Saturday, 27 August 2011

मंदना/मांडणा - राजस्थान की एक लोककला

राहुल तोन्गारिया
परिचय 
मंदना/मांडणा राजस्थान की ग्रामीण महिलाओं की एक परंपरिक कलात्मक क्षमता तथा मौलिक सोच का परिचायक है। इसके अध्ययन से इसके विभिन्न पहलू हैं जैसे लोगों के जीवन की कलात्मक पहलू, परंपरा, धार्मिक विश्वास तथा परंपरिक इतिहास पर प्रकाश पड़ता है। मंदना मूलत: एक कला है जो औरते बनाती हैं। इसे फर्श या जमीन पर और दीवारों पर विभिन्न पर्वो, धार्मिक अनुष्ठानों, वर्त एवं अन्य उत्सवों में चित्रित किया जाता है। मंदना कला जो राजस्थान की धार्मिक लोककला के नाम से ज्यादा प्रसिद्ध है, देश के अन्य भागों में भी प्रचलित है। महाराष्ट्र तथा दक्षिण भारत में इसे रंगोली तथा कोलम एवं बिहार एवं बंगाल में इसे अल्पना या अरिपन के नाम से जाना जाता है।

मंदना की सज्जा ज्यादातर वैश्य गृहों में पाई जाती है। इसके बाद बाह्मणों में इसका प्रचलन है। अनेक वर्णों में भी इस कला को गृह सज्जा के लिए किया जाता है।
इसके आकृतियों (design) में क्षेत्रों के आधार पर विविधता है। परंतु इसके तत्व और आधार (theme : motif) चुनने की स्वतंत्रता महिलाओं को है तथा वे इसका चित्रांकन रुचि से करती है। चित्रांकन में विविधता न केवल क्षेत्रों पर बल्कि ॠतुओं पर भी आधारित है। मंदना की आकृतियां समान्यत: धार्मिक एवं सामाजिक उत्सवों पर की जाती है।
मंदना की आकृतियों को मुख्यत: दो भागों में विभक्त किया जा सकता है, एक जो पहाड़ी क्षेत्रों में बनाई जाती है तथा दुसरा जो समतल एवं ऊपजाऊ भूमि में की जाती है।
मंदना जो मंदन शब्द से लिया गया है का अर्थ सज्जा है। मंदना एक सज्जा है जो कच्छे फर्श पर चित्रित किया जाता है। राजस्थान में चित्रण के लिए सतह, कच्ची सतह को गोवर तथा मिट्टी से लेपा जाता है।
मंदना को विभिन्न पर्वों, मुख्य उत्सवों तथा ॠतुओं के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है। इसे आकृतियों के विभिन्न आकार के आधार पर भी बाँटा जा सकता है। उदाहरण-स्वरुप चौका, चतुर्भुज मंदना की आकृति है जिसका एक प्रमुख समृद्धि के (Propitious) उत्सवों में विशेष महत्व है जबकि त्रिभुज, वृत्त एवं स्वास्तिक लगभग सभी पर्वों या उत्सवों में बनाए जाते है। कुछ आकृतियों में आनेवाले पर्व का निरुपण एवं उस दौरान पड़ने वाले पर्वों को भी बनाया जाता है।
मंदना की पारंपरिक आकृतियों में ज्यामितिय एवं पुष्प आकृतियों को लिया गया है। इन आकृतियों में त्रिभुज, चतुर्भुज, वृत्त, स्वास्तिक, शतरंज पट का आधार, कई सीधी रेखाएँ, तरंग की आकृति आदि मुख्य है। इनमें से कुछ आकृतियां हड़प्पा की सभ्यता के काल में भी मिलती है। पुष्प आकृतियां ज्यादातर सामाजिक एवं धार्मिक विश्वास तथा जादू-टोना से जुड़ी हुई है जबकि ज्यामितिय आकृतियां ज्यादातर तंत्र-मंत्र एवं तांत्रिक रहस्य से जुड़ी है। ज्यामितिय आकृतियों मूलत: किसी मुख्य आकृति के चारों ओर बनाई जाती है। कुछ ज्यामितिय आकृतियां के रुप किसी देवी या देवता से जुड़े होते हैं जैसे कि षष्टकोण जो दो त्रिभुज के जोड़कर बनाया जाता है, देवी लक्ष्मी को चिन्हित करता है। मंदना की यह आकृति काफी प्रसिद्ध है तथा इसे विशेषत: दीपावली तथा सर्दियों में फसल कटाई के समय उत्सव में बनाया जाता है। इनके अलावा बहुत सारी आकृतियां किसी मुख्य आकृति के चारों ओर बनाई जाती है। ये आकृतियां सामाजिक एवं धार्मिक परंपरा पर आधारित होती है जिसमें वर्षों पुराने रीति-रिवाज तथा विभिन्न पर्वों में महिलाओं की दृष्टि को प्रदर्शित करती है। 
इन आकृतियों में से पागलया और भरण या भाखा महिलाओं के कलात्मक श्रेष्ठता का चित्रांकन करते है। पागलया मंदना का एक मुख्य एवं विस्तृत रुप हैं। पगलया की कई मुख्य आकृतियां या परिकल्पनाएं है जो सीधी एवं जटिल आकृतियां, पैर की संकेतात्मक मुद्रा का चित्रण आदि है। पगलया की ज्यादातर आकृतियां एवं रुप त्रिभुज, चतुर्भुज, आयत आदि के रुप में हैं। भरण अथवा भारवा को केन्द्रीय विचार या उद्देश्य मुख्य रेखाओं और आकृतियों के मध्य खाली जगह को भरना है। स्री कलाकारों के तीक्ष्ण कल्पना शक्ति एवं प्रयोगक्षमता के कारण ये मंदना की आकृतियां भव्य, सुंदर तथा उद्देश्य प्रतीत होती है।

मंदना/मांडणा बनाने की कला एवं तकनीक 
मंदना मुख्यत: खड़िया से निर्मित घोल से खीचीं जाती है। संपूर्ण आकृति इसी घोल से बनाई जाती है तथा इसमें कोई रंग या रंजक का प्रयोग नही होता है। सिर्फ केन्द्रीय भाग को उज्जवलतम अंकन के लिए लाल (haemalite) गेरु रंग प्रयुक्त होता है। राजस्थान में सफेद तथा लाल रंगों का प्रयोग गोवर के साथ होता है। धरातल का रंग तीन पर्वों के अनुसार बनाया जाता है। सर्दियों के लिए लाल, गीष्मकाल में भूरे रंग तथा वर्षा ॠतु में हरे सतह का निर्माण किया जाता है। इन निर्मित सतहों पर महिलाएँ खड़िया घोल की सहायता से मंदना की आकृति बनाती है। मंदना बनाने की परंपरा देश के अन्य हिस्सों में भी लगभग इसी तरह है। कुछ बदलाव के रुप में सूखे रंगों का प्रयोग पश्चिम बंगाल में होता है तथा कई तरह के रंजक महाराष्ट्र एवम गुजरात में इसे बनाने के लिए प्रयोग की जाती है।
खड़िया घोल का प्रयोग मंदना आकृतिओं के लिए राजस्थान में किया जाता है। बिहार तथा बंगाल में खड़िया के अलावा चावल के चूर्ण का भी प्रयोग होता है। कई उत्सवों में सूखे तथा गीले रंगों का प्रयोग इन आकृतियों के निरुपण में किया जाता है। प्राय: अल्पना की आकृतियां गीले रंगों से बनाई जाती है। ये रंग हरे पत्तों एवं फूलों से बनाए जाते है। परंतु कुछ अल्पनाओं को सूखे रंगों से भी बनाया जाता है। बंगाल की महिलाओं का विशेष गुण यह है कि वे अल्पना के रंगों को खुद बनाती है। महाराष्ट्र की रंगोली में, रंगोली ही रेखन का माध्यम है। ये रंगोली रंग सफेद रंजक है जो चकमक को आग में जलाने के बाद प्राप्त किए जाते है तथा इसे महीन बारीक बनाया जाता है।
आकृतियों को बनाने के समय महिलाएँ रंगों के चुनाव में विशेष ध्यान रखतीं है। जैसे पत्तियों की आकृतियों को हरे रंग से बनाया जाता है तथा हल्के रंगों से इसे संपूर्ण किया जाता है। इस कारण इसके सजीव चित्रण में सहायता मिलती है। गुजरात में महिलाएँ सफेद रंजक "कालोथी' का इस्तेमाल "साथिया' (रंगोली) बनाने में करती हैं।मंदना की आकृतियों को बनाने के लिए बहुत सारे वस्तुओं की आवश्यकता नही होती है। मंदना बनाने के लिए खड़िया के घोल, सूती कपड़ा तथा अंगुली के द्वारा बनाया जाता है। अच्छे सजीव चित्रांकन के लिए खजूर की लकड़ी की कूची इस्तेमाल की जाती है। राजस्थान की महिलाएँ इसे बनाने में बड़ी निपुण है तथा वे हाथों द्वारा ही ज्यामितिय तथा अन्य आकृतियां बना लेती है। अन्य राज्यों में भी मंदना की आकृतियां इसी तरह बनाई जाती है। मंदना के बनाने के लिए सर्वप्रथम मुख्य आकृति से इसकी शुरुआत कर की जाती है तथा चारों ओर का भाग बाद में बनाया जाता है।
गुजरात एवं महाराष्ट्र में इन आकृतियों को बनाने के लिए विभिन्न प्रकार के रंगों, आकृतियों का ढाँचा, कूची, कम्पास, स्केल आदि का इस्तेमाल होता है। यहां मंदना की सतह को नाप कर उसपर रंगोली की जाती है तथा इसे बड़ा या छोटा बनाया जाता है।
     

राजस्थान में धार्मिक जागृति के कारण : राजस्थान में धार्मिक आन्दोलन का आशय

राहुल तोन्गारिया
राजस्थान में मुसलमान आक्रमणों से पूर्व हिन्दू धर्म व जैन धर्म निर्विध्न रुप से पल्लवित हो रहे थे। मुसलमान आक्रमण के समय हिन्दू धर्म का विभाजन कई सम्प्रदायों में हो गया था। शैवमत के अनुयायी राजस्थान में पर्याप्त संख्या में थे। वे शिव की विभिन्न रुपों में पूजा करते थे। शैव धर्म के अन्य अंग थे -- लकुलीश एवं नाथ सम्प्रदाय। शिव पूजा के साथ - साथ यहाँ शक्ति की उपासना भी की जाती थी। राजपूत युद्ध प्रेमी थे। अत: उनके शासकों ने तो शक्ति (दैवी) को अपनी आराध्य या कुलदेवी के रुप में स्वीकार कर लिया था और उसकी आराधना राजस्थान में कई रुपों में की जाती थी। उदाहरणस्वरुप, बीकानेर में करणी माता, जोधपुर में नागणेची, मेवाड़ में बाण माता तथा जयपुर में अन्नपूर्णा आदि की कुल देवियों के रुप में पूजा की जाती है।

