन्या विद्यालय स्थापित करके किया। यहां छात्राओं को सिलाई सिखाई जाती थी। 7 सितम्बर 1866 को भरतपुर में, इसी वर्ष उदयपुर में, 1872 में अलवर व कोटा में, 1883 में झालावाड़ में कन्या स्कूल खोले गये, 1886 ई. में जोधपुर में महाराजा के लोकप्रिय संरक्षक हेवसन की अचानक मृत्यु हो जाने पर उनकी स्मृति में हेवसन कन्या विद्यालय स्थापित किया गया। टोंक रियासत में 1885 में मुस्लिम कन्याओं के लिये और 1888 में बीकानेर में लेडी एलिगन की यात्रा के समय स्कूल खोले गये।

  • मिशनरी प्रयत्न : महिला शिक्षा को संस्थापित करने में मिशनरी संस्थाओं का भी योगदान रहा है। 1861 में नसीराबाद मे स्थापित प्रथम गल्र्स वर्नाकुलर स्कूल अन्य कई मायनों में प्रथम था यह राजपूताना का प्रथम स्कूल था जहां गल्र्स स्काउट गाईड प्रारम्भ हुई, यहां से पहली बार 1894 में तीन छात्राओं को छात्रवृति देकर आगरा मेडीकल काॅलेज में पढ़ने हेतु भेजा गया, 1910 में गल्र्स नार्मल कक्षायें शिक्षक प्रशिक्षण कक्षाएं प्रारम्भ की। पुष्कर में भी 1866 में मिशनरी विलेज स्कूल प्रारम्भ की। अजमेर में भी एक केन्द्रीय स्कूल और उसकी 7 ब्रांच विभिन्न मोहल्लों में खोली गई। महिला शिक्षा को प्रोत्साहित करने में मिशनरी संस्थाओं ने अग्रणी भूमिका निभाई। दयानन्द सरस्वती ने महिला शिक्षा के महत्व को स्वीकारते हुये सत्यार्थ प्रकाश के तीसरे अध्याय में विस्तार से लिखा है अजमेर में परोपकारणी सभा की स्थापना की, जिसके माध्यम से शिक्षा प्रचार का कार्य किया गया। अजमेर, उदयपुर, भरतपुर और शेखावाटी में आर्य समाज ने शिक्षा के प्रसार हेतु बहुत कार्य किये। यह प्रचलित मान्यताए रही है। कि अजमेर में 1913 में  स्थापित सावित्री काॅलेज और उदयपुर का महिला महाविद्यालय आर्य समाज से प्रेरित थे।

  • सार्वजनिक शिक्षण संस्थाएं : स्वतत्रंता आंदोलन के दौरान सार्वजनिक स्वयं सेवी शिक्षण संस्थायें स्थापित की गई, इसका प्रारम्भ बिजोलिया किसान आन्दोलन के समय से ही हो गया था, लेकिन गांधी के नेतृत्व में राष्ट्रीय आन्दोलन ने इसे रचनात्मक कार्यक्रम के अन्तर्गत एक व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया। 1921 में शेखावाटी में संगासी सम्मलेन में महिला शिक्षा को एक कार्यक्रम के रूप में अपनाया। 1927 में हटूण्डी अजमेर में गांधी आश्रम की स्थापना हुई, 1945 में यह महिला शिक्षा सदन बना। 1927-1945 तक यह राजपूताना के राष्ट्रवादियों और रचनात्मक कार्यकर्ताओं की कर्म भूमि रहा। नवम्बर 1938 में उदयपुर में महिला मण्डल की स्थापना हुई। आदिवासी क्षेत्र में कन्याओं को शिक्षित करने के लिये उदयपुर में आवासीय स्कूल भी चलाया। इन कारणों से आदिवासी अपने क्षेत्र से निकलकर बाहरी समाज की प्रगति से परिचित हो सका तथा उनका संर्वागीण विकास हो सका। महिला शिक्षा के क्षेत्र में अक्टूबर , 1935 में प्रारम्भ वनस्थली विद्यापीठ का नाम प्रतिष्ठित है। यह अपनी पंचमुखी शिक्षा 1. ड्रील, योग खेल-कूद आदि 2. व्यवहारिक शिक्षा, 3. सौंदर्य अभिव्यक्ति चित्रकला संगीत आदि, 4. नैतिक शिक्षा-नित्य प्रार्थना, वार्ता, विचार, 5. बौद्धिक शिक्षा आदि के लिये जाना जाता है। इसके अतिरिक्त यहां चर्खा और खादी पर विषेश बल दिया गया है। भीलवाड़ा की महिला परिषद और शेखावाटी का जाट छात्रावास भी महिला शिक्षा के प्रमुख केन्द्र रहे है। गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित शिक्षण संस्थाओं में बुनियादी शिक्षा को आधार बनाया गया जहां महिलाओ को चर्खा निर्माण, चर्खा चलाना, खादी का निर्माण व उपयोग कुटीर उद्योग, कुओं का निर्माण आदि कार्य सिखाये जाते थे, जिससे व्यक्ति स्वावलम्बी बन सकें।

