Thursday, 25 August 2011

विरासत का संरक्षण

भारतवर्ष के मानचित्र पर राजस्थान प्रदेश राजनैतिक, भौगोलिक एवं प्राकृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यह संस्कारों एवं पवित्र रिश्तों का प्रदेश है। यहाँ की समृद्व विरासत (धरोहर) का एक लम्बा गौरवशाली इतिहास रहा है। यहाँ के राजाओं, सामन्तों, सेठ-साहुकारों और प्रबुद्व नागरिको ने समय-समय पर जिन महलों किलों, हवेलियों, छत्ररियों, झीलों, बावडियों, स्तम्भों, मन्दिरों, स्मारकों आदि का निर्माण करवाया था, वो स्थापत्य कला की दृष्टि से अद्भुत एवं बेजोड़ हैं। राजस्थान की समृद्व धरोहर है। इनकों देखकर उस समय के तकनीकी, कला एवं विज्ञान के उच्च स्तर का पता चलता है, इसलिए राजस्थान धरोहरों का प्रदेश है।
         राजस्थान की समृद्व सांस्कृतिक विरासत में प्रमुखरूप से दो पक्ष हैः प्रथम-साहित्य तथा द्वितीय-कला।

  • साहित्य : राजस्थान में साहित्य संस्कृत तथा प्राकृतभाषा में लिखा जान पड़ता है। पूर्व मध्ययुग (700-1000 ई.) में अपभ्रंश भाषा के विकास के कारण इसमें भी साहित्य लिखा गया। कुछ विद्वान मानते हैं कि प्राकृत भाषा से डिगंल तथा डिंगल से गुजराती और मारवाडी़ भाषाओं का विकास हुआ। संस्कृत से पिंगल तथा इससे ब्रज और खडी़ हिन्दी का विकास हुआ। भाषा विद्वानों के अनुसार राजस्थान की प्रमुख भाषा मरू भाषा है। मरूभाषा को ही मरूवाणी तथा मारवाडी़ कहां जाता है। डाॅ. सुनीति कुमार चटर्जी ने राजस्थानी भाषा के लिए डिगंल अथवा मारवाडी़ भाषा का प्रयोग किया है। आठवी शताब्दी ई0 में उद्योतन सूरि ने अपनें ग्रन्थ कुवलयमाला मंे मरू, गुर्जर, लाट और मालवा प्रदेश की भाषाओं का उल्लेख किया है। जैन कवियों के ग्रन्थों की भाषा भी मरू भाषा है।

  • राजस्थानी साहित्य : राजस्थानी साहित्य, समृद्व साहित्य है जिसके अन्तर्गत रचना की दृष्टि से विविधता हैं, यही राजस्थान की विरासत है। राजस्थानी सम्पूर्ण राजस्थान की भाषा रही हैं, इसकी कृतियों को 4 भगों में विभक्त किया जा सकता है:-
    (1) चारण साहित्य की कृतियाँ (2) जैन साहित्य की कृतियाँ (3) संत साहित्य की कृतियाँ (4) लोक साहित्य की कृतियाँ।
    चारण साहित्य राजस्थानी भाषा का सबसे समृद्व साहित्य है। चारण कवियों ने इसका लेखन किया है। यह साहित्य वीर रस से ओत-प्रोत है। यह साहित्य प्रबन्ध काव्यों, गीतों, दोहों, सौरठों, कुण्डलियों, छप्पयों, सवैयों आदि छन्दों में उपलब्ध है। चारणसाहित्य मंे अचलदास खींची री वचनिका, पृथ्वीराज रासो, सूरज प्रकाश, वंशभास्कर, बाकीदास ग्रन्थावली आदि प्रमुख हैं। जैन साहित्य के अन्तर्गत वह साहित्य आता है, जो जैनमुनियों द्वारा लिखित है। वज्रसेन सूरिकृत-भरतेश्वर बाहुबलि घोर, शालिचंन्द्र सूरि कृत-भरतेश्वर बाहुवलिरास प्राचीन राजस्थानी ग्रन्थ हैं।कालान्तर में बृद्धिरास, जंबूस्वामी चरित, आबरास, स्थूलिभद्ररास, रेवंतगिरिरास, जीवदयारासु तथा चन्दनबाला रास आदि ग्रन्थों की रचना हुई।राजस्थान के साहित्यिक विरासत में संतसाहित्य का उल्ेखनीय स्थान है। भक्ति आन्दोलन के समय दादू पंथियों और राम स्नेही सन्तों ने साहित्य का सृजन किया। इसके अतिरिक्त मीराबाई के पद, महाकवि वृंद के दोहे, नाभादास कृत वैष्णव भक्तों के जीवन चरित, पृथ्वीराज राठौड़ (पीथल) कृत वेलिक्रिसन रूकमणी
    री, सुन्दर कुंवरी के राम रहस्य पद, तथा सुन्दरदास और जांभोजी की रचनाएं आदि महत्वपूर्ण हैं। राजस्थान का लोक साहित्य भी समृद्व है। इसके अन्तर्गत लोकगीत, लोक गथाएं, लोक नाट्य, पहेलियाँ, प्रेम कथाएँ और फडें आदि है।तीज, त्यौहार, विवाह, जन्म, देवपूजन और मेले अधिकतर गीत लोक साहित्य का भाग हैं। राजस्थान में ‘फड’ का प्रचलन भी हैं।
    किसी कपड़े पर लोक देवता का चित्रण किया जाकर उसके माध्यम से ऐतिहासिक व पौराणिक कथा का प्रस्तुतिकरण किया जाना ‘फड़’ कहलाता है जैसे- देवनारायण महाराज की फड़ बापूजी री फड़ आदि। विधा की दृष्टि से राजस्थानी साहित्य को दो भागों मंे बाँटा जा सकता है : (1) पद्य साहित्य (2) गद्य साहित्य।
    (1) पद्य साहित्य
    पद्य साहित्य मंे दूहा, सोरठा, गीत, कुण्डलियाँ, छंद छप्पय आदि आते हैं।
    (2) गद्य साहित्य
    गद्य साहित्य के अन्तर्गत वात, वचनिका, ख्यात दवावैत, वंशावली, पटृावली, पीढि़यावली, दफ्तर, विगत एवं हकीकत आदि आते हैं।
    इसके अतिरिक्त हरिदास भार कृत-अजीतसिंह चरित, उदयराम बारठ कृत-अवधान, पद्मनाभकृत- कान्हडदे प्रबन्ध, दुरसा आढ़ा कृत-किरतार बावनी दलपति विजया या दौलत विजय कृत-खुमंाण रासो, शिवदास कृत-गजगुणरूपक, अमरनाथ जोगी कृत-रालालैंग, कवि धर्म कृत-जम्बूस्वामीरास, कविराज, मृरारिदास कृत-डींगक कोश, हरराजकृत ढो़ला मारवाडी़, चंद दादी कृत-ढो़ला मारूरा दोहा, बांकीदास कृत- बांकीदास री ख्यात, नरपति नाल्ह कृत- बीसलदेव रासो, बीठलदास कृत-रूकमणिहरण, श्यामलदास कृत-बीरविनोद ईसरदास कृत-हाला झाला री कुण्डलियाँ तथा भांड़ड व्यास कृत-हमीरायण आदि राजस्थानी भाषा के प्रमुख ग्रन्थ है। यह सम्पूर्ण राजस्थानी साहित्य हमारी समृद्ध धरोहर है।