जैसलमेर के क्षेत्र में शक्ति की उपासना व्यापक रुप से होती है। वैष्णव धर्म भी राजस्थान में पर्याप्त रुप में प्रचलित था। यहाँ के नरेश भी वैष्णव धर्म के अनुयायी थे। उन्होंने इस धर्म को जनसाधारण में लोकप्रिय बनाया राम की पूजा वैष्णव धर्म के अंग मात्र थी। आलोच्यकालीन मेवाड़ के राजपत्रों एवं ताम्रपत्रों पर 'श्री रामोजयति 'एवं 'रामापंण' शब्दों का उल्लेख मिलता है। बांसवाड़ा एवं जयपुर राज्य के राजपत्रों पर 'श्री रामजी 'तथा 'श्री सीता रामजी' शब्दों का प्रयोग किया गया है। जयपुर के महाराजा विजयसिंह ने अपने समय में वल्लभ सम्प्रदाय को अधिक प्रोत्साहन दिया। यद्यपि राजस्थान का कोई भी शासक जैन धर्म को अनुयायी नहीं था, तथापि यह धर्म भी यहाँ पल्लवित होता रहा। इसका कारण जैनियों का राजपूत शासकों के यहाँ पर उच्च पदों पर आसीन होना था। इसलिए जैसलमेर, नाडौल, आमेर, रणकपुर एवं आबू आदि स्थानों पर काफी संख्या में जैन मंदिरों की निर्माण हुआ।
इसके अतिरिक्त हिन्दू धर्म भी अनेक सम्प्रदायों में विभक्त था। वे अपने - अपने इष्ट देवताओं की पूजा करते थे। राजस्थान के विभिन्न स्थानों पर पंचायतन देवालय प्राप्त हुए हैं, इस बात की पुष्टि करते हैं।
इन विभिन्न सम्प्रदायों में धर्म के नाम पर कोई विवाद नहीं होता, परन्तु मुसलमानों के राजस्थान में प्रवेश करते ही यहाँ के धार्मिक वातावरण में हलचल मच गई। मुसलमानों ने अजमेर को अपना केन्द्र बनाया और उसके बाद राजस्थान के अन्य भागों में फैलना शुरु कर दिया। उन्होंने हिन्दू मंदिरों को गिरा दिया और हिन्दुओं को बलपूर्वक इस्लाम स्वीकार करवाया। मंदिरों में प्रतिष्ठित मूर्तियों को खण्डित कर हिन्दुओं की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाई। इस प्रकार के संक्रमण काल में राजस्थान में भी कई सन्तों का आविर्भाव हुआ। उन्होंने अपने धार्मिक विचारों के माध्यम से हिन्दू और मुसलमानों में समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया। रुढिवादी विचारों के स्थान पर उन्होंने हृदय की शुद्धि व ईश्वर की भक्ति पर अधिक बल दिया। उन्होंने सगुण तथा निर्गुण भक्ति में समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया। धार्मिक क्षेत्र में इस प्रकार के परिवर्तनों के समावेश को धार्मिक आन्दोलन की संज्ञा दी जाती है।
उत्तर भारत में इस आन्दोलन का श्रेय रामानंद को एवं दक्षिण भारत में रामानुज को दिया जाता है। कबीर, चैतन्य तथा नानक रामानंद के सहयोगी माने जाते हैं। राजस्थान में भी सन्तों ने ही इस आन्दोलन को प्रारम्भ करने का प्रयास किया। पाँच सन्तों - पाबू जी राठौड़, रामदेव जी तंवर, हड़बूजी सांखला, मेहाजी मांगलिया और गोगाजी चौहान ने इस आन्दोलन को प्रबल बनाने का प्रयास किया। इनके अतिरिक्त अन्य सन्तों में मीरा, दादू, चरणदास एवं रामचरण आदि के नाम विशेष रुप से उल्लेखनीय हैं।    

राजस्थान में धार्मिक आन्दोलन के कारण

 राहुल तोन्गारिया
भक्ति आन्दोलन की प्रबलता
मध्यकालीन भारत की सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना भक्ति आन्दोलन का प्रबल होना था। कुछ विद्वानों का मानना है कि भक्ति आन्दोलन इस्लाम की देन था, किन्तु दकिंक्षण भारत में यह आन्दोलन छठी शताब्दी से नवीं शताब्दी के बीच प्रारम्भ हो गया था। भक्ति का प्रारम्भ ही दक्षिण भारत से माना जाता है, और यहाँ के आलावार सन्तों ने इस आन्दोलन को प्रारम्भ किया था। बाद में रामानुज ने इस आन्दोलन को दार्शनिक रुप प्रदान किया। अत: यह धारणा मि है कि भक्ति आन्दोलन इस्लान की देन है। चौदहवीं शताब्दी के आरम्भ में उत्तर भारत में इस आन्दोलन को प्रबल बनाने का श्रेय रामानंद को जाता है। रामानंद के १२ शिष्य थे। वे अपने शिष्यों के साथ अपने मत का प्रचार करने के लिए उत्तरी भारत का भ्रमण करने लगे। उनके इस प्रचार का राजस्थान पर भी प्रभाव किया। उनके शिष्यों में कबीर प्रमुख थे। कबीर ने अपने विचारों से राजस्थान को भी प्रभावित किया। इसके फलस्वरुप राजस्थान में भी कई धर्म प्रचारकों का आविर्भाव हुआ। उन्होंने भी भारत के अन्य सन्तों की भाँति परम्परागत धर्म में व्याप्त दोषों को दूर करने का हर संभव प्रयास किया। परिणामस्वरुप राजस्थान में भी धर्म सुधार आन्दोलन प्रारम्भ हुआ।
राजस्थान में इस्लाम का प्रवेश
ग्यारहवीं तथा बारहवीं शताब्दी में मुसलमानों ने राजस्थान पर निरन्तर आक्रमण किया। उन्होंने न केवल भारत का धन लूटा, बल्कि इस्लाम धर्म का प्रचार भी किया। उनका प्रमुख उद्देश्य भारत में अपनी सत्ता स्थापित करके यहाँ की सम्पत्ति को लूटना एवं इस्लाम धर्म का प्रचार करना था। इसलिए मुसलमानों ने सत्ता में आते ही हिन्दू मंदिरों को नष्ट करना एवं हिन्दुओं को बलपूर्वक मुसलमान बनाना प्रारम्भ कर दिया। मुसलमानों ने राजस्थान में अजमेर को अपना केन्द्र बनाया। यहाँ से ही उन्होंने जालौर, नागौर, चित्तौड़ एवं मांडल की ओर प्रस्थान किया था। वहाँ भी उन्होंने मंदिरों को गिराना एवं मूर्तियों को नष्ट करना जारी रखा। मुसलमानों के धार्मिक अत्याचारों ने हिन्दुओं को अपनी धार्मिक आस्था से डिगा दिया। जब ईश्वर ने उनकी रक्षा नहीं की, तो ऐसी स्थिती में वे निराशा के सागर में निमग्न हो गये। ऐसे वातावरण में धर्म सुधारकों ने धर्म में व्याप्त बुराईयों को दूर किया और निराश हिन्दुओं के दिल में अपने धर्म के प्रति आस्था का पुन: संचार किया।   

हिन्दुओं तथा मुसलमानों में समन्वयात्मक भावना का उदय
मुसलमानों ने प्रारम्भ में आक्रमणकारी के रुप में धर्म के नाम पर अत्यधिक अत्याचार किए। अत: हिन्दुओं में उनके प्रति रोष एवं आक्रोश की भावना उत्पन्न होना स्वाभाविक था, परन्तु जब मुसलमानों को यहाँ रहते हुए काफी समय व्यतीत हुआ, तो उनका धार्मिक जोश भी ठंडा पड़ गया था। दोनों सम्प्रदायों में विचारों का आदान- प्रदान होने लगा और दोनों ने एक दूसरे को समझने का प्रयत्न किया।
राजस्थान के शासकों ने भी मुस्लिम धर्माधिकारियों को सम्मानित करना प्रारम्भ कर दिया। महाराणा जगतसिंह द्वितीय ने अजमेर की दरगाह को चार गाँव जागीर के रुप में प्रदान किये थे। मारवाड़ नरेश अजीतसिंह ने भी दरगाह के खर्चे के लिए कुछ अनुदान की राशि निश्चित कर दी थी। इस्लाम के सरल एवं सादगीपूर्ण विचारों ने हिन्दू धर्म को भी प्रभावित किया। इसके परिणामस्वरुप हिन्दू धर्म के कई समाज सुधारकों ने जाति - पांति, ऊँच - नीच एवं छुआछूत के भेदभावों का विरोध किया। इस प्रकार की विचारधारा से राजस्थान में धार्मिक आन्दोलन की पृष्टभूमि तैयार हुई  

सूफी मत के संतों का प्रभाव
सूफी मत सुन्नी मत से अधिक उदार तथा सरल है। सूफी सन्तों ने प्यार एवं मधुर वाणी के माध्यम से अपने विचार हिन्दुओं तक पहुँचाए। वे धार्मिक आडम्बरों में विश्वास नहीं करते थे। उन्होंने अल्लाह तक अपनी आवाज पहुँचाने के लिए संगीत (कव्वाली) का सहारा लिया। हिन्दू सन्त सूफी सन्तों के विचार से काफी प्रभावित हुए और उन्होंने भी धर्म के बाहरी आडम्बरों की आलोचना करके कीर्तन पर अधिक जोर देना प्रारम्भ कर दिया। सूफी सन्तों तथा मुस्लिम दरवेशों ने हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच सामंजस्य उत्पन्न करने का प्रयत्न किया

नवीन साहित्यिक ग्रन्थों का सृजन
सत्रहवीं शताब्दी में सृजित नवीन साहित्यिक ग्रन्थों ने धार्मिक आन्दोलन को बल प्रदान किया। हरि बोल चिन्तामणि व विप्रबोध मानक साहित्यकारों ने अपने साहित्यिक ग्रन्थों के माध्यम से हृदय की शुद्धि पर विशेष बल दिया। विप्रबोध का मानना था कि हरि सर्वोपरि है और उसे प्रार्थना के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। वह पंडितों एवं शेखों का विरोधी था। उसका मानना था कि ये लोग धर्म को मि आडम्बरों से ही ग्रसित करते हैं।"पश्चिमाद्रिस्तोत्र '' नामक ग्रन्थ में राम, रहीम, गोरख, पीर व अल्लाह को एक ही शक्ति के विभिन्न नाम बताये गये हैं। इन साहित्यिक ग्रन्थों की रचना का परिणाम यह हुआ कि राजस्थान के लोगों के धार्मिक विचार उदार हो गये। अब हिन्दुओं ने परम्परागत धार्मिक विचारों के दायरे से अपने को मुक्त कर दिया और नवीन उदार धार्मिक मान्यताओं को महत्व देना प्रारम्भ कर दिया।

राजस्थान के सिद्ध पुरुषों का धर्म आन्दोलन में सहयोग
राजस्थान के इस धार्मिक आन्दोलन की प्रवृत्ति हमें यहाँ के सिद्ध पुरुषों के चिंतन में भी स्पष्ट रुप से दृष्टिगोचर होती है। ऐसे व्यक्ति जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन त्याग तथा बलिदान के साथ समाज सेवा एवं धर्म प्रचार में व्यतीत कर दिया था, उन्हें सिद्ध पुरुष कहा जाता है। ऐसे सिद्ध पुरुषों को अलौकिक शक्तियाँ प्राप्त थीं, अत: जनता ने उन्हें देवत्व की भाँति पूजना शुरु कर दिया। ऐसे सिद्ध पुरुषों में गोगाजी, पाबूजी, तेजाजी एवं मल्लिनाथ आदि के नाम विशेष रुप से उल्लेखनीय हैं। गोगाजी ने यवनों के शिकंजे से गायों को छुड़वाने के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया था। उनकी स्मृति में भाद्रपद की कृष्णा नवमी को गोगा नवमी का मेला भरता है।
 इसी प्रकार तेजाजी ने जाटों की गायों को मुक्त करवाने में अपने प्राण दांव पर लगा दिये थे। वे खड़नवाल गाँव के निवासी थे। भादो शुक्ला दशमी को तेजाजी का पूजन होता है। तेजाजी का राजस्थान के जाटों में महत्वपूर्ण स्थान है। अन्य लोक देवों में पाबूजी, मल्लिनाथ एवं देवजी के नाम विशेष रुप से उल्लेखनीय हैं, जिन्होंने अपने आत्म - बलिदान तथा सदाचारी जीवन से अमरत्व प्राप्त किया था। उन्होंने अपने धार्मिक विचारों से जनसाधारण को सद्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया और जनसेवा के कारण निष्ठा अर्जित की। उन्होंने जनसाधारण के हृदय में हिन्दू धर्म के प्रति लुप्त विश्वास को पुन: जागृत किया। इस प्रकार लोकदेवों ने अपने सद्कार्यों एवं प्रवचनों से जन - साधारण में नवचेतना जागृत की, लोगों की जात - पांत में आस्था कम हो गई। अत: उनका इस्लाम के प्रति आकर्षण दिन - प्रतिदिन कम होता गया। इस प्रकार इन लोक देवताओं ने धर्म सुधार की पृष्ठभूमि तैयार कर दी।