  • महिला शिक्षा का पाठ्यक्रम : प्रारम्भ मे यह सिलाई, बुनाई बच्चेगान जैसे घरेलू कार्यो की शिक्षा तक सीमित था, इससे छात्राओं की संख्या घटने लगी। 1875 में र्थी आर अर्थात रीडिंग, राईटिंग, अर्थमेटिक को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया तथा भाषा भी पढ़ाई जाने लगी। 1937 में राष्ट्रीय महिला समिति के तीसरे अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित करके छात्र और छात्राओं के लिये समान पाठ्य क्रम लागू करने का प्रस्ताव भेजा, इसके आधार पर बोर्ड ने प्राथमिक शिक्षा से ही समान पाठ्यक्रम लागू कर दिया इससे पूर्व हाई स्कूल और काॅलेज स्तर का पाठ्यक्रम समान था।

  • महिला शिक्षा के विकास में बाधाएं : अभिलेखागार में उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर महिला शिक्षा के विकास में अनेक बाधायें थी- जैसे पर्दा प्रथा, बाल विवाह, प्रारम्भ में योग्य शिक्षिकाओं का अभाव, प्राकृतिक आपदाये एवं भौगोलिक दूरियां आदि। इन बाधाओं के कारण अनेक बालिकाएं शिक्षा से वंचित रह जाती थी। उत्तरोत्तर ऐसा समाज विकसित होने लगा जिसमें महिलाएं शिक्षाविहीन हो गई। उपरोक्त कठिनाईयों का समाधान कालान्तर में हुआ, विषेशकर प्रथम महायुद्ध के बाद विदेश से लौटकर आये सैनिकों का दृष्टिकोण व्यापक हो गया था, दूसरा राष्ट्रीय आन्दोलनकारियों और समाज सुधारकों ने महिला शिक्षा के महत्व को आमजन तक पहुंचाया एवं महिलाओं ने भी स्वालम्बन के महत्व को समझा।    

  • कमजोर वर्ग के लिये शैक्षणिक कार्य : राजपूताना का दक्षिणी क्षेत्र वर्तमान में उदयपुर, चित्तौड़, डूंगरपूर बांसवाड़ा और प्रतापगढ़, सिरोही मेरवाड़ा आदि क्षेत्र आदिवासी बहुल है। इन क्षेत्रों में ईसाइ मिशनरी, आर्य समाज और राष्ट्रीय आन्दोलन कर्ताओं ने अहम् भूमिका निभाई। मिशनरियों द्वारा शिक्षा कार्य -पहाड़ी लोगों को शिक्षित करने का पहला कदम ईसाई मिशनरी संस्था ने दिसम्बर 1863 में टौडगढ़ में रोवर्स स्कूल स्थापित करके उठाया। मेरवाड़ा क्षेत्र में 1882 तक राजकीय और गैर राजकीय शिक्षण संस्थाओं की संख्या 16 तक पहुंच गई थी। अजमेर मेरवाड़ा से सम्बद्ध मेवाड़ के आदिवासी भी नव शिक्षा से प्रभावित हो रहे थे। अतः मेवाड़ के महाराणा सज्जन सिंह ने 1875 में ऋषदेव और जावर में 1883 में पड़ना एवं बारापाल में स्कूलें प्रारम्भ की। इसी क्रम में बांसवाड़ा में 1901 तक और कुशलगढ़ में 10 स्कूले संचालित थी। यहां एक एंगलों वर्नाकुलर और तीन वर्नार्कुलर स्कूल चल रहे थे। डुंगरपुर में एक स्कूल था। 1940 तक खेरवाड़ा में एक स्कूल और सार्वजनिक पुस्तकालय स्थापित किये गये।