  • राजस्थान की स्थापत्य कला - एक समृद्ध विरासत  : संस्कृति के आधार पर ही राष्ट्र की उपलब्धियों एवं उन्नति का आकलन होता है। संस्कृति आन्तरिक वस्तु है और व्यापक हैं। कला संस्कृति की गाडी़ होती है। कला संस्कृति का ही अंग है। कला संस्कृति की भाषा है। कला ही संस्कृति को मूलरूप प्रदान करती है। कला की सामग्री से जीवन व रहन-सहन के विभिन्न बौद्धिक पहलुओं का इतिहास लिखा जासकता है। राजस्थान में स्थापत्य कला का विकास गुप्तों के समय अपने उत्कर्ष पर था। हूणों के आक्रमणसे राजस्थान के स्थापत्य को नुकसान हुआ। पूर्वमध्यकाल में (700-1000ई.) जब गुर्जर-प्रतिहार शासकों ने राजस्थान क्षेत्र पर अपना शासन जमाया तो वे स्थापित के विकास के मामले में गुप्तों के उत्तराधिकारी साबित हुए। इस काल में बडी़ संख्या में मन्दिर बनें, जो गुर्जर-प्रतिहार शैली अथवा ‘महामारू’ शैली के नाम से जाने जाते हैं- (देखें-राजस्थान ज्ञान कोश-मोहनलाल गुप्ता) जैम्स बर्जेस तथा जैम्स फग्र्युसन ने इन मन्दिरों के लिए आर्यावर्त शैली या इण्डोआर्यन शैली का प्रयोग किया है। कला शिल्प, भाव प्रधानता अंग सौण्ठव, प्रतीकात्मक तथा धर्म प्रधानता इस शैली की विशेषता रही है।

  • दुर्ग : राजस्थान के राजा, महाराजा, सामंत व ठिकानेदारों ने राज्य की तथा स्वंय की रक्षा हेतु बडी़ संख्या में दुर्गों का निर्माण किया। कुछ दुर्ग सामरिक दृष्टि से अति उपयोगी थे। आज हमारे प्रदेश की ये धरोहर हैं। शुक्र नीति में नौ प्रकार के दुर्गों का उल्ल्ेख है। कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में दुर्गों की चार श्रेणियां निर्धारित की है:- 1. औदृक, 2. पार्वत, 3. धान्वन 4. वन दुर्ग। कुछ विद्वान स्थल पर बने दुर्ग की भी एक पृथक श्रेणी- स्थल दुर्ग को मानते है। राजस्थान में ये सभी प्रकार के दुर्ग पाये जाते हैं।
    • औदुक दुर्गः- यह जल दुर्ग है। गागरौन दुर्ग इसी प्रकार है।

    • पार्वत दुर्गः- यह उच्च पहाड़ पर स्थित होता है। जालोर, सिवाना, चित्तौड़, रणथम्भौर, तारागढ़ मेहरनगढ़, जयगढ़ आदि दुर्ग इसी श्रेणी के पार्वत दुर्ग हैं।

    • धान्वन दुर्गः- मरूभूमि में बना हुआ दुर्ग धान्वन दुर्ग कहलाता है। जैसलमेर का दुर्ग इसी श्रेणी का है।

    • वन दुर्गः- जंगल में बना हुआ वन दुर्ग होता है। सिवांना का दुर्ग इसी कोटि का है।

    • स्थल दुर्गः- बीकानेर, नागौर, चैमू तथा माधोराजपुरा का दुर्ग इसी श्रेणी में आते हैं। चितौडगढ़ का किला धन्व दुर्ग श्रेणी को छोड़कर सभी श्रेणियों की विशेषताएँ रखता है। इसी कारण राजस्थान में एक कहावत है, कि गढ़ तो गढ़ चित्तौड़गढ़ बाकी सब गढैया। मिट्टी के किले- हनुमानगंढ का भटनेर तथा भरतपुर का लोहागढ़ हैं। 


  • राजस्थान के प्रमुख दुर्ग -
    • अचलगढ़:- 900 ई0 में इस दुर्ग का निर्माण परमार राजाओं ने करवाया था।

    • अलवर दुर्गः- इसे बाला किला के नाम से भी जानते है। 300 मीटर ऊँचा तथा 5 कि.मी. के आकार से घिरा यह दुर्ग निकुंभ क्षत्रियों द्वारा निर्मित है। हसन खां मेवाती ने इसकी मरम्मत करवाई थी। 1775 ई. में कच्छवाह राजा प्रतापसिंह ने इस पर अधिकार कर लिया था। इसमंे जलमहल व निकुंभ महल सुन्दर हैं। इस दुर्ग में जहाँगीर तीन साल तक रहा था इसलिए उसे सलीम महल भी कहते हैं।

    • आम्बेर का किलाः- यह पार्वत्य दुर्ग है। जयपुर नगर से 10 कि.मी. उत्तर की ओर स्थित है। दुर्ग के दो तरफ पहाडि़याँ और एक तरफ जलाशय हैं। हिन्दू-मुस्लिम स्थापत्य कला का मिश्रण है। दुर्ग में स्थित रंगमहल, दिलखुश महल तथा शीशमहल दर्शनीय है।

    • कुंभलगढ़:- 1458 ई. में. निर्मित यह दुर्ग शिल्पी मंडन के निर्देशन मंे पूरा हुआ था। इस कुंभाल मेरू भी कहते हैं। यह राजस्थान के सर्वगधिक सुरक्षित किलों में से एक है।

    • गागरोन का किलाः- काली सिन्ध नदी के तट पर स्थित यह किला जल दुर्ग श्रेणी का है इसका निर्माण 11 वीं शताब्दी में परमाराें द्वारा करवाया गया था। अब यह झालावाड़ जिले में स्थित हैं। इसमंे सिक्के ढालने की टकसाल भी स्थापित की गयी थी।

    • चित्तौड़गढ़:- इसका वास्तविक नाम चित्रकूट हैं। इसे 7 वीं शताब्दी मंे चित्रांगद मोरी ने बनवाया था। कालान्तर में इसमें निर्माण होते रहे। 1302 ई. में अल्लाउद्ीन खिलजी ने रतनसिंह को मारकर इस दुर्ग पर अधिकार कर लिया था। यह दुर्ग 616 फिट ऊँचे एक पठार पर स्थित है इसके 7 दरवाजे हैं। इसमें पदमिनी महल, गोरा एवं बादल महल, पत्ता की हवेलियाँ, जैमलजी तालाब, मीरा बाई का मन्दिर तथा जैन मन्दिर आदि स्थित हैं। नौखण्डा विजय स्त्तम्भ इस दुर्ग की सबसे सुन्दर इमारत है।

