Friday, 26 August 2011

असहयोग आन्दोलन और राजस्थान

राहुल तनेगारिया



प्रथम विश्व युद्ध के दौरान राजस्थान के शासकों ने अंग्रेजों का तन - मन - धन से सहायता की थी युद्ध की समाप्ति के बाद अंग्रेजों ने यह अनुभव किया कि देशी राज्यों और रजवाड़ों को विश्वास में लेकर स्वराज की बढ़ती माँग के विरुद्ध एक अवरोध खड़ा किया जाए। इसलिए मान्टेग्यु चेम्सफोर्ड सुधारों के अन्तर्गत देशी राज्यों के' नरेन्द्र मण्डल' की स्थापना की गयी। इस समय भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्व महात्मा गाँधी कर रहे थे, उन्होंने आन्दोलन को एक नई दिशा दी। इस समय राजस्थान से दो नये समाचार पत्र निकलने लगे। 'एक राजस्थान केसरी' नामक समाचार पत्र था, जिसके सम्पादक विजयसिंह दीपक थे। उनको रामनारायण चौधरी, हरि भाई किंकर और कन्हैयालाल कलयंत्री का सहयोग प्राप्त था। १५ मार्च, १९२१ ई० को अजमेर में 'राजस्थान पोलिटीकल काँग्रेस' का अधिवेशन हुआ। इसके अध्यक्ष मोतीलाल नेहरु थे। इस अधिवेशन में यह निश्चित किया गया कि असहयोग आन्दोलन के समर्थन में विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया जाए। इस समय अंग्रेज सरकार द्वारा राजनीतिक बन्दियों को क्षमादान दिया जा चुका था। इसलिये अर्जुनलाल सेटी, केसरीसिंह बारहठ और गोपालसिंह जेल से रिहा कर दिये गए थे, अजमेर में असहयोग आन्दोलन आरम्भ हो गया और पूरा प्रदेश पुन: राजनीतिक हलचल का केन्द्र बन गया। मार्च १९२० में 'राजस्थान - मध्य भारत सभा' की स्थापना हुई। इस सभा के अध्यक्ष जमनालाल बजाज थे। इसके पूर्व १९१९ में वर्धा में 'राजस्थान सेवा संघ' की स्थापना हो चुकी, जिसे १९२० में अजमेर में स्थानान्तरित कर दिया गया। जोधपुर, जयपुर, कोटा एवं बून्दी में भी सेवा संघ की शाखाएँ खोली गईं। सेवा संघ का मुख्य उद्देश्य जनता में राजनीतिक चेतना जागृत करना और उनकी कठिनाइयों को दूर करना था। चूँकि संघ के पदाधिकारियों में मतभेद था, जिसके कारण १९२८ के अन्त तक सेवा संघ प्राय: समाप्त हो चुका था।
१९२० में नागपुर में काँग्रेस के अधिवेशन के साथ ही 'राजस्थान -मध्य भारत सभा' का अधिवेशन हुआ। राजस्थान - मध्य भारत सभा के अधिवेशन में देशी रियासतों की जनता पर होनेवाले अत्याचारों, जनता की गरीबी और अशिक्षा को दर्शाया गया था। इस समय काँग्रेस से अनुरोध किया कि वह देशी रियासतों की जनता की कठिनाइयों की ओर ध्यान दे। जोधपुर में जयनारायण व्यास के नेतृत्व में 'मारवाड़ हिताकारिणी सभा' की स्थापना हुई जो आगे चलकर जोधपुर में राजनीतिक आन्दोलन का आधार बनी। इसी बीच विजयसिंह पथिक के नेतृत्व में राजस्थान में बिजौलिया किसान आन्दोलन हो गया।
विजयसिंह पथिक और बिजौलिया किसान आन्दोलन   
विजयसिंह पथिक का वास्तविक नाम भूपसिंह था। उनका जन्म बुलन्दशहर जिले के गुढ़वाली ग्राम में एक गुर्जर परिवार में हुआ था। वह अपने जीवन के प्रारम्भ से ही क्रान्तिकारी था। उत्तर प्रदेश के क्रान्तिकारियों ने उन्हें राजस्थान में शस्र संग्रह के लिए नियुक्त किया गया था। पथिक ने भीलों, मीणों और किसानों में राजनैतिक चेतना जागृत की। १९१३ में उदयपुर राज्य की जागीर बिजौलिया ठिकाने के भयंकर अत्याचारों से त्रस्त किसानों ने साधु सीताराम के नेतृत्व में किसान आन्दोलन आरम्भ किया था। १९१५ में इस आन्दोलन का नेतृत्व विजयसिंह पथिक ने संभाल लिया था।
