Saturday, 27 August 2011

मंदना/मांडणा - राजस्थान की एक लोककला

राहुल तोन्गारिया
परिचय 
मंदना/मांडणा राजस्थान की ग्रामीण महिलाओं की एक परंपरिक कलात्मक क्षमता तथा मौलिक सोच का परिचायक है। इसके अध्ययन से इसके विभिन्न पहलू हैं जैसे लोगों के जीवन की कलात्मक पहलू, परंपरा, धार्मिक विश्वास तथा परंपरिक इतिहास पर प्रकाश पड़ता है। मंदना मूलत: एक कला है जो औरते बनाती हैं। इसे फर्श या जमीन पर और दीवारों पर विभिन्न पर्वो, धार्मिक अनुष्ठानों, वर्त एवं अन्य उत्सवों में चित्रित किया जाता है। मंदना कला जो राजस्थान की धार्मिक लोककला के नाम से ज्यादा प्रसिद्ध है, देश के अन्य भागों में भी प्रचलित है। महाराष्ट्र तथा दक्षिण भारत में इसे रंगोली तथा कोलम एवं बिहार एवं बंगाल में इसे अल्पना या अरिपन के नाम से जाना जाता है।

मंदना की सज्जा ज्यादातर वैश्य गृहों में पाई जाती है। इसके बाद बाह्मणों में इसका प्रचलन है। अनेक वर्णों में भी इस कला को गृह सज्जा के लिए किया जाता है।
इसके आकृतियों (design) में क्षेत्रों के आधार पर विविधता है। परंतु इसके तत्व और आधार (theme : motif) चुनने की स्वतंत्रता महिलाओं को है तथा वे इसका चित्रांकन रुचि से करती है। चित्रांकन में विविधता न केवल क्षेत्रों पर बल्कि ॠतुओं पर भी आधारित है। मंदना की आकृतियां समान्यत: धार्मिक एवं सामाजिक उत्सवों पर की जाती है।
मंदना की आकृतियों को मुख्यत: दो भागों में विभक्त किया जा सकता है, एक जो पहाड़ी क्षेत्रों में बनाई जाती है तथा दुसरा जो समतल एवं ऊपजाऊ भूमि में की जाती है।
मंदना जो मंदन शब्द से लिया गया है का अर्थ सज्जा है। मंदना एक सज्जा है जो कच्छे फर्श पर चित्रित किया जाता है। राजस्थान में चित्रण के लिए सतह, कच्ची सतह को गोवर तथा मिट्टी से लेपा जाता है।
मंदना को विभिन्न पर्वों, मुख्य उत्सवों तथा ॠतुओं के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है। इसे आकृतियों के विभिन्न आकार के आधार पर भी बाँटा जा सकता है। उदाहरण-स्वरुप चौका, चतुर्भुज मंदना की आकृति है जिसका एक प्रमुख समृद्धि के (Propitious) उत्सवों में विशेष महत्व है जबकि त्रिभुज, वृत्त एवं स्वास्तिक लगभग सभी पर्वों या उत्सवों में बनाए जाते है। कुछ आकृतियों में आनेवाले पर्व का निरुपण एवं उस दौरान पड़ने वाले पर्वों को भी बनाया जाता है।
मंदना की पारंपरिक आकृतियों में ज्यामितिय एवं पुष्प आकृतियों को लिया गया है। इन आकृतियों में त्रिभुज, चतुर्भुज, वृत्त, स्वास्तिक, शतरंज पट का आधार, कई सीधी रेखाएँ, तरंग की आकृति आदि मुख्य है। इनमें से कुछ आकृतियां हड़प्पा की सभ्यता के काल में भी मिलती है। पुष्प आकृतियां ज्यादातर सामाजिक एवं धार्मिक विश्वास तथा जादू-टोना से जुड़ी हुई है जबकि ज्यामितिय आकृतियां ज्यादातर तंत्र-मंत्र एवं तांत्रिक रहस्य से जुड़ी है। ज्यामितिय आकृतियों मूलत: किसी मुख्य आकृति के चारों ओर बनाई जाती है। कुछ ज्यामितिय आकृतियां के रुप किसी देवी या देवता से जुड़े होते हैं जैसे कि षष्टकोण जो दो त्रिभुज के जोड़कर बनाया जाता है, देवी लक्ष्मी को चिन्हित करता है। मंदना की यह आकृति काफी प्रसिद्ध है तथा इसे विशेषत: दीपावली तथा सर्दियों में फसल कटाई के समय उत्सव में बनाया जाता है। इनके अलावा बहुत सारी आकृतियां किसी मुख्य आकृति के चारों ओर बनाई जाती है। ये आकृतियां सामाजिक एवं धार्मिक परंपरा पर आधारित होती है जिसमें वर्षों पुराने रीति-रिवाज तथा विभिन्न पर्वों में महिलाओं की दृष्टि को प्रदर्शित करती है। 
इन आकृतियों में से पागलया और भरण या भाखा महिलाओं के कलात्मक श्रेष्ठता का चित्रांकन करते है। पागलया मंदना का एक मुख्य एवं विस्तृत रुप हैं। पगलया की कई मुख्य आकृतियां या परिकल्पनाएं है जो सीधी एवं जटिल आकृतियां, पैर की संकेतात्मक मुद्रा का चित्रण आदि है। पगलया की ज्यादातर आकृतियां एवं रुप त्रिभुज, चतुर्भुज, आयत आदि के रुप में हैं। भरण अथवा भारवा को केन्द्रीय विचार या उद्देश्य मुख्य रेखाओं और आकृतियों के मध्य खाली जगह को भरना है। स्री कलाकारों के तीक्ष्ण कल्पना शक्ति एवं प्रयोगक्षमता के कारण ये मंदना की आकृतियां भव्य, सुंदर तथा उद्देश्य प्रतीत होती है।