    • चुरू का दुर्गः- यह दुर्ग सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा है। इसकी पहचान राष्ट्रीय धरोहर के रूप मंे है। 1857 के विद्रोह में ठाकुर शिवसिंह ने अंग्रेजों का जमकर मुकाबला किया। अंग्रेजों के विरूद्ध युद्ध में जब गोले (तोप के) समाप्त हो गये तो लुहारों ने लोहे के गोले बनाये किन्तु कुछ समय बाद गोले बनाने के लिए शीशा समाप्त हो गया। ऐसी कहावत है कि साहुकारों एवं जन सामान्य ने ठाकुर को घरों से चांदी लाकर समर्पित कर दी। जब अंग्रेज शत्रु पर चांदी के गोले जाकर गिरे तो शत्रु हैरान रह गया। इससे बडा़ राष्ट्रीयता का उदाहरण नहीं हो सकता।

    • जयगढ़ः- जयपुर का यह दुर्ग गढ़ था। इसका निर्माण मिर्जा राजा जयसिंह (1620-1667ई.) ने करवाया था। यह 500 फिट ऊँची पर्वतीय शिखर पर स्थित है। इसके चारो ओर सुरक्षा के लिए मजबूत चार दीवारी बनायी गयी है। इसमें शस्त्रागार भी है। यहीं पर जयबाण नामक तोप स्थित है जिसका निर्माण इसी शस्त्रागार में हुआ था।

    • जालोर दुर्गः- यह दुर्ग दिल्ली-गुजरात जाने वाले मार्ग पर स्थित है। युद्ध की दृष्टि से यह किला सबसे सुदृढ़ हैं। अल्लउद्ीन खिलजी ने कई वर्षो तक इसकी घेरा बन्दी की लेकिन इसमें प्रवेश नहीं कर सका। बाद में 1314 में कान्हड़दे के आदमियों की गद्ारी से किले का पतन हुआ। इसका निर्माण कार्य गुर्जर-प्रतिहार राजा नागभटृ प्रथम ने प्रारम्भ किया था। बाद में परमारों ने इसे पूरा करवाया। स्वतन्त्रता आन्दोलन के समय मथुरादास माथुर, फतहराज जोशी, गणेशीलाल व्यास तथा तुलसीदास राठी आदि नेताओं को इस दुर्ग में नजरबन्द किया था।

    • जैसलमेर दुर्गः- इसे सोनार गढ़ भी कहते हैं। इसका निर्माण, रावल जैसल भाटी ने, 1155 ई. में करवाया था। इसके चारों ओर विशाल मरूस्थल फैला हुआ हैं, अतः यह धान्व श्रेणी के दुर्ग में आता है। दुर्ग में स्थित रंग महल, राजमहल, मोती महल, एवं दुर्ग संग्रहालय दर्शनीय हैं। इसमे कई महल, मन्दिर तथा आवासीय भवन बने हुए है। वर्तमान में राजस्थान में दो ही दुर्ग ऐसे है जिनमें लोग निवास करते हैं। उनमें से एक चित्तौड़गढ़ का दुर्ग है तथा दुसरा जैसलमेर का दुर्ग है।

    • तारागढ़:- इसे गढ़ बीठली भी कहते हैं। अरावली की पहाडि़यों पर निर्मित तारागढ़ दुर्ग समुद्र तल से 870 मीटर तथा धरातल से 265 मीटर ऊँचाई पर स्थित है। चैहान वंशीय अजयराज ने इस दुर्ग का निर्माण करवाया था मेवाड़ महाराणा रायमल के पुत्र पृथ्वीराज ने इस दुर्ग में कुछ महल आदि बनवाये थे जिसके कारण इसका नाम अपनी पत्नी ताराबाई के नाम पर तारागढ़ रख दिया। राजस्थान मे तारागढ़ के नाम से दो दुर्ग हैं। पहला अजमेर में तथा दुसरा दुर्ग बून्दी में है।

    • बीकानेर दुर्गः- इसको जूनागढ़ भी कहते हैं। यह मरू दुर्ग की श्रेणी में आता हैं। इस दुर्ग की नींव महाराज रायसिंह ने 17 फरवरी 1589 ई. में रखी थी। इसको बनने में लगभग 5 वर्ष लगे थे। इसकी दीवारे 40 फिट ऊँची तथा 15 फिट चैड़ी हैं जो सुरक्षा की दृष्टि से मजबूत हैं। दुर्ग की प्राचीरे अधिकांशतः लाल पत्थर से निर्मित हैं। दुर्ग परिसर में फूलमहल शीशे का बना हुआ है जो बेजोड़ व अद्भुत है। इसमें सोने की नक्काशी और चित्रकला का काम अनूठा है। इसमें महाराजा गंगासिंह का कार्यलय भी उत्कृष्ट है।

    • भटनेर का किलाः- हनुमानगढ़ जिला मुख्यालय पर स्थित यह किला लगभग 50 बीघा भूमि मे विस्तृत है। यह दुर्ग प्राचीन है। मूल दुर्ग मिटृी का था। बादमें समय-समय पर इसका पक्की ईटों से निर्माण होता रहा। इसे राजस्थान की उत्तरी सीमा का प्रहरी कहा जाता है।

    • मांडलगढ़ दुर्गः- भीलवाडा़ जिले मंे स्थित यह दुर्ग गोलाई में बना हुआ है। लोक कहावतों के अनुसार माण्डिया के नाम पर इस दुर्ग का नाम माण्डलगढ़ पडा़। इसका निर्माण शांकभरी के चैहानों ने 12 वीं शताब्दी में करवाया था। इसमंे निर्मित जैन मन्दिर दर्शनीय हैं।

    • मेहरानगढ़:- पार्वत्य दुर्ग की श्रेणी का यह दुर्ग जोधपुर के उत्तर मे मेहरान पहाडी़ पर स्थित हैं वास्तुकला की दृष्टि से बेजोड़ कृति हैं। यह मयुराकृति में है। इसलिए यह मयूरानगढ़ कहलाता था। इसकी स्थापना नीव राव जोधा ने रखी थी। एक तान्त्रिक अनुष्ठान के तहत दुर्ग की नीवं मे राजिया नामक व्यक्ति जिन्दा चुन दिया गया था। इसके ऊपर खजाने की इमारते बनायी गयी थी। दुर्ग के चारों ओर सुदृढ़ 20 से 120 फिट ऊँची दीवारे बनाई गई जो 12 से 20 फिट चैडी़ हैं। इसके अन्दर एक विशाल पुस्तकालय भी हैं। दुर्ग के अन्दर मोतीमहल, फतहमहल, फूला महल तथा सिंगार महल दर्शनीय है। किले में अनेक प्राचीन तोपें है।