इस समय जागीरदारों द्वारा बिजौलिया के लोगों पर भारी कर लगाये गये थे और उनसे बलात् बेगार ली जाती थी। बिजौलिया आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य इन अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाना था। १९१३ में साधु सीताराम के नेतृत्व में बिजौलिया के किसानों ने अपना विरोध प्रकट करने के लिये भूमि कर देने से इन्कार कर दिया और एक वर्ष के लिये खेती करना स्थगित कर दिया। इसके बाद १९१५ ई० में साधु सीताराम चित्तौड़गढ़ गये। वहाँ उन्होंने विजयसिंह पथिक से सम्पर्क किया और उनसे बिजौलिया के जागीरदार द्वारा जनता पर किये जाने वाले अत्याचारों की कहानी सुनाते हुआ आन्दोलन का नेतृत्व संभालने का अनुरोध किया। पथिक ने बिजौलिया आन्दोलन का नेतृत्व करना स्वीकार कर लिया। इस प्रकार बिजौलिया आन्दोलन को एक उत्साही और साहसी नेता मिल गया। १९१६ में किसानों ने अन्याय और शोषण के विरुद्ध 'किसान पंच बोर्ड' की स्थापना की, जिसका अध्यक्ष साधु सीताराम को बनाया गया। इस समय किसानों ने विजयसिंह पथिक के आह्मवान पर युद्ध ॠण देने से इन्कार कर दिया। बिजौलिया आन्दोलन इतना उग्र हो गया था कि ब्रिटिश सरकार को इस आन्दोलन में रुस के बोल्शेविक आन्दोलन की प्रतिछाया दिखाई देने लगी। परिणामस्वरुप ब्रिटिश सरकार ने महाराणा और बिजौलिया के ठाकुर को आदेश दिया कि वे आन्दोलन को कुचल दें। इस पर बिजौलिया के ठाकुर ने इस आन्दोलन को कुचलने के लिए दमनकारी नीतियों का सहारा लिया। हजारों किसानों और उनके प्रतिनिधियों को जेलों में ठूंस दिया गया, जिनमें साधु सीतारामदास, रामनारायण चौधरी एवं माणिक्यलाल वर्मा भी शामिल थे। इस समय पथिक भागकर कोटा राज्य की सीमो में चला गया और वहीं से आन्दोलन का नेतृत्व एवं संचालन करता रहा।
बिजौलिया के ठाकुर ने आन्दोलन को निर्ममतापूर्वक कुचलने का प्रयास किया, किन्तु किसानों ने समपंण करने से इन्कार कर दिया। रामनारायण चौधरी ने अपनी डायरी में लिखा है कि बिजौलिया आन्दोलन राष्ट्रीय भावना से प्रेरित था और प्रत्येक स्थान पर वन्दे मातरम् की आवाज सुनाई देती थी। इस आन्दोलन का समाचार सारे संसार में फैल गया। महात्मा गाँधी और तिलक जैसे नेताओं ने दमन नीति की निन्दा की। जब आन्दोलन ने उग्र रुप ले लिया, तब राजस्थान में ए० जी० सर हालैण्ड एवं मेवाड़ रेजीडेन्ट विलकिन्सन बिजौलिया पहुँचे, ताकि समस्या का समाधान निकाला जा सके। मेवाड़ राज्य के प्रतिनिधियों, बिजौलिया ठिकानों के प्रतिनिधियों ने वार्ता में भाग लिया। परिणामस्वरुप बिजौलिया के ठाकुर और वहाँ के किसानों के बीच एक समझौता हो गया। किसानों की अनेक मांगें स्वीकार कर ली गईं, उनमें बेगार प्रथा भी शामिल थी, बिजौलिया के किसानों का यह आन्दोलन सन् १९२२ में वन्दे मातरम् के नारों के बीच समाप्त हुआ। बिजौलिया के किसानों की यह अभूतपूर्व विजय थी । इससे राजस्थान में सेवा संघ का प्रभाव बढ़ गया।