धर्म तथा समाज में व्याप्त आडम्बर एवं कुप्रथायें
हिन्दू समाज तथा धर्म में कुरीतियों, आडम्बरों एवं पाखण्डों का बोलबाला था, जिसके कारण जनसाधारण अन्धविश्वास का शिकार बना हुआ था। इस समय हिन्दू समाज अनेक जातियों एवं उपजातियों में विभक्त हो चुका था एवं कई नयी जातियाँ भी बन चुकी थीं। इस समय निम्न जातियों की दशा बहुत शोचनीय थी। इनकी बस्तियाँ गाँव के बाहर होती थीं। स्वर्ण जाति के लोग इनके हाथ का छुआ पानी नहीं पीते थे। परिणामस्वरुप निम्न जातियों के लोग इस्लाम की ओर आकर्षित हुए। इस स्थिति से बचने के लिए एकमात्र उपाय यही था कि समाज में व्याप्त दोषों को दूर किया जाए। 
डॉ० पेमाराम ने लिखा है, "इन सन्तों के द्वारा इस नवजागरण में आत्मसम्मान तथा सर्वसाधारण सन्त साधना जैसे रहस्यमय एवं गूढ़ सिद्धांतों की व्याख्या बोलचाल की भाषा में सर्वसाधारण के लिए की जाने लगी। जो अभी तक ब्राह्मण एवं उच्च वर्ग तक ही सीमित थी। अब उन गूढ़ एवं रहस्यमय सिद्धांतों को अनपढ़ व साधारँ ज्ञान वाले व्यक्ति समझने लगे, जिससे ये पंथ लोकप्रिय हुए।"
डॉ० गोपीनाथ शर्मा के अनुसार, "यह युग न केवल राजस्थान की संस्कृति का, बल्कि भारत की संस्कृति का एक उज्जवल युग है। हमारी स्मृति में धार्मिक जीवन का कोई ऐसा उज्जवल पक्ष इसके पूर्व इतना नैसर्गिक और फलद नहीं हो सका।"          

जाम्भोजी और विश्नोई सम्प्रदाय

राहुल तोन्गारिया
मध्यकाल में राजस्थानमें अनेक संत हुए, जिन्होंने यहाँ के धार्मिक एवं सामाजिक आन्दोलन को नवीन गति प्रदान की। डॉ पेमाराम के अनुसार, "उन्होंने हिन्दू तथा इस्लाम में प्रचलित आडम्बरों तथा रुढियों का खण्डण किया और समाज के वास्तविक रुप को समझने का निर्देश दिया।"
जाम्भोजी :
जाम्भोजी का जन्म, १४५१ ई० में नागौर जिले के पीपासर नामक गाँव में हुआ था। ये जाति से पंवार राजपूत थे। इनके पिता का नाम लोहाट और माता का नाम हंसा देवी थी। ये अपने माता - पिता की इकलौती संतान थे। अत: माता - पिता उन्हें बहुत प्यार करते थे। डॉ० जी० एन० शर्मा के अनुसार,"जाम्भोजी बाल्यावस्था से ही मननशील थे तथा वे कम बोलते थे, इसलिए लोग उन्हें गूँगा कहते थे। उन्होंने सात वर्ष की आयु से लेकर १६ वर्ष कीआयु तक गाय चराने का काम किया। तत्पश्चात् उनका साक्षात्कार गुरु से हुआ। माता - पिता की मृत्यु के बाद जाम्भोजी ने अपना घर छोड़ दिया और सभा स्थल (बीकानेर) चले गये तथा वहीं पर सत्संग एवं हरि चर्चा में अपना समय गुजारते रहे। १४८२ ई० में उन्होंने कार्तिक अष्टमी को विश्नोई सम्प्रदाय की स्थापना की।
जाम्भोजी चिन्तनशील एवं मननशील थे। उन्होंने उस युग की साम्प्रदायिक संकीर्णता, कुप्रथाओं एवं अंधविश्वासों का विरोध करते हुए कहा था कि -

"सुण रे काजी, सुण रे मुल्लां, सुण रे बकर कसाई।
किणरी थरणी छाली रोसी, किणरी गाडर गाई।।
धवणा धूजै पहाड़ पूजै, वे फरमान खुदाई।
गुरु चेले के पाए लागे, देखोलो अन्याई।।"

वे सामाजिक दशा को सुधारना चाहते थे, ताकि अन्धविश्वास एवं नैतिक पतन के वातावरण को रोका जा सके और आत्मबोध द्वारा कल्याण का मार्ग अपनाया जा सके। संसार के मि होने पर भी उन्होंने समन्वय की प्रवृत्ति पर बल दिया। दान की अपेक्षा उन्होंने ' शील स्नान ' को उत्तम बताया। उन्होंने पाखण्ड को अधर्म बताया और विधवा विवाह पर बल दिया। उन्होंने पवित्र जीवन व्यतीत करने पर बल दिया। ईश्वर के बारे में उन्होंने कहा - 

"तिल मां तेल पोहप मां वास,
पांच पंत मां लियो परगास।"
जाम्भोजी ने गुरु के बारे में कहा था -
"पाहण प्रीती फिटा करि प्राणी,
गुरु विणि मुकति न आई।"
भक्ति पर बल देते हुए उन्होंने कहा था -
"भुला प्राणी विसन जपो रे,
मरण विसारों के हूं।"
जाम्भोजी ने जाति भेद का विरोध करते हुए कहा था कि उत्तम कुल में जन्म लेने मात्र से व्यक्ति उत्तम नहीं बन सकता, इसके लिए तो उत्तम करनी होनी चाहिए। उन्होंने कहा -
"तांहके मूले छोति न होई।
दिल-दिल आप खुदायबंद जागै,
सब दिल जाग्यो लोई।"
तीर्थ यात्रा के बारे में विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा था :
"अड़सठि तीरथ हिरदै भीतर, बाहरी लोकाचारु।"
मुसलमानों के बांग देने की परम्परा के बारे में उन्होंने कहा था -

"दिल साबिति हज काबो नेड़ौ, क्या उलवंग पुकारो।"
डॉ पेमाराम के अनुसार, उनके विचार कबीर से काफी मिलते- जुलते थे। जाम्भोजी १५२६ ई० में तालवा नामक ग्राम में परलोक सिधार गए। उनकी स्मृति में विश्नोई भक्त फान्गुन मास की त्रियोदशी को वहाँ उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। जाम्भोजी की शिक्षाएँ, सबदवाणी एवं उनका नैतिक जीवन मध्य युगीन धर्म सुधारक प्रवृत्ति के प्रमुख अंग हैं।
विश्नोई सम्प्रदाय 
जाम्भोजी द्वारा प्रवर्तित इस सम्प्रदाय के अनुयायियों के लिए उनतीस नियमों का पालन करना आवश्यक है। इस सम्बन्ध में एक कहावत बहुत प्रसिद्ध है, जो इस प्रकार है -
"उणतीस धर्म की आंकड़ी, हृदय धरियो जोय।
जम्भेशेवर कृप करें, बहुरि जभ न होय। "
 
१) प्रतिदिन प्रात:काल स्नान करना।
२) ३० दिन जनन - सूतक मानना।
३) ५ दिन रजस्वता स्री को गृह कार्यों से मुक्त रखना।
४) शील का पालन करना।
५) संतोष का धारण करना।
६) बाहरी एवं आन्तरिक शुद्धता एवं पवित्रता को बनाये रखना।
७) तीन समय संध्या उपासना करना।
८) संध्या के समय आरती करना एवं ईश्वर के गुणों के बारे में चिंतन करना।
९) निष्ठा एवं प्रेमपूर्वक हवन करना।
१०) पानी, ईंधन व दूध को छान-बीन कर प्रयोग में लेना।
११) वाणी का संयम करना।
१२) दया एवं क्षमाको धारण करना।
१३) चोरी,
१४) निंदा,
१५) झूठ तथा
१६) वाद - विवाद का त्याग करना।
१७) अमावश्या के दिनव्रत करना।
१८) विष्णु का भजन करना।
१९) जीवों के प्रति दया का भाव रखना।
२०) हरा वृक्ष नहीं कटवाना।
२१) काम, क्रोध, मोह एवं लोभ का नाश करना।
२२) रसोई अपने हाध से बनाना।
२३) परोपकारी पशुओं की रक्षा करना।
२४) अमल,
२५) तम्बाकू,
२६) भांग
२७) मद्य तथा
२८) नील का त्याग करना।
२९) बैल को बधिया नहीं करवाना।
  

जाम्भोजी की शिक्षाओं पर अन्य धर्मों का प्रभाव स्पष्ट रुप से दृष्टिगोचर होता है। उन्होंने जैन धर्म से अहिंसा एवं दया का सिद्धान्त तथा इस्लाम धर्म से मुर्दों को गाड़ना, विवाह के समय फेरे न लेना आदि सिद्धान्त ग्रहण किये हैं। उनकी शिक्षाओं पर वैष्णव सम्प्रदाय तथा नानकपंथ का भी बड़ा प्रभाव है।

डॉ पेमाराम के अनुसार,"इस प्रकार जाम्भोजी ने वैष्णव, जैन, इस्लाम धर्म के सिद्धान्तों का समन्वय करके एक सार्वभौमिक पंथ (विश्णोई) को जन्म दिया।" 

दीक्षा विधि : 
जो व्यक्ति इस सम्प्रदाय के २९ नियमों का पालन करने के लिए तैयार हो जाता है, इसे दीक्षा दी जाती है। दीक्षा मंत्र तारक मंत्र या गुरु मंत्र कहलाता था, जो इस प्रकार था  :
"ओं शब्द गुरु सुरत चेला, पाँच तत्व में रहे अकेला।
सहजे जोगी सुन में वास, पाँच तत्व में लियो प्रकाश।।
ना मेरे भाई, ना मेरे बाप, अलग निरंजन आप ही आप।
गंगा जमुना बहे सरस्वती, कोई- कोई न्हावे विरला जती।।
तारक मंत्र पार गिराय, गुरु बताओ निश्चय नाम।
जो कोई सुमिरै, उतरे पार, बहुरि न आवे मैली धार।। "
  
इस सम्प्रदाय में गुरु दीक्षा एवं डोली पाहल आदि संस्कार साधुओं द्वारा सम्पादित करवाये जाते हैं, जिनमें कुछ महन्त भी भाग लेते हैं। वे महन्त, स्थानविशेष की गद्दी के अधिकारी होते हैं परन्तु थापन नामक वर्ग के लोग नामकरण, विवाह एवं अन्तयेष्टि आदि संस्कारों को सम्पादित करवाते हैं। चेतावनी लिखने एवं समारोहों के अवसरों पर गाने बजाने आदि कार्यों के लिए गायन अलग होते हैं।

अभिवादन का तरीका 
इस सम्प्रदाय में परस्पर मिलने पर अभिवादन के लिए 'नवम प्रणाम', तथा प्रतिवचन में' विष्णु नै जांभौजी नै' कहा जाता है।

सम्प्रदाय की विशिष्ट वेशभूषा :
जाम्भोजी के समय तथा उनके निकटवर्ती काल में विश्नोई समाज की कोई विश्नोई विशिष्ट वेशभूषा नहीं थी, परन्तु धीरे - धीरे इनकी विशिष्ट वेशभूषा बन गई थी। रिपोर्ट मर्दुमशुमार राज. मारवाड़ से पता चलता है कि विश्नोई औरतें लाल और काली ऊन के कपड़े पहनती हैं। वे सिर्फ लाख का चूड़ा ही पहनती हैं। वे न तो बदन गुदाती हैं न तो दाँतों पर सोना चढ़ाती है। विश्नोई लोग नीले रंगके कपड़े पहनना पसंद नहीं करते हैं। वे ऊनी वस्र पहनना अच्छा मानते हैं, क्योंकी उसे पवित्र मानते हैं। साधु कान तक आने वाली तीखी जांभोजी टोपी एवं चपटे मनकों की आबनूस की काली माला पहनते हैं। महन्त प्राय: धोती, कमीज और सिर पर भगवा साफा बाँधते हैं।