    • रणथम्भौर:- सवाईमाधोपुर में स्थित यह दुर्ग पार्वत्य दुर्ग हैं। इसको निर्माण 8 वीं शताब्दी मंे अजमेर के चैहान शासकों द्वारा पहाडि़यों से घिरा हुआ है। यह दुर्ग रवाइयों एवं नालो से आवृत हैं। ये नाले चम्बल व बनास मे जाकर गिरते हैं। यह गिरि शिखर पर निर्मित है। इस तक पहुँचने के लिए संकरी घुमावदार घाटियों से होकर जाने वाले मार्ग से गुजरना पड़ता है। दुर्ग में 32 खम्भों की छतरी, जैन मन्दिर, लक्ष्मी मन्दिर तथा गणेश मन्दिर स्थित है।

    • सिवाना दुर्ग:- बाड़मेर जिले मंे स्थित यह दुर्ग परमार शासकों द्वारा 954 ई. में बनवाया गया था। यह ऊँची पहाडी़ पर निर्मित हैं। अल्लाउदीन खिलजी के समय यह दुर्ग कान्हडदेव के भतीजे सातलदेव के अधिकार में था। अल्लाउद्ीन ने जालौर आक्रमण के दौरान इस दुर्ग पर कडी़ मेहनत के बाद अधिकार कर लिया था। जौधपुर के राठौड़ नरेशों के लिए यह दुर्ग संकटकाल में शरण स्थली रहा है। यह वर्तमान में राजस्थान के दुर्गो में सबसे पुराना दुर्ग है। इस पर कूमट नामक झाडी़ बहुतायत में मिलती थी, जिससे इसे कूमट दुर्ग भी कहते हैं।

    • लोहागढ़:- इस दुर्ग को 1733 ई. में जाट राजा सूरजमल ने बनवाया था। दुर्ग पत्थर की पक्की दीवार से घिरा हुआ है। इसके चारों ओर 100 फिट चैडी़ खाई है। खाई के बाहर मिट्टी की एक ऊँची प्राचीर है। इस तरह यह दुर्ग दोहरी दीवारों से घिरा हुआ है अहमदशाह-अब्दाली एवं जनरल लेक जैसे आक्रमणकारी भी इस दुर्ग में प्रवेश नहीं कर सके थे। दुर्ग में प्रवेश के लिए केवल दो पुल बनाये गये हैं। इसमें एक पुल पर बना हुआ दरवाजा अष्ठ धातुओं का है। यह दरवाजा महाराजा जवाहरसिंह 1765 ई. में. मुगलों को परास्त कर लाल किले से उतार कर लाया था। इस दुर्ग के निर्माण में 8 वर्ष लगे। यद्यपि राजा जसंवत सिंह (1853-93) के काल तक इसका  निर्माण कार्य चलता रहा। इसमें 8 विशाल बुर्जे हैं। इनमें सबसे प्रमुख जवाहर बुर्ज हैं, जो महाराजा जवाहरसिंह की दिल्ली फतह के स्मारक के रूप में बनायी गयी थी। फतेहबुर्ज अंग्रेजों पर फतह के स्मारक के रूप में 1806 ई0 में बनायी थी। यह दुर्ग स्थल दुर्गो की श्रेणी में विश्व का प्रथम दुर्ग है। दुर्ग में कई महल दर्शनीय है। 17 मार्च, 1948 को मत्स्य संघ का उद्घाटन समारोह भी दुर्ग में हुआ था।


  • राज प्रसाद  : राजस्थान में राजाओं, महाराजाओं, सामन्तों, ठिकानेदारों आदि ने अपने निवास के लिए महलों का निर्माण करवाया था, उनमें कुछ नष्ट हो गये तथा कुछ स्थानों के महल सुरक्षित हैं। बैराठ, नागदा, राजोरगढ़, भीनमाल तथा जालौर आदि स्थानों के महल नष्ट हो गये हैं, फिर भी जोधपुर, उदयपुर, बीकानेर, अलवर, कोटा, बूदी, करौली एवं जयपुर के महल सुरक्षित हैं, और उनमें उनके वंशज रहते है। मुगलों के सम्पर्क से पूर्व के राजमहल सादगीपूर्ण तथा छोटे-छोटे कमरों वाले होते थे। जब राजस्थान के राजाओं का सम्पर्क मुगलों से हुआ तब नयी विधा का प्रयोग प्रारम्भ हुआ। अब महलों में जलाशय, फव्वारे, उपवन, बाग-बगीचे, तोपखाना, शास्त्रागार, गवाक्ष, झरोखे, रगंमहल आदि बनाये जाने लगे। इस समय के प्रासादों का स्थापत्य कला
    उत्कृष्ट है।
    • उदयपुर का महल:- उदयपुर के राजमहल के बारे में फग्र्यूसन लिखता हैं कि राजपूताने का यह सबसे बडा़ महल हैं तथा लंदन के विण्डसर महल की तरह विशाल हैं।

    • करौली राजमहल:- यह महल एक विशाल परकोटे से घिरा हुआ है। इसमें भित्तिचित्रों का अच्छा अंकन है। इसमें सफेद चंदन से महकने वाले उद्यान मंे 50 चदंन के वृक्ष हैं।

    • कोटा का हवामहल:- यह कोटा के गढ़ के पास निर्मित हवामहल हिन्दू स्थापत्य कला का सुन्दर नमूना है।

    • जयनिवास महल:- महाराजा जयसिंह द्वारा निर्मित राज प्रासाद जयनिवास कहलाता है। यह जयपुर में स्थित हैं, इसे अब सिटी पैलेस भी कहते हैं। इसका मुख्य द्वार त्रिपोलिया कहलाता हैं। यह दरवाजा केवल पूर्व महाराजा के लिए या गणगौर की सवारी के लिए ही खोला जाता है। इसमें यूरोपीय तथा भारतीय भवन निर्माण पद्धति का मिश्रण है। इसी परिवार में सवाई माधोसिंह द्वारा निर्मित मुबारक महल भी हैं।

    • हवामहल (जयपुर):- 1799 ई. मे. निर्मित हवामहल पिरामिड की आकृति मंे है। इसमें छोटी-छोटी खिड़कियाँ हैं, इसलिए इसको हवामहल कहा जाता है।

    • तलहटी महल:- मेहरानगढ़ की तलहटी में एक विशाल चटृान पर राजा सूरसिंह ने रानी सौभाग्य देवी के लिए महलों का निर्माण करवाया था।

    • उम्मेद महल:- इसे छीतर महल भी कहते हैं। यह अत्याधुनिक महल है। 1929 में राजा उम्मेदसिंह ने बनवाया था। इसमंे पाँच सितारा होटल भी चलता है। हेरीटेज होटल के रूप में विकसित है। यह जोधपुर में स्थित हैं।

    • राई का बाग पेलेस:- जोधपुर मंे स्थित इस महल को राजा जसंवत सिंह प्रथम की रानी हाड़ीजी ने 1663 ई. में बनवाया था। 1883 ई. में दयानन्द सरस्वती ने इसी महल में बैठकर राजा को उपदेश दिया था।

