Saturday, 27 August 2011

राजस्थानी कठपुतलियों की अभिव्यंजना शैली

राहुल तोन्गारिया
कठपुतलियों की सूत्र-संचालन-प्रणाली में राजस्थानी कठपुतलियों का अपना विशेष स्थान है, आधुनिक युग की प्रगति की दौड़ में वे अभी तक पिछड़ी हुई बनी रही, उनके संचालक अशिक्षित व रुढिग्रस्त होने की वजह से इस दिशा में अपने आप शायद एक कदम भी नहीं बढ़ा सके। कठपुतलियों के संचालन में परम्परावादी बने रहे। फिर भी उन्हें जो परम्परा से कठपुतलियों द्वारा अभिव्यजंना की धरोहर मिली हैं, वह अपूर्व है। आज कठपुतलियों के अंग-प्रत्यंग के संचालन में जो तरह-तरह के प्रयोग रहे हैं, वे निश्चय ही कठपुतलियों को अधिक वास्तविक व युक्तियुक्त बनाने की दिशा में चमत्कारिक प्रयोग हैं। लेकिन जिस उद्देश्य से कठपुतलियों का प्रार्दुभाव कभी हुआ था उसकी ओर उनकी न अवश्य है, देश की अनेक प्राचीनतम पुतलियों को देखने से पता चलता है कि उनके पीछे एक विशेष उद्देश्य था, उनकी शक्ल सूरत देखकर अनायास ही यदि यह कोई कह दे कि उनके बनाने वालों में शरीर विज्ञान का ज्ञान नहीं था तो अनुचित होगा। आज भी राजस्थान के ये कठपुतली नचाने वाले अनपढ़ कलाकार अपने हाथ से ही पुतलियां खोदकर उन्हें रंग भी लेते हैं, उन्हें शरीर विज्ञान का कोई ज्ञान नहीं है अत: उनकी बनाई हुइ कठपुतलियों में नाक, आँख, मुँह आदि की कांट-छांट होना सम्भव नहीं हैं। फिर भी जिस परम्परा का चाहे वे अज्ञात में ही क्यों न हो, पालन करते हैं। फिर भी जिसके पीछे एक बहुत बड़ा राज यही है कि कठपुतलियों का प्रयोजन कभी वास्तविक था सजीव स्री पुरुषों का अनुकरण करना नहीं था। प्रत्यक्ष में तो यही महसूस होने लगता है कि उनका अंग-संचालन मानवी व्यापारों के अनुकूल होता है, परन्तु वास्तव में यह बात नहीं है। उनके क्रियाकलाप, अंग-संचालन, व्यापार व्यवहार आदि में निश्चय ही मानवी व्यापारों से भिन्नता रखने का उद्देश्य रहा है और कई वर्षों के अभ्यास के बाद वे परम्परा के बाद उनके समस्त क्रिया-कलाप एक विशिष्ट नियमावली (code) के अनुसार होते हैं। यह बात अंग-संचालन तक ही सीमित नहीं रहती, बल्कि उनकी आँख, नाक आदि की काट-छाट की शैली में भी परिलक्षित होती है। अत: सभी परम्परागत राजस्थानी कठपुतलियों की आँखे अतिशय उभरी हुई, बड़ी तथा भीमकाय नाक, होंठ, मुँह आदि में भी इस शैली का अनुकरण किया गया है। चाहे उनका बनाने वाला एक अनुभवी तथा निपुण शिल्पकार ही क्यों न हो। यही पद्धति उनके श्रृंगार, पहराव तथा संचालन में भी प्रयुक्त होती है।
कठपुतलियों में यह बात विशेष रुप से देखने को मिलती है कि उनके सूत्रों में अधिक किलष्टता से जान बूझकर दूर रहने की चेष्टा की गई है। अधिकांश कठपुतलियां कम से कम सूत्रों से संचालित की जाती है और कुछ ही विशिष्ट पुतलियों में सूत्रों का आधिक्य है, यह परम्परा केवल संचालन की किलष्टता की उलझन से बचने के लिए ही नहीं है, वरन् उनके पीछे एक विशेष उद्देश्य यह है कि एक या कम से कम सूत्रों में संचालित कठपुतलियां एक विशिष्ट प्रकार की जो अभिव्यंजना और क्रिया कलाप उत्पन्न करती है। उनकी रक्षा की जाए, यह इतना सूक्ष्म अनुभव है जो सूत्र संचालन करने वाले ही कर सकते हैं। इसी तरह अधिकांश कठपुतलियों में पांवों का अभाव, हाथों