Tuesday, 16 August 2011

राजस्थान का बाल साहित्य : कल, आज और कल


शिव मृदुल


बालक आने वाले कल के नागरिक तथा राष्ट्र की अमूल्य धरोहर हैं। उन्हें सुसंस्कारित करने के लिए विश्व की प्रत्येक भाषा में बालसाहित्य का विपुल मात्रा में सृजन हुआ है। भारत में हिन्दी भाषा के विकास के साथ ही भारतेन्दु युग में बाल साहित्य का सृजन प्रारम्भ हो चुका था। इसके लिये संस्कृत वाङ्मय तथा विभिन्न प्रादेशिक भाषाओं में लिखे बालसाहित्य ने पृष्ठभूमि उपलब्ध कराई है। यों तो माँ की लोरी विश्व का सर्वोत्तम बालसाहित्य माना जाता है किन्तु अखिल भारतीय स्तर पर भारत के स्वर्णिम अतीत, पौराणिक आख्यानों के प्रेरण प्रसंग, ऐतिहासिक पात्रों के आदर्श चरित्र, पंचतंत्र की कहानियाँ, जातक कथाएँ, हितोपदेश, बैताल कथाएँ, सिंहासन बत्तीसी जैसी पुस्तकों ने हिन्दी बाल साहित्य की भावभूमि तैयार की है।

राजस्थान में लिखे गए हिन्दी बालसाहित्य पर काल तथा प्रवृत्तिमूलक दृष्टिकोण से एक विहंगम दृष्टि डालें तो गंगानगर से लेकर बाँसवाडा तक और जैसलमेर से लेकर हाडौती अँचल तक सैकडों रचनाकारों ने बाल साहित्य लिखा है और आज भी लिख रहे हैं। इनके बालसाहित्य लेखन में गीत, कविता, कहानी, एकांकी, नाटक, उपन्यास, डायरी, यात्रा वृत्तांत, आत्मकथा, जीवनी, खण्डकाव्य आदि जैसी लगभग सभी विधाएँ समेकित हैं। राजस्थान के हिन्दी बाल साहित्य की अब तक प्रकाश में आई सामग्री को कल, आज और कल की कसौटी पर परखें तो इसे पाँच भागों में विभक्त किया जा सकता है। 

१. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि : चालीस के दशक से पूर्व का बालसाहित्य २. प्रारम्भिक काल : चालीस का दशक ३. स्वातंत्राेत्तर काल का बालसाहित्य: आजादी से साठ का दशक ४. आधुनिक काल : साठोत्तरी युग का बालसाहित्य ५. भावी चुनौतियों का काल : इक्कीसवीं सदी का बालसाहित्य
१. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि : चालीस के दशक से पूर्व का बालसाहित्य
राजस्थान के हिन्दी बालसाहित्य की पृष्ठभूमि में पौराणिक आख्यानों के प्रेरक प्रसंग, राजस्थान का वात-साहित्य, यहाँ का गौरवशाली इतिहास तथा लोक कथाओं की महती भूमिका रही है जिसमें पडोसी राज्यों में लिखे गए साहित्य का बिम्ब भी दृष्टिगोचर होता है। इसके प्रत्येक कथ्य को यहाँ के जलवायु, वातावरण, धरातल और जन जीवन के ताने बाने में गूँथा गया है जिसमें लोक-संस्कृति की चमक और जीवन के विविध रंग हैं। इन कहानियाँ के प्रधान पात्र धीरोदात्त नायक नायिका हैं जिनमें अदम्य साहस और शौर्य के दर्शन होते हैं। वे उच्चकोटि के चारित्रिक आदर्श को निरूपित करते हैं। वे न्याय ओर नीति के पक्षधर तथा अन्याय के विरोधी हैं। सत्यवादिता, ईमानदारी और कर्त्तव्य परायणता उनकी रग-रग में रमी हुई है। वे मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर करने में अपना गौरव समझते हैं। वे बडों के प्रति सम्मान, आज्ञा, पालन, सहयोग, सौहार्द, विनम्रता, सदाचार जैसे शाश्वत मानव मूल्यों से विभूषित होने के साथ-साथ सत्यम् शिवम् सुन्दरम् के उपासक हैं। नैसर्गिक न्याय के रंग से सँवरा प्रत्येक कथानक बालक को सुनागरिक बनने की प्रेरणा देता है। राजस्थान के बालसाहित्य में जन साधारण के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधि पात्रों एवं वन्य प्राणियों को भी निरूपित किया गया है। राजस्थान के देश, काल और वातावरण की झलक के साथ गूँथे हुए प्रत्येक कथानक में यहाँ के नदी, पहाड, घाटी, खेत, रेत, धोरे, अकाल, सुख दुःख आदि प्रस्तुति को जीवन्त बना देते हैं। तीज-त्योहारों और उत्सवों के अवसर पर अपने हर्ष और विषाद् के क्षणों में ये प्रतिनिधि पात्र बालकों को सांसारिक जीवन-संघर्ष में होने वाले कटु सत्य से साक्षात्कार कराते हैं।
नायक नायिका के रूप में निरूपित परियाँ, पशु पक्षी, पुरुष, स्त्री आदि के जीवन में दैविक चमत्कार, भाग्यचक्र, सहृदय और क्रूर पात्र बालकों में कौतुहल, जिज्ञासा, कल्पना लोक में विचरण करने की क्षमता, सूझबूझ, आत्म विश्वास, अलौकिक शक्ति में आस्था भाव आदि उत्पन्न करते हैं। ये उनके सामान्य ज्ञान को तो समृद्ध करते ही हैं, उनको जीवन के यथार्थवादी दृष्टिकोण से भी परिचित करवाते हैं। इस दृष्टि से गद्य में विजयदान देथा की ’बातां री फुलवाडी‘ और पद्य में वाचिक परम्परा से