    • काष्ठ प्रासाद:- यह झालावाड़ में स्थित हैं लकडी़ से निर्मित यह महल राजा राजेन्द्र सिंह ने 1936 ई0 में बनवाया था। यह महल तीन हजार पाँच सौ वर्ग फुट फैला हुआ है।

    • बंूदी के राज महल:- यहाँ के राज महल राजस्थान के महलों मंे अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं, जिस राजा ने जिस महल का निर्माण करवाया, उनके नाम लिखे हुए है। यहाँ पर प्राचीन समय की पानी घडी़ लगी हुई है।



  •  मन्दिर शिल्प : राजस्थान मंे मन्दिर निर्माण के प्रमाण 7 वीं शताब्दी से भी पूर्व मिलते हैं। मन्दिर शिल्प का चरमोत्कर्ष राजस्थान में 8 वीं से 11 वीं शताब्दी के मध्य देखा जा सकता है। राजस्थान में झालरापाटन का शीतलेश्वर महादेव का पहला मन्दिर है जिसके पास निर्माण तिथि है। आठवीं से बारहवीं शती तक का काल गुर्जर-प्रतिहारों का समय है। मन्दिर शिल्प निर्माण की दृष्टि से यह काल राजस्थान का स्वर्ण युग है। मण्डोर, मेड़ता तथा जालौर के गुर्जर-प्रतिहारों के नेतृत्व में जो कला आन्दोलन विकसित हुआ वह ‘महामारू’ शैली कहलाता है। इस शैली का विस्तार मरू प्रदेश से निकलकर आभानेरी (बांदीकुई), चित्तौड़, बाडौली तक हुआ। इस वंश के शासक धार्मिक सहिष्णु व कलानुरागी थे, इसलिए इसकाल में शैव, वैष्णव, शाक्त तथा जैन मन्दिरों का निर्माण बहुतायत में हुआ।
    इस शैली के प्रमुख केन्द्र चित्तौड़, आँसिया व आभानेरी हैं।ओसियाँ में बौद्ध कला, जैनकला तथा गुप्तकाल का गुर्जर-प्रतिहारकाल में समन्वय देखनें को मिलता है। खुजराहों में मन्दिर कला का जो उत्कर्ष मिलता है उसका आधार प्रतिहारकालीन गुर्जर मारू अथवा महामारू शैली ने ही तैयार किया है। अलवर जिले की मन्दिरां की श्रृखंला दसवी शताब्दी की है। हिन्दू मन्दिरों के साथ-साथ जैन मन्दिरों का भी निर्माण करवाया गया। आॅसिया में गुर्जर-प्रतिहार शासक वत्सराज ने 8 वीं शताब्दी मंे जो महावीर जी का जैन मन्दिर बनवाया था, जो अब तक का प्राचीनतम जैन मन्दिर है। माउण्ट आबू के देलवाडा़ जैन मन्दिर वास्तुकला के बेजोड़ नमूने हैं। 12 वीं से 16 वीं शताब्दी के मध्य निर्मित मन्दिर सुरक्षा की दृष्टि से दुर्गो में ही बनते रहें ताकि शत्रु से सुरक्षित रह सके। 17 वीं शताब्दी और उसके बाद मुगल शासकों के डर से उत्तरी भारत के मठो व मन्दिरों के आचार्य व पुजारी देव मूर्तिया लेकर राजाओं से आश्रय पाने के अभिप्राय से राजस्थान में आ गये। इनमंे राद्यावल्लभ, निम्बार्क व पृष्टि मार्ग के आचार्य विशेष उल्लेखनीय है।
    इस क्रम मे इन विचार धाराओं के मन्दिर सिहांड़, नाथद्वारा, कांकरोली, चारभुजा, कोटा, डूंगरपुर एवं जयपुर आदि स्थानों पर बनाये गये।
    इस प्रकार मन्दिर स्थापत्य कला राजस्थान की उद्भुत विरासत हैं, जिन्हें देखने और अध्ययन करने विदेशों से कला मर्मज्ञ विद्धान जन राजस्थान आते रहते हैं। मूर्तिकला में, आभानेरी, अटरू, आबू, नागदा, चित्तौड़ किराड़, आॅसियाँ, सीकार आदि स्थानों की अद्र्यनारीश्वर व नृत्य मातृकायें मूर्तियाँ दर्शनीय है। गुप्त एवं गुप्तोत्तर काल में राजस्थान की मूर्ति शिल्प में नवीन, भरतपुर, बैराठ, डूंगरपुर आदि स्थानों से शिव, विष्णु, याक्ष आदि की मूर्तिया प्राप्त हुई हैं। भरतपुर की बदलदेव की 27 फुट ऊँची मूर्ति इस कला का उद्भुत उदाहरण हैं।
    गुर्जर-प्रतिहारों का काल देवी-देवताओं की मूर्तियों में माधुर्य एवं कोमलता के साथ साथ शक्ति व शौर्य का मिश्रण मिलता है। उदयपुर में नागदा का सास-बहू मन्दिर की लक्षण कला अति उत्तम है। आँसिया के मन्दिर में एक आभीर कन्या का अंकन दर्शनीय है। अर्थूणा (बाॅसवाडा़) गाँव में शिल्प व स्थापत्य का प्राचीन खजाना खेतों में बिखरा पडा़ है। यह पुरातात्विक व धरोहर के दृष्टिकोण से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यहां शिव मन्दिर हैं। ऐसे ही आभानेरी (बाँदी कुई) का स्थापत्य अवशेष व मूतियाँ चारों ओर बिखरा पडा़ हैं जहाँ पर हर्षत माता का मन्दिर है।