मृतक संस्कार :
मोहसिन फानी ने लिखा है कि विश्नोईयों में शव को गाड़ने की प्रथा प्रचलित थी। विश्नोई सम्प्रदाय मूर्ति पूजा में विश्वास महीं करता है। अत: जाम्भोजी के मंदिर और साथरियों में किसी प्रकार की मूर्ति नहीं होती है। कुछ स्थानों पर इस सम्प्रदाय के सदस्य जाम्भोजी की वस्तुओं की पूजा करते हैं। जैसे कि पीपसार में जाम्भोजी की खड़ाऊ जोड़ी, मुकाम में टोपी, पिछोवड़ों जांगलू में भिक्षा पात्र तथा चोला एवं लोहावट में पैर के निशानों की पूजा की जाती है। वहाँ प्रतिदिन हवन - भजन होता है और विष्णु स्तुति एवं उपासना, संध्यादि कर्म तथा जम्भा जागरण भी सम्पन्न होता है।

विश्नोई सम्प्रदाय का समाज पर प्रभाव :
इस सम्प्रदाय के लोग जात - पात में विश्वास नहीं रखते। अत: हिन्दू -मुसलमान दोनों ही जाति के लोग इनको स्वीकार करते हैं। श्री जंभ सार लक्ष्य से इस बात की पुष्टि होती है कि सभी जातियों के लोग इस सम्प्रदाय में दीक्षीत हुए। उदाहरणस्वरुप, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, तेली, धोबी, खाती, नाई, डमरु, भाट, छीपा, मुसलमान, जाट, एवं साईं आदि जाति के लोगों ने मंत्रित जल (पाहल) लेकर इस सम्प्रदाय में दीक्षा ग्रहण की।
राजस्थान में जोधपुर तथा बीकानेर राज्य में बड़ी संख्या में इस सम्प्रदाय के मंदिर और साथरियां बनी हुई हैं। मुकाम (तालवा) नामक स्थान पर इस सम्प्रदाय का मुख्य मंदिर बना हुआ है। यहाँ प्रतिवर्ष फाल्गुन की अमावश्या को एक बहुत बड़ा मेला लगता है जिसमें हजारों लोग भाग लेते हैं। इस सम्प्रदाय के अन्य तीर्थस्थानों में जांभोलाव, पीपासार, संभराथल, जांगलू,लोहावर, लालासार आदि तीर्थ विशेष रुप से उल्लेखनीय हैं। इनमें जांभोलाव विश्नोईयों का तीर्थराज तथा संभराथल मथुरा और द्वारिका के सदृश माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त रायसिंह नगर, पदमपुर, चक, पीलीबंगा, संगरिया, तन्दूरवाली, श्रीगंगानगर, रिडमलसर, लखासर, कोलायत (बीकानेर), लाम्बा, तिलवासणी, अलाय (नागौर)एवं पुष्कर आदि स्थानों पर भी इस सम्प्रदाय के छोटे -छोटे मंदिर बने हुए हैं। इस सम्प्रदाय का राजस्थान से बाहर भी प्रचार हुआ। पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में बने हुए मंदिर इस बात की पुष्टि करते हैं।
जाम्भोजी की शिक्षाओं का विश्नोईयों पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ा। इसीलिए इस सम्प्रदाय के लोग न तो मांस खाते हैं और न ही शराब पीते हैं। इसके अतिरिक्त वे अपनी ग्राम की सीमा में हिरण या अन्य किसी पशु का शिकार भी नहीं करने देते हैं।
इस सम्प्रदाय के सदस्य पशु हत्या किसी भी कीमत पर नहीं होने देते हैं। बीकानेर राज्य के एक परवाने से पता चलता है कि तालवा के महंत ने दीने नामक व्यक्ति से पशु हत्या की आशंका के कारण उसका मेढ़ा छीन लिया था।
व्यक्ति को नियम विरुद्ध कार्य करने से रोकने के लिए प्रत्येक विश्नोई गाँव में एक पंचायत होती थी। नियम विरुद्ध कार्य करने वाले व्यक्ति को यह पंचायत धर्म या जाति से पदच्युत करने की घोषणा कर देती थी। उदाहरणस्वरुप संवत् २००१ में बाबू नामक व्यक्ति ने रुडकली गाँव में मुर्गे को मार दिया था, इस पर वहाँ पंचायत ने उसे जाति से बाहर कर दिया था।
ग्रामीण पंचायतों के अलावा बड़े पैमाने पर भी विश्नोईयों की एक पंचायत होती थी, जो जांभोलाव एवं मुकाम पर आयोजित होने वाले सबसे बड़े मेले के अवसर पर बैठती थी। इसमें इस सम्प्रदाय के बने हुए नियमों के पालन करने पर जोर दिया जाता था। विभिन्न मेलों के अवसर पर लिये गये निर्णयों से पता चलता है कि इस पंचायत की निर्णित बातें और व्यवस्था का पालन करना सभी के लिए अनिवार्य था और जो व्यक्ति इसका उल्लंघन करता था, उसे विश्नोई समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता था।
विश्नोई गाँव में कोई भी व्यक्ति खेजड़े या शमी वृक्ष की हरी डाली नहीं काट सकता था। इस सम्प्रदाय के जिन स्री - पुरुषों ने खेजड़े और हरे वृक्षों को काटा था, उन्होंने स्वेच्छा से आत्मोत्सर्ग किया था। इस बात की पुष्टि जाम्भोजी सम्बन्धी साहित्य से होती है।
राजस्थान के शासकों ने भी इस सम्प्रदाय को मान्यता देते हुए हमेशा उसके धार्मिक विश्वासों का ध्यान रखा है। यही कारण है कि जोधपुर व बिकानेर राज्य की ओर से समय - समय पर अनेक आदेश गाँव के पट्टायतों को दिए गए हैं, जिनमें उन्हें विश्नोई गाँवों में खेजड़े न काटने और शिकार न करने का निर्देश दिया गया है।
बीकानेर ने संवत् १९०७ में कसाइयों को बकरे लेकर किसी भी विश्नोई गाँव में से होकर न गुजरने का आदेश दिया। बीकानेर राज्य के शासकों ने समय - समय पर विश्नोई मंदिरों को भूमिदान दिए गए हैं। ऐसे प्रमाण प्राप्त हुए हैं कि सुजानसिंह ने मुकाम मंदिर को ३००० बीघा एवं जांगलू मंदिर को १००० बीघा जमीन दी थी।
बीकानेर ने संवत् १८७७ व १८८७ में एक आदेश जारी किया था, जिसके अनुसार थापनों से बिना गुनाह के कुछ भी न लेने का निर्देश दिया था। इस प्रकार जोधपुर राज्य के शासक ने भी विश्नोईयों को जमीन एवं लगान के सम्बन्ध में अनेक रियायतें प्रदान की थीं। उदयपुर के महाराणा भीमसिंह जी और जवानसिंह जी ने भी जोधपुर के विश्नोईयों की पूर्व परम्परा अनुसार ही मान - मर्यादा रखने और कर लगाने के परवाने दिये थे।      
        

राजस्थानी राजप्रासाद और स्थापत्य

राहुल तोन्गारिया
स्थापत्य का विशिष्ट रुप राजप्रासाद है। प्राचीनकाल के राजप्रासादों के खण्डहर पूरी तरह उपलब्ध नहीं होते, परन्तु यह निश्चित है कि जब से राजस्थान में राजपूतों के राज्य स्थापित होने लगे तब से राजभवनों का निर्माण होने लगा। मेनाल, नागदा, आमेर आदि में पूर्व मध्यकालीन काल में राजभवनों के अवशेष देखने को मिलते हैं जिनमें छोटे - छोटे कमरे , छोटे - छोटे दरवाजे तथा खिड़कियों का अभाव प्रमुख रुप से होता रहा है। दो किनारों कमरों को बरामदे से जोड़ा जाना भी राजभवन के स्थापत्य की प्रमुख विशेषता रही है।
मण्डन शिल्पी ने राजभवनों को बनाने का स्थान या तो नगर के बीच में या नगर के एक कोने में ऊँचे स्थान पर ठीक माना है। उसके अनुसार राजभवनों के ढ़ाँचे में दुर्गों की भांति प्राकार तथा कुओं का होना आवश्यक माना जाता है। उसके अनुसार अन्त: पुर और पुरुष कक्षों को सँकरे ढ़ँके हुए भागों से जोड़ना अच्छा समझा जाता है। उसने महलों में दरबार लगाने, आम जनता एवं दरबारियों से मंत्रणा करने के कक्षों पर बल दिया है राजभवन के अन्तर्गत रसोईघर, शस्रागार, धान्य भण्डार, मंदिर, राजकुमारों के कक्षों को मान्यता दी है जो भारतीय शास्रीय पद्धति के अनुरुप है। वैसे राजभवन साधारण गृहस्थ के मकानों का वृहद रुप मात्र है, जिसमें सादगी की मात्रा अधिक देखी गई है। नीची छतें, छोटे - छोटे आवास, पतली गैलेरियाँ, छोटे - छोटे दालान इन राजभवनों की विशेषता रही है। महाराणा कुंभा जैसे शक्तिशाली व संपन्न व्यक्ति ने, जिसने कई विशाल दुर्ग बनवाएँ, अपने लिए कुम्भलगढ़ में सादे मकान स्वयं के रहने के लिए बनवाया जो साधारण व्यक्ति के मकान से अधिक विशएषता नहीं रखता था। परन्तु जब राजपूतों को सम्बन्ध मुगलों से जुड़ा तथा उनमें आदेन - प्रदान का क्रम आरम्भ हुआ तो इन राजभवनों को भव्य, रोचक तथा क्रमबद्ध बनाने की प्रक्रिया आरम्भ हुई। इनमें फव्वारें, छोटे बाग, पतले खम्भे, दीवारों पर बेलबूटे, संगमरमर का काम, आदि का समावेश हो गया।

उदयपुर के अमरसिंह के महल, जगनिवास, जगमंदिर, जोधपुर के फूलमहल, आमेर व जयपुर के दीवाने आम व दीवाने खास, तथा बीकानेर के रंगमहल, कर्णमहल ,शीशमहल, अनूपमहल आदि में राजपूत तथा मुगल - पद्धति का समुचित समन्वय है। बूँदी, कोटा तथा जैसलमेर के महलों में मुगल शैली क्रमश: बदलती दिखाई देती है। कारण यह है कि ज्यों - ज्यों राजपूत सरदार मुगलों के दरबार में अधिकाधिक जाने लगे, त्यों - त्यों कलात्मक विचारों का आदान - प्रदान भी होने लगा तथा उनमें मुगली शान के अनुरुप अपने राज्य में व्यवस्था लाने की भी रुचि बढ़ने लगी। मुगलों के पतन के पश्चात् तो मुगल - आश्रित कई कलाकारों के परिवार राजस्थान में आकर राजपूत दरबार के आक्षित बन गए। यहाँ तक सामन्तों तथा समृद्ध परिवारों के भवनों में भी यह समन्वय की प्रक्रिया बढ़ती गई। राजभवनों का निर्माण समन्वय परक हो गया। आज महलों पर पारिवारिक स्थापत्य का स्वरुप समन्वय के माध्यम से ही परखा जा सकता है।

