राजस्थान की साहित्यिक पत्रिकाएँ - नए अंक


राजेश शर्मा


साहित्यिक लघु पत्र-पत्रिकाओं के सम्बन्ध में राजस्थान धनी रहा है। ’लहर‘, ’बिन्दु‘, ’क्यों‘, ’वातायन‘ और ’पुरोवाक‘ जैसी हिन्दी जगत् की ख्यातनाम पत्रिकाएँ यहीं से प्रकाशित हुईं और उन्होंने बडे पाठक वर्ग तक अपनी पहुँच बनाई। भूमण्डलीकरण के नये दौर में विसंस्कृतीकरण से प्रतिरोध का जैसा काम साहित्यिक पत्रिकाओं ने किया है वह श्लाघनीय है। प्रतिरोध की परम्परा को सुदृढ करते लघु पत्रिकाओं के नये अंक पिछले दिनों आए हैं, जिन्हें पढना किसी भी पाठक के लिए सुखद है। 
’संबोधन‘ पिछले ४४ वर्षों से नियमित प्रकाशित हो रही वह लघु पत्रिका है जिसने राजस्थान का नाम देश में ही नहीं अपितु दुनिया भर के हिन्दी प्रेमियों में किया है। संबोधन के अनेक महत्त्वपूर्ण विशेषांक बीते वर्षों में आते रहे हैं। अप्रैल-जून २०१० का नया अंक सुपरिचित कवि-कथाकार विष्णु नागर के कृतित्व पर केन्दि्रत है। व्यक्ति केन्दि्रत विशेषांकों का चलन नया नहीं है, बल्कि अब क्षेत्रीयता के संकुचन से ऊपर व्यापक दृष्टि से ऐसे अंकों का आना हिन्दी साहित्य के लिए शुभ संकेत है। प्रस्तुत अंक में विष्णु नागर के अंतरंग मित्रों ने जहाँ उनके बहुआयामी लेखक व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला है, वहीं लगभग डेढ दर्जन आलोचनात्मक आलेखों में उनके लेखन का सम्यक विवेचन-मूल्यांकन है। 
अंक में विष्णु नागर से दो साक्षात्कार भी प्रकाशित हैं, जिन्हें पढना रोचक है। अतुल चतुर्वेदी से बातचीत में उन्होंने कहा है कि ’’लिखित शब्द की विश्वसनीयता गहरी है।‘‘ आगे वे एक प्रश्न के उत्तर में कहते हैं, ’’राजस्थान का परिदृश्य काफी सम्भावनापूर्ण है। कुछ कारणों से सामान्यतः राष्ट्रीय परिदृश्य पर वह महत्त्व नहीं मिल पाया जिसके वे हकदार थे। फिर भी राजस्थान में इन दिनों काफी अच्छा काम हो रहा है।‘‘ कमर मेवाडी के संपादन में प्रकाशित इस विशेषांक के अतिथि सम्पादक युवा कवि हरे प्रकाश उपाध्याय ने सचमुच एक यादगार अंक दिया है। 
’कृति ओर‘ कवि विजेन्द्र द्वारा प्रकाशित संपादित चर्चित लघु पत्रिका रही है, इन दिनों डॉ. रमाकांत शर्मा इसका संपादन कर रहे हैं। पत्रिका का नया अंक अप्रैल-जून २०१० प्रकाशित कविताओं तथा विचारोत्तेजक पत्रों के कारण उल्लेखनीय बन पडा है। कवि-सम्पादक शंभु बादल से लताश्री की बातचीत हमारे समय और साहित्य को चिंता के दायरे में लाती है। एक प्रश्न के उत्तर में शंभू बादल ने कहा, ’’पहल बंद होने से अन्य लघु-पत्रिकाओं का दायित्व और बढ जाता है।‘‘ युवा कवि अमित, मनोज, आईदान सिंह भाटी, रामकुमार कृषक और राजकुमार कुम्भज की कविताएँ अंक की उपलब्धि हैं। विरासत-स्तम्भ में प्रकाश चन्द्र गुप्त का आलेख ’प्रगतिशील आलोचना के मान‘ और कवि विजेन्द्र का ’कवि की प्रतिबद्धता‘ साहित्य के सामाजिक सरोकारों की पुनर्स्थापना करते हैं। कहना न होगा कि कविता के संबंध में ’कृति ओर‘ का दाय सचमुच उल्लेखनीय है। 
