राजस्थान में राजनीतिक जागृति

Bharat Choudhary Reply 11:18
राहुल तनेगारिया
१८५७ ई० के विद्रोह के दमन के बावजूद जनता में ब्रिटिश विरोधी भावनाओं का दमन न किया जा सका। १९वीं शताब्दी के अन्त में तथा २०वीं शताब्दी में राजस्थान में तीव्रगति से राजनीतिक चेतना का विकास हुआ, जिसके प्रमुख कारण निम्नलिखीत थे -

राजस्थान में राजनीतिक जागृति के कारण
किसानों में व्याप्त असन्तोष और उनके आन्दोलन
इस समय जागीरदारों द्वारा किसानों पर बहुत अत्याचार किया जा रहा था। सारंगधरदास के अनुसार, 'जीवन और मृत्यु के अलावा अन्य सभी बातों में जागीरदार लोग अपनी प्रजा के वास्तविक शासक थे तथा वे अपनी प्रजा पर मनमाना अत्याचार करते थे।'
किसानों के असन्तोष के कारण - (क) जागीरदार किसानों पर बहुत अत्याचार कर रहे थे। डॉ० एम० एस० जैन के अनुसार , ' जागीरदारों की बढ़ती हुई विलासिता का व्यय किसानों पर लाद दिया गया। (ख)इस समय कृषि भूमि की माँग में वृद्धि होने के कारण जागीरदारों का शोषण भी बढ़ता जा रहा था।

बिजौलिया का कृषक आन्दोलन - बिजौलिया की जागीर मेवाड़ के अधीन थी तथा यहाँ के किसानों में जागीरदारों का शोषण के विरुद्ध भयंकर असन्तोष व्याप्त था। अत: उन्होंने नानजी पटेल एवं साधु सीताराम के नेतृत्व में आन्दोलन छेड़ दिया। जागीरदारों तथा मेवाड़ के महाराजा ने इस आन्दोलन को कुचलने के लिए बहुत अत्याचार किये, परन्तु उन्हें असफलता ही हाथ लगी। १९१५ ई० में विजय सिंह पथिक ने आन्दोलन का नेतृत्व सम्भाल लिया। धीरे - धीरे बिजौलिया के आन्दोलन ने इतना उग्र रुप धारण कर लिया कि राष्ट्रीय स्तर पर उसकी चर्चा की जाने लगी। वहाँ के किसानों ने अंग्रेजों के समक्ष अपनी माँगें रखी तथा उसकी गाँधीजी का नैतिक समर्थन भी प्राप्त कर लिया।

सरकार को इस आन्दोलन में रुस की बेल्शेविक आन्दोलन की छवि दिखने लगी। अत: उसने १९२२ ई० में बिजौलिया के किसानों से समझौता कर लिया, परन्तु यह समझौता स्थाई सिद्ध नहीं हुआ। १९३१ ई० में किसानों ने शान्तिपूर्ण तरीके से पुन: आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया। सेठ जमनालाल बजाज एवं माणिक्यलाल भी इस आन्दोलन से जुड़गये थे तथा आन्दोलन ने अखिल भारतीय समस्या का रुप ले लिया था।
जमनालाल बजाज ने उदयपुर के महाराजा से आन्दोलन के बारे में बातचीत की, जिसके कारण जपलाई , १९३१ ई० को समझौता हो गया, परन्तु सरकार ने किसानों के उनकी जमीनें वापस नहीं दी। १९४१ ई० में किसानों को उनकी जमीनें लौटा दी गयीं, जिसके कारण यह आन्दोलन समाप्त हो गया।
बेंगू का किसान आन्दोलन - बिजौलिया आन्दोलन से प्रेरित होकर बेंगू के किसानों ने भी १९२१ ई० में आन्दोलन छेड़ दिया। जागीरदार ने हिंसात्मक साधनों के द्वारा इस आन्दोलन को निर्ममतापूर्वक कुचलने का प्रयास किया, परन्तु इससे आन्दोलन और तीव्र गति से भड़क उठा। भारतीय समाचार पत्रों ने किसानों पर किये जा रहे अत्याचारों के सामाचार को प्रमुखता से छापा , जिसके कारण यह आन्दोलन सुर्किखयों में आ गया। इससे घबराकर वहाँ के जागीरदारों ने किसानों से समझौता कर लिया।