बिजौलिया के बाद मेवाड़ के एक अन्य ठिकाने बेगूँ के किसानों ने वहाँ के ठाकुर के अत्याचारों के विरुद्ध १९२१ में आन्दोलन आरम्भ कर दिया। बेगूँ के ठाकुर ने हिंसात्मक साधनों से आन्दोलन को कुचलने का प्रयास किया। ट्रेन्च ने बेगूँ पहुँचकर किसानों पर गोली चलवा दी तथा सिपाहियों ने घरों में घुसकर स्रियों का सतीत्व लूटा। परिणामस्वरुप आन्दोलन ने उग्र रुप धारण कर लिया। इसी बीच पथिक ने बेगूँ पहुँचकर आन्दोलन का संचालन किया। पथिक जी के मेवाड़ आने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। अत: जब वे बेगूँ पहुँचे, तो उन्हें गिरफ्तार कर मुकदमा चलाया गया। पथिक जी के बयान से प्रभावित होकर न्यायालय ने उनको छोड़ दिया, परन्तु सरकार ने उन्हें नहीं छोड़ा। मेवाड़ सरकार ने अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग कर उन्हें पाँच वर्ष की कारावास की सजा दे दी। १९२८ में पथिक को रिहा कर दिया गया तथा मेवाड़ से निष्कासित कर दिया गया। बेगूँ सत्याग्रह के सामने ठाकुर को झुकना पड़ और सत्याग्रहियों की मांगें स्वीकार करनी पड़ीं। बिजौलिया आन्दोलन से प्रेरित होकर बून्दी के किसानों ने भी आन्दोलन आरम्भ कर दिया, राज्य सरकार ने पाश्विक ढंग से इस आन्दोलन का दमन कर दिया। फलत: आन्दोलन धीमा पड़ गया।
१९२०-२१ ई० में राजस्थान में पहली बार गोपीलाल यादव एवं जुगल किशोर चतुर्वेदी के नेतृत्व में भरतपुर के विद्यार्थियों ने आन्दोलन प्रारम्भ किया। विद्यार्थियों ने विभिन्न सभाओं और जुलूसों का आयोजन किया। उन्होंने ब्रिटिश सम्राट जार्ज पंचम के चित्रों का अपमान करने के बाद उनकी होली जलाई तथा 'भारत माता की जय' के नारे लगाये। इस समय राष्ट्रीय भावनाओं से ओत - प्रोत 'राष्ट्रीय वीणा' नामक पुस्तक प्रकाशित हुई। सरकार ने शीघ्र ही इस पुस्तक को जब्त कर लिया।
 भोमर का भील आन्दोलन
मेवाड़ के एक भाग में भील बहुत संख्या में रहते हैं ।यह भाग भोमर के नाम से प्रसिद्ध है। भील स्वभाव से साहसी एवं स्वतंत्रताप्रिय जाति है। ये जाति अपनी परम्पराओं एवं रीतिरिवाजों में कानूनी हस्तक्षेप पसन्द नहीं करती है। १८१८ में भीलों के मद्यपान पर नियन्त्रण एवं अन्धविश्वास को दूर करने के लिए कुछ सुधार लागू किये गए। इसे भीलों ने अपनी परम्पराओं को उल्लंघन समझा और विद्रोह कर दिया। भीलों ने न केवल सरकारी अधिकारियों को मौत के घाट उतारा, अपितु महाजनों की दुकानों को भी आग लगा दी। अन्त में मेवाड़ के महाराणा के हस्तक्षेप करने पर भीलों के साथ सुलह हो गयी जिसमें उनकी समस्त माँगें स्वीकार कर ली गईं। फिर भी शान्ति स्थापित नहीं हो सकी। भीलों ने एक साथ विद्रोह नहीं किया था और उनके पास योग्य नेता का अभाव था। अत: सरकार ने सैनिक शक्ति से विद्रोह का दमन कर दिया।