’प्रतिश्रुति‘ मरुधर मृदुल द्वारा संपादित वह पत्रिका है जो विगत दस वर्षों से राजस्थान की रचनाशीलता को व्यापक परिदृश्य में स्थापित कर रही है। नये अंकअप्रैल-जून २०१० में पन्द्रह कवियों की कविताएँ, गजलें, दो कहानियाँ और अन्य विविध सामग्री मिलकर पत्रिका को बहुआयामी बनाते हैं। युवा कवि विवेक कुमार मिश्र की कविता ’रंग और प्रकृति‘ की पंक्तियाँ हैं - मनुष्य को भी / प्रकृति की तरह / अपने ही रंग से / खिलना चाहिए। अंक में ओम नागर, डॉ. भगवतीलाल व्यास, रजत कृष्ण, शहंशाह आलम और राज्यवर्द्धन की कविताएँ भी उल्लेखनीय हैं। हसन जमाल और हबीब कैफी की कहानियाँ पढना अपने दौर की विडम्बनाओं को सही-सही समझना है। 
’अक्सर‘ हेतु भारद्वाज के संपादन में प्रकाशित हो रही वह पत्रिका है जो अपने खास तेवर के लिए जानी जाती है। नये अंक अप्रैल-जून २०१० में रामशरण जोशी का कविवर अज्ञेय पर लिखा संस्मरण सचमुच स्मृतियों में ले जाता है। मुक्तिबोध को याद करते हुए दो समकालीन कवियों चन्द्रकांत देवताले और हरिराम मीणा की कविताएँ पढना एक समृद्ध अनुभव है। ’ब्रह्मराक्षस‘ की रोशनी में कविताएँ हमारे संकटों के इर्द-गिर्द नये दृश्यों को पहचानने वाली हैं। नंद चतुर्वेदी और शशि प्रकाश चौधरी ने क्रमशः नेमीचन्द भावुक और प्रभाष जोशी पर संस्मरण लिखे हैं तो प्रीता भार्गव, रणजीत, रेणु दीक्षित की कविताएँ भी उल्लेखनीय हैं। विमर्श के अन्तर्गत ब्रजरतन जोशी, रमेशचन्द्र मीणा, राजाराम भादू और उर्वशी शर्मा के आलेख विचारोत्तेजक हैं। 
’बनास‘ का प्रकाशन अनियतकालीन है तथापि इसका दूसरा अंक एक नयी जीवंत बहस को स्थापित करने वाला है। ’गल्पेतर गल्प का ठाठ‘ शीर्षक से आया तीन सौ पृष्ठों का नया अंक चर्चित उपन्यास ’काशी का अस्सी‘ के बहाने हिन्दी उपन्यास के स्वरूप पर गंभीर बहस करता है। शीर्ष आलोचकों - नामवर सिंह, विश्वनाथ त्रिपाठी, नंद किशोर नवल, मधुरेश, नवल किशोर और जीवन सिंह के साथ कथाकार-संपादक राजेन्द्र यादव ने भी इस बहस में भागीदारी की है। अंक कई खण्डों में विभाजित हैं - चिट्ठियाँ, साक्षात्कार, नजरिया, संस्मरण और मंचन में ’काशी का अस्सी‘ को जानना सचमुच आश्वस्तिप्रद है। यह जोखिम पत्रिका ने उठाया है कि समकालीन रचनाशीलता से ही एक कृति पर ग्रंथाकार अंक प्रकाशित कर दिया गया है। उपन्यासकार काशीनाथ सिंह से साक्षात्कार और उनके कुछ आलेख लेखक का पक्ष उपस्थित करते हैं। संपादक और युवा आलोचक पल्लव ने यह स्थापित करने का प्रयास किया है कि काशी का अस्सी कहन, कथा और चलन में नयेपन का सूत्रपात करता है। 
कहना न होगा कि हिन्दी भाषी व्यापक समाज में लघु पत्रिकाओं की आवश्यकता बनी हुई है और आलोच्य पत्रिकाओं के साथ सैकडों छोटी-बडी पत्रिकाएँ यह दायित्व पूरा कर रही हैं

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