भोमट का भील आन्दोलन - १९१८ ई० में मेवाड़ सरकार के प्रशासनिक सुधारों के विरुद्ध भोमट के भीलों ने आन्दोलन छेड़ दिया। गोविन्द गुरु ने भीलों में एकता स्थापित करने का प्रयास किया। मोतीलाल तेजावत ने भील आन्दोलन का नेतृत्व किया, जिसके कारण इस आन्दोलन ने और जोर पकड़ लिया। भीलों ने लागत तथा बेगार करने से इनकार कर दिया। सरकार ने आन्दोलन को कुचलने के लिए दमन - चक्र का सहारा लिया, किन्तु उसे सफलता नहीं मिली। इस आन्दोलन से भीलों को अनेक सुविधाएँ प्राप्त हुई। सरकार ने अनेक प्रयत्नों के बाद १९२९ ई० में तेजावत को गिरफ्तार कर लिया तथा १९३६ ई० में रिहा कर दिया।
मारवाड़ में किसान आन्दोलन
मारवाड़ में भी किसानों पर बहुत अत्याचार होता था। १९२३ ई० में जयनारायण व्यास ने 'मारवाड़ हितकारी सभा' का गठन किया और किसानों को आन्दोलन करने हेतु प्रेरित किया, परन्तु सरकार ने 'मारवाड़ हितकारी सभा' को गैर - कानूनी संस्था घोषित कर दिया। अब कियान आन्दोलन का नेतृत्व मारवाड़ लोक परिषद ने अपने हाथों में ले लिया। इस संस्था ने किसानों को आन्दोलन हेतु प्रोत्साहित किया।
सरकार ने किसान आन्दोलन को ध्यान में रखते हुए मारवाड़ किसान सभा नामक संस्था का गठन किया, परन्तु उसे सफलता प्राप्त नहीं हुई। अब सरकार ने आन्दोलन का दमन करने हेतु दमन की नीती का सहारा लिया, परन्तु उससे भी कोई लाभ नहीं हुआ। चण्डावल तथा निमाज नामक गाँवों के किसानों पर निर्ममता पूर्वक अत्याचार किये गये तथा डाबरा में अनेक किसानों को निर्दयता पूर्वक मार दिया गया। इससे सम्पूर्ण देश में उत्तेजना की लहर फैल गई, किन्तु सरकार ने इसके लिए किसानों को उत्तरदायी ठहराया। आजादी के बाद भी जागीरदार कुछ समय तक किसानों पर अत्याचार करते रहे, परन्तु राज्य में लोकप्रिय सरकार के गठन के बाद किसानों को खातेदारी के अधिकार मिल गये।
अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार
अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार ने भी राजनीतिक चेतना के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। डॉ० एम० एस० जैन के अनुसार '१९३१ में समस्त राजस्थान में एक प्रतिशत से भी कम लोग अंग्रेजी बोलते - जानते थे।'
अंग्रेजी बोलने वालों का यह प्रतिशत कम होते हुए भी अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ। आधुनिक ढ़ंग से शिक्षित ये लोग सरकारी नौकरी की प्राप्ति के इच्छुक थे, परन्तु राजकीय सेवा में नियुक्ति भाई - भतीजावाद के आधार पर दी जाती थी। अत: शिक्षित वर्ग के लोगों में असन्तोष फैलना स्वाभाविक ही था। ये शिक्षक स्वतन्त्रता तथा समानता का पाठ पढ़ चुके थे अत:उनमें निरन्तर राजनीतिक चेतना के विकास होता चला गया।
समाचार - पत्रों एवं साहित्य का योगदान
