राजस्थान की स्थापत्य संस्कृति

राहुल तोन्गारिया
स्थापत्य का मानव संस्कृति के इतिहास में अपना स्वतन्त्र स्थान है, स्थापत्य एक ऐसी श्रृंखला है जो शताब्दियों की बिखरी हुई कड़ियों को जोड़कर क्षेत्र और मानव जाति की सच्ची सांस्कृतिक झाँकी प्रस्तुत करता है। मानव सभ्यता के विकास में स्थापत्य का अपना महत्व है इसका उदाहरण हमें विश्व की प्राचीन सभ्यताओं से मिलता है चाहे वो रोम की हो या मिश्र की या भारतीय हो या चीनी, सभी महत्वपूर्ण प्राचीन सभ्यताओं से मिलता है। जहाँ लिखित ऐतिहासिक साधनों की उपलब्धि नहीं हो सकती वहाँ स्थापत्य के अवशेष अज्ञातकाल के इतिवृत के साक्षी बनते हैं तथा विस्मृत युगों की खोज एवं उनको कलपनात्मक रुप देने में सहायक होते हैं। किसी भी देश की युगीन प्रगति का समुचित अध्ययन बिना स्थापत्य की विविध परतों तथा खण्डहरों के अध्ययन के नहीं हो सकता, क्योंकी उनमें देश की वास्तविक आत्मा प्रतिबिम्बित होती है। उन्हीं के माध्यम से कला और जीवन का सामंजस्य एक दिव्य प्रकाश के रुप में प्रस्फुटित होता रहा है। जहाँ तक भारत की स्थिति का प्रश्न है, हम अनुमान करते हैं कि यहाँ धार्मिक चिन्तन, भाव, प्रमाण और प्रगति का समुचा चित्रण स्थापत्य के अन्तर्गत निहित रहा है। यहाँ कला ने निरन्तर राष्ट्रीय अनुभूतियों और जनजीवन के विशिष्ट उद्देश्यों की पूर्ति की है। साथ ही साथ सौन्दर्य और माधुर्य के विरल स्रोतों को बहा कर जीवन और आत्मा के स्थायी तत्वों द्वारा सुखमय बनाया है। स्थापत्य के ये सभी सांस्कृतिक तत्व विकसित तथा समृद्ध परिमाण में राजस्थान में पाये जाते हैं, क्योंकी यहाँ स्थापत्य की ओर रुचि सभी युगों में और ज्ञान समुदाय में सतत् बना रही है। इस स्थापत्य की अभिव्यक्ति गाँवों, नगरों, मंदिरों, राजभवनों, दुर्गों जलाशयों, उद्यानों तथा समाधियों के निर्माण द्वारा प्रभावित होती है।

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