  • राजस्थान के प्रसिद्ध मन्दिर : अजमेर जिले में, पुष्कर-ब्रह्मामन्दिर, सावित्री मन्दिर, वराह मन्दिर, नौग्रह मन्दिर रंगनाथ मन्दिर, तथा वराह मन्दिर आदि। अलवर में-नीलकण्ठ मंदिर।
    उदयपुर में -आबूनाथ मंदिर-नागदा। करौली में कैला मैया मन्दिर। टौंक जिले में कल्याण का मंदिर-डिग्गी। डूंगरपुर जिले में- देव सोमनाथ मन्दिर, गवरीबाई का मन्दिर, एवं श्रीनाथ मन्दिर। चित्तौड़गढ़:- मीराबाई मन्दिर, कालिका माता मन्दिर, सांवलिया सेठ मन्दिर-मण्डाफिया। चुरू:-सालासर बालाजी-सालासर, गोगाजी की जन्मस्थली-गोगामेडी़। जयपुर:- गढ़ गणेश मन्दिर (मोती डूंगरी), गोविन्द देवजी मन्दिर, ताडकेश्वर मन्दिर, तीर्थराज, गलताजी-जयपुर। आमेर में सूर्य मन्दिर, जगतशिरोमणि मंदिर, नृसिंह मन्दिर, शिला देवी मन्दिर। कल्याण जी मन्दिर -डिग्गी। जालौर:- चामुण्डा मन्दिर-आहोर, पातालेश्वर मन्दिर-सेवाडा़, वराह श्याम मन्दिर-भीनमाल। जैसलमेर:-हिंगलाज देवी मन्दिर, नीलकण्ठ महोदव, रामेदवरा मन्दिर-रामदेवरा, तणोर देवी मंदिर-तणोट। झालावाड़:-सुर्यमन्दिर, कालिकामन्दिर, कराहमन्दिर, सातसहेली मन्दिर-झालरापाटन। झुन्झुनू:- द्वारकाधीश मन्दिर-नवलगढ़, जगदीश मन्दिर-चिडा़वा, रानीसती मन्दिर-झुन्झुनू, शारदा देवी मन्दिर-पिलानी। दौसा:- बैजनाथ मन्दिर, सोमनाथ मन्दिर, नीलकण्ठ मन्दिर, मेहंदीपुर बालाजी मन्दिर-मेहंदीपुर। नागौर:- बंशीवाले का मन्दिर, ब्रह्माणीमाता मन्दिर तेजाती मन्दिर-खरनाल, मीरा बाँई मन्दिर-मेड़तासिटी पाडामाता मन्दिर-डीडवाना। बाँसवाडा़:- त्रिपुरा सुन्दरी मन्दिर-तलवाडा़, नन्दनी माता तीर्थ-बडो़दिया, धूणी के रणछोरजी-बासवाडा़। बाड़मेर:- सोमेश्वर मन्दिर-किशडू, ब्रह्माजी का मन्दिर-आसोतरा, रणछोड़ राय मन्दिर-खेड, हल्देश्वर मन्दिर-पीपलूद। बीकानेर:- कपिल मुनि मन्दिर-कोलायत, करणीमाता मन्दिर-देशनोक, भैखमंदिर-कोड़मदेसर। भीलवाडा़:- रामद्वारा-शाहपुरा,बाणमाता शक्तिपीठ-माण्डलगढ़-माण्डलगढ़। राजसमंद:- श्रीनाथजी मन्दिर-नाथद्वारा, द्वारिकाधीश मंदिर-कांकरोली। सवाई माधोपुर:- मेहंदीपुर बालाजी, कालागोरा भैरव मंदिर, रणतभंवर गजानन मंदिर-रणथंभौर। सीकर:- शांक भरी देवी मंदिर-शाकंभरी, हर्षनाथ मंदिर-सीकर, जीणमाता मंदिर-गौरिया (सीकर), खाटूश्याम जी मन्दिर-खाटूश्याम (सीकर)। हनुमानगढ़:- भद्र काली मंदिर, गोगाजी समाधि स्थल-गोगामेडी (नोहर)।

  • राजस्थान के प्रसिद्ध जैन मंदिर .: सोनीजी की नसियाँ- अजमेर, केसरिया नाथ मंदिर- ऋृषभदेव, दिलवाडा़ के जैन मन्दिर-माउण्ट आबू, भीमाशाह मन्दिर-माउण्ट आबू, पाश्र्वनाथ जैन मंदिर- मेड़तारोड, श्री महावीर जी-महावीर जी, रणकपुर जैन मंदिर-पाली।

  • राजस्थान के प्रसिद्ध गुरूद्धारे : साहवा का गुरूद्वारा-चुरू, बुड्ढा़ जोहड गुरूद्वारा-रायसिंह नगर (गंगानगर), गुरूद्वारा - नरैना (जयपुर)

  • राजस्थान की प्रसिद्ध दरगाह - मकबर : ख्वाजा मुद्दीन चिश्ती की दरगाह -अजमेर, बडेपीर, दरगाह, नागौर, नरहडशरीफ की दरगाह-चिवाडा़, झुन्झुनू, मीठेशाह की दरगाह-गागरोण (झालावाड़), पीर हाजि निजामुद्दीन की दरगाह-फतहपुर (सीकर) गुलाब खाँ का मकबरा-जोधपुर, शक्करबाबा शाह की दरगाह-नरहड़ (झुन्झुनू), कबीर शाह की दरगाह-करौली।

हवेलियां : राजस्थान में सेठ-साहूकारों तथा धन्ना सेठों ने अपने निवास के लिए भव्य व विशाल हवेलियों का निर्माण करवाया। इनके द्वारों पर कलात्मक गवाक्ष, बडा़ चैक, लम्बी पोल,चैबारे और बगल में कमरे होते है। ये हवेलियाँ कई मंजिली तथा दो-दो चोक वाली होती हैं। शेखावटी, ढूढा़ढ, मारवाड़ तथा मेवाड़ राज्यांे की हवेलियाँ स्थापत्य की दृष्टि से भिन्नता लिए हुए है। ये राजस्थान की विरासत मंे अहम भूमिका निभा रही है। इनकी स्थापत्य कला प्रदेश का प्रतिनिधित्व करती है। राजस्थान सरकार भी, 1991 की भारत सरकार की हवेली होटल हेरिटेज की तर्ज पर प्राचीन हवेलियों को हेरिटेज होटल का दर्जा दे रही है। इससे राजस्थान की धरोहर के रूप मंे हवेलियों की पहचान बन पायेगी।
शेखावटी क्षेत्र की हवेलियाँ अधिक भव्य व कलात्मक हैं। जयपुर, रामगढ़, नवलगढ़,फतेहपुर, मुकुंदगढ़, मण्डावा, पिलानी, सरदार शहर, रतनगढ़, इत्यादि शहरों व कस्बों में खडी़ विशाल हवेलियाँ स्थापत्य शिल्प का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।
                        जैसलमेर की सालमसिंह की हवेली, नथमल की हवेली और पटवों की हवेली पत्थरों की जालीदार कटाई के कारण विश्व प्रसिद्ध है। करौली, भरपुर, कोटा में स्थित हवेलियों का कला पक्ष देखते ही बनता है। जोधपुर में हवेलियाँ अधिकांशतः सूनी पडी़ है। इसी तरह लक्ष्मणगढ़-शेखावाडी़ (सीकर) की भी अधिकंाश हवेलियों के ताले लगे हैं जो अर्से से बन्द पडी़ हैं। राजस्थान सरकार की प्ररेणा से अब इन मध्यकालीन राजस्थानी हवेलियों का जीर्णोंद्धार एवं भवन हिस्सों की मरम्मत की जा रही हैं। इससे राजस्थान की समृद्ध विरासत को बचाया जा सकता है। जयपुर शहर (हल्दियों का रास्ता) मे 1775 ई. में बनी हवेली सलीम-मंजिल इसी प्रकार हेरिटेज हवेली का रूप प्राप्त कर चुकी है। जर्मन पत्रकारों ने (30 नवम्बर, 2010) जयपुर दरबार के शाही हकीम मोहम्मद सलीम खाँ के वंशज नसीमुद्दीन खाँ प्यारे मियां को हवेली की सार-संभाल अच्छे ढंग से करने पर बधाई दी।  
 