राजस्थान : सातवीं शताब्दी से तेरहवीं शताब्दी

राहुल तोन्गारिया
जब हम सातवीं से तेरहवी शताब्दी के स्थापत्य का पर्यवेक्षण करते हैं तो हम पाते हैं कि वह एक नये राजनीतिक परिस्थिती के अनुरुप ढल जाता है। इसी युग में अर्बुदांचल प्रदेश में परमार, मेवाड़ और बाँगड में गुहिल, शाकाम्भरी में चौहान, ढूँढ़ाड़ में कच्छपाट, जाँगल व मरु में राठौर, मत्स्य व राजगढ़ में गुर्जर प्रतिहार आदि राज्यों का उदय होता है। ये राजवेश बल और शौर्य को प्रधानता देते थे और विस्तार की ओर अग्रसर थे। यही कारण है कि इस काल की वास्तुकला में शक्ति विकास तथा जातीय संगठन की भावना स्पष्ट झलकती है। उदाहरणार्थ नागदा चीखा, लोद्रवा, अर्थूणा, चाटसू आदि कस्बों को घाटियों पहाड़ों या जंगल तथा रेगिस्तान से आच्छादित स्थानों में बसाया गया और इनमें वे सभी साधन जुटाएँ गये जो युद्धकालीन स्थिती में सुरक्षा के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकते थे। इन कस्बों को राजकीय निवास का केन्द्र भी बनाया गया जिससे राजवंशों को आसपास के भागों पर अपना अधिकार स्थापित करने में कोई कठिनाई न हो। इन कस्बों में राजकीय अधिकारियों के आवास तथा धर्मगुरुओं के ठहरने की भी व्यवस्था की गयी थी। नागदा, जो गुहिलों की राजधानी थी, अच्छे पत्थर से मढ़ी हुई सड़कों और नालियों से सुशोभित थी।
वही सड़क आज बाघेला तालाब में छिपी हुई उस युग की दुहाई दे रही है। इस काल में नगरों में बस्तियां किस प्रकार विभाजित थीं और उनकी योजना का सम्पूर्ण ढ़ाँचा कैसा था उसका पूरा चित्रण करना तो बड़ा कठिन है परंतु इतना अवश्य कहा जा सकता है कि नगर निर्माण में प्रयुक्त स्थापत्य का प्रमुख आधार महाभारत, अर्थशास्र, कामसूत्र, शुक्रनीति, अपराजिताप्रेच्छ आदि ग्रन्थों में दिए गए सिद्धान्तों के अनुरुप था। उदाहरणार्थ नगरों को परकोटों तथा खाईयों से सुरक्षित रखने तथा राजप्रसादों को सुदूर भवनों, मंदिरों और उद्यानों से सुशोभित करने पर बल दिया जाता था। यथासम्भव बस्तियों को क्षेत्रों के अनुसार बाँटा जाता था। इन सांस्कृतिक सूत्रों के अनुपालन हमें मध्ययुगीन वास्तुकला में दिखाई देता है। उदाहरणार्थ वैर सिंह ने ११वीं शताब्दी में आधार नगर के चारों ओर परकोटे की व्यवस्था की थी। इंगदा नामक कस्बे में बस्तियों को वर्ण तथा व्यवसाय के अनुसार बसाया गया था। इसमें ब्राह्मणों के रहने के भाग को ब्रह्मपुरी कहते थे। देलवाड़ा में भी बस्ती का बँटवारा व्यवसाय के अनुरुप किया गया था।

आमेर १६वीं शताब्दी से १७वीं शताब्दी तक कछवाहों शासकों के शक्ति का केन्द्र था, जिसे एक विशेष, योजना के साथ बसाया गया था। दोनों तरफ की पहाड़ियों की ढ़लानों पर हवेलियाँ तथा उँचे - ऊँचे भवन बनाये गए थे और नीचे के समतल भाग में पानी के कुण्ड, मंदिर, सड़कें, बाजार आदि थे। पहाड़ी रास्तों को संकरा रखा गया था जिससे सुरक्षा की व्यवस्था समुचित रुप से हो सके। उँची पहाड़ियों पर राजभवनों के निर्माण करवाया गया था, परन्तु आगे के युग में जब आमेर में विकास की गुंजाइश नहीं रही तो कछवाहा शासक जयसिंह ने जयपुर नगर को खुले मैदान में चौहड़ योजना के अनुरुप बसाया और उसे चारों ओर दीवार और परकोटों से सुरक्षित किया। नाहरगढ़ को सैनिक शक्ति से सुसज्जित कर सम्पूर्ण मैदानी भाग की चौकसी का प्रबन्धक बनाया गया। जगह - जगह जलाशय, आरामगृह, फव्वारे, नालियाँ - नहर,, चौड़ी सड़कें, चौपड़ आदि बनायी गई जिनके नीर्माण में मुगल तथा राजपूत स्थापत्य का समुचित समन्वय समावेशित किया गया। जयपुर नगर की योजना भी व्यवसाय के अनुरुप बस्तियों की व्यवस्था थी। १२ वीं शताब्दी में जैसलमेर का निर्माण जंगल की समीपता और पानी की सुविधा को ध्यान में रखकर किया गया था। जैसलमेर अलग - अलग वस्तुओं के क्रय - विक्रय का केन्द्र था। समूची योजना, जन जीवन और व्यापार की समृद्धि के हित में थी।

अजमेर चौहानों के समय समृद्ध नगरों में गिना जाता था। हसन निजामी, अबुल फजल, सर टामस रो आदि लेखकों ने अजमेर की सम्पन्न अवस्था पर काफी प्रकाश डाला है। मालदेव ने अजमेर परिवर्किद्धत करने में काफी योग दिया। अकबर और शाहजहाँ ने इसे सुसज्जित करने में कोई कसर न रखी। मराठों ओर अंग्रेजों के शासनकाल तक अजमेर भवन - निर्माण, बाजारों के व्यवस्था आदि वाणिज्य स्थिती में अपना अनूठापन रखता रहा है। दरगाह शरीफ होने से और उसके निकट पुष्कर होने से इसका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व और अधिक बढ़ जाता है।

बूँदी के स्थापत्य में तथा उसके बसाने में पानी के प्राचुर्य का बड़ा हाथ रहा है। जोधपुर और बीकानेर की बसावर में गढ़ निर्माण, परकोटे भवन - निर्माण आदि भौगोलिक परिस्थियों से सम्बन्धित है। जोधपुर में कहीं कहीं ऊँचाईं और ढ़ालों को बस्तियों को बसाने के उपयोग में लाया गया और सड़कों तथा नालियों की योजना उसके अनुकूल की गई। बीकानेर में समतल भूमि में व्यवसाय के अनुसार नगर को बाँटा गया था तथा हाटों और बाजारों को व्यापारिक सुविधा के अनुरुप बनवाया गया। उदयपुर को झील के किनारे घाटियों के अनुरुप व्यवसाय के अनुरुप विचारों से मुहल्लों में बाँटा गया। बस्ती के बीच - बीच कहीं कहीं खेत और बगीचे देकर उसे अधिक आकृष्ट बनाया गया। नगर के बसाने में प्राकार, खाई तथा पहाड़ी श्रेणियों का उपयोग किया गया। पहाड़ी ढ़लान, चढ़ाव और उतार को ध्यान में रखेत हुए सारे नगर को टेढ़ा - मेढ़ा इस तरह बसाया गया कि मध्यकालीन उदयपुर की योजना में कहीं रास्ते या चौपड़ की व्यवस्था नहीं दीख पड़ती। नगरों के में गाँवों की वास्तुकला भिन्न है। गाँव नदी के निकट व किनारे मिलते हैं, उनको लम्बे आकार में खुली बस्ती के रुप में बसाया गया। पहाड़ी इलाके के गाँव पहाड़ी ढ़लान और कुछ ऊँचाईं लिए हुए हैं; उदाहरणार्थ केलवाड़ा, सराड़ा आदि। पहाड़ों और घने जंगलों में आदिवासियों की बस्तियाँ छोटे - छोटे टेकरियों पर दो - चार झोपड़ियों के रुप में बसी मिलती हैं, जिनके चारों ओर काँटें की बाड़ें लगी रहती है जिससे जंगली जानवरों से सुरक्षा भी बनी रहती है। इस प्रकार एक परिवार दूसरे परिवार से विलगता भी बनाये रखते हैं। मेवात के ऐसे गाँवों का जिक्र जोहर ने पुस्तक"तजकिरात"में किया है। रेगिस्तानी गाँवों के पानी की सुविधा को ध्यान में रखकर बसाया जाता है, इसीलिए बीकानेर और जैसलमेर के गाँवों के आगे"सर ' अर्थात जलाशय का प्रयोग बहुधा पाया जाता है, जैसे बीकानेर, जेतसर, उदासर आदि। गाँवों की वास्तुकला में बड़ी इकाई वाले मकान का मुख्य द्वार बिना छत का होता है या बड़े छप्पर के बरामदे से जुड़ा होता है। बीच में खुला आंगन एवं पशुओं की शाल एवं निवास - गृह के कच्चे मकान होते हैं जिन्हें केवल घास - फूस से छा दिया जाया है, साधारण स्थिती के ग्रामीण एक ही कच्चे मकान में गुजारा करते हैं जो अन्न संग्रह, रसोईघर और पशु बाँधनें के काम आता है। ऐसे मकानों के द्वार छोटे रहते हैं जिनमें रोशनदान या खिड़कियों का प्रावधान नहीं होता। जन - जीवन के विकास के साथ राजस्थान में ग्रामीण स्थापत्य की स्थिती बदल रही है और राज्य सरकार खुले, पक्के व हवादार मकानों को बनवाने की व्यवस्था जगह - जगह कर रही है। इसी तरह नगरों के स्थापत्य में भी बड़ी द्रुत गति से बदलाव आ रहा है। प्राचीन नगरों में जो ग्रामीण और नागरिक स्थापत्य का सामंजस्य था,वह विलीनप्राय होता जा रहा है। इनमें आधुनिक संस्कृति प्राचीनता के तत्वों को कम करती जा रही है। 

राजस्थान : मौर्यर्काल से उत्तर गुप्तकालीन युग

राहुल तोन्गारिया
मौर्यर्काल से उत्तर गुप्तकालीन युग में भारतीय स्थापत्य की भांति राजस्थान में स्थापत्य का एक विशेष रुप में विकास हुआ। इस काल की कला केवल राजकीय प्रश्रय की ही पात्र न थी वरन् उसे जन प्रिय बनने के सौभाग्य प्राप्त था। वैराट नगर जोकि जयपुर जिले में है, अशोक कालीन सभ्यता का एक अच्छा उदाहरण है, यहाँ के भग्नावशेषों में स्तम्भ लेख आदि बौद्ध विहार के खण्डहर प्रमुख हैं। स्तम्भ लेख राजकीय कला के प्रतीक हैं तो बौद्ध विहार के अवशेष जनता के भाव और विश्वास के। इस युग में तथा बाद के युगों में राजस्थानी स्थापत्य में जैन, बौद्ध और हिन्दु विषयों - विचारों को प्रतिष्ठित स्थान मिला। मध्यामिका में, जिसे आजकल नगरी कहते हैं और जो चित्तौड़ से आठ मील उत्तर में बेड़य नदी पर स्थित है, इन विविध प्रवृत्तियों के अच्छे नमूने उपलब्ध हैं। इस नगरी के भग्नावशेष नदी के किनारे - किनारे दूर - दूर तक फैले हुए हैं। यत्र - तत्र कई ईंटे, मंदिर के अवशेष तथा भग्नों के अवशेषों के आधार पर दिखाई देते हैं। इस नगरी के भग्नावशेषों से स्पष्ट है कि यह नगरी तीसरी सदी ईसा पूर्व से छठीं सदी ईसा पूर्व तक एक समृद्ध नगर था। वर्तमान नगरी से कुछ दूर आज भी विशाल प्रस्तर खण्ड प्राकार के रुप में मिलते हैं जो तीसरी सदी ईसा पूर्व के स्थापत्य की विशालता और विलक्षणता प्रमाणित करते हैं। नगर के दक्षिण की ओर नहर के अवशेष मिले हैं जो नदी की बाढ़ से नगर को सुरक्षित रखनो तथा कृषि के उपयोगार्थ बनायी गई थी। यहाँ से मिलने वाली ईंटें, प्रस्तर खण्ड, प्राकार के लम्बे और ऊँचे पत्थर उस युग के स्थापत्य कौशल के अद्वितीय उदाहरण हैं तथा प्रमाणित करते हैं कि उस समय धार्मिक तथा सार्वजनिक भवनों की मिर्माण कला उच्च स्तर की थी, जो आगे आने वाले युग के लिए अद्वितीय देन थी।


इसी तरह उस युग के उत्तरपूर्वी तथा दक्षिण - पश्चिमी राजस्थान, जयपुर तथा कोया के आसपास के क्षेत्र वास्तुकला की दृष्टि से महत्व के हैं। उदाहरणार्थ, नाद्रसा (२२५ ई०) ककोटनगर, रंगमहल आदि अपने धर्म, कृषि वाणिज्य, व्यापार तथा शिल्प की समृद्ध स्थिती के कारण अच्छी बस्ती के स्थान थे। पुरमण्डल, हाडौती, शेखामटी और जाँगल प्रदेश में भी स्थापत्य के उत्कृष्ट नमूने देखने को मिलते हैं। परन्तु जब हम गुप्तकाल और गुप्तोत्तर काल में प्रव्श करते हैं तो राजस्थान के स्थापत्य में एक शक्ति और दक्षता का संचार दिखाई देता है। मेनाल, अमझेरा, डबोक आदि कस्बों के भग्नावशेषों से परावर्ती शताब्दी के नगर निर्माण के अच्छे उदाहरण मिलते बैं। कुण्ड, वापिकाएँ, सड़कें, मंदिर, नालियाँ, आदि का प्रमाणिक संतुलन इन खण्डहरों में देखने को मिलता है। इस समूचे काल के सौन्दर्य तथा आध्यात्मिक चेतना ने भवन निर्माण तथा नगम विकास योजनाओं को ईंटों तथा पत्थर के आकार और प्रकार से आभारित किया। इसी तरह कल्याणपुर का वीरान नगर हमें स्थापत्य के क्षेत्र में नयी दिशा में सोचने की ओर आकृष्ट करता है। यह नगर निकवर्ती दो धाराओं वाली नदी के बीच में बसा हुआ था जिसके किनारे - किनारे मंदिर और बीच - बीच में बस्ती, खेत आदि के खण्डहर दिखाई देते हैं। कल्याणपुर तथा बसी आदि नगरों से मिलने वाले ईंटों को देखकर यह आश्चर्य होता है कि उस युग की संस्कृति कितनी विकसित रही होगी !