की सादगी तथा अनेक शारीरिक अवयवों का अधूरापन ही इन कठपुतलियों की सम्पूर्णता है। यह ऐसा राज है जिसके अध्ययन की जरुरत है। यह अभाव किसी तरह इस कला का पिछड़ापन नहीं है, इनके किसी अज्ञान का द्योतक है। सैकड़ो वर्षों के व्यवहार तथा अनुभव ने ही कुछ स्वस्थ्य रुढियां कायम कर दी हैं, जिनसे इन पुतलियों की सजीवता और अत्यधिक मनोरंजन प्रदान करने की शक्ति कायम रह गई है। यदि यह बात मान ली जाए कि यह सादगी इनकी अज्ञानता का कारण है, तो फिर कुछ कठपुतलियां ऐसी क्यों बनाई गई है जिनमें सूत्रों के किलष्ट संचालन और पुतलियों को वैविध्यपूर्ण अंग-भंगिमाओं का प्रदर्शन किया गया है, जैसे नर्तिकाएं, घुड़सवार, सपेरा, ऊँट सवार आदि।
इन कठपुतलियों के सूक्ष्म अध्ययन से ज्ञात होता है कि उनकी सीमाएं ही उनकी विशेषाताएं हैं। इन सब अभिव्यजनों के मूलभूत सिद्धान्तों का विवेचन करना हमारे लिए जरुरी है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इन कलाकारों को कम से कम साधनों और कम से कम सूत्रधारों से यह व्यवसाय करना पड़ता है। आर्थिक दृष्टि से इन निर्धन और सामाजिक दृष्टि से हीन कलाकारों को एक ही परिवार में व्यवसायिक दृष्टि से एक से अधिक दलों का निर्माण करना पड़ता है। कभी-कबी एक सूत्रकार को ही वाद्यकार की सहायता से सारे खेल का संचालन करना पड़ता है। इस दृष्टि से भी सूत्रों की किलष्टता से बचने की कोशिश की गई है, जिससे वह आसानी से सारे खेल का अकेला ही संचालन कर सके। राजस्थानी पुतलियों के पीछे एक सर्वाधिक भावना यह ज्ञात होती है कि ये कठपुतलियां मानवी स्री-पुरुषों की अनुकृति कदापि नहीं है। ये किसी दूसरे लोक के प्राणी हैं, जो मनोरंजन के हेतु इस लोक पर मानवी कथाओं के आधार पर नाट्य प्रदर्शन करने के लिए अवतरित हुए हैं। इन आलौकिक प्राणियों का कद छोटा तथा भाषा अनोखी है तथा मानवीय भंगिमाओं को अपनी संक्षिप्त और विनोद प्रधान शैली में अभिव्यक्त करने की अपनी अलग प्रणाली है। जब से पारलौकिक कलाकार मानवी रुप में रंगमंच पर आते हैं तो इनके आने, उछलने, कूदने, नाचने आदि का लहजा ही अलग होता है और पद-पद उनमें हंसाने और खुश करने की क्षमता रहती है। वे चिड़ियों जैसी आवाज में बोलती में बोलती हैं, क्योंकि उनमें मानवी भाषा का ज्ञान नहीं हैं। उस भाषा को कठपुतली वाली ढोलक बजाने वाली महिला को मानवी भाषा में उलथाना पड़ता है। यह उलथाने की कला ही इसकी जान है। पुतलियां रंगमंच पर अवतरित होती हैं। बात करने के लिए कानाफूंसी करती है। उसे इनकी भाषा की विशेषता मानवी अभिव्यंजना के अनुसार, भाव-भंगिमाओं की क्षमता नही होती, इसलिए बोलने की अभिव्यंजना एक-दूसरे के कानों में कानाफूंसी करती है। इसी तरह किसी की कही हुई बात पर स्वीकृति प्रकट करने के लिए मुंह नीचे की तरफ हिला दिया जाता है। इसलिए किसि से रुठने मनाने का प्रसंग होता है तो कठपुतलियां ऊपर से हिला दी जाती है और सूत्रधार उसके साथ ही सीटी की आवाज में सिलसिला देता है। इसी तरह वजन उठाने या किसी से जुत्थमजुत्था होने के लिए पुतलियों को स्थिति के अनुकूल हिला दिया जाता है तथा सूत्रधार और उसकी सहायिका वाचन द्वारा उसका प्रभाव पैदा कर देते हैं। इसी तरह युद्ध, झगड़े तथा लड़ाई की क्रियाएँ भी बड़ी चतुराई के साथ दर्शायी जाती है। पुतलियों के अंग-प्रत्यंग जो कि रुई और कपड़ो से बने होते हैं, इस तरह ढ़ीले और लचकीले रखे जाते हैं कि थोड़े से हिलाने और हवा में घुमाने सु युद्ध करते हुए प्राणियों जैसे दर्शाएं जाते हैं, तनिक से संचालन से ही सारी कठपुतली के अंग-प्रत्यंग दिखने लगते हैं और इस तरह एक ही धागे से सारी पुतली का यथावांछित संचालन हो जाता है।