शासक एवं कुलीन वर्ग के लिये शिक्षा :

  • उद्देश्य : ब्रिटिश सम्प्रभुताकाल में देशी रियासते दो प्रकार से शिक्षा से सम्बद्ध हुई, एक तो अपने राज्य में शिक्षण संस्थाये संचालित करना और दूसरा स्वयं को आधुनिक शिक्षा से शिक्षित करना। इस नीति के तहत उन्होनें शासकों के लिये पृथक यिक्षण संस्थाएं खोलकर शासकों को आमजन से अलग करने की नीति अपनाई। जिससे भविष्य में जनता और शासकों का संयुक्त संघटन ब्रिटिश राज के विरूद्ध खड़ा नहीं हो सके। सर वाल्टर ने विदेश सचिव को एक पत्र में परिवर्तित स्थिति मंें पृथक शिक्षण संस्थाओं के लाभ दर्शाते हुये लिखा था वह यह नहीं समझते कि इससे सीधा लाभ होगा, किन्तु जब हमारा अगला संघर्ष होगा, साम्राज्य खतरे में पड़ जाएगा तब हम देशी राज्यों की और देखेगे। वाल्टर के इन विचारों का वायसराय मैयों ने समर्थन किया, इसी दृष्टि से शासकों के लिये खोले जाने वाली शिक्षण संस्थाओं के लिये ब्रिटिश पब्लिक स्कूल की रूपरेखा को स्वीकार किया गया। बाद में लार्ड कर्नल ने भी शासकों के लिये पृथक एवं पब्लिक स्कूल व्यवस्था को एक सफल नीति के रूप में स्वीकार किया। उक्त ब्रिटिश नीति क्रियान्वित होने से यद्यपि कुछ शासकों ने अपने यहां राजपरिवार के सदस्यों की शिक्षा हेतु व्यवस्था की थी। 1861 में जयपुर महाराजा ने अपने यहां शासक एवं सामन्त परिवारों के लिये स्कूल खोला, 1936 के बाद यह कम उपस्थिति की समस्या से जुझता रहा और 1944 मंे इसे बन्द कर दिया गया। 1877 में उदयपुर महाराणा ने भी सरकारी स्कूल में ही कुलीन वर्ग के लिये पृथक कक्षाएं चलाई, 1871 में अलवर में ठाकुर स्कूल खोला, लेकिन उपरोक्त प्रयत्न किसी नीति पर आधारित पूर्ण पृथक व्यवस्था नहीं थी वरन् एक प्रयास मात्र रहा।

  • शिक्षण संस्थाएं : 1870 में जब लार्ड मेयो ने वायसराय का कार्यभार सम्भाला तब उन्होनें 1869 की वाल्टर की योजना को क्रियान्वित किया, सबसे पहले राजकोट में एक काॅलेज खोला, अण्डमान मंें लार्ड मेयों की हत्या के बाद अजमेर में उनके नाम पर मैयो काॅलेज खुला, बाद में इस क्रम में 1886 में एचीसन काॅलेज लाहौर और डेली काॅलेज इंदोर स्थापित किये गये, इस प्रकार पूरे भारत में 4 काॅलेज शासक परिवारों के लिये प्रारम्भ किये। इसी क्रम में रियासतों में नोबल स्क्ूल खोले गयें। 1872 में स्थापित मैयों काॅलेज स्कूल का प्रथम सत्र 1875-76 में हुआ, इस सत्र में 23 छात्र थे। इस प्रकार की शिक्षण संस्थाओं का पाठ्यक्रम अलग से तैयार किया जाने लगा, यहां अन्य विषयों के अतिरिक्त कृषि भू लगान, धार्मिक और घुड़सवारी आदि की भी शिक्षा दी जाती थी।