राजस्थान के स्थापत्य का इतिहास

राहुल तोन्गारिया
राजस्थान के स्थापत्य का इतिहास उतना ही प्राचीन है, जितना मानव सभ्यता का इतिहास। प्रमाणों से ज्ञात है कि राजस्थान का आदि - निवासी पूर्व - प्रस्तर युगीन मानव था। सरस्वती, चम्बल, बनास, तथा लूनी नदियों तथा अरावली की श्रेणियों के किनारों और गड्ढ़ों में जमी हुई परतें तथा उनके आस - पास के क्षेत्रों में मिलने वाली पत्थरों के औजार इस बात को प्रमाणित करते हैं कि यहाँ का आदि - मानव इन नदियों के तटों और अरावली पर्वत की उपत्यकाओं में कम से कम एक लाख वर्ष पूर्व रहता था। कालांतर में इस पूर्व प्रस्तरकालीन मानव ने उत्तर - प्रस्तरकालीन युग में प्रवेश किया। इस समय तक वह भौंडे औजारों के बजाए पैने एवं चमकीले औजारों को बनाना सीख गया था। मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग तथा चमड़े एवं वल्कल के वस्रों का प्रयोग वह जान चुका था।
इसी प्रकार घास -फूस की झोपड़ियों का घर बनाकर रहने की विधि वह जान चुका था। अन्तत: पूर्व - प्रस्तर कालीन मानव से उत्तर प्रस्तर युगीन मानव में कुछ अन्तर आ चुका था। वह कन्दराओं के बजाय नदी - तटों के खुले स्थानों पर घास - फूस - बाँस की झोंपड़ी बनाकर प्रागैतिहासिक स्थापत्य का जन्मदाता बना और वही उस युग की संस्कृति का द्योतक है। आज भी राजस्थान के घने - जंगली, रेतीले बीहड़ पहाड़ी भागों में रहने वाले आदिवासियों के समुह - समुदाय ऐसे स्थापत्य का प्रयोग करते हैं। कालांतर में प्रस्तर - युगीन मानव प्रस्तर धातु युग में प्रवेश कर गया। स्थापत्य की धुंधली एवं अन्धकारपूर्ण अवस्था में अब समाप्त होती है और राजस्थान की स्थापत्य संस्कृति एक दम आगे बढ़ती है। यहाँ आकर स्थापत्य का एक विशेष रुप देखने को मिलता है। गंगानगर जिले में कालीबंगा और सौंथी में पुरातत्व सम्बन्धी खुदाईयों से यह स्पष्ट प्रमाणित होता है कि ॠगवेद काल से कई सदियों पूर्व सरस्वती एवं दृषद्वति, जिन्हें आजकल घघ्घर और छटूंग कहते हैं के काठे पर जीवन सक्रिय था। इन काठों की उपजाऊ स्थिती अच्छी होने के कारण यहाँ की सभ्यता सक्रिय थी तथा यहाँ की संस्कृति उच्चकोटी की थी। इस प्रान्त के कई रेतीले ढेरों में उन्नत सभ्यता के केन्द्र ढ़ंके पड़े थे। इन ढ़ेरों की खुदाई से प्रमाणित है कि ये समृद्ध सभ्यता के केन्द्र किसी विशेष शैली के अनुरुप बने थे जिनमें हड़प्पा और स्थानीय स्थापत्य की विशेषताओं का समावेश था। यहाँ की चौड़ी सड़कें, सार्वजनिक नालियाँ, दुर्ग का प्राकार, गोल कुएँ, क्रमिक अन्तर वाली नालियाँ, गलियाँ, छोटे - बड़े सटे हुए मकान, वेदियाँ आदि उस युग की शालीन स्थापत्य के साक्षी हैं। दीवारें कच्ची तथा सूर्यतापी ईंटों की होती थी। सड़के विशेष प्रकार के गोल मिट्टी के ढेलों से कड़ी की जाती थी, मकानों के द्वार छोटे होते थे और घरेलू पानी निकलने की व्यवस्था रहता थी। दुर्ग, आंगन, प्राकार वेदी आदि से सांस्कृतिक सम्पन्नता के अच्छे प्रमाण यहाँ देखने को मिलते हैं।

सरस्वती सभ्यता के बाद दक्षिण - पश्चिमी राजस्थान की संस्कृति का जन्म हुआ। यह संस्कृति भी ऐतिहासिक काल तक अनेक रुपों में विकसित होती रही। आहड़, गिलूँड आदि केन्द्र इस सभ्यता के केन्द्र रहे। यहाँ के मकान, छतें, द्वार, बाँस की दीवारें . भौंडे पत्थरों के आंगन तथा दीवारें उस युग के स्थापत्य पर पूरा प्रकाश डालते हैं। मकानों में खिड़कियाँ, द्वार, बरामदे, खुले चौक आवास की पूरी इकाई बनाते थे जो यहाँ की समृद्ध अवस्था पर प्रकाश डालते हैं। ताँबे के कतिपय खानों के निकट होने से खनन कार्य में लगे हुए मानव का बोध होता है। आज भी इसका पुराना नाम ताम्रवती नगरी से जाना जाता है।

इसी प्रकार पौराणिक सभ्यता के युग में राजस्थान के कई सांस्कृतिक केन्द्रों को बोध होता है जिनमें पुष्कर, मसध्वन जाँगल, मत्स्य, साल्व, मरुकांतार आदि प्रमुख हैं। इनसे सम्बन्धित उल्लेखों से ऐसा प्रतीत होता है कि अर्बुद, पुष्करारण्य, बागड़ आदि भागों में जहाँ - जहाँ नगरों के विकास हुआ, वहाँ नगर के चारों तरफ खाईयाँ तथा प्राकारों के निर्माण हुए तथा नगरे में प्रासाद, भवन, वापिकाओं तथा उद्यानों की व्यवस्था रखी गई। पहाड़ी तथा जंगल में बसने वाली बस्ती में घास -फूस, बाँस, खपरैल के मकान बने जिन्हें काँटेदार झाड़ियों से सुरक्षित रखा जाता थआ। इस प्रकार के स्थापत्य से अनुमान है कि उस समय तक नागरिक एवं ग्रामीण स्थापत्य का स्वभाव विकसित हो चुका था और उसके सामंजस्य से एक उन्नत सभ्यता तथा संस्कृति का जन्म हुआ।

राजस्थानी लोक संस्कृति

राहुल तोन्गारिया
लोक संस्कृति की समस्त विद्याओं में लोक संगीत, नाटकों, ख्यालों तथा नृत्यों एवं नाट्यों का अपना ही महत्वपूर्ण स्थान है। इन विद्याओं में लोक संस्कृति, जीवन और लोक मनोरंजन का अपना ही अनुपम रुप निहारने को मिलता है। इन विद्याओं का नहीं कोई जन्मदाता है और ना कोई शास्र और प्रणेता रहा है। इनके अन्तर्गत जो नाच, गीत, नाट्य, संगीत इत्यादि हैं उनके रचयिता भी अज्ञात हैं। सामुदायिक वातावरण और परम्परागत अभ्यास ने इन कलाओं को जीवित रखा है। मौखिक स्मरण और लौकिक रुढियों में ढ़ली यह कला आज भी जीवित हैं। युग - युगान्तर से जन्मी - पनपी यह सांस्कृतिक विद्या राजस्थान संस्कृति का अभिन्न अंग है जो राजस्थान संस्कृति की प्राण बनी हुई है। इन सांस्कृतिक विद्याओं को लोक शब्द से जोड़ा गया है, इसलिए नहीं कि इनका सम्बन्ध केवल ग्रामीण जीवन या आदिवासी जीवन से है। चाहे गांव हो या शहर, सभी स्थानों में लोक - गीतों, लोक - नृत्यों, ख्यालों व नाट्यों का प्रमुख स्थान है। पर्वों एवं धार्मिक तथा सामाजिक उत्सवों और त्यौहारों में में ऐसे अनेक गीत तथा नृत्यऔर मनोरंजन का साधन हैं जो ग्रामीण जीवन और कस्बों और नगरों में समान रुप से मिलते हैं। सामाजिक जीवन और संस्कृति के प्रतीकों के बीच कोई अन्तर नहीं है और न ही इनके मध्य कोई सीमा रेखा खींची जा सकती है। इनकी अभिव्यक्ति मनोवैज्ञानिक, बौद्धिक तथा धार्मिक प्रवृत्तियों में सर्वत्र मिलती है जिनका रसास्वादन सम्पूर्ण जनता करती है। लोक का व्यक्त रुप मानव है, एतएव लोक संस्कृति व्यावहारिक जीवन का परिष्कृत रुप है।
लोक संस्कृति के तीन मुख्य स्तम्भ है :

१) लोकनाट्य
२) लोकगीत
३) लोकनृत्य
इन तीन स्तम्भों के अन्तर्गत लोक संस्कृति का क्रमवार विशलेषण आगे के पृष्ठों में किया जा रहा है-

लोक नाट्य
 


लोक नाट्य की परम्परा बड़ी प्राचीन है जिसको हम स्वांग, लीला और ख्याल के रुप में प्रचलित पाते हैं। लोक - नाट्य भरतपुर और जयपुर दोनों में बड़े लोकप्रिय हैं। रामायण और कृष्ण लीलाओं पर आधारित कथाओं के साथ लोक जीवन को इस तरह प्रदर्शित किया जाता है कि राम व सीता अथवा कृष्ण और राधा एक साधारण व्यक्ति के रुप में आते हैं और उनकी पोशाकें भी लोक लोक परिपाटी के अनुकूल होती है। इन प्रदर्शनों में धर्म, नैतिकता, मनोरंजन और व्यावहारिकता को इस तरह संयोजा जाता है कि लोक जीवन का सच्चा स्वरुप प्रकट हो जाता है। आज इन लीलाओं का मंचन कमतर हो चला है, इन लीलाओं के प्रति पात्र और दर्शक उदासीन हैं, फिर भी दशहरे के अवसर पर यत्र - तत्र इनका आयोजन होता रहता है। भरतपुर, अलवर, करौली आदि भागों में रासलीला का प्रचलन अद्यावधि भी देखा जाता है। इन खेलों की भाषा स्थानीय रहती है और कई स्थलों को संवाद अथवा गीतों द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। बीच - बीच में हास्य -संवाद मनोरंजक होते हैं।




रम्मत :
बीकानेर और जैसलमेर में लोक नाट्यों में"रम्मत"सामुदायिक स्वरुप को निभा रही है। रम्मत में समभागी सभी जाति वर्ग के लोग होते हैं और सभी समुदाय के लोग इसमें रस लेते हैं। भाषा और क्षेत्रीय रंगत के कारण"रम्मत"की लोकप्रियता अन्य क्षेत्रों में नहीं है। प्रारम्भ से ही समस्त पात्र रंगमंच पर बैठे मिलते हैं और अपना - अपना करतब दिखाकर स्थान ग्रहण करते हैं। इसमें टेरियों और गायकों की प्रमुखता रहती है।

