Wednesday, 9 March 2011

आदिवासियों का मुख्य पर्व ‘बेणेश्वर मेला’

साभार : हिंदुस्तान लाईव
बेणेश्वर मेला, डूंगरपुर, राजस्थान



साभार : जागरण
भील माही, सोम तथा जाखम नदियों के पवित्र जलसंगम पर डुबकी लगाने के पश्चात भगवान शिव के दर्शन के लिए बेणेश्वर मंदिर जाने को हर कोई बेताब रहता है। यह अवसर होता है बेणेश्वर मेले का, जो आदिवासियों का मुख्य त्योहार है। इसे वनवासियों का महाकुंभ कहा जाता है ।
माघ शुक्ल पूर्णिमा के अवसर पर राजस्थान के प्रसिद्ध ऐतिहासिक शहर डूंगरपुर से 60 किलोमीटर की दूरी पर बेणेश्वर मंदिर के परिसर में लगने वाला यह मेला भगवान शिव को समर्पित होता है। सोम व माही नदियों के संगम पर बने इस मंदिर के निकट भगवान विष्णु का भी मंदिर है, जिसके बारे में मान्यता है कि जब भगवान विष्णु के अवतार माव जी ने यहां तपस्या की थी, यह मंदिर उसी समय बना था।
चार दिनों तक चलने वाला यह मेला मुख्यत: इस क्षेत्र की आदिवासी भील जाति का मुख्य त्योहार है तथा इस मेले में राजस्थान के अलावा मध्य प्रदेश एवं गुजरात से हजारों आदिवासी भील सोम, माही व जाखम नदियों के पवित्र संगम पर डुबकी लगाने के पश्चात भगवान शिव के बेणेश्वर मंदिर तथा आसपास के मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं। मेले के दौरान तरह-तरह के मनोरंजन के साधनों के अलावा, जादुई तमाशे व करतबों का प्रदर्शन तथा शाम में लोक कलाकारों द्वारा प्रस्तुत संगीत एवं नृत्य के कार्यक्रम पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। भील आदिवासी समूहों में अपनी पारंपरिक पोशाकों को पहने नाचते-गाते इस पर्व पर स्नान करने आते हैं। यूं तो इस मेले में पांचों दिन लोगों का आना जारी रहता है, परंतु पूर्णिमा के दिन स्नान एवं पूजा करने वाले श्रद्धालुओं का हुजूम देखते ही बनता है। मेले का आनंद उठाने के दौरान यहां आने वाले पर्यटक डूंगरपुर के ऐतिहासिक किलों एवं मंदिरों को देखना नहीं भूलते। अरावली पर्वत श्रृंखला के मध्य बसे डूंगरपुर की नींव 13वीं शताब्दी के अंत में  रावल वीर सिंह ने रखी थी। यहां के मुख्य दर्शनीय स्थलों में उदय विलास पैलेस, वास्तु कला के लिए विख्यात सात मंजिला जूना महल, अपनी अनूठी प्राकृतिक छटा के लिए मशहूर गैब सागर ङील में बोटिंग तथा बर्ड वॉचिंग के अंतर्गत प्रवासी पक्षियों को देखने का भी आनंद उठाया जा सकता है। अनेक उत्कृष्ट रूप से निर्मित मंदिरों के समूह तथा भगवान शिव का विजय-राज-राजेश्वर मंदिर, वास्तुशिल्पीय वैभव का प्रतीक है और श्रद्धालुओं एवं भक्तों की आस्था का केन्द्र। जो पर्यटक प्राचीन मूर्तियों को देखने का शौक रखते हैं, उनके लिए राजकीय पुरातत्वीय संग्रहालय एक उत्तम स्थान है। यहां से 24 किलोमीटर दूर देवनाथजी का मंदिर, 58 किलोमीटर दूर गलियाकोट स्थित जैन मंदिर तथा फखरुद्दीन की शानदार मजार बहुत प्रसिद्ध है, जहां उर्स के दौरान हजारों श्रद्धालु एकत्र होते हैं। पुंजपुर (37 किलोमीटर) में माव जी के मंदिर में दर्शन करने वालों का तांता लगा रहता है।
 
कैसे पहुंचें

वायु सेवा: यहां से उदयपुर हवाई अड्डा 120 किलोमीटर तथा अहमदाबाद हवाई अड्डा 175 किलोमीटर है।
रेल सेवा: डूंगरपुर के लिए उदयपुर तथा अहमदाबाद से अनेक रेलगाड़ियां हैं।
सड़क मार्ग: दिल्ली-मुंबई राष्ट्रीय राज मार्ग नंबर-8 से जुड़ा है डूंगरपुर।
कहां ठहरें: सर्किट हाउस तथा पी.डब्ल्यू.डी. के रेस्ट हाउस सैलानियों के लिए उपलब्ध रहते हैं। हैरिटेज होटल भी उपयुक्त हैं।

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