  • मिशनरी संस्थाएं : राजपूताना में आधुनिक शिक्षा के प्रसार में ईसाई मिशनरी संस्थाओं का विषेश योगदान रहा। राजपूताना में निम्न मिशनरी संस्थायें शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय थी प्रेसब्रिटेरियन, रोमनकैथोलिक द मेथोडिस्टस, द चर्च मिशनरी सोसाइटी, द एंगलिकन चर्च और सोसायटी फार द प्रोपगेशन आॅफ द गोसपल मिशन आदि। इन संस्थाओं के माध्यम से अजमेर, ब्यावर, नसीराबाद, कोटा के निकट पिपलोदा, अलवर में राजगढ़ और बांदीकुई आदि अनेक स्थानों पर मिशनरी स्कूल खोले गये। 

  • आर्य समाज : ईसाई मिशनरियों के बाद आर्य समाज शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय रहा। उदयपुर में आर्य समाजियों की मांग पर सरकारी स्कूल में संस्कृत की कक्षाएं प्रारम्भ की। 1891 में पृथक संस्कृत स्कूल स्थापित किया। 1930 में यह संस्कृत काॅलेज बना। इसके अतिरिक्त अजमेर, चित्ताैड़, मांडल आदि अनेक स्थानों पर बालकों तथा बालिकाओं के लिये स्कूल प्रारम्भ किये गये जिनमें से अनेक स्कूल कालान्तर में काॅलेज के रूप में क्रमोन्नत हुये। इन स्कूलों में गुरूकुल प्रणाली पर आधारित शिक्षा व्यवस्था प्रचलित थी।


अन्य निजी शिक्षण संस्था :

धनाढ़्य वर्ग और समाज सेवी वर्ग ने भी शिक्षा के विकास में योगदान दिया। शेखावाटी में बिड़ला एज्यूकेशन ट्रस्ट ने शिक्षण संस्थाएं स्थापित की। बगड़, फतेहपुर, रामगढ़, नवलगढ़, सीकर आदि में संस्थायें स्थापित हुई। जयपुर मे खण्डेलवाल वैश्य अग्रवाल स्कूल, महेश्वरी स्कूल, जैन, पारीख स्कूल, कायस्थ स्कूल जातियों के आधार पर भी खोले गये। जोधपुर में लाछू मेमोरियल स्कूल, सोमानी स्कूल, गांधीवादी बुनयादी शिक्षा में विद्या भवन, राजस्थान विद्यापीठ, वनस्थली विद्यापीठ सावित्री काॅलेज अजमेर, महिला विद्यापीठ भीलवाड़ा हटुण्डी महिला विद्यालय प्रमुख है।

तकनीकी शिक्षा :

20 वीं सदी के प्रारम्भ में भारत तकनीकि शिक्षा में पिछड़ा हुआ था। 1901 में लार्ड कर्जन ने शिमला में शिक्षा सम्मेलन में तकनीकि शिक्षा को शिक्षा का अभिन्न अंग बनाने पर बल दिया। लेकिन प्रथम महायुद्ध के बाद तकनीकी शिक्षा प्रारम्भ हुई और द्वितीय विश्वयुद्ध (1939-1945) के बाद विकसित हुई। इसका मुख्य कारण था बिगड़ी आर्थिक स्थिति में भारत से कच्चा माल इंग्लैण्ड ले जाना कठिन था। अतः यहीं कल कारखाने स्थापित करना आवश्यक हो गया ब्रिटिश सरकार के सुझाव पर 3 फरवरी 1945 को राजपूताना और मध्य भारत की कुछ रियासतों के विद्वानों का एक सम्मेलन हुआ, जिसमें प्रत्येक रियासत में एक प्रस्तावित तकनीकि काॅलेज खोलने का प्रस्ताव रखा, लेकिन उक्त प्रस्ताव क्रियांवित नहीं हो सकी। राजपुताना में जिन क्षेत्रों में तकनिकी शिक्षा का विकास हुआ वह थी, शिक्षक-प्रशिक्षण कृषि, अभियांत्रिकी, चिकित्सा आयुर्वेद, आर्युविज्ञान, पशु चिकित्सा, कानून, जंगलात व मच्छी पालन आदि।

शिक्षक-प्रशिक्षण :

