Wednesday, 9 March 2011

रणथम्भौर नेशनल पार्क

साभार : हिंदुस्तान लाईव
रणथम्भौर, सवाई माधोपुर, राजस्थान



साभार : हिंदुस्तान लाईव
रणथम्भौर नेशनल पार्क ऐसा पार्क है, जहां हमें इतिहास और प्रकृति दोनों को पास से निहारने का मौका मिलेगा। इतना ही नहीं, पार्क के अन्दर डरावना सा एक किला भी है, जो 10वीं शताब्दी में बनाया गया है, लेकिन उत्तरी और मध्य भारत के कई शासकों ने इसमें तमाम परिवर्तन किए हैं। यह पार्क अरावली पहाड़ियों और विंध्य भूभाग को जोड़ता है। साथ ही यहां के समतल और सीधे पहाड़ भी पर्यटकों को खूब लुभाते हैं। यह पार्क दो तरफ से नदियों से घिरा है। उत्तरी तरफ बनास और दक्षिणी तरफ चंबल नदी पड़ती है।

उत्तर भारत के प्रमुख बड़े नेशनल पार्कों में रणथम्थौर पार्क भी शामिल है। यह सवाई माधोपुर जिले में पड़ता है। मौजूदा समय वाइल्ड लाइफ प्रेमियों और फोटोग्राफरों के लिए यह प्रमुख आकर्षण का केंद्र है। इस पार्क की लंबाई का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह मानसिंह सैंक्चुरी और कैला देवी सैक्चुरी तक फैला है। दिन के समय चीतों को मस्ती करते हुए आसानी से देखा जा सकता है।
प्रकृति और वाइल्ड लाइफ प्रेमियों के लिए इससे अच्छी जगह और नहीं हो सकती है। यहां चीतों के अलावा तेंदुआ, नीलगाय, सांभर, भालू और चीतल के साथ-साथ मन को प्रसन्न करने वाली तरह-तरह की चिड़ियों की अठखेलियों को देखने का मौका मिलेगा, जो जीवन भर यादगार होगा। पार्क के साथ-साथ रणथम्थौर किला और जोगी महल भी लोगों को आकर्षित करते हैं।
इस पार्क की स्थापना 1955 में सवाई माधोपुर गेम सैंक्चुरी के रूप में भारत सरकार ने की थी। 1973 में टाइगर प्रोजेक्ट रिजर्व्स घोषित किया और 1980 में रणथम्भौर नेशनल पार्क बनाया गया। 1984 में पास के जंगल को सवाई मानसिंह सैंक्चुरी और कैलादेवी सैंक्चुरी घोषित किया गया। 1991 में इन दोनों को टाइगर रिजव्र्स में शामिल कर लिया गया।

किसलिए प्रसिद्ध है पार्क
पार्क मुख्य रूप से चीतों के लिए जाना जाता है। इसके अलावा पार्क की लोकेशन ऐसी जगह है, जहां प्रकृति से जुड़ी तमाम चीजों को न सिर्फ देखा जा सकता है, बल्कि छूकर एहसास भी किया जा सकता है।

पार्क में और क्या है खास
बकौला, कचिडा वैली, लर्काडा और अनंतपुरा, राजबाग, पद्म तलाओ, राजबाग तलाओ और मलिक तलाओ आदि प्रमुख आकर्षण के केन्द्र हैं।

जानकारी
यह पार्क राजस्थान में है, जो दिल्ली से 450 किलोमीटर और जयपुर से 185 किलोमीटर दूर पड़ता है। किला पार्क के मुख्य द्वार से करीब 3 किलोमीटर अंदर पड़ता है। यहां आने के लिए सबसे अच्छा समय मार्च और अप्रैल का महीना होता है, जब जानवर पानी की तलाश में बाहर निकलते हैं और उन्हें आसानी से देखा जा सकता है।

आदिवासियों का मुख्य पर्व ‘बेणेश्वर मेला’