१८८५ ई० में 'राजपूताना गजट' एवं १८८९में 'राजस्थान समाचार 'नामक समाचार पत्रों का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। इनमे ब्रिटिश सरकार के कार्यों की खुला आम आलोचना की जाती थी, अत: सरकार ने इन पर प्रतिबन्ध लगा दिया। विजयसिंह पथिक ने 'राजस्थान केसरी' नामक समाचार पत्र का प्रकाशन प्रारम्भ किया। इसमें ब्रिटिश साशन के कार्यों की कटु आलोचना की जाती थी। अत: सरकार ने इस पर प्रतिबन्ध लगा दिया। १९२३ ई० में प्रकाशित 'तरुण राजस्थान  ने सरकारी दमन का जोरदार विरोध किया, जिसके कारण जनता में तीव्रगति से राष्ट्रीयता की भावना का संचार हुआ।
साहित्यकारों ने भी समाचार पत्रों की भाँति जनता में राष्ट्रीय चेतना उत्पन्न करने का प्रयत्न किया। केसरी सिंह बारहठ की कविताएँ राष्ट्रीय भावनाओं से ओत - प्रोत थीं। राजस्थान के प्रसिद्ध इतिहासकार एवं महाकवि सूर्यमल्ल मिश्रण ने 'वीर सतसई' नामक ग्रन्थ की रचना की, जिससे यहाँ के भीरु शासक कंपकंपायमान हो उठे। इसके अतिरिक्त जयनारायण व्यास की कविताओं एवं पंडित हीरालाल शास्री के गीतों से भी जनता में अभूतपूर्व राजनीतिक चेतना जागृत हुई।
मध्यम वर्ग का योगदान
मध्यम वर्ग ने भी जनता में राजनीतिक जागृति उत्पन्न करने में सराहनीय योगदान दिया। जोधपुर के जयनारायण व्यास, बिजौलिया के विजय सिंह पथिक एवं जयपुर के पं० हीरालाल शास्री आदि मध्यम वर्ग के प्रतिनिधी थे, जिन्होंने आन्दोलन को गति प्रदान की। इस वर्ग का मुख्य उद्देश्य जनता में राजनीतिक तथा राष्ट्रीय चेतना का विकास करना था।
आधुनिक शिक्षा के प्रसार से मध्यम वर्ग के शिक्षित नवयुवक प्रजातन्त्र, राष्ट्रवाद और स्वतन्त्रता के महान आदर्शों से परिचित हुए। इसके बाद उन्होंने ब्रिटिश शासन की आधार - स्तम्भ सामन्ती व्यवस्था, जो मध्यकाल से भारत में चली आ रही थी, को उखाड़ फेंकने का निश्चय किया।
आर्य समाज का प्रभाव
आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती हिन्दू धर्म, समाज एवं राष्ट्र के पुरुत्थान के लिए प्रयत्नशील थे। उन्होंने राजस्थान की विभिन्न रियासतों की यात्रा की और वहाँ के शासकों तथा जनता के समक्ष चार बातें रखीं - स्वधर्म, स्वराज्य, स्वदेशी एवं स्वभाषा। राजस्थान के विभिन्न नगरों में भी आर्य समाज की शाखाएँ स्थापित हो चुकी थीं। स्वामीजी ने १८८३ ई० में परोपकारिणी सभा नामक संस्था की स्थापना की। उन्होंने कहा कि वे हिन्दूओं को एकता के सूत्र में बांधना चाहते हैं और राजाओं को सन्मार्ग पर लाना चाहते हैं। यही नहीं, उन्होंने स्वशासन पर भी बल दिया है। उनकी शिक्षाओं से राजस्थान के लोग सामाजिक तथा धार्मिक आवश्यकताओं की अनुभूति करने लगे और राजनैतिक सुधारों के प्रति भी जागरुक हुए। इस प्रकार स्वामी दयानन्द सरस्वती और बाद में आर्यसमाज ने राजस्थान में राष्ट्रवाद और राजनैतिक चेतना की आधारशिला रखी।
प्रथम विश्व युद्ध का प्रभाव