शिक्षकों को प्रशिक्षित करने के लिये सबसे पहले नसीराबाद और ब्यावर में मिशनरियों द्वारा नार्मल कक्षाएं प्रारम्भ की। तत्पश्चात रियासतों में भी नार्मल कक्षाएं प्रारम्भ हुई। काॅलेज स्तर पर सर्वप्रथम विद्याभवन एज्यूकेशन सोसायटी ने टीचर्स ट्रेनिंग काॅलेज 1941 में प्रारम्भ हुआ। दूसरा टीचर्स ट्रेनिंग काॅलेज राजपूताना, मध्य भारत और ग्वालियर संयुक्त बोर्ड के अध्यक्ष डाॅ. जे.सी. चटर्जी के प्रयत्नों से अजमेर में 1941 में खोला गया। तीसरा टीचर्स ट्रेनिंग काॅलेज 1946 में बीकानेर में खोला गया।

कृषि तकनीकी

राजपूताना कृषि प्रधान क्षेत्र होने के कारण नई कृषि तकनीकी के अध्ययन को स्कूल शिक्षा में अपनाया गया। शिक्षा बोर्ड के गठन के बाद 1936 में माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूलों के पाठ्यक्रम में इसे अनिवार्य विषय के रूप में सम्मिलित किया गयां 1938-39 में कृषि इंटरमीडिएट काॅलेजों में तकनीकी वैकल्पिक विषय के रूप में सम्मिलित किया गया। मेवाड़ में किसानों को कृषि की नई तकनीकी की जानकारी के उद्देश्य से गांवो में रात्रि कालीन कक्षाएं भी चलाई। 1944 में सचिव भारत सरकार ने सिलोन योजना लागू करने हेतु प्रारूप शासकों को भेजे, इसे अनेक रियासतों में लागू किया गया। सिलोन योजना के अनुसार किसी एक विद्यालय को बागवानी, सब्जी उगाने और अनाज व खेती सम्बन्धी आधुनिक तकनीकी नये नये औजार, नल कूप की व्यवस्था और प्रयोग सिखाया जाता था।

आयुर्वेदिक चिकित्सा काॅलेज

1933 में उदयपुर में पहला तकनीकी काॅलेज आयुर्वेद चिकित्सा का प्रारम्भ किया गया। इसे आयुर्वेद-मण्डल कानपुर से सम्बन्ध किया गया। इसमें शल्य चिकित्सा का अध्यापन नहीं कराया जाता था केवल जांच एक दवाओं से सम्बन्धित अध्ययन कराया जाता था। जयपुर में भी एक आयुर्वेदिक चिकित्सालय खोला गया।

आयुर्विज्ञान चिकित्सा

आयुर्विज्ञान चिकित्सा के क्षेत्र में सबसे पहले जयपुर के महाराजा रामसिंह ने डाॅ. ब्रुर के सहयोग से 1947 में सवाई मानसिंह मेडीकल काॅलेज खोला। इससे पूर्व तक चिकित्सिकय पढ़ाई के लिये ब्रिटिश सर्वोच्चता द्वारा प्रत्येक रियासत से निर्धारित 4 विद्यार्थी कोटे के अनुसार भेजे जाते थे। 1894 में नसीराबाद से 4 छात्राओं को आगरा मेडीकल काॅलेज में भेजकर पहली बार महिला डाॅक्टर की पढ़ाई के क्षेत्र में राजपूताना ने कदम रखा। नर्सिग ट्रेनिंग के क्षेत्र में अजमेर मेडीकल होम स्कूल, और बीकानेर में स्कूल संचालित थे।

विधि शिक्षा

1946 में भूपाल नोबल्स काॅलेज उदयपुर में एल.एल.बी. की कक्षाएं प्रारम्भ की गई। राजस्थान विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद पृथक विधि काॅलेज खोलने का प्रस्ताव लाया गया। इस आधार पर महाराजा काॅलेज में रात्रिकालीन विधि विद्यालय प्रारम्भ किया गया। महाराजा भूपाल काॅलेज के अतिरिक्त निम्न 4 काॅलेजों में विधि अध्ययन की व्यवस्था की गई लाॅ काॅलेज जयपुर, जसवन्त काॅलेज जोधपुर राज ऋषि काॅलेज अलवर, डूंगर काॅलेज बीकानेर।

प्रशासन :