आए ’गुडलिया और हीड‘ को रेखांकित किया जा सकता है। जन-जन के जीवन से जुडा ’इंदर राजा पाणी दो, पाणी दो गुड धाडी दो‘ जैसा बाल सुलभ चेष्टाओं पर आधारित गीत राजस्थान की धरती की देन है। यह यहाँ पर हजारों-हजारों वर्षों पहले बालकों के द्वारा गाया जाता था। यह मौलिक एवं प्रथम श्रेणी का गीत है। ’काले बादल पानी दे‘, ’बादल-बादल‘ पानी दे‘, ’काले मेघा पानी दे‘ जैसे गीतों को लिखने की प्रेरणा हिन्दी भाषा के लेखकों को राजस्थान की धरती ने ही दी है।
२. प्रारम्भिक काल : चालीस का दशक 
हिन्दी भाषा के विकास के साथ ही राजस्थान में भी विविध विधाओं में सृजन प्रारम्भ हो चुका था। अब तक प्रकाश में आई सामग्री के आधार पर राजस्थान में चालीस के दशक में हिन्दी बालसाहित्य लेखन का इतिहास प्रारम्भ होता है। इस युग में पूरे देश में स्वतन्त्रता आंदोलन अपने चरम पर था। चालीस के दशक में प्रताप, शिवाजी और १८५७ की क्रान्ति के इतिहास का गौरवगान, अंग्रेजी सत्ता के शोषण से मुक्ति, स्थानीय वीरों की महिमा, आजादी के प्रति ललक, स्वराज की कल्पना, देशप्रेम, मातृभूमि के प्रति समर्पण की भावना तथा शाश्वत जीवनमूल्य बालसाहित्य के प्रधान विषय रहे हैं। इस युग में चारण कवियों तथा स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों ने सरल भाषा में छोटे-छोटे गीत लिखकर आजादी के आन्दोलन को तीव्रता प्रदान की। इस युग में राजस्थान में पद्य विशेष रूप से लिखा गया किन्तु प्रकाशन की सुविधा उन दिनों राजस्थान में उपलब्ध नहीं थी।
प्रकाशित सामग्री के आधार पर ज्ञात होता है कि श्री शम्भू दयाल सक्सेना राजस्थान के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने हिन्दी में बालसाहित्य लिखा और उनकी पुस्तकें सर्व प्रथम प्रकाश में आईं। इनके अतिरिक्त श्री दौलत सिंह लोढा ’अरविन्द‘ की ’बुद्धि के लाल‘ १९४२ ई. में प्रकाशित हुई थी। इसमें सामाजिक परिवेश पर आधारित सात बाल कहानियाँ हैं जो बालकों में तर्कशक्ति और बुद्धि कौशल का विकास करती हैं। श्री ’अरविन्द‘ के लिखे तीन बाल एकांकी ’सट्टे के खिलाडी‘ तथ एक नाटक ’चतुर चोर‘ बाद में इसी दशक में प्रकाशित हुए। इस दृष्टि से श्री शम्भू दयाल सक्सेना तथा दौलत सिंह लोढा ’अरविन्द‘ राजस्थान में हिन्दी बालसाहित्य लेखन के पुरोधा कहे जा सकते हैं।
चालीस के दशक में ही विद्या भवन उदयपुर ने ’बालहित‘ नामक एक पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ किया गया था। इसके अंकों में बालकों को सुसंस्कारित करने तथा उनके व्यक्तित्व में निखार लाने सम्बन्धी रचनाएँ प्रकाशित की जाती थीं। सम्भवतया यह राजस्थान में बालसाहित्य की प्रथम पत्रिका रही है। इसके पश्चात ’वानर‘ पत्रिका भी प्रकाशित हुई किन्तु ये दोनों पत्रिकाएँ बाद में बन्द हो गईं।