१९२१ - २२ में मोतीलाल तेजावत के नेतृत्व में ईडर, डूंगरपुर, सिरोही एवं दाता आदि स्थानों में भील आन्दोलन पुन: प्रारम्भ हो गया। भीलों ने सम्पूर्ण भील क्षेत्र में एक ही पद्धति से भू - राज एकत्रित करने की माँग की, मोतीलाल तेजावत ने पहली बार मेवाड़, सिरोही, डूंगरपुर एवं ईडर के भीलों को संगठित किया। इस भील आन्दोलन को ब्रिटिश सरकार ने अपनी सत्ता को चुनौती समझा। ईडर के महाराणा ने मोतीलाल तेजावत के ईडर राज्य की सीमा में प्रवेश करने पर कानूनी प्रतिबन्ध लगा दिया। राजा ने भीलों के आन्दोलन को शक्ति से कुचलने का निश्चय किया। दो भील गाँवों को आग लगा दी, जिससे उन गरीबों का हजारों रुपयों का नुकसान हुआ और कई जानवर भी जलकर भ हो गये। इतना ही नहीं, शान्त भीलों पर गोलियों की बौछार की गयी। सरकार के इन अत्याचारों के कारण आन्दोलन पहले से अधिक तेज हो गया। ईडर की पुलिस ने भीलों के नेता तेजावत को गिरफ्तार कर मेवाड़ राज्य को सौंप दिया। मेवाड़ सरकार ने एक वर्ष तेजावत को जेल में बन्द रखा। मणीलाल कोठारी ने तेजावत को जेल से रिहा करवाने के प्रयास किये। जब मेवाड़ सरकार ने यह घोषणा कर दी कि तेजावत ने कोई अपराध नहीं किया है, तो तेजावत ने मेवाड़ सरकार राज्य विरोधी कार्य न करने तथा मेवाड़ राज्य के बाहर न जाने का वचन दिया। १९४२ में जब भारत छोड़ो आन्दोलन आरम्भ हुआ, तो तेजावत को पुन: गिरफ्तार कर लिया और फरवरी, १९४७ को रिहा कर दिया गया।
भीलों में सर्वप्रथम मोतीलाल तेजावत ने राजनीतिक चेतना जागृत की। इसके बाद भीलों की आर्थिक स्थिति को सुधारने तथा उनके अन्ध - विश्वासों को दूर करने के लिए बनवासी संघ की स्थापना की गई।
राजस्थान में राजनीतिक आन्दोलन
१९२१ में महात्मा गाँधी ने असहयोग आन्दोलन आरम्भ,जिससे राजस्थान भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। असहयोग आन्दोलन ने राजस्थान में राजनीतिक चेतना जागृत की, जिसके कारण विभिन्न राज्यों में राजनीतिक संस्थाओं की स्थापना हुई, जिनका मुख्य उद्देश्य उत्तरदायी सरकार की स्थापना की मांग करना था। सिरोही, मेवाड़, जयपुर, जोधपुर, अलवर और हाड़ौती आदि राज्यों में भाषण देने पर प्रतिबन्ध था और सार्वजनिक सभा का आयोजन भी नहीं किया जा सकता था। परन्तु इन राज्यों में अनेक राजनीतिक आन्दोलन हुए, इसलिए १९२४-२५ में राजस्थान के राज्यों में निरंकुश दमन का नया दौर आरम्भ हुआ।
१९२५ में अलवर राज्य की दो तहसीलों - बानसूर व गाजी का थाना में आन्दोलन आरम्भ हो गया, यह आन्दोलन सरकार द्वारा लागू किये गये नये करों के विरोध में था। राज्य की सेनाओं ने इस आन्दोलन को कुचलने के लिए दोनों गाँवों को घेर लिया और गोलीबारी आरम्भ कर दी। परिमामस्वरुप ९५ व्यक्ति मारे गये और २५० से अधिक घायल हुए। सरकार की दमन नीति के फलस्वरुप राज्य में भय का वातावरण उत्पन्न हो गया। इसके बाद १९३२ में मेव -मुसलमानों के आन्दोलन आरम्भ हो गया। मेवों ने मांग की कि राज्य में कुरान की शिक्षा पर प्रतिबन्ध न हो और शिक्षा का माध्यम उर्दू को बनाया जाए। धीरे - धीरे यह धीरे राज्य की सीमा से बाहर भी फैल गया।