मंदना/मांडणा बनाने की कला एवं तकनीक 
मंदना मुख्यत: खड़िया से निर्मित घोल से खीचीं जाती है। संपूर्ण आकृति इसी घोल से बनाई जाती है तथा इसमें कोई रंग या रंजक का प्रयोग नही होता है। सिर्फ केन्द्रीय भाग को उज्जवलतम अंकन के लिए लाल (haemalite) गेरु रंग प्रयुक्त होता है। राजस्थान में सफेद तथा लाल रंगों का प्रयोग गोवर के साथ होता है। धरातल का रंग तीन पर्वों के अनुसार बनाया जाता है। सर्दियों के लिए लाल, गीष्मकाल में भूरे रंग तथा वर्षा ॠतु में हरे सतह का निर्माण किया जाता है। इन निर्मित सतहों पर महिलाएँ खड़िया घोल की सहायता से मंदना की आकृति बनाती है। मंदना बनाने की परंपरा देश के अन्य हिस्सों में भी लगभग इसी तरह है। कुछ बदलाव के रुप में सूखे रंगों का प्रयोग पश्चिम बंगाल में होता है तथा कई तरह के रंजक महाराष्ट्र एवम गुजरात में इसे बनाने के लिए प्रयोग की जाती है।
खड़िया घोल का प्रयोग मंदना आकृतिओं के लिए राजस्थान में किया जाता है। बिहार तथा बंगाल में खड़िया के अलावा चावल के चूर्ण का भी प्रयोग होता है। कई उत्सवों में सूखे तथा गीले रंगों का प्रयोग इन आकृतियों के निरुपण में किया जाता है। प्राय: अल्पना की आकृतियां गीले रंगों से बनाई जाती है। ये रंग हरे पत्तों एवं फूलों से बनाए जाते है। परंतु कुछ अल्पनाओं को सूखे रंगों से भी बनाया जाता है। बंगाल की महिलाओं का विशेष गुण यह है कि वे अल्पना के रंगों को खुद बनाती है। महाराष्ट्र की रंगोली में, रंगोली ही रेखन का माध्यम है। ये रंगोली रंग सफेद रंजक है जो चकमक को आग में जलाने के बाद प्राप्त किए जाते है तथा इसे महीन बारीक बनाया जाता है।
आकृतियों को बनाने के समय महिलाएँ रंगों के चुनाव में विशेष ध्यान रखतीं है। जैसे पत्तियों की आकृतियों को हरे रंग से बनाया जाता है तथा हल्के रंगों से इसे संपूर्ण किया जाता है। इस कारण इसके सजीव चित्रण में सहायता मिलती है। गुजरात में महिलाएँ सफेद रंजक "कालोथी' का इस्तेमाल "साथिया' (रंगोली) बनाने में करती हैं।मंदना की आकृतियों को बनाने के लिए बहुत सारे वस्तुओं की आवश्यकता नही होती है। मंदना बनाने के लिए खड़िया के घोल, सूती कपड़ा तथा अंगुली के द्वारा बनाया जाता है। अच्छे सजीव चित्रांकन के लिए खजूर की लकड़ी की कूची इस्तेमाल की जाती है। राजस्थान की महिलाएँ इसे बनाने में बड़ी निपुण है तथा वे हाथों द्वारा ही ज्यामितिय तथा अन्य आकृतियां बना लेती है। अन्य राज्यों में भी मंदना की आकृतियां इसी तरह बनाई जाती है। मंदना के बनाने के लिए सर्वप्रथम मुख्य आकृति से इसकी शुरुआत कर की जाती है तथा चारों ओर का भाग बाद में बनाया जाता है।
गुजरात एवं महाराष्ट्र में इन आकृतियों को बनाने के लिए विभिन्न प्रकार के रंगों, आकृतियों का ढाँचा, कूची, कम्पास, स्केल आदि का इस्तेमाल होता है। यहां मंदना की सतह को नाप कर उसपर रंगोली की जाती है तथा इसे बड़ा या छोटा बनाया जाता है।
     

No comments:

Post a Comment