३. स्वातंन्नाोत्तर काल का बालसाहित्य: साठ तक के दशक का युग 

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् राजस्थान में कई लोगों ने बालसाहित्य लिखना प्रारम्भ कर दिया था। इस युग में गद्य तथा पद्य विपुल मात्रा में लिखा गया किन्तु उनका प्रकाशन फुटकर रचनाओं के रूप में स्थानीय समाचार पत्रों तक ही सीमित रहा। इनमें महापुरुषों के यशोगान तथा देशप्रेम की भावना के अतिरिक्त बालकों के प्रिय विषय परियाँ, पशु-पक्षी, वर्षा, आँधी, ऋतुएँ, फूल, बगीचे, खिलौने, मिठाई जैसे विषय प्रधान रहे। रसगुल्ले, रेवडी, हलवा, लड्डू जैसे विषयों पर कविताएँ लिखी गईं।

रेवडी वाला बडा निराला, रोज सवेरे आता है। 
मीठी-मीठी, ताजी-ताजी, द्वार-द्वार चिल्लाता है।। 
इसके साथ ही मीठी बोली, सद्गुणों का विकास, राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान, महँगे मोल मिली आजादी की रक्षा, राष्ट्रीय पर्व, नव निर्माण, श्रमनिष्ठा कर्त्तव्यबोध, सुखी और सुन्दर भारत की रचना आदि बाल साहित्य के विषय बन गए। ’आराम हराम है‘ की भावना को निरूपित करते गीत, कविता, कहानी और एकांकी राजस्थान की धरती पर लिखे गए। उस समय तक लेखकों की रचनाएँ पुस्तकाकार रूप में कम ही प्रकाशित हो पाई थीं।
जिस प्रकार अखिल भारतीय स्तर पर हिन्दी भाषा में सर्व श्री मैथिलीशरण गुप्त, रामधारी सिंह ’दिनकर‘ हरिवंशराय बच्चन, गोपालदास ’नीरज‘ जैसे समर्थ रचनाकारों ने बालकों के लिए रचनाएँ लिखी हैं, राजस्थान में भी श्री ज्ञान भारिल्ल, घनश्याम शलभ, डॉ. प्रकाश आतुर तथा श्री नन्द चतुर्वेदी जैसे समर्थ रचनाकारों ने अपने लेखन के प्रारम्भिक काल में बालकों के लिए रचनाएँ लिखी हैं किन्तु उनको बालसाहित्यकारों की श्रेणी में रखना क्या उचित होगा ? यह एक सोचने का विषय है।
श्री शम्भूदयाल सक्सेना तथा दौलत सिंह लोढा ’अरविंद‘ की पुस्तकों के प्रकाशन के पश्चात् साठ के दशक तक प्रकाशित पुस्तकों में हिन्दी तथा राजस्थानी भाषा में लिखी रानी लक्ष्मी कुमारी चूण्डावत की ’लोक कथाएँ, हुँकारो दो सा‘, ’मांझल रात‘, ’टाबरां री बातां‘ तथा ’शाबास म्हारी जूं‘ पुस्तकें बालसाहित्य की दृष्टि से उल्लेखनीय हैं। इन पुस्तकों का कथ्य बालकों में साहस, धैर्य, देशप्रेम, संस्कृति के प्रति जुडाव, सूझबूझ तथा वीरोचित गुणों का विकास करता है।
इसी साठ के दशक में हुए चीन तथा पाकिस्तान के आक्रमण की राष्ट्रीय स्तर की तथा चंद्रमा की खोज सम्बन्धी अंतरराष्ट्रीय स्तर की घटनाओं ने बालसाहित्य लेखन को नये आयाम दिए। राजस्थान में भी ’माँ मुझको बन्दूक दिला दे, मैं भी लडने जाऊँगा,‘ जैसी रचनाओं ने एक बार फिर देशप्रेम तथा मातृभूमि के प्रति समर्पण का शंखनाद किया। इसके अतिरिक्त ’चन्दा के घर जाना है‘ जैसी रचनाएँ लिखी जाने लगीं। विज्ञान तथा अन्तरिक्ष संबंधी खोज बालसाहित्य के विषय बन गए जिनका विकास साठोत्तरी युग में स्पष्ट दिखाई देता है। ऐसी अवधारणाओं पर आधारित पाठ राजस्थान में प्राथमिक और माध्यमिक स्तर की पाठ्य पुस्तकों में भी सम्मिलित किए गए। बालकों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने की दृष्टि से भी राजस्थान एक अग्रणी प्रांत रहा है। जयपुर से प्रकाशित होने वाली ’विज्ञान प्रगति‘ नामक पत्रिका इस तथ्य का प्रमाण है।