अन्त में अलवर महाराजा ने १९३३ में ब्रिटिश सेनाओं के द्वारा इस आन्दोलन को कुचल दिया गया और इस क्षेत्र में शान्ति एवं व्यवस्था स्थापित की। १९३५ में राज्य के ठाकुर और किसानों ने लगान वृद्धि के विरोध में आन्दोलन आरम्भ कर दिया। इस आन्दोलन को कुचलने के लिए राज्य की फौज ने नीमचूणा गाँव में एक सभा में बैठे लोगों को चारों ओर से घेरकर पौन घण्टे तक गोलियाँ चलाई, जिससे सैकड़ो लोग मारे गये। सरकार की दमन नीति के फलस्वरुप राज्य में आतंक फैल गया।
नीमचूणा गाँव की घटना से राज्य में असंतोष फैल गया। अत: अक्टुबर १९३७ में अलवर महाराज के इंग्लैण्ड से लौटने पर लोकप्रिय सरकार की स्थापना की माँग को लेकर आन्दोलन आरम्भ हो गया। १९३८ में अलवर प्रजा मण्डल की स्थापना हुई। राज्य सरकार ने अनेक व्यक्तियों को गिरफ्तार कर कारावास की सजा दी। राज्य में स्थिति तनावपूर्ण हो गई, परन्तु १९३९ में द्वितीय विश्व युद्ध के आरम्भ हो जाने से वातावरण कुछ ठण्डा हुआ।
इसी प्रकार जयपुर महाराज के निरंकुश शासन के विरुद्ध १९२७ में आन्दोलन आरम्भ हो गया। १९३१ ई० में जयपुर में प्रजा मण्डल की स्थापना हुई, जिसका मुख्य उद्देश्य उत्तरदायी सरकार की मांग करना तथा नागरिकों को अधिकार दिलाना था। इस आन्दोलन के मुख्य नेता पण्डित हीरालाल शास्री एवं सेठ जमनालाल बजाज आदि थे। सरकार ने शक्ति से इस आन्दोलन को कुचलने का प्रयास किया। परिणामस्वरुप जनता ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन आरम्भ कर दिया। राज्य सरकार ने अत्याचार प्रजा मण्डल को मान्यता नहीं दी और लोगों पर अमानवीय अत्याचार किये। इस समय ५०० व्यक्ति गिरफ्तार किये गये, जिनमें सेठ जमनालाल बजाज और हीरालाल शास्री आदि शामिल थे। अन्त में ९ मार्च १९३९ ई० में राज्य सरकार ने विवश होकर सभी गिरफ्तार व्यक्तियों को रिहा कर दिया गया और प्रजा मण्डल को मान्यता दे दी। इसी प्रकार भरतपुर में महाराजा के निरंकुश शासन के विरुद्ध आन्दोलन छिड़ गया। १९२९ में भरतपुर पीपुल्स एसोसियेशन की स्थापना हुई, जिसने राज्य में सविनय अवज्ञा आन्दोलन का संचालन किया। राज्य सरकार ने दमन नीति का सहारा लिया। अन्त में विवश होकर १९३९ में प्रजा मण्डल को मान्यता देना स्वीकार कर लिया। बीकानेर में महाराजा के निरंकुश शासन के विरुद्ध आन्दोलन छिड़ गया। पंचायत बोर्ड के सरपंच रामनारायण के नेतृत्व में उत्तदायी सरकार की मांग की गई, परन्तु राज्य की पुलिस ने उसे निर्ममतापूर्वक पीटा। इतना ही नहीं महात्मा गाँधी की जय व जयहिन्द के नारों पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया गया।
जोधपुर में जयनारायण व्यास ने हितकारिणी सभा की स्थापना की। इसके बाद उन्होंने आन्दोलन आरम्भ कर दिया। इस समय' पीपाबाई की पोल 'नामक पुस्तक प्रकाशित हुई थी, जिसमें प्रशासन की कटु आलोचना की गई थी। १९ सितम्बर, १९२९ ई ० में जयनारायण व्यास और आनन्द राज सुराणा ने सार्वजनिक सभा को सम्बोधित करने के बाद लोगों में यह पुस्तक वितरित की। परिणामस्वरुप जयनारायण व्यास और आनन्द राज सुराणा एवं भंवरलाल सर्राफ को गिरफ्तार कर लिया गया तथा उन्हें तीन वर्ष के कारावास की सजा दी गई। जनता द्वारा विरोध करने पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया तथा अनेक आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर लिया जिनमें कुछ विद्यार्थी भी थे। १९३१ में सरकार ने जयनारायण व्यास तथा उनके साथियों को जेल से रिहा कर दिया गया। इस समय जोधपुर में सविनय अवज्ञा आन्दोलन आरम्भ हो गया। अत: जयनारायण व्यास एवं उनके साथियों को पुन: गिरफ्तार कर लिया गया। इतना ही नहीं, सरकार ने मारवाड़ हितकारिणी सभा को गैर कानूनी घोषित कर दिया। सरकार ने आन्दोलन का दमन करने के लिए अनेक दमनकारी कानून लागू किये। फिर भी १९३४ में मारवाड़ प्रजामण्डल नामक संस्था की स्थापना हुई। सरकार ने प्रजामण्डल को भी गैरकानूनी घोषित कर दिया तो, नागरिक अधिकार रक्षक सभा की स्थापना की गई। परन्तु सरकार तो आंदोलन को कुचलने पर तुली हुई थी, अत: सितम्बर १९३६ को आंदोलनकारी नेताओं को बन्दी बनाकर परबतसर के किले में नजरबन्द कर दिया। अब अचलेश्वर प्रसाद शर्मा ने आन्दोलन का नेतृत्व सम्भाला, १९३७ में उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। मारवाड़ प्रजामण्डल और नागरिक अधिकार रक्षक सभा गैरकानूनी घोषित हो चुके थे। अत: १९३८ में 'मारवाड़ लोक परिषद' नामक संस्था की स्थापना की गई, जिसने १९४० में उत्तरदायी सरकार की स्थापना के लिए आन्दोलन किया।
उदयपुर महाराणा के निरंकुश शासन के विरुद्ध जनता में घोर असंतोष व्याप्त था। बिजौलिया के किसानों ने ठाकुर के विरुद्ध आन्दोलन आरम्भ कर दिया था। अन्त में ठाकुर को किसानों की माँगें स्वीकार करनी पड़ी थीं।
जुलाई, १९३२ में महाराणा ने कुछ नये कर लगाये, जिनका विरोध करने के लिए उदयपुर के नागरिक पीपलीघाट में एकत्रित हुए। ४ अप्रेल, १९३५ को रामसिंह ने अजमेर में इन्सपैक्टर खलीलउद्दीन की हत्या करने का असफल प्रयास किया। पुलिस ने खोजबीन के बाद रामसिंह को गिरफ्तार कर लिया। रामसिंह ने पुलिस को बताया कि हत्या की यह योजना ज्वालाप्रसाद ने बनाई थी और रिवाल्वर भी उसी ने दिया था। परिणामस्वरुप पुलिस ने २९, अप्रैल १९३५ ई० को ज्वालाप्रसाद को गिरफ्तार कर लिया।
जेल में उन्होंने सी० आई० डी० पुलिस अधीक्षक मुमताज हुसैन को एक धमकी भरा पत्र लिखा, जिसमें कहा कि यदि उन्होंने समस्त क्रान्तिकारियों को जेल से रिहा नहीं किया, तो उनकी भी हत्या कर दी जाएगी। इस पत्र के बाद ज्वालाप्रसाद को दिल्ली की जेल में भेज दिया गया। ब्रिटिश सरकार ज्वालाप्रसाद को सशर्त रिहा करने को तैयार थी, परन्तु ज्वालाप्रसाद ने सशर्त रिहा होने से इन्कार कर दिया। अन्त में १९ मार्च, १९३९ ई० को महात्मा गाँधी ने उन्हें रिहा करवाया। जेल से रिहा होने के बाद ज्वालाप्रसाद २२ मार्च को अजमेर पहुँचे, तो उनका भव्य स्वागत किया गया। इसके बाद जयनारायण व्यास की अध्यक्षता में एक सभा हुई। सभा में नृसिंह एवं कुमारानन्द आदि वक्ताओं ने भाषण दिये। उन्होंने अपने भाषण में कहा कि भारतीयों को जर्मनी तथा इटली में शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए तथा ज्वालाप्रसाद के पदचिन्हों पर चलना चाहिए।



जनमत की विजय