छतरियाँ : राजस्थान में, राजाओं, श्रेष्ठियों, संतो तथा वीर पुरूषों के मरणो परांत बने स्मृति स्थल न केवल स्थापत्य व इतिहास की दृष्टि से महत्व पूर्ण हैं, बल्कि प्रदेश की समृद्ध विरासत में शामिल है। जयपुर का गैटोर, जोधपुर का जसवंत थडा़, कोटा का छत्रविलास बाग, जैसलमेर का बडा़ बाग, अलवर में मूंसी रानी की छतरी, बीकानेर में राव कल्याण मल की छतरी, करौली में गोपालसिंह की छतरी, बंूदी मे चैरासी खम्भों की छतरी, रामगढ़ में सेठों की छतरी, जैसलमेर में पालीवालों एवं राजाओं की छतरियाँ तत्कालीन इतिहास, कला एवं पुरातात्विक महत्व के विविध पक्षों को चिन्हित करते हैं। जहाँ एक ओर राजाओं, श्रेष्ठों एवं पुरूषों की छतरियों में सामान्यतः पदचिन्ह बने हैं वही शैवो और नाथों की छतरियों में धार्मिक चिन्ह शिवलिंग तथा खडाऊ बने हुए हैं। जालौर में नाथों की समाधियों की छतरी पर तोता बना हुआ है।

बावडियां : राजस्थान में बावडियाँ भी अपने स्थापत्य शिल्प के लिए जानी जाती है। बावडियाँ गहरी, चैकोर तथा कई मंजिला होती हैं। ये सामूहिक रूप से धार्मिक उत्सवों पर स्नान के लिए भी प्रयोग में आती थी। नीमराणा की बावडी़ (अलवर) का निर्माण राजा टोडरमल ने करवाया था। यह नौ मंजिला है। इसकी लम्बाई 250 फुट व चैडा़ई 80 फुट है। इसमें समय पर एक छोटी सैनिक टुकडी़ को छुपाया जा सकता था। इसी प्रकार से गंगरार (चित्तौड़) में 600 वर्ष पुरानी दो बावडी़, बाराॅ में कोतवाली परिसर में एक बावडी़, बूंदी में रानीजी की बावडी़, गुल्ला की बावडी़, श्याम बावडी़, व्यास जी की बावडी़ तथा मूर्ति शिल्प कला की दृष्टि से अनुपम है। रंगमहल, (सूरतगढ़) किसी समय यौद्येय गणराज्य की राजधानी था। पहले सिकन्दर के आक्रमण से हाँनि उठानी पड़ी, उसके बाद हूणों के आक्रमण से रंगमहल पूरी तरह नष्ट हो गया। उत्खन्न में यहाँ से एक प्राचीन बावडी़ प्राप्त हुई हैं जिसमें 2 फुट लम्बी तथा 2 फुट चैडी़ ईटें लगी है। बावडी इस
बात का प्रतीक है कि शको के भारत आगमन के बाद भी रंगमहल सुरक्षित था। क्योंकि बावडी़ बनाने की कला शक अपने साथ भारत लाये थे। रेवासा (सीकर) में भी दो बावडि़याँ दर्शनीय हैं। इनकों परम्परागत जल सरंक्षण के रूप में काम लिया जा सकता है।

राजस्थान की प्रमुख झीलें : राजस्थान में अनेक झीलों के निर्माण का उल्लेख मिलता हैं। झीलों के निर्माण में राजा, महाराजाओं ने बहुत रूची दिखाई। इससे सिंचाई की व्यवस्था की जाती थी। प्राचीन काल में चन्द्रगुप्त मौर्य ने कृषि की सिंचाई हेतु सुदर्शन झील का निर्माण करवाया था। झीलों से प्रदेश की आर्थिक स्थिति मजबूत होती हैं। 1152 से 1163 के बीच अजमेर के पास वीसलसर नामक कृत्रिम झील निर्मित करने का उल्लेख मिलता ह। पुष्कर में मीठे पानी की झील अत्यन्त प्राचीन हैं। इसके तट पर ब्रह्माजी का विख्यात प्राचीन मन्दिर हैं।अलवर में तीन ओर से पहाडि़यों से गिरी सिलीसेढ नीली झील दर्शनीय है। उदयपुर को झीलों की नगरी कहां जाता है। यहाँ की पिछोला झील ऐतिहासिक है। इसमें कई टापू है। इनमें से एक टापू पर जग निवास नामक महल है। पिछोला झील के उत्तर में फतह सागर झील का निर्माण है। इस झील में आहाड़ नदी से 6 कि.मी. लम्बी नहर द्वारा जल लाया जाता है। इस झील के बीच स्थित टापू आकर्षण का केन्द्र है। उदयपुर से 51 कि.मी. दूर स्थित जयसमुद्र झील हैं जिसका निर्माण 1687-1691 ई. में महाराणा जयसिंह ने करवाया था। यह विश्व की दूसरे नम्बर की तथा ऐशिया की पहली सबसे बडी़ कृत्रिम झील है। इसकी लम्बाई 14,400 मीटर तथा चैडा़ई 9,600 मीटर है। इसमें 9 नदियों का पानी आता है। कोटा में नगर के मध्य छत्र बिलास नामक झील स्थित है, इस झील में जगमन्दिर नामक महल है। इसका निर्माण महाराव दुर्जनशाल ने करवाया था। आबू पर्वत पर स्थित नक्की झील के बारे में कहा जाता है कि इसे देवताओं ने अपने नाखून से खोद कर बनाया था। सर्दियों में इस झील का पानी जम जाता है। इस झील के चारों और सड़क है। एक किनारे मेढ़काकार चट्टान है जिसे टाॅड़ राॅक कहते है।

अन्य ऐतिहासिक विरासत :

  • ईसरलाटः  जयपुर के आतिश अहाते में खडी़ ईसरलाट का निर्माण राजा जयसिंह के दूसरे पुत्र ईश्वरी सिंह ने 1749 ई. में करवाया था। मराठों की सेना को पराजित करने के उपलक्ष्य में विजय स्तम्भ के रूप मे इस भव्य इमारत का निर्माण करवाया गया था। इसे सरगा सूली भी कहते हैं।