४. आधुनिक काल : साठोत्तरी युग 
लोक कल्याणकारी राज्य की संकल्पना, पंचवर्षीय योजनाओं में हुए विकास कार्य, बाँध, नहर और सडकों के निर्माण, शिक्षा और चिकित्सा की सुविधाओं के विस्तार, विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हुई प्रगति ने हरित एवं श्वेत क्रान्ति से देश के जन जीवन को हरियाली और खुशहाली से रूबरू करवाया है किन्तु देश में हुए आशातीत विकास के समानान्तर जनसंख्या की गुणोत्तर वृद्धि आगे निकल गई। जंगल कटने लगे। वर्षा का औसत गडबडा गया। नदी एवं जलाशय सूखने लगे। पर्यावरण प्रदूषित हो गया। अतः इन सबने मिलकर बालसाहित्य के लिए एक नवीन एवं विस्तृत भावभूमि उपलब्ध करवा दी। वैज्ञानिक उपकरण एवं अवधारणाएँ, यातायात के विभिन्न साधन, बिजली, कल कारखाने, बहुउद्देशीय योजनाएँ, बाँध, नहर, हरियाली, उन्नत खाद बीज, कृषि उपकरण, राजस्थान नहर, किसान की समृद्धि आदि के साथ विकासमान राजस्थान का चित्र रचनाओं में उभरा तथा शहर की तरफ आकर्षण, छोटे परिवार की अवधारणा और पर्यावरण संचेतना पर आधारित कहानियाँ, कविताएँ, गीत एवं एकांकी विपुल मात्रा में लिखे गए। ’सोमू की सैर उडनतश्तरी से‘ तथा ’शुक्र लोक की राजकुमारी‘ जैसी पुस्तकें राजस्थान में लिखी गईं। इसी काल में बाल साहित्य में चित्रकथा की एक नई विधा भी विकसित हुई। इस दृष्टि से श्री अनन्त कुशवाहा का नाम यहाँ अंकित करना समीचीन होगा।
राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर हुए बहुआयामी विकास के कारण हुए ज्ञान के विस्तार ने बालकों के बस्ते का बोझ बढा दिया। शिक्षाशास्त्री तक बस्ते के इस बढते हुए बोझ से काँप उठे। यशपाल समिति ने चिन्ता प्रकट करते हुए बस्ते के बोझ को कम करने की सिफारिश की। अतः शिक्षा के क्षेत्र में उत्पन्न हुई इस नवीन समस्या पर ’बस्ता हल्का कर दो राम, मेरे भारी भरकम बस्ते, नन्ही सी है जान हमारी, पर है मेरा बस्ता भारी,‘ जैसी रचनाएँ देश में सर्व प्रथम राजस्थान के बाल रचनाकारों ने लिखी है। उसके पश्चात् देश के कई रचनाकारों ने बस्ते के बोझ को अपने लेखन का विषय बनाया है। इस तथ्य का उल्लेख बालसाहित्य के शोधार्थियों ने भी अपने शोधग्रंथों में किया है।
आज ऐसा अनुभव किया जा रहा है कि अभिभावकों की महत्त्वाकांक्षा बालकों से बचपन छीन रही है। वे कम उम्र में बालकों की पीठ पर भारी बस्ता लाद रहे हैं। वे उन्हें बचपन में ही प्रौढ बना देना चाहते हैं। इससे उनका मानसिक विकास भले ही हो जाए किन्तु शारीरिक विकास अवश्य ही अवरुद्ध हो गया है। विद्यालय की पढाई, गृहकार्य और व्यक्तिगत शिक्षण की व्यस्तता बालकों के खेलने के समय को निगल गई है। घडी की घूमती सुइयों तथा स्कूल की बसों के हॉर्न के भय से बालक यंत्रवत् भागते हैं। दूध, नाश्ते और भोजन के स्वाद का आनन्द लेने के लिए उन्हें फुर्सत ही नहीं है। उनके मासूम चेहरों की मुस्कान छिन गई है। उन्हें खिलौनों की ओर झाँकने तक का समय नहीं है। लगता है वे कहना चाहते हों - हम कच्ची उम्र के बाल हैं। हम खेलना चाहते हैं। हमारा बचपन मत छीनो। हमारे पर बस्ते का बोझ मत लादो। टी. वी. पर प्रसारित होने वाली कार्टून फिल्मों ने तो स्थिति को और भी बद से बदतर बना दिया है। बालक टी.वी. के सामने से उठना ही नहीं चाहते हैं। अभिभावक भी इस समस्या से चिन्तित हैं किन्तु उन्हें इस ओर सोचने का समय कहाँ ?
एक बार एक महानगर के सर्वाधिक प्रतिष्ठित पब्लिक स्कूल के नन्हे बालकों से एक साक्षात्कार में पूछा गया कि आप क्या चाहते हैं ? उन्होंने उत्तर दिया - ’’हम ऐसे अभिभावक चाहते हैं जो हमारे बचपन को बचपन रहने दें। हमारे पर बस्ते का बोझ नहीं लादें। वे हमें खुली हवा में खेलने दें।‘‘ ऐसे विकट दृश्य बाल रचनाकारों के समक्ष एक नई चुनौती उत्पन्न करते हैं।
अखिल भारतीय स्तर पर राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद्, नई दिल्ली ने तो इस विकट समस्या को उठाया ही है किन्तु राजस्थान राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान, उदयपुर ने भी अपनी संगोष्ठियों में ऐसा बालसाहित्य तैयार करवाया है। संस्थान के इस प्रयास में राजस्थान से जो रचनाएँ उभर कर आई हैं, उनका उल्लेख भी यहाँ आवश्यक है -