१९३९ ई० में द्वितीय विश्वयुद्ध आरम्भ होने पर राजस्थान के शासकों ने ब्रिटिश सरकार की हर सम्भव सहायता की। चूँकि ब्रिटिश सरकार ने बिना काँग्रेसी मन्त्रिमण्डल के परामर्श के भारत को इंग्लैण्ड के समर्थन में युद्ध में शामिल कर लिया, तब कांग्रेस ने सत्याग्रह आन्दोलन चलाने का निश्चय किया। १९४० में महात्मा गाँधी की अपील पर राजस्थान में व्यक्तिगत सत्याग्रह आरम्भ किया था। इस समय अनेक सभाओं का आयोजन किया गया। दिल्ली की एक राजनैतिक कार्यकर्या श्रीमति प्रभाती डीडवानिया ने एक सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि नवयुवकों को जलियांवाला बाग के शहीदों से प्रेरणा लेनी चाहिए।
इस भाषण का इतना प्रभाव हुआ कि लोगों ने अपने खून से हस्ताक्षर करके प्रतिज्ञा ली कि वे देश को आजाद कराकर ही चैन लेंगे। ज्वालाप्रसाद के भाषण से प्रभावित होकर १५ अगस्त, १९४१ ई० में अजमेर के रेलवे वर्कशाप के कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी। सरकार ने हड़ताल को असफल बनाने के लिए सेना बुला ली। अत: ३ सितम्बर, १९४१ ई० को ज्वालाप्रसाद को गिरफ्तार कर लिया गया। १२ नवम्बर १९४१ ई० को ज्वालाप्रसाद ने जेल से भागने का प्रयास किया, परन्तु उन्हें सफलता नहीं मिली। फलत: उन्हें तीन वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी गई और ५०० रुपये जुर्माने का दण्ड दिया गया। बाद में ज्वालाप्रसाद की अपील पर यह सजा रद्द कर दी गयी लेकिन सरकार ने १९४२ में एक नया मुकदमा दायर किया। फलस्वरुप ज्वालाप्रसाद को छ: मास के कठोर कारावास का दण्ड दिया गया।
अत: २९ फरवरी, १९४४ ई० को ज्वालाप्रसाद जेल से भाग निकले। जयपुर में प्रजामण्डल ने १९४० में उत्तरदायी सरकार की स्थापना के लिए आन्दोलन आरम्भ कर दिया। राज्य सरकार ने शक्ति से आन्दोलन को कुचलने का प्रयास किया। ऐसी स्थिति में जयपुर प्रजामण्डल के अध्यक्ष हीरालाल शास्री ने १९४१में सरकार से मांगी की कि राज्य सरकार को दमन नीति का परित्याग कर देना चाहिए। इसी समय जयपुर में आजाद मोर्चा नामक एक नया दल बना, जिसके नेतृत्व में डेढ़ वर्ष तक सत्याग्रह आन्दोलन चलता रहा। इसी प्रकार अलवर, भरतुर और उदयपुर में भी सत्याग्रह आन्दोलन हुए। जोधपुर में मारवड़ लोक परिषद् ने आन्दोलन आरम्भ किया, जिसका नेतृत्व जयनारायण व्यास कर रहे थे। सरकार ने समस्त आन्दोलनकारियों को गिरफ्तार कर लिया तथा लोकपरिषद् की मान्यता को गैरकानूनी घोषित कर दिया। १९४० में सरकार और लोक परिषद् के बीच समझौता हो गया, जिसके अनुसार समस्त राजनीतिक कैदियों को जेल से रिहा कर दिया गया। जेल से रिहा होने के बाद जयनारायण व्यास ने 'मारवाड़ में उत्तरदायी शासन' और जोधपुर की स्थिति पर प्रकाश नामक दो पुस्तकें प्रकाशित की। इनके प्रकाशन से जोधपुर महाराजा नाराज हो गये। अत: २७ मई, १९४२ को जयनारायण व्यास सहित कई कार्यकर्ताओं को भी गिरफ्तार कर लिया गया।