  • जंतर-मंतर (वैधशाला) : जयपरु के चन्द्र महल के पूर्व मंे जंतर-मंतर वेद्यशाला है इसका निर्माण राजा सवाई जयसिहं ने करवाया था। जयसिंह ने तीन नये यन्त्रों का भी आविष्कार किया जिनके सम्राट यन्त्र, जय प्रकाश यन्त्र और राम यन्त्र नाम रखे। इनमें सम्राट यन्त्र सबसे बडा़ व ऊँचा है। यह यन्त्र शुद्धतम समय बताने में सक्षम है। इससे मौसम का अदांजा भी लगाया जा सकता है। इस ऐतिहासिक राजस्थान की विरासत को यूनेस्को की वल्र्ड हेरिटेज सूची में शामिल किया गया है, विश्व धरोहर घोषित कर दिया गया हैं। इस तरह राजस्थान का यह पहला और देश का 28 वाँ स्मारक बन गया है। राजस्थान के मुख्य मंत्री ने जंतर-मंतर को विश्व धरोहर की सूची में जोडा़ जाना देश व प्रदेश के लिए एक बडी़ उपलब्धि बताया है। जंतर-मंतर के नाम के पीछे भी एक गूढ़ अर्थ छिपा है। जंतर का अर्थ होता है उपकरण और मंतर का अर्थ होता है गणना। जंतर-मंतर का अर्थ है कि वह उपकरण जिससे गणना की जाए।

संरक्षण की आवश्यकता एवं सरंक्षण हेतु किये गये प्रयास  :  राजस्थान प्रदेश का गौरवशाली अतीत एवं समृद्ध सांस्कृतिक विरासत हैं। किले, अतुलनीय मंन्दिर स्थापत्य शिल्प, हमल एवं हवेलियों का चित्रांकन आदि इसका प्रमाण है। इन सब को सुरक्षित रखने का हमारा परम दायित्व है। इससे प्रदेश के पर्यटन को बढा़वा मिलेगा। आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। रोजगार के अवसर बढे़गें। प्रदेश की नयी पीढ़ी को समृद्ध विरासत का उचित ज्ञानवर्धन होगा। विश्वपटल पर राजस्थान प्रदेश का नाम उभरेगा। राजस्थान की विशिष्टता बढे़गी। व्यापार में वृद्धि होगी जिससे देश को विदेशी मुद्रा प्राप्त होगी। राज्य में प्रति व्यक्ति आय बढ़ेगी। यातायात एवं परिवहन व्यवसाय को बढा़वा मिलेगा। अतः प्रदेश की विरासत की सुरक्षा एवं सरंक्षण अति आवश्यक है।विगत वर्षों में प्रदेश की सरकार ने इस ओर ध्यान देते हुए प्रदेश की बहुमुल्य विरासत के सरंक्षण हेतु अनेक प्रयास किये हैं। स्मारकों को बचाये रखने के लिए वित्त पोषण सरंक्षण योजना, व्यक्तियों एवं व्यवसायिक घरानों को राज्य की तरफ सहायता करना, तथा निजी स्मारकों को विकसित एवं सुरक्षित रख रखाव हेतु प्रोत्साहन करना आदि शामिल है। ऐतिहासिक धरोहरों के सरक्षंण और विकास हेतु अनिवासी राजस्थानियों को, राजस्थान सरकार द्वारा नाजुक स्मारकों की संरक्षण योजना मैं भागीदारी के लिए और किसी स्मारक को गोद लेने के लिए आमन्त्रित किया है। वस्तुतः यह एक सराहनीय प्रयास है। आभानेरी (बांदीकुई) एवं अर्थूणा जैसे अनेक ऐसे ऐतिहासिक स्मारक स्थल हैं जिनकी स्थिति दयनीय है जिनका शिल्प व स्थापत्य खजाना खेतों में बिखरा पडा़ हैं जो किसी आक्रान्ता द्वारा की गई कार्यवाही और करतूत की कहानी कह रहे हैं। उन्हें तुरन्त सरंक्षण की आवश्यकता है। यद्यपि राजस्थान में पर्यटन व पुरातत्व विभाग हैं जो विरासत सरंक्षण का काम करते हैं फिर भी इस क्षेत्र में ओर अधिक सजगता की आवश्यकता हैं।

पर्यटन एवं पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षण के प्रयास : 1956 ई. में स्थापित राजस्थान पर्यटन विभाग,विदेषी पर्यटकों को आकर्षित करने के लिये राजस्थान के महत्वपूर्ण महलों, किलों, हवेलियों को पर्यटन की दृष्टि से विकसित कर एक तरफ उनका संरक्षण कर रहा है तथा दूसरी तरफ राज्य के लिये राजस्व जुटा रहा है।आमेर महल राज्य का सर्वाधिक राजस्व जुटाने वाला पर्यटन स्थल है। इसके अतिरिक्त पर्यटन विभाग हवेली हैरिटेज होटलों का निर्माण करना, मेघाडेजर्ट सर्किट बनाना,राॅयल राजस्थान आॅन व्हील्स का प्रारम्भ,पैकेज टयूर,विरासत स्थलों पर मेलों का आयोजन करवाना तथा निजी क्षैत्र में होटल निर्माण को वित्तीय सहायता एवं प्रोत्साहन प्रदान कर राजस्थान विरासत के संरक्षण में अपनी अहम भूमिका निभा रहा है।
विरासत संरक्षण में पुरातत्व विभाग का सहयोग व योगदान भी सराहनीय है। 1950 ई.में स्थापित इस विभाग में 32 उच्च अधिकारी कार्यरत है।यह विभाग प्रदेष की पूरा सम्पदा व सांस्कृतिक धरोहर की खोज,सर्वेक्षण,प्रचार-प्रसार एवं उनके संरक्षण का कार्य करता है। इस विभाग ने प्रदेष में 222 स्मारक तथा पूरा स्थल घोषित किये है। दुर्गों , स्मारकों, हवेलियों, देवालयों,महलों आदि का यह विभाग विकास एवं रसायनिक उपचार भी करता है।विभाग अपनी पत्रिका ’रिसर्चर’ के नाम से प्रकाषित करता है।
1955 में स्थापित राज्य अभिलेखागार भी साहित्यिक विरासत के संरक्षण एवं संवर्घन में कार्य कर रहा है।इसका मुख्यालय बीकानेर में है। विरासत के महत्वपूर्ण लेख, फरमान, निषान, मंसूर,परवाना,रूक्का,बहियाँ,अर्जियों आदि के संरक्षण में लगा हुआ है। 1955 ई. में प्राच्य विधा प्रतिष्ठान की स्थापना जोधपुर में हुई थी।यह संस्कृत , प्राकृत, अपभ्रंष,
तथा पाली आदि भाषाओं में लिखे गये, वेद, धर्मषास्त्र,पुराण,दर्षन,ज्योतिष,गणित,आयुर्वेद, व्याकरण,तंत्र-मंत्र आदि की पाण्डुलिपियों के लेखन एवं संरक्षण का कार्य करता है।अरबी-फारसी षोध संस्थान (टोंक)भी फारसी-अरबी भाषा की दुर्लभ पुस्तकों के संरक्षण का काम करती है।
इसके अतिरिक्त राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर,जयपुर कत्थक केन्द्र,राजस्थान संस्कृत अकादमी जयपुर तथा लोक संस्कृति ष्षोध संस्थान चुरू आदि संस्थायें भी राजस्थान की साहित्यिक विरासत के संरक्षण का काम कर रही है। निजी विरासत के संरक्षण के कार्य में पूर्व राजा-महाराजा फाउन्डेषन समितियों के माध्यम से योगदान देते है।

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