उम्र खेलने जाने की। 
दूध, दही, घी खाने की।। 
खाया हुआ पचाने दो। 
हमें खेलने जाने दो।। 
हम भी पढने जाएँगे। 
पढकर नाम कमाएँगे।। 
हमें बडा तो होने दो। 
हमको खेल खिलौने दो।। 
बाल साहित्यकारों को इस दिशा में बहुत अधिक सोचने की आवश्यकता है। यह बहुत ही चुनौतीपूर्ण कार्य है।
५. भावी चुनौतियों का काल : इक्कीसवीं सदी का बालसाहित्य 
बस्ते के बढते बोझ, जनसंख्या वृद्धि, प्रदूषित पर्यावरण तथा कार्टून फिल्मों पर दीवानें बालकों के टी.वी. से चिपक कर रहने की चुनौतियों के साथ सम्पूर्ण देश की भाँति राजस्थान के बालसाहित्यकारों ने भी इक्कीसवीं शताब्दी में प्रवेश किया है। कम्प्यूटर, इन्टरनेट, मोबाईल, ई-मेल, फेक्स आदि आज जन साधारण की अनिवार्य आवश्यकताओं की श्रेणी में आँके जाने लगे हैं। वैश्वीकरण के युगबोध ने किशोर प्रतिभाओं के मन में विदेशों में पलायन का आकर्षण पैदा कर दिया है। हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली, सामाजिक व्यवस्था तथा अभिभावकों की महत्त्वाकांक्षाओं को देखते हुए बालक यह अनुभव कर रहे हैं कि दिन में २४ घण्टे का समय उनके लिए कम है। वे नींद में उछल पडते हैं। सजधज और उत्कृष्ट सामग्री के साथ प्रकाशित होने वाली बालवाटिका, बालहंस, बच्चों का देश, टाबर टोली, बाल भास्कर, छोटू मोटू जैसी पत्रिकाओं को पढने के लिए बालकों के पास समय नहीं है। सामग्री को और अधिक आकर्षक तथा रोचक ढंग से प्रस्तुत किए जाने की आवश्यकता है। लेखन के क्षेत्र में बाल मन की उडान तथा बाल मनोविज्ञान के अनुरूप कहानी, कविता, गीत, एकांकी, नाटक, प्रहसन, उपन्यास, खंडकाव्य आदि लिखे जाने की आवश्यकता है।
हमारे लिए ये चुनौतियाँ कम नहीं हैं। रास्ते में रोडे तो आएँगे ही किन्तु हम दायित्व से क्यों मुकरें ? सकारात्मक सोच के साथ सृजन करते रहें। बालकों का स्वस्थ मनोरंजन हो, उनका बचपन उल्लास और उमंगों के साथ बीते तथा वे सुनागरिक बनें। तभी हम अपने दायित्व का निर्वहन कर पाएँगे।
वैसे राजस्थान के बाल साहित्यकारों का भविष्य उज्ज्वल है। यों तो राजस्थान के कई समर्थ, वरिष्ठ और प्रतिष्ठित लेखकों ने भी बाल साहित्य लिखा है किन्तु अखिल भारतीय स्तर पर राजस्थान के बाल साहित्यकारों की अपनी पहचान है। वे बाल मनोविज्ञान के मर्मज्ञ तथा बाल चेष्टाओं के कुशल चितेरे हैं। सीताराम गुप्त, रामगोपाल राही, रामनिरंजन शर्मा ’ठिमाऊ‘, भगवतीलाल व्यास, बालक मन की उलझन, चंचलता और उल्लास की अभिव्यक्ति के क्षेत्र में अरनी रॉबर्ट्स; ऐतिहासिक कहानियाँ के क्षेत्र में यादवेंद्र शर्मा चंद्र, डॉ. राजेन्द्र मोहन भटनागर व श्याम मनोहर व्यास तथा विज्ञान कथाओं के क्षेत्र में विष्णु प्रसाद चतुर्वेदी, पाली, मदन वैष्णव, प्रतापगढ, विमला भंडारी, सलूम्बर व प्रह्लाद दुबे, कोटा के नाम अग्रणी हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि अन्य रचनाकार उनसे पीछे हैं।
राजस्थान में बाल साहित्य के उन्नयन हेतु किए जा रहे प्रयास में राजस्थान राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान, उदयपुर के शिशु शिक्षा प्रकोष्ठ ने लगभग ४० पुस्तकें प्रकाशित की हैं। जिनमें शिशु से संज्ञानात्मक, सामाजिक, संवेगात्मक एवं स्वस्थ मानसिक विकास की सोद्देश्य अवधारणाओं पर प्रशंसनीय सामग्री है। इस संस्थान ने भ्रूण हत्या विरोधी एक फिल्म का निर्माण भी किया है जो शिव मृदुल की पुस्तक ’लडकी‘ पर आधारित है। शिक्षा विभाग बीकानेर प्रति वर्ष शिक्षक दिवस पर बाल साहत्य की पुस्तकें प्रकाशित करता है। तथा राज्य संदर्भ केन्द्र, जयपुर भी कई वर्षों से रोचक सामग्री अनवरत प्रकाशित कर रहा है। महाराणा मेवाड फाउण्डेशन, उदयपुर तथा बाल चेतना संस्था, जयपुर द्वारा प्रति वर्ष बाल रचनाकारों को सम्मानित किया जा रहा है। बालवाटिका, भीलवाडा के वार्षिक समारोह में सार्थक चर्चा गोष्ठियों के साथ राष्ट्रीय एवं प्रांतीय स्तर पर बाल साहित्यकारों के सम्मान पर शोधकार्य भी हो रहा है।
राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर ने १९६७ तथा १९८० में दो बार बालसाहित्य पर विशेषांक निकाले हैं। यह प्रतिवर्ष पाण्डुलिपि प्रकाशन सहयोग के अतिरिक्त बालसाहित्य पर श्री शम्भूदयाल सक्सेना पुरस्कार प्रदान कर रही है किंतु यह पर्याप्त नहीं है। मेरा विन्रम निवेदन यह है कि बाल साहित्य पर अन्य राज्यों की भाँति एक पत्रिका का प्रकाशन राजस्थान में भी करने का प्रस्ताव संचालिका द्वारा पारित किए जाने की आवश्यकता है। इससे राजस्थान के बालसाहित्य तथा बाल रचनाकारों का आने वाला कल समृद्ध हो सकेगा।

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