१९४२ में बालमुकुन्द बिस्सा को गिरफ्तार कर लिया गया और बाद में अनेक कार्यकर्ताओं को भी गिरफ्तार कर लिया गया। बालमुकुन्द बिस्सा के साथ पुलिस ने इतना अमानवीय व्यवहार किया की बिस्सा जेल में ही शहीद हो गये। इस घटना से सारा जोधपुर शहर उत्तेजित हो उठा। जैसलमेर में सत्याग्रह आन्दोलन आरम्भ हुआ, जिसका नेतृत्व सागरमल गोपा ने किया। राजस्थान की जनता में अभूतपूर्व जागृति देखकर जयपुर, जोधपुर और सिरोही राज्यों में प्रतिनिधि सलाहकार सभा की स्थापना की गई। इस सभा में महाराजा के समर्थक सदस्य अधिक संख्या में थे। अत:सुधारों से कोई सन्तुष्ट नहीं हुआ। ८ अगस्त १९४२ को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने भारत छोड़ों आन्दोलन आरम्भ किया। महात्मा गाँधी की अपील पर राजस्थान में भी यह आन्दोलन आरम्भ हो गया। सरकार ने उन्हें तथा उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया। अजमेर में इस आन्दोलन का नेतृत्व हरिभाऊ उपाध्याय ने किया। जयपुर के प्रजामण्डल के सदस्यों में आपसी मतभेद उत्पन्न हो गये। अत- जयपुर में भारत छोड़ो आन्दोलन को विशेष सफलता नहीं मिली। उदयपुर में इस आन्दोलन का संचालन माणिक्यलाल वर्मा, मोहनलाल सुखाड़िया और बलवन्त सिंह मेहता ने किया।

डीडवाना जिले में डाबलो के लोगों में जागीरदारों के अत्योचारों के विरुद्ध असंतोष व्याप्त था। इस असंतोष को प्रकट करने के लिए एक सभा को आयोजित किया गया,जिसमें द्वारका दास पुरोहित व राधाकिशन आदि नेताओं ने भाग लिया। जागीरदारों ने उन्हें बन्दी बना लिया। कुछ समय बाद जोधपुर में जयनारायण व्यास के नेतृत्व में मन्त्रिमंडल बना, तब समस्त सत्याग्रहियों को जेल से निकाल दिया गया। १९४६ में जैसलमेर के मीठालालव्यास ने जयनारायण व्यास के साथ जैसलमेर में राष्ट्रीय झंडा फहराया। जनता ने प्रजामण्डल जिन्दाबाद के नारे लगाये।
इस प्रकार राजस्थान के विभिन्न प्रान्तों में प्रजामण्डलों प्रजा परिषदों लोक परिषदों और किसान सभा, ने सत्याग्रह आन्दोलन चलाये। परन्तु अंग्रेज सरकार की दमनकारी नीति ने इन्हें कुचल दिया। भारतीयों के त्याग, बलिदान का पुरस्कार उन्हें अन्तत: १५ अगस्त १९४७ ई० को मिला जब भारत आजाद हो गया।

स्वतन्त्र भारत की मुख्य समस्या देशी राज्यों के एकीकरण की थी, लेकिन भारत के तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के अथक प्रयासों के कारण देशी रियासतों को भारतीय संघ में शामिल किया गया आधुनिक राजस्थान का निर्माण छ: चरणों में पूरा हुआ। प्रथम चरण में २८ फरवरी, १९४८ को अलवर, भरतपुर, करौली की रियासतों और नीम का थाना मिला।  दूसरे चरण में बाँसवाड़ा, डूंगरपुर, किशनगढ़, प्रतापगढ़, शाहपुरा और टोंक की रियासतों के मिलाकर 'राजस्थान यूनियन' का निर्माण हुआ। तीसरे चरण में १ अप्रैल १९४८ को उदयपुर भी राजस्थान यूनियन में सम्मिलित हो गया। चौथे चरण में १४ जनवरी, १९४९ ई० को बीकानेर जोधपुर जैसलमेर आदि राज्यों को राजस्थान यूनियन में सम्मिलित कर लिया गया, जिससे वृहत् राजस्थान का निर्माण हुआ या यूँ कहें कि अस्तित्व में आ गया। पाँचवे चरण में ३० मार्च, १९४९ ई० को 'मत्स्य युनियन' को वृहत् राजस्थान में सम्मिलित कर लिया और राजस्थान का निर्माण किया गया। छठे चरण में अजमेर और सिरोही को राजस्थान में शामिल कर लिया गया। इस प्रकार वर्तमान राजस्थान का निर्माण हुआ।

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