ख्याल :


ख्याल सम्पूर्ण राजस्थान में अपनी क्षेत्रीय रंगत के लिए बड़े लोकप्रिय है। इनमें अनेक वीरों की कहानियाँ इस तरह समाविष्ट हैं कि वे वीर रस प्रधान होते हुए भी अन्य रसों को व्यक्त करने में पीछे नहीं रहते। जब इन ख्यालों को व्यावसायिक होने का अवसर मिला तो विषय एवं रंगत की विशेषता ने इन्हें राजस्थान से बाहर भी लोकप्रिय बना दिया। ये ख्याल कभी कभी धार्मिक कथानकों को गायन, वादन और संवाद से सम्मलित कर इनकी उपयोगिता को बढ़ा देते हैं। धर्म और वीर रस प्रधान ख्यालों में अखरुपता तो दिखाई नहीं देती , परन्तु ध्येय की दृष्टि से अपने - अपने क्षेत्र में उनमें विविधता आ जाती है। फिर भी इनकी लोकप्रियता बनी रहती है। इन ख्यालों को क्षेत्रीय भाषाओं और स्थानीय परिवेश में रखे जाने से यह नहीं समझना चाहिए कि इनकी सांस्कृतिक इकाई में कोई व्यवधान है। वे ख्याल परम्परा के अंग हैं। अमर सिंह रो ख्याल , रुठी रानी रो ख्याल , पद्मिनी रो ख्याल , पार्वती रो ख्याल , आदि भिन्न भिन्न रंगत प्रस्तुत करने पर भी सांस्कृतिक आधार में समान है।

भवाई नाटक :

राजस्थान में भवाई नाट्य अपने ढ़ंग का अनूठा नाट्य है। इसमें पात्र व्यंगवक्ता होते हैं। तात्कालिक सवाल - जवाब तथा सामाजिक समस्याओं पर चोट करना प्रमुख कार्य है। इनके खेल परम्परा पर आधारित रहते हैं परन्तु पात्र स्थानीय एवं सामयिक समस्याओं को लेकर व्यंगों का निरुपण कर दर्शकों को दंग कर देते हैं। इनका कोई रंगमंच नहीं होता, परन्तु कुशाग्र संवाद से इनके प्रदर्शन में समा बंध जाता है। भवाइयों को नाटकों के मूल लेख परिवर्तित होते रहते हैं। इनमें गायकी के गायन और भवाइयों की हँसी मजाक और संवाद तथा नृत्य बड़े रोचक होते हैं। इनमें कथानक तो गौण हो जाते हैं पर गायन, हास्य और नृत्य पूरे तौर पर छा जाते हैं।

वादन, संवाद, प्रस्तुतिकरण और लोक संस्कृति के प्रतीकों में मेवाड़ की ' गवरी ' निराली है। इसमें कई तरह नृत्य नाटिकायें होती हैं। गवरी का उद्भव शिव भस्मासुर की कथा से तथा किंवदन्तियों पर आधारित है। नृत्य नाटिकायें पौराणिक कथाओं, लोक कथाओं और लोकगाथाओं और लोकजीवन की विभिन्न झाँकियाँ पर आधारित होती है। शिव भस्मासुर कथा अनुसार भस्मासुर ने अपनी तपस्या से शिवजी को प्रसन्न करने की शक्ति प्राप्त कर ली थी। उसने पार्वती को पाने के लिए शिव पर ही उसका प्रयोग करना चाहा। अन्त में विष्णु भगवान ने अपनी लीला से शिव को बचाया और भस्मासुर का हाथ उसी के सिर पर रखवा कर उसका अन्त किया। इसी संदर्भ में शिवजी ने भीलों को साथ नृत्य किया जो आगे चलकर गवरी के रुप में प्रचलित हुए। गवरी का आयोजन रक्षा बन्धन के दूसरे दिन से शुरु होता है। खेड़ा देवी से भोपा भादवा कृष्णा एकम् को आज्ञा लेता है। इसके बाद पात्रों के कपड़े बनते हैं। पात्र मंदिरों में "धोक"देते हैं और नव - लाख देवी - देवता, चौसठ योगिनी और बावन भैंरु को स्मरण करते हैं। दो चार गाँवों के समझौते के बाद गवरी आरम्भ होती है जिसके पात्र व्रत और संयम रख कर इसको स्थान - स्थान पर जाकर खेलते हैं। गवरी का मुख्य पात्र बुढिया भस्मासुर का जप होता है और अन्य मुख्य पात्र"राया"होती है जो स्री वेष में पार्वती और विष्णु की प्रतीक होती है। भामट्या नाम का पात्र लोकभाषा में कविता बोलता है और खट्कइया उसको दोहरातें हैं और बीच - बीच में जोकर का काम करता है। बुढिया भी खट्कइये के समय - समय पर संवाद में पूरक बनता है। शेष सभी पात्र ' खेला ' कहलाते हैं। गवरी में मुख्य पात्र होते हैं। पात्रों के खेलों में गणपति, भूमरिया, भेवावड़, मीणा, कान - गूजरी, जोगी, लाखा बण्जारा नटड़ी तथा माता और शेर के खेल होते हैं। कान्ह - गूजरी के खेल में मजीरा और चीमरे बजते हैं और अन्य खेलों में मादल और थाली बजाते हैं। खेल के पात्रों में जादू, टोना, और तान्त्रिक प्रयोग किए जाते हैं, जिन्हें ' झाड़ा फूँका ' के माध्यम से ठीक किया जाता है। गवरी सवा महीने तक खेली जाती है। इस अवधि में राई , बुढिया और भोपा नंगे पाँव रहते हैं, जमीन पर सोते हैं और स्नान नहीं करते। कुछ क्षेत्रों में राई, बुढिया दूध पीकर ही रहते हैं; शराब माँस और हरी सब्जी का इस अरसे में निषेध रहता है। गवरी का व्यय, प्रमुख गाँव जहाँ से गवरी आरम्भ होती है, वहन करता है और जिन गाँवों में गवरी खेली जाती है, खाने - पीने का व्यय उसी गाँव केलोग करते हैं। आदिवासियों की गवरी गाँव के चौराहे से प्रारम्भ होती है और शकुन को लेकर दिशा निश्चित कर आगे गाँवों के लिए प्रस्थान करती है। गवरी समाप्ति पर दो दिन पहले ज्वार बोये जाते हैं और एक दिन पहले कुम्हार के यहाँ से मिट्टीका हाथी लाया जाता है। हाथी के आने के बाद भोपे का भाव बन्द हो जाता है। मय, जावरा हाथी के गवरी विसर्जन प्रक्रिया होती है जिसे किसी जलाशय में विसर्जित करते हैं। कहीं कहीं गाँव के बाहर गाड़ दिया जाता है। गवरी समाप्ति के छठे दिन नवरात्रि का आरम्भ हो जाता है। यह पर्व आदिवासी जाति पर पौराणिक तथा सामाजिक प्रभाव की अभिव्यक्ति है। इसकी लोकप्रियता सभी जातियों के लोगों की इसमें रुचि लेने से सुस्पष्ट है। उनके खेल, कथानक, वीर गाथाओं से जुड़ी हुई यह नृत्य नाटिका गवरी के आरम्भ और समाप्ति में पूर्ण रुप से स्वीकर की जाती है। ध्वाजारोहण और ध्वज का आद्योपान्त रखना दैविक शक्ति की मान्यता पर बल देना है। यह ध्वज एक प्रकार से अनुयायियों, दर्शकों और पात्रों के बीच दैवी शक्ति की प्रधानता स्वीकार करने के माध्यम का काम करता है। भोपे, पात्र और दर्शक सभी खेल के हर क्षण देवी की प्रत्यक्षता अनुभव करते हैं। युद्ध विजय और पराजयों तथा नृत्यों के प्रसंग देवी के आशीर्वाद से आरम्भ और समाप्त होते हैं। ऐसे लगता है कि गवरी द्वारा सम्पूर्ण वातावरण आस्था से ओत - प्रोत हो जाता है। इसके द्वारा नाटकीय अभिव्यक्तियाँ एक ऐसी सामाजिक स्वतन्त्रता की प्रतीक बन जाती है कि उनमें जात - पात, रंग, वर्ण भेद का कोई स्थान नहीं रहता। देव देवताओं की आराधना के प्रसंगों में गवरी के पात्र पूर्ण स्वतन्त्रता से कई र - रिवाजों तथा गाँवों के अधिकारियों की आलोचना एवं समर्थन करते हैं जिससे दर्शकों में एक सामाजिक चेतना अनायास प्रवेश कर जाती है और स्वतन्त्र जीवन का सूत्र बन जाती है।

आदिवासी क्षेत्रों में होली के अवसर पर लगभग पूरे मास गेर नृत्य का चलन बड़े उल्लासमय और स्फूर्तिदायक रुप में होता है। सामूहिक रुप में विशेषकर पुरुष लड़कियों के डंके के साथ नाचते हैं जिसमें प्रत्येक अंग का भाग तोड़ और मरोड़ के साथ ताल से नाचता है और बीच में ढोल का ठमका बजाता रहता है। लगभग आधी रात तक यह क्रम चलता है, कभी कभी स्री पुरुष के जोड़े एक कतार में दो दलों के रुप में पास आते हैं और पीछे हटते हैं। इस नृत्य में भीली संस्कृति की प्रधानता रही है। इसके साथ जो संगीत की लड़ियाँ गाई जाती हैं, वे किसी वीरोचित गाथा का प्रेमात्यान के खण्ड होते हैं। फसल भी खुशहाली की द्योतक लयों को भी गा - गाकर नृत्य के साथ जोड़ा जाता है। वर्तमान में इस नृत्य की लोकप्रियता इतनी बढ़ गयी कि भीलों के अतिरिक्त अन्य जातियाँ भी इस अवसर पर"गेर"बनाकर नाचते रहते हैं और इसके साथ गाते भी हैं। कृषक समाज में भी इसका प्रचलन है जो फसल काटने के पश्चात् और फसल बोकर गेर करते हैं।

लोकनृत्य :

पुरुष प्रधान नृत्यों की भांति राजस्थान में महिलाओं द्वारा भी कुछ नृत्यों का आयोजन होता है जिसमें एकल, युगल और सामुहिक नृत्य मुख्य हैं।"ऊब नाच"में महिला अकेली नाचती हैं जिसमें हाथ, पैर और कमर का मुड़ाव बड़ा रोचक होता है। सिर पर घड़ा या घड़े रखकर नाचना"मटकी नाच"कहलाता है जो कई करतबों से जुड़ा रहता है। सामूहिक रुप में"चपटी नाच","ताल नाच", "डांडिया नाच"भी बड़े रोचक होते हैं। विवाह तथा गणगौरके अवसर पर या तीज के त्यौहार रहता है। श्रावण मास में इस प्रकार के नाचों के छटा बड़ी अद्वितीय होती है।


महिला नृत्य में गरबा भक्तिपूर्ण नृत्य कला का अच्छा उदाहरण है। यह नृत्य शक्ति की आराधना का दिव्य रुप है जिसे गुजरात के प्रत्येक शहर और गाँव में नवरात्रि के अवसर पर देखा जाता है। गुजरात से जुड़े डूँगरपुर और बाँसवाड़ा में भी इसका प्रचलन व्यापक रुप से समाहित है। इसके साथ साथ द्रविड़ संस्कृति के भ मेवाड़ा, नागर, आदित्य आदि जातियों में भी"गरबा"के अवसर को बड़े धूमधाम से मनाती है। गरबा का स्वरुप रास, गरबा, डाँडिया, गवरी आदि में अभिव्यक्त होता है जो हस्तला के प्रकार हैं। ऐसी मान्यता है कि प्रारम्भ में इस कला का उपयोग आद्यशक्ति की आराधना से प्रारम्भ हुआ। इसकी आराधना में मिट्टी के घड़ों में छिद्र कर और उसमें ज्योति प्रज्वलित कर उसे सर पर रखकर स्रियाँ गर्भगृह के आसपास प्रदक्षिणा करती थी। धीरे - धीरे यह विधि गोलाकार नृत्य में परिणत हो गई। मुख्य रुप से गरबे के तीन स्वरुप देखे जाते हैं पहले में शक्ति की आराधना एवं अर्चना है। दूलरे में कृष्ण - राधा, गोप - गोपियों का प्रणय चित्रण हैं और रास नामक नृत्य की प्रस्तुति है। तीसरे स्वरुप के अन्तर्गत लोक जीवन का सौन्दर्य पक्ष प्रस्तुत किया जाता है।