आधुनिक शिक्षा का प्रशासन क्रमिक रूप से निश्चित ढ़ांचागत स्वरूप की ओर बढ़ा। प्रारम्भ में आधुनिक ब्रिटिश कम्पनी और 1858 से ब्रिटिश ताज की नीति और व्यवस्था से प्रेरित और प्रभावित रही। 1871 में ब्रिटिश ताज द्वारा अजमेर मेरवाड़ा का प्रशासन उत्तर पश्चिम प्रान्त से स्थानान्तरित करके फोरेन पोलटिकल विभाग के अधीन कर दिया, इसके साथ ही अजमेर में कमीश्नर व्यवस्था प्रारम्भ हो गई , शिक्षा विभाग भी कमीश्नर के अधीन आ गया। धीरे-धीरे
रियासतों में भी सुपरिडेन्टेड एज्यूकेशन या डायरेक्टर एज्यूकेशन नियुक्त किये जाने लगें, जिन्हें सरिश्ते तालीम भी कहा जाता था। प्रारम्भ में इस पद पर किसी भी विभाग के अधिकारी को नियुक्त कर दिया जाता था। 1854 में पहली बार वुड डिस्पेच में देशी रियसतों में स्कूलें खोलने के परामर्श के आधार पर अजमेर मेरवाड़ा में कम्पनी के प्रतिनिधि शिक्षण कार्य हेतु सक्रिय हुये। वूड डिस्पेच के प्रस्ताव पर कलकत्ता विश्वविद्यालय 1854 में स्थापित हुआ। राजपूताना की शिक्षण संस्थायें उसी से सम्बन्ध थी। 23 सितम्बर 1887 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय की घोषणा की गई। राजपूताना की शिक्षण संस्थायें कलकत्ता के स्थान पर अब इलाहाबाद विश्वविद्यालय से सम्बन्ध होने लगी। वित्त व्यवस्था हेतु प्रथम प्रयास 1866 में भरतपुर में बन्दोबस्त (सेटलमेन्ट) व्यवस्था लागू करने के साथ प्रारम्भ हुआ। भू-लगान का एक निश्चित प्रतिशत शिक्षा के लिये रखा जाने लगा। यह व्यवस्था अन्य राज्यों में भी बन्दोबस्त व्यवस्था के साथ लागू की गई।

शिक्षा बोर्ड की स्थापना :
1921 में सेलेडर कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर विद्यालय को 1929 में आवासीय शिक्षण संस्था काॅलेज शिक्षा के कार्य सम्पादन तक सीमित कर दी गई। परिणामसवरूप राजपूताना की हाईस्कूल एवं इंटरपीजिए तक की शिक्षा यूनाईटेड प्राॅविन्सेज के अधिन कर दी गई। लेकिन यह इतने बड़े क्षेत्राधिकार में कार्य करने के लिये अपने को असमर्थ मानते हुये राजपूताना के लिये पृथक बोर्ड का सुझाव दिया। फलस्वरूप जुलाई 1929 में बोर्ड आॅफ हाई स्कूल एण्ड इंटरमीडिएट एज्यूकेशन राजपूताना अजमेर मेरवाड़ा सेन्ट्रल इंडिया एण्ड ग्वालियर बोर्ड की स्थापना की गई, जिसका मुख्यालय अजमेर में रखा गया। बोर्ड के प्रथम अध्यक्ष जयपुर के विषिष्ट शिक्षा अधिकारी के.पी. किचलू को तीन वर्ष के लिये नियुक्त किया गया। बोर्ड का मुख्य उत्तरदायित्व पाठ्यक्रम निर्धारण एवं परीक्षाओं का आयोजन कराना था। 1930 में बोर्ड ने पहली बार परीक्षाओं का आयोजन कराया, जिसमें 70 हाईस्कूल व 12 इंटरमिडिएट काॅलेज के विद्यार्थी परीक्षार्थी थे। इस प्रकार बोर्ड की स्थापना के बाद रियासतों की स्कूल शिक्षा में एकरूपता प्रारम्भ होने लगी।

विश्वविद्यालय शिक्षा :

जनवरी 1947 में जयपुर में राजपूताना विश्वविद्यालय स्थापित किया गया, दिसम्बर 1946 में उदयपुर, जोधपुर, बीकानेर, अलवर और जयपुर ने मिलकर उक्त विश्वविद्यालय की स्थापना का निर्णय लिया। इस दृष्टि से भारत में यह एक ऐसा विश्वविद्यालय था जिसे रियासतों के सामूहिक सहयोग से स्थापित किया गया। राजपूताना का गौरव मानते हुये विश्वविद्यालय का एक मुख्य उद्देश्य कला संस्कृति के अध्ययन को विकसित करना था।

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