साभार : हिंदुस्तान लाईव
बेणेश्वर मेला, डूंगरपुर, राजस्थान



साभार : जागरण
भील माही, सोम तथा जाखम नदियों के पवित्र जलसंगम पर डुबकी लगाने के पश्चात भगवान शिव के दर्शन के लिए बेणेश्वर मंदिर जाने को हर कोई बेताब रहता है। यह अवसर होता है बेणेश्वर मेले का, जो आदिवासियों का मुख्य त्योहार है। इसे वनवासियों का महाकुंभ कहा जाता है ।
माघ शुक्ल पूर्णिमा के अवसर पर राजस्थान के प्रसिद्ध ऐतिहासिक शहर डूंगरपुर से 60 किलोमीटर की दूरी पर बेणेश्वर मंदिर के परिसर में लगने वाला यह मेला भगवान शिव को समर्पित होता है। सोम व माही नदियों के संगम पर बने इस मंदिर के निकट भगवान विष्णु का भी मंदिर है, जिसके बारे में मान्यता है कि जब भगवान विष्णु के अवतार माव जी ने यहां तपस्या की थी, यह मंदिर उसी समय बना था।
चार दिनों तक चलने वाला यह मेला मुख्यत: इस क्षेत्र की आदिवासी भील जाति का मुख्य त्योहार है तथा इस मेले में राजस्थान के अलावा मध्य प्रदेश एवं गुजरात से हजारों आदिवासी भील सोम, माही व जाखम नदियों के पवित्र संगम पर डुबकी लगाने के पश्चात भगवान शिव के बेणेश्वर मंदिर तथा आसपास के मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं। मेले के दौरान तरह-तरह के मनोरंजन के साधनों के अलावा, जादुई तमाशे व करतबों का प्रदर्शन तथा शाम में लोक कलाकारों द्वारा प्रस्तुत संगीत एवं नृत्य के कार्यक्रम पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। भील आदिवासी समूहों में अपनी पारंपरिक पोशाकों को पहने नाचते-गाते इस पर्व पर स्नान करने आते हैं। यूं तो इस मेले में पांचों दिन लोगों का आना जारी रहता है, परंतु पूर्णिमा के दिन स्नान एवं पूजा करने वाले श्रद्धालुओं का हुजूम देखते ही बनता है। मेले का आनंद उठाने के दौरान यहां आने वाले पर्यटक डूंगरपुर के ऐतिहासिक किलों एवं मंदिरों को देखना नहीं भूलते। अरावली पर्वत श्रृंखला के मध्य बसे डूंगरपुर की नींव 13वीं शताब्दी के अंत में  रावल वीर सिंह ने रखी थी। यहां के मुख्य दर्शनीय स्थलों में उदय विलास पैलेस, वास्तु कला के लिए विख्यात सात मंजिला जूना महल, अपनी अनूठी प्राकृतिक छटा के लिए मशहूर गैब सागर ङील में बोटिंग तथा बर्ड वॉचिंग के अंतर्गत प्रवासी पक्षियों को देखने का भी आनंद उठाया जा सकता है। अनेक उत्कृष्ट रूप से निर्मित मंदिरों के समूह तथा भगवान शिव का विजय-राज-राजेश्वर मंदिर, वास्तुशिल्पीय वैभव का प्रतीक है और श्रद्धालुओं एवं भक्तों की आस्था का केन्द्र। जो पर्यटक प्राचीन मूर्तियों को देखने का शौक रखते हैं, उनके लिए राजकीय पुरातत्वीय संग्रहालय एक उत्तम स्थान है। यहां से 24 किलोमीटर दूर देवनाथजी का मंदिर, 58 किलोमीटर दूर गलियाकोट स्थित जैन मंदिर तथा फखरुद्दीन की शानदार मजार बहुत प्रसिद्ध है, जहां उर्स के दौरान हजारों श्रद्धालु एकत्र होते हैं। पुंजपुर (37 किलोमीटर) में माव जी के मंदिर में दर्शन करने वालों का तांता लगा रहता है।
 
कैसे पहुंचें

वायु सेवा: यहां से उदयपुर हवाई अड्डा 120 किलोमीटर तथा अहमदाबाद हवाई अड्डा 175 किलोमीटर है।
रेल सेवा: डूंगरपुर के लिए उदयपुर तथा अहमदाबाद से अनेक रेलगाड़ियां हैं।
सड़क मार्ग: दिल्ली-मुंबई राष्ट्रीय राज मार्ग नंबर-8 से जुड़ा है डूंगरपुर।
कहां ठहरें: सर्किट हाउस तथा पी.डब्ल्यू.डी. के रेस्ट हाउस सैलानियों के लिए उपलब्ध रहते हैं। हैरिटेज होटल भी उपयुक्त हैं।

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