मजलिस या सभा में बैठी हुई कठपुतलियों को यदि एक साथ किसी विशिष्ट आगन्तुक का स्वागत करना होता है या एक साथ अभिवादन या स्वीकृति आदि की घोषणा करनी होती है तो जिस पार्श्व की लकड़ी पर पुतलियां लटकी हुई होती है, उसे हिलाने मात्र से ही वांछित प्रभाव पैदा हो जाता है।
एक दूसरी मौके की बात यह है कि पुतलियों के पांव नहीं होने से भी अनेक व्यंजनाएं आसान हो जाती हैं और कई धागों की किलष्टता से सूत्रधार बच जाता है। केवल पुतली को झुकाने, उठाने, घुमाने मात्र से ही पुतलियों के उठने, बैठने, लेटने आदि की क्रियाएं स्पष्टत: परिलक्षित हो ही जाती हैं।
इन सब बातों से यह स्पष्ट पता चलता है कि सैकड़ों वर्षों के अनुभव के बाद इन कलाकारों ने व्यंजनों के साधन खोज निकाले हैं। इन व्यंजनों के पीछे मुख्य बात तो यही है कि पुतलियों का संचालन सरल हो जाए और कम सूत्रों से थोड़े-से-थोड़े आदमी अनेक पुतलियों का एक ही बार संचालन कर सके। दूसरी बात यह भी कि इन सब व्यंजनों का प्रभाव अधिक मनोरंजनकारी है, यदि पुतलियां वास्तविक मानवी ढंग से व्यवहार करने लगे और उनकी सब अभिव्यंजनाएं मनुष्य की तरह हुआ करें तो यह निश्चित है कि उनकी मनोरंजन मात्रा घट जाएगी। यदि पुतली के नाम, हाथ, कान, पांव, होंठ, आँख, कमर, गर्दन आदि शारीरिक अवयव उसी प्रकार काम करने लगे तो निश्चय ही जिस कुतूहल की सृष्टि ये पुतलियाँ और उनके संचालन में जाने-अनजाने में भी जो अभाव रखे गए हैं, वे निश्चय ही कुतूहलवर्धक है। आज जो अनेक प्रयोग इन पुतलियों में हो रहे हैं उनमें निश्चय ही अनेक अभावों की पूर्ति की गई है। उनमें अंग-प्रत्यंग संचालन में अनेक सूत्रों का प्रयोग होने लगा है। हाथ, पांव, होंठ व आँखें भी चलने लगी हैं। ये सब कठपुतलियां मानवी ढांचे की छोटी अनुकृतियां अवश्य बन गई हैं और कलाकार, निर्माता, लेखक तथा रंगमंच की सजावट आदि में करामात को विलक्षण बुद्धि का परिचय अवश्य मिलता है। नाट्याभिव्यंजना, कथोपकथन सम्भाषण, वास्तविक स्थल, स्थितियां, दृश्यावलियां तथा पुतलियों के अंग संचालन आदि में वास्तविकता अवश्य आ गई है। और इन्होंने जनता की रुचि को भी अत्यधिक आकर्षित किया है। परन्तु परम्परागत राजस्थानी शैली की पुतलियों में जो कम शब्दों में कम क्रियाओं और कम उपकरणों से विशाल कथा प्रसंगों को अभिव्यक्त करने की जो विलक्षण करामात थी, उसको क्षति अवश्य पहुँचेगी। यह भी कहा जाता है कि इस परम्परागत शैली में रचनाओं, नवीन कथा प्रसंगों के लिए बहुत कम गुंजाईश रह जाती है। यह बात कुछ हद तक सही हो सकती है, परन्तु जिन निर्माताओं ने आज सैकड़ों वर्ष पूर्व अमर सिंह राठौड़ का इस शैली में निर्माण किया था वैसी रचनाएं और भी तो बन सकती थी। इसके पीछे दो मूल कारण थे - जिस पृष्ठभूमि में इस विशिष्ट नाटक की रचना हुई थी, उस समय नवीन नाट्य रचना के लिए राज्य की तरफ से उन पर प्रतिबन्ध था और दूसरा कारण यह भी था कि जिस समय यह खेल रचा गया उस समय इन भाटों की राज-दरबारों तथा प्रतिष्ठित घरानों में बड़ी कदर थी। नवीन रचनाओं के हौसले भी उनमें थे, परन्तु बाद में अनेक सामाजिक कारणों, हीनता की भावना व आर्थिक दृष्टि से कष्टों के कारण ये जातियां अनेक कुरुतियों व समाज की अवहेलना का शिकार बन गई, और जो भी कला उनके पास थी, वह भी गिरने लगी। नवीन रचना की बात तो दूर रही उनके पास जो भी रचना थी उसमें केवल तमाशाबाजी रह गई, उसके नाट्य तत्व प्राय: खत्म ही हो गए।
यह तो निश्चित है कि युग के अनुकूल अनेक परिवर्तन राजस्थानी कठपुतलियों में आवश्यक हैं, जैसे कथावस्तु, अंगों के संचालन में सुधार, कथोपकथन में परिवर्तन, दृश्यों की वास्तविकता आदि अनेक ऐसी बातें है, जिनमें सुधार होना ही चाहिए, परन्तु उनकी परम्परागत शैली की अभिव्यंजनाओं में जो शक्ति थी उसको सुरक्षित रखना अत्यन्त आवश्यक है।
इस सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण बात और है, और वह है उसकी रचना-विधि। कोई नाट्य-रचनाकार यह समझ ले कि साधारण नाटक लिखने के समान ही कठपुतली नाट्य की रचना भी है, तो वह भूल करता है। रचनाकार की सर्वप्रथम कठपुतलियों की अभिव्यंजनात्मक शक्ति को ध्यान में रखना पड़ेगा, लम्बे व भारी-भरकम कथोपकथन से निश्चय ही कठपुतलियां अभिष्ट मनोरंजन की सृष्टि और जन रुचि को आकृष्ट नहीं कर सकेंगी। पुतली नाट्य रचना की कला भी इसी में निहीत है कि कम से कम शब्दों तथा मानवी व्यापारों के उपयोग से ही अधिक से अधिक नाट्य तत्वों का प्रतिपादन किया जाए। जिस रचनाकार को यह मंत्र मिल गया वही सफल कलाकार व रचनाकार समझा जाएगा, अन्यथा नहीं। जिस प्रकार एक नृत्यकार को अपनी सीमित मुद्राओं की सीमा में रहकर ही अधिक से अधिक अर्थ व्यक्त करने की क्षमता होनी चाहिए वही हाल पुतली-नाट्य रचनाकार का भी है। इस विश्लेषण से कोई गलती से भी न समझ ले कि इन कठपुलियों की सीमित अभिव्यंजना शक्ति के कारण किसी कठिन से कठिन कथानक पर आधारित नाट्य की रचना सम्भव नहीं है। रचनाकार की कल्पना, उसकी रचना-शक्ति तथा नवीन अभिव्यंजनाओं की सृष्टि की योग्यता के परिणाम के अनुसार ही कठिन से कठिन कथानक, चरित्र चित्रण, तरित्रोत्कर्ष, अपकर्ष आदि का प्रतिपादन सम्भव है। यह कभी जरुरी नहीं है कि पुतली-नाट्य के पात्र के मुख से किसी कथोपकथन का वाचन कराने से ही कथा का प्रतिपादन होता है। अनेक ऐसी युक्तियां व अभिव्यंजनाएं सम्भव है, जिनके मूकमात्र तथा विशिष्ट पैदी की हुई परिस्थितियां अभिष्ट उद्देश्य की पूर्ति कर सकती है। कभी-कभी यह भी सम्भव है कि शब्द की ताकत से कहीं अधिक पुतली की विशेष भंगिमाए असर पैदा करती है। रचनाकार का कौशल इसी में है कि वह ऐसी अभिव्यंजनाओं व भंगिमाओं का प्रयोग करें। जिनमें शब्द से भी कहीं अधिक अर्थ प्रकट करने की शक्ति है। कठपुतलियों की यह शैली सर्वाधिक कुतूहल पैदा करने वाली है व इसीलिए अधिक से अधिक मनोरंजनकारी भी हैं। राजस्थानी कठपुतलियों की यही अभिव्यंजनात्मक शैली इनकी प्राण है। नवीन नाट्य-रचनाओं में राजस्थान के रचनाकारों को इसका सबसे अधिक ध्यान रखना चाहिए।

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