इसमें पनिहारी, नव - वधू की भावुकता और गृह कार्य में रत स्रियों का चित्रण रहता है। आराधना - दीपक, कलश, नृत्य ताली, चुटकी से नाच होता है और घरों में अखण्ड ज्योति दुर्गा, अम्बिका माता की आराधना में लगाई जाती है। नवरात्रि की समाप्ति के अवसर पर इसका विसर्जन होता है। गरवा लेते समय अनेक लयों में गीत गाए जाते हैं जो अम्बा की भक्ति के पोषक होते हैं या जिनमें नारी समस्त भावनाओं को वाद - माधुर्य और अर्थ - सौन्दर्य के साथ प्रस्तुत किया जाता है। गरबा नृत्य लोक जीवन और दैवी शक्ति की अप्रतिमता प्रस्तुत करता है। इसमें मानव संस्कृति और पारलौकिक भावनाओं का अनुपम सम्मिश्रण है। गरबा ने लोक जीवन को धर्म और संस्कृति के प्रति आस्थावान बनाने तथा परम्परागत भक्ति तथा रुढियों को स्थायित्व प्रदान करने में बड़ा योग दिया है। गुजरात और राजस्थान की संस्कृति के समन्वय का सुन्दर रुप हमें"गरबा"नृत्य में देखने को मिलता है। गरबा में गाये जानेवाले पदों में सौभाग्य, कल्याण, प्रेम और उल्लास प्रतिध्वनित होते हैं। हास्य रस का समावेश देवर, भौजाई, ननद, सौत, सास आदि को लेकर गरबा के गीतों में किया जाता है। राधाकृष्ण के प्रेम अथवा मीरा की भक्ति से सम्बन्धित गीतों की लय गरबा में रहती है। इन पदों में कितना सौन्दर्य और आसक्ति है ----

"नागर नंदजी ना लाल
रास रमता मारी नथनी खोवाणी"
"हूँ तो जोगण बनी हूँ म्हारा बालमजी,
बालमजी प्रेम आलमनी"
"उगे छे - प्रभात आज धीमे धीमे
उगे छे उषानु राज्य धीमे धीमे"


राजस्थानी लोकगीत :


राजस्थानी लोकगीत संगीत के क्षेत्र में अनमोल हैं। इनको किसी ने न लिखा है और न ही इनके रचयिता का पता है। ये मौखिक परम्परा और अनुश्रूती पर आधारित रहे हैं। मानस पटल की उपज लोने के नाते इनमें सांस्कृतिक और कलात्मक प्रवृत्तियाँ प्रविष्ट हो जाती हैं। इनमें मानव समाज की विशिद्ध मनोवृत्तियाँ और भावनाएँ समयोचित प्रसंगों पर हर्ष - विषाद, प्रेम ईर्ष्या, उल्लास - भक्ति आदि प्रकट होती हैं। मौखिक होने से एकल और बहुधा सामुहिक रुप से इन्हें गाया जाता है। इनके द्वारा बुद्धि, सौन्दर्य, सुख, भक्ति तथा आनन्द का अनुभव होता है। विवाह, जन्म या अन्य त्यौहारों पर पति - पत्नि, ननद - भौजाई, सती, मातृ - भक्ति, शौर्य, रीति - रिवाज, शक्ति, आराधना, ज्ञान, दर्शन, नीति आदि विषयों को प्राचीन और वर्तमानकालीन आदर्शों और मानव धर्म के सिद्धान्तों के रुप में इनमें अभिव्यक्ति होती हैं। गीतों में उपदेश और त्याग का इतना वर्णन रहता है कि गाने वाले और सुनने वाले में एक नई प्रेरणा का भाव भर जाता है। विवाह और पुत्र जन्म के गीतों में उल्लास है तो पुत्री की विदाई में लौकिक दुख का प्राबल्य है। इसी तरह रात्रि - जागरण के गीतों में भक्ति रस समाया मिलता है। तीज के त्यौहार के गीतों में प्राकृतिक छटा और पति - पत्नि संयोग या वियोग तथा सहेलियों के सहवास के भावों का अच्छा संयोग दिखाई देता है। जन - जीवन में व्याप्त हर्ष, कामनाओं और अभिलाषाओं का यदि अविरल स्रोत प्राप्त करना है तो वह लोकगीतों में मिलेगा। लोकगीतों का माध्यम जितनी स्रियाँ हैं उतने पुरुष नहीं। जितना प्रेम, स्नेह, विषाद, पीड़न, और उल्लास का चित्रण महिलाएँ कर सकती हैं अन्य व्यक्ति नहीं कर सकते। उनके कण्ठ स्वर निकलते हैं व वास्तविकता के निकट में सहजता से पहुँचते हैं। गीत के बोल बालिका अवस्था में यौवन या प्रौढ़ अवस्था तक वेद वाक्य बन जाते हैं जिससे महिलाओं में एक अनमोल आस्था उत्पन्न होती है। वेदों की भाँति लोकगीत भी हमारी संस्कृति के अटूट भण्डार बन जाते हैं और समाज के भव्य भवन को स्थायित्व प्रदान करते हैं।

गणगौर के अवसर पर गाये जाने वाले अनेक गीतों में भक्ति और प्रेम टपकता है जो साहित्य की दृष्टि से बड़ा महत्वपूर्ण है :
"खेलग दौ गिणगौर भमवर, म्हाँनै पूजण दौ गिणगौ
औ जी म्हारी सैल्याँ जौवे बार, भँवर म्हानै खैलण दौ गिणगौर"
इसी प्रकार यौवन की पिपासा के साधनों के जुटाने में स्री हृदय कितनी शान्ति का अनुभव करती है जो इस गीत में प्रकट है :
"चुग - टुग कलियाँ सेज बिछाई
पौढणरी रुत आसी"
मारुजी को सम्बोधित कर सौभाग्याकांक्षा का रुप भी इन पंक्तियों द्वारा पत्नी व्यक्त करती है :
"उदयपुर से तो सायबा पीलो मंगओजी
तो नानीसी बंधण बंधाओ गाढा मारुजी"

विवाह या बनौले के अवसर रक गाये जाने वाले गीतों में राजस्थान की गर्मी और सौन्दर्य का अच्छा वर्णन है :

"धूप तपे धरती तपे रे
गोरो गोरो मुखड़ों कुम्हलाय"
तीज सम्बन्धित गीतों में कितनी लालसा है :
"तीज सुण्याँ घर आव

मँझल आपरो नौकरी महाराज
जीत सुण्याँ घर आव"
होली सम्बन्धी गीत में कितना उल्लास भरा है :
"म्हाँरी घूमर छे नखराली ए माँ
घूमर रमवा म्हे जास्याँ "

राजस्थान में लोक संगीत किसी न किसी लोकवाद्य से जुड़ा हुआ है। पाबुजी की कथा के साथ रावण हत्या या गूजरी, बगड़ाव के साथ गला लगे, अर्जुननंग (बाँसवाड़ा, डूँगरपुर) के साथ केन्द्र और अनेक बड़ी गेय कथाओं के साथ तंदूरा व मजीरा जुड़ा हुआ है। यह भी एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि अनेक अवदानात्मक नायकों के साथ वाद्य विशिष्ट रुप से प्रयुक्त हो रहे हैं। इसी प्रकार देवीयों के साथ भी वाद्य हैं। कैलादेवी के मेले में नगाड़ें, तासे और तीनतारा है जो सारंगी की तरह बजाया जाता है। उसके तीन मुख्य तार घोड़ों की पूँछ के बाल के गुँथाव से लगाए जाते हैं। जोगिया सारंगी का प्रसार पूरे अलवर, भरतपुर जिले में हैं --साथ ही झूँनझूँनू, सीकर से लेकर नागौर तक का मुख्य लोक वाद्य है। जोगियों के साथ साथ कोली, माली व गू भी एक प्रकार का पूंगी वाद्य बजाते हैं। इस क्षेत्र में इसे पूंगी कहा जाता है। सामान्यत: पूंगी नामक वाद्य का नाम सपेरों से जुड़ा हुआ है। नलीवाले तूँबे से यह वाद्य बनता है। किन्तु इस क्षेत्र में पूंगी का अर्थ मशक व बंग पाइप है। यह बकरी की खाल से बनी एक बड़ी मशक है जिसमें एक ओर वाल्व लगे हुए मुख से फूँक भरी जाती है जिससे रीड लगी हुई दो बाँसुरियों से संगीत - ध्वनी निकलती है। सांगीतिक रुप में पूँग का प्रयोग सीमित है। इसमें केवल पाँच छेद होते हैं जो पूरे सप्तक का काम नहीं करते। इस प्रकार के पाँच छेद वाले वाद्य लक्ष्मणगढ़ के मीणा क्षेत्र से लगे आदिवासी जन - समुदाय में प्रचलित है जो खेराड़ और मेवाड़ तक चले जाते हैं। भीलवाड़ा के निकट भी भीलों द्वारा देशी मशक बनाई व बजाई जाती है। लक्ष्मणगढ़ एवं उसके आसपास के क्षेत्र में मेव व मीणों की बड़ी बस्तियाँ हैं। इन मेवों में मिरासी है जो गायक हैं, ये चिकारा, जोगिया, सारंगी, शास्रीय सारंगी जैसे यन्त्र वाद्यों को बजाते हैं। भपंग एक प्रकार का लय वाद्य है तो तूँबे पर चमड़ा मढ़ कर एक तार के तनाव से बजता है। मिरासियों में भपंगवादन अदभुत् जटिल लयों को अनुबंधित कर सकता है। भीलों में ढूचकों एवं भपूंग वाद्य प्रचलित है। ढोल, शहनाई, ढोलक, पूँगियों आदि का प्रयोग विवाह, त्यौहार आदि रीजि - रिवाजों और उत्सवों में किया जाता है।


लोकगीत, लोकनाट्य एवं लोकवाद्य राजस्थानी संस्कृति एवं सभ्यता के प्रमुख अंग हैं। आदिकाल से आजतक इन कलाओं का विविध रुप में विकास होता आया है। इन कलाओं का पारस्परितक सम्बन्घ भी घनिष्ठ है। इन सभी का साथ -साथ प्रयोग रंगमंच या तौराहों पर समां बाँध देता है। ये कलाएँ किसी न किसी पूर में शास्रीय संगीत की सीधी विचारों से नहीं जुड़ती हैं परन्तु लय और ताल में समानता आ जाती है। यदि इन कलाओं के इतिहास पर दृष्टिपात करें तो ज्ञात होता है कि रह युग में इनमें एकरुपता रही है जिनकी अभिव्यक्ति राजस्थानी जन जीवन में प्रस्फुटित हुई है। इन विद्याओं के विकास में भक्ति, प्रेम, उल्लास और मनोरंजन का प्रमुख स्थान रहा है। इनके पल्लवन में लोक - आस्था की प्रमुख भूमिका रही है। बिना आस्था और विश्वास के इन लोक कलाओं में अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
लोककला का राजस्थानी स्वरुप आज भी भारतीय लोककला को नई दिशा देने में अग्रणी है। इनकी केन्द्रीय स्थिती पंजाब, मध्य भारत एवं गुजरात तथा उत्तर प्रदेश इन लोक कलाओं से प्रभावित है। इन भागों के विविध जीवन पक्षों में राजस्थानी लोक कलाओं के प्रभाव का दिग्दर्शन होता है। इन कलाओं के विषय और साहित्य ने भारत के ही नहीं, विदेशों के कला मर्मज्ञों के हृदय को भी आकर्षित करने में सफलता प्राप्त की है ग्राहस्थ्य जीवन की सभी साधें लोक कला के माध्यम से प्रकट हुई है।

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