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान समस्त राजपूत राज्यों ने ब्रिटिश शासन की हरसम्भव सहायता की। जब राजपूत सैनिक विश्व के अन्य देशों में युद्ध करने गये, तो वहाँ की स्वतन्त्रता के नये विचारों तथा आदर्शों से अत्यधिक प्रभावित हुए। स्वदेश लौटने पर उन्होंने अपने मित्रों, पड़ोसियों तथा अन्य लोगों को अपने अनुभवों के बारे में बता कर उनमें स्वतन्त्रता की भावना प्रजवल्लित कर दी। प्रथम विश्व युद्ध में अपार धनराशि खर्च हुई, अत: उसने आन्दोलन का मार्ग अपना लिया।
पड़ोसी प्रान्तों का प्रभाव
पड़ोसी प्रान्तों में उमड़ती हुई राष्ट्रीयता की भावना का भी राजस्थान पर बहुत प्रभाव पड़ा। इस समय मध्यम वर्ग ने ब्रिटिश सरकार की कटु आलोचना करते हुए विभिन्न प्रान्तों में अनेक संघों का निर्माण किया। पाश्चात्य शिक्षा के लाभ उठा चुकी राजपूत राज्यों की जनता ने राष्ट्रीय पथ पर चलने का निश्चय किया। ब्रिटिश अधिकारियों ने भी यह अनुभव किया कि ब्रिटिश प्रान्तों में जिस तरह से स्वराज्य के लिए संघर्ष चल रहा है, उसका प्रभाव देशी रियासतों की जनता पर भी पड़ेगा और अनुदार विचारधारा वाले लोग भी समय के साथ - साथ राष्ट्र की मूलधारा में घुल - मिल जायेंगे।
क्रान्तिकारियों की गतिविधियों का प्रभाव
राजस्थान के क्रान्तिकारियों ने भी राजनीतिक चेतना उत्पन्न करने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया। राजस्थान के प्रसिद्ध क्रान्तिकारियों में अर्जुनलाल सेठी, केसरीसिंह बारहठ, राव गोपाल सिंह, विजय सिंह पथिक एवं रामनारायण चौधरी आदि प्रमुख थे। श्यामजी कृष्ण वर्मा ने राजस्थान में क्रान्तिकारियों के लिए पृष्ठभूमि तैयार कर दी थी।



राजस्थान में राजनीतिक चेतना का विकास
१८८८ ई० में इलाहाबाद में काँग्रेस का अधिवेशन हुआ था, जिसमें अजमेर के प्रतिनिधि मण्डल ने भाग लिया था। १८८५ ई० में अजमेर से 'राजस्थान गजट 'व १८८९ में ' राजस्थान समाचार 'नामक समाचार पत्रों का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ, किन्तु ब्रिटिश सरकार की आलोचना करने के कारण सरकार ने शीघ्र ही इन पर प्रतिबन्ध लगा दिया। १९०५ ई० में बंगाल विभाजन के समय सारे देश में स्वदेशी आन्दोलन प्रारम्भ हुआ उस समय राजस्थान में भी स्थान - स्थान पर स्वदेशी वस्तुओं पर बल देते हुए विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया। १९१९ ई० में अर्जुनलाल सेठी, केसरीसिंह बारहठ एवं विजय सिंह दीपक ने मिलकर 'राजस्थान सेवा संघ' नामक संस्था की स्थापना की। इस संस्था ने राजनीतिक चेतना के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। 'राजस्थान केसरी 'तथा 'तरुण राजस्थान' नामक समाचार पत्रों ने राष्ट्रीयता की भावना उत्पन्न करने की दिशा में जो सहयोग किया उसे भुलाया नहीं जा सकता।
१९१९ में राजस्थान - मध्य भारत सभा नामक संस्था का गठन किया गया, जिसने पाँच वर्ष तक काफी महत्वपूर्ण कार्य किया। इस संस्था ने अपनी गतिविधियों के माध्यम से राजस्थान की जनता में राष्ट्रीय चेतना जागृत करने का महत्वपूर्ण प्रयास किया।

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