Sunday, 20 February 2011

राजस्थान की संस्कृति एवं कला-साहित्य

राजस्थान को सांस्कृतिक दृष्टि से भारत को समृद्ध प्रदेशों में गिना जाता है। संस्कृति एक विशाल सागर है जिसे सम्पूर्ण रूप से लिखना संभव नहीं है। संस्कृति तो गाँव-गाँव ढांणी-ढांणी चैपाल चबूतरों महल-प्रासादों मे ही नहीं, वह तो घर-घर जन-जन में समाई हुई है। राजस्थान की संस्कृति का स्वरूप रजवाड़ों और सामन्ती व्यवस्था में देखा जा सकता है, फिर भी इसके वास्तविक रूप को बचाए रखने का श्रेय ग्रामीण अंचल को ही जाता है, जहाँ आज भी यह संस्कृति जीवित है। संस्कृति में साहित्य और संगीत के अतिरिक्त कला-कौशल, शिल्प, महल-मंदिर, किले-झोंपडियों का भी अध्ययन किया जाता है, जो हमारी संस्कृति के दर्पण है। हमारी पोशाक, त्यौहार, रहन-सहन, खान-पान, तहजीब-तमीज सभी संस्कृति के अन्तर्गत आते है। थोड़े से शब्दों में कहा जाए तो 'जो मनुष्य को मनुष्य बनाती है, वह संस्कृति है।'

ऐतिहासिक काल में राजस्थान में कई राजपूत वंशों का शासन रहा है। यहाँ सभी शासकों ने अपने राज्य की राजनैतिक एकता के साथ-साथ साहित्यिक और सांस्कृतिक उन्नति में योगदान दिया है। ग्याहरवीं शताब्दी में उत्तर पष्चिम से आने वाली आक्रमणकारी जातियों ने इसे नष्ट करने का प्रयास किया, परन्तु निरन्तर संघर्ष के वातावरण मे भी यहाँ साहित्य, कला की प्रगति अनवरत रही। मध्य काल में राजपूत शासकों के मुगलों के साथ वैवाहिक और मैत्री संबन्धों से दोनों जातियों में सांस्कृतिक समन्वय और मेल-मिलाप रहा कला, साहित्य में विविधता एंव नवीनता का संचार हुआ और सांझी संस्कृति का निर्माण हुआ।

सांझी संस्कृति

राजस्थान के भू-भाग पर आक्रमणों एवं युद्धों का दौर लम्बे समय तक चलता रहा। राजस्थानी जनजीवन में समन्वय एवं उदारता के गुणों ने सांझी संस्कृति को पनपने का अवसर प्रदान किया। धार्मिक सहिष्णुता के परिणामस्वरूप अजमेर में ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में हिन्दू-मुस्लिम एकता के दर्शन होते हैं। जहाँ सभी धार्मिक लोग एकत्र होकर इबादत (प्रार्थना) करते हैं और मन्नत मांगते है। लोक देवता गोगाजी, रामदेवजी के समाधि स्थल पर सभी धर्मानुयायी अपनी आस्था रखकर साम्प्रदायिक सद्भावना का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। राजस्थान के सामाजिक जीवन यथा खान-पान, रहन-सहन, आमोद-प्रमोद और रस्मों-रिवाजों में सर्वत्र हिन्दू मुस्लिम संस्कृति का समन्वय हुआ है। भोजन में अकबरी जलेबी, खुरासानी खिचड़ी, बाबर बड़ी, पकौड़ी और मुंगड़ी का प्रचलन मुगली प्रभाव से खूब पनपा है। परिधानों में मलमल, मखमल, नारंग शाही, बहादुर शाही कपड़ों का प्रयोग हुआ है। आमोद-प्रमोद में पतंगबाजी, कबूतर बाजी मुगल काल से प्रचलित हुई है। स्थापना कला में हिन्दू-मुस्लिम शैलियों का सम्मिश्रण सांझी संस्कृति उदाहरण हैं। यहाँ के राजा-महाराजाआंे ने मुगली प्रभाव से स्थापत्य निर्माण में संगमरमर का प्रयोग किया। गेलेरियों, फव्वारांे, छोटे बागों को महत्व दिया। दिवारांे पर बेल बूंटे के काम को बढा़वा दिया। चित्रकला की विभिन्न शैलियांे में मुगल शैली का प्रभाव सर्वत्र देखा जा सकता है। अतः कहा जा सकता है कि राजस्थानी कला एवं संस्कृति में सांझी संस्कृति के वे सभी तत्त्व मौजूद है जो अपने मूलभूत स्वरूप को बनाए रखते हुए भी नवीनता, ग्रहणषीलता, सहिष्णुता और समन्वय को स्वीकार करने के लिए तैयार रहते हंै।

मध्यकालीन साहित्यिक उपलब्धियाँ

राजस्थान में साहित्य प्रारम्भ में संस्कृत व पा्र कतृ भाषा में रचा गया। मध्ययुग के प्रारम्भकाल से अपभृंष और उससे जनित मरूभाषा और स्थानीय बोलियां जैसे मारवाड़ी, मेवाड़ी, मेवाती, ढूँढाड़ी और बागड़ी में साहित्य की रचना होती रही, परन्तु इस काल में संस्कृत साहित्य अपनी प्रगति करता रहा।

संस्कृत साहित्य
राजपूताना के विद्यानुरागी शासकांे, राज्याश्रय प्राप्त विद्वानांे ने संस्कृति का सृजन किया है। षिला लेखांे, प्रषस्तियांे और वंषावलियांे के लेखन में इस भाषा का प्रयोग किया जाता था। महाराणा कुम्भा स्वयं विद्वान संगीत प्रेमी एवं विद्वानांे के आश्रयदाता शासक थे। इन्होंने संगीतराज, सूढ़ प्रबन्ध, संगीत भीमांसा, रसिक प्रिया, (गीत गोविन्द की टीका) संगीत रत्नाकर आदि ग्रन्थांे की रचना की थी। इनके आश्रित विद्वान मण्डन ने षिल्पषास्त्र से सम्बन्धित अनेक गन््र थांे की रचना की। जिनमें दवेमूर्तिप्रकरण, राजवल्लभ, रूपमण्डन, प्रसादमण्डन महत्त्वपूर्ण कुंभाकालीन (चित्तौड़गढ़) और कुंभलगढ़ प्रशास्ति (कुंभलगढ) की रचना की। राणा जगतसिंह एवं राजसिंह के दरबार में बाबू भट्ट तथा रणछोड़ भट्ट नामक विद्वान थे, जिन्होंने क्रमषः जगन्नाथराम प्रशस्ति और राजसिंह प्रशस्ति की रचनाएँ की। ये दोनों  प्रशस्तियां मेवाड़ के इतिहास के लिए महत्त्वपूर्ण है। आमेर-जयपुर के महाराजा मानसिंह, सवाईजयसिंह, मारवाड़ के महाराजा जसवन्तसिंह, अजमेर के चैहान शासक विग्रहराज चतुर्थ तथा पृथ्वीराज तृतीय बीकानेर के रायसिंह और अनूपसिंह संस्कृत के विद्वान एवं विद्वानांे के आश्रयदाता शासक थे। अनूपसिंह ने बीकानेर में ‘अनूप संस्कृत पुस्तकालय’ का निर्माण करवाकर अपनी साहित्यिक प्रतिभा का परिचय दिया। विग्रहराज चतुर्थ ने ‘हरिकेलि’ नाटक लिखा, पृथ्वीराज के कवि जयानक ‘पृथ्वीराजविजय’ नामक काव्य के रचयिता थे। प्रतापगढ़ के दरबारी पंडित जयदेव का ‘हरिविजय’ नाटक तथा गंगारामभट्ट का ‘हरिभूषण’ इस काल की प्रसिद्ध रचनाएँ है। मारवाड़ के जसवन्तसिंह ने संस्कृत में भाषा-भूषण और आनन्द विलास नामक श्रेष्ठ ग्रंथ लिखें। जोधपुर के मानसिंह ने नाथ-चरित्र, नामक गं्रथ लिखा। मानसिंह को पुस्तकांे से इतना प्रेम था कि उन्होंने काषी, नेपाल आदि से संस्कृत के अनेक गं्रथ मंगवाकर अपने पुस्तकालय में सुरक्षित रखा । आज यह पुस्तकालय मानसिंह पुस्तक प्रकाश शोध केन्द्र के रूप में विख्यात है।

राजस्थानी साहित्य
राजस्थानी समस्त राजस्थान की भाषा रही है जिसके अन्तर्गत मेवाड़ी, मारवाड़ी, ढूढाड़ी, हाड़ौती, बागड़ी, मालवी और मेवाती आदि बोलियाँ आती है। इस भाषा में जैनशैली, चारणशैली, संतशैली और लोकशैली में साहित्य का सृजन हुआ है।

(1) जैनशैली का साहित्य - जैनशैली का साहित्य जैन धर्म से सम्बन्धित है। इस साहित्य में शान्तरस की प्रधानता है। हेमचन्द्र सूरी (ग्यारहवीं सदी) का देषीनाममाला’, ‘षब्दानुषासन’, ऋषिवर्धन सूरी का नल दमयन्ती रास, धर्म समुद्रगणि का ‘रात्रि भोजनरास’, हेमरत्न सूरी का गौरा बादल री चैपाई प्रमुख साहित्य हैं।

(2) चारणशैली का साहित्य - राजपूत युग के शौर्य तथा जनजीवन की झांकी इसी साहित्य की देन है। इसमें वीर तथा शृंगार रस की प्रधानता रही है। चारणषैली में रास, ख्यात, दूहा आदि में गद्य, पद्य रचनाएँ हुई है। बादर ढा़ढी कृत ‘वीर भायण’ चारण शैली की प्रारम्भिक रचना है। चन्दवरर्दाइ  का ‘पृथ्वीराजरासो’ , नेणसी की ‘नेणसीरीख्यात’, बाँकीदास की ‘बाँकीदासरीख्यात,’ दयालदास की ‘दयालदासरी ख्यात’ गाडण शिवदास की ‘अचलदास खींची री वचनिका’ प्रमुख ग्रन्थ हैं जिनमें राजस्थान के इतिहास की झलक मिलती है। दोहा छन्द में ढ़ोलामारू रा दूहा, सज्जन रा दूहा प्रसिद्ध रचनाएँ हैं। इनके अतिरिक्त दुरसा आढ़ा का नाम भी विषिष्ठ उल्लेखनीय है। वह हिन्दू संस्कृति और शौर्य का प्रषंसक तथा भारतीय एकता का भक्त था। बीकानेर नरेष कल्याणमल के पुत्र पृथ्वीराज राठौड़ ने ‘वेलि क्रिसन रूकमणी री’ नामक ग्रंथ की रचना की, जो राजस्थानी साहित्य का ग्रन्थ माना जाता है। इन गुणांे की ध्वनि इसके गीतों, छन्दों, झुलका तथा दोहा में स्पष्ट सुनाई देती है। सूर्यमल्ल मीसण आधुनिक काल का महाकवि था और बून्दी राज्य का कवि था। इसने ‘वंष भास्कर’ और ‘वीर सतसई’ जैसी उल्लेखनीय कृतियों की
रचना की।

(3) सन्त साहित्य - राजस्थान के जनमानस का े प्रभावित करने वाला सन्त साहित्य बड़ा मार्मिक है। सन्तांे ने अपने अनभ्ु ावों का े भजनों द्वारा नैतिकता, व्यावहारिकता का े सरलता स े जनमानस में पस्र ारित किया ह,ै एसे े सन्तों में मल्लीनाथजी, जाभ्ं ाा े जी, जसनाथ जी, दादू की वाणी, मीरा की ‘पदावली’ तथा ‘नरसीजी रो माहेरो’, रामचरण जी की ‘वाणी’ आदि संत साहित्य की अमूल्य धरोहर है।

(4) लोकेकेक साहित्य - लोक साहित्य में लोकगीत, लोकगाथाएँ, प्रेमगाथाएँ, लोकनाट्य, पहेलियाँ, फड़ें तथा कहावतें सम्मिलित है। राजस्थान में फड़ बहुत प्रसिद्ध है। फड़ चित्रण वस्त्र पर किया जाता है। जिसके माध्यय से किसी ऐतिहासिक घटना अथवा पौराणिक कथा का प्रस्तुतिकरण किया जाता है। फड़ में एक अधिकतर लोक देवताआंे यथा पाबूजी देवनारायण ने रामदेवजी इत्यादि के जीवन की घटनाआंे और चमत्कारksa का चित्रण होता है। फड़ का चारण भोपे करते हैं। राजस्थान में शाहपुरा (भीलवाड़ा) का फड़ चित्रण राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाये हुए है। भीलवाड़ा के श्रीलाल जोषी ने फड़ चित्रण को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में सहयोग किया। इस कार्य हेतु भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से नवाजा है। इनमें पाबूजी री फड़, ‘देवजी री फड़’ तीज, गणगौर, शादी, संस्कारांे, मेलांे पर गाये जाने वाले लोकगीत आते है।


राजस्थान का स्थापत्य एवं चित्रकला

स्थापत्य कला
मानव संस्कृति के इतिहास में स्थापत्य का अपना स्वतन्त्र स्थान है। मध्ययुगीन राजस्थान के स्थापत्य मंे राजप्रासाद, मन्दिरों और दुर्गों का निर्माण महत्वपूर्ण है। इस युग में स्थापत्य कला की एक विशेष शैली का विकास हुआ, जिसे हिन्दू स्थापत्य शैली कहा जाता है। इस शैली की प्रमुख विशेषताएँ थी- शिल्प सौष्ठव, सुदृढ़ता, अलंकृत पद्धति, सुरक्षा, उपयोगिता, विशालता और विषयों की विविधता आदि। मुगलसत्ता के साथ समागम के पश्चात् राजस्थानी स्थापत्य में तुर्की और मुगल प्रभाव से नई शैली का विकास हुआ जिसे हिन्दू-मुस्लिम स्थापत्य शैली कहा गया है।


दुर्ग स्थापत्य 
राजस्थान राजाआंे का स्थान रहा है जहाँ राजा हो या सामंत दुर्ग निर्माण को आवश्यक मानते थे। दुर्गाे का निर्माण निवास, सुरक्षा, सामग्री संग्रहण के लिए और आक्रमण के समय जनता, पशु तथा सम्पत्ति के संरक्षण हेतु किया जाता था। अधिकांश दुर्गों का निर्माण सामरिक महत्व के स्थानों पर किया गया ताकि आक्रमणकारियों से प्रदेश की सुरक्षा हो, तथा व्यापारिक मार्ग सुरक्षित रह सकें। दुर्ग निर्माण उँची एवं चैड़ी पहाड़ियों पर किया जाता था, जहाँ कृषि एवं सिंचाई के साधन उपलब्ध रहते थे।
दुर्गों की प्रमुख विषेषताएँ थी -
1.    सुदृढ़ प्राचीरे
2.    विषाल परकोटा
3.    अभेद्य बुर्जे
4.    दुर्ग के चारों ओर गहरी नहर या खाई
5.    दुर्ग के भीतर शास्त्रागार की व्यवस्था
6.    जलाशय
7.    मन्दिर निर्माण
8.    पानी की टंकी की व्यवस्था
9.    अन्नभण्डार की स्थापना
10.  गुप्तप्रवेश द्वार रखा जाना
11.  सुरंग निर्माण
12.  राजप्रासाद एवं सैनिक विश्राम गृहों की व्यवस्था आदि।
चित्तौड का दुर्ग सबसे प्राचीन गिरी दुर्ग है, जिसे महाराणा कुम्भा ने द्वारों की शृंखला और बुर्जों के निर्माण से सुदृढ़ बनाया । इसके बारे में प्रसिद्ध है गढ़ तो चित्तौढ़, बाकी सब गढ़ैया। कुम्भा द्वारा ही कुम्भलगढ़ दुर्ग का निर्माण कराया गया जो विशाल और ऊँची पहाड़ी पर सुदृढ़ द्वारों तथा प्राचीरों से सुरक्षित है। परमारों का जालोर दुर्ग, चैहानों का अजमेर में तारागढ़ दुर्ग तथा रणथम्भौर दुर्ग, हाड़ाओं द्वारा निर्मित बून्दी का तारागढ़, राव जौधा का जोधपुर में मेहरानगढ़ दुर्ग, कछवाहों का जयपुर के पास आमेर दुर्ग नाहरगढ़ दुर्ग तथा जयगढ़ दुर्ग उत्कृष्ठ गिरी दुर्ग हैं। परमारों का झालावाड़ के निकट गागरोन दुर्ग जल दुर्ग की श्रेणी में आता है। महारावल जैसलदेव का जैसलमेर दुर्ग पीले पत्थरों से निर्मित मरूस्थलीय दुर्ग है। बीकानेर का जूनागढ़ दुर्ग, भरतपुर का दुर्ग समतल मैदान पर निर्मित चैड़ी खाई से घिरा हुआ है। राजस्थान के अन्य प्रसिद्ध दुर्गों में माण्डलगढ़ - भीलवाड़ा, अचलगढ़ - आबू, रणथम्बोर - सवाई माधोपुर, बयाना-भरतपुर, सिवाना-बाड़मेर, भटनेर-हनुमानगढ़ आदि है।

राजप्रासाद (महल)
राजस्थान में राजपतू राज्यों की स्थापना के साथ ही राजप्रसादों का निर्माण होने लगा था। राजप्रासाद या महल दो भागों पुरूष कक्ष तथा अन्तपुर, (जनानाकक्ष), में विभाजित होते थे। महलों में आवास कक्ष, शस्त्रागार, धान्यभण्डार, रसोई घर और पूजागृह होते थे। सादगी, नीची छतें, पतली गेलेरियाँ, छोटे-छोटे कक्ष और ढालान महलों की प्रमुख विषेशताएँ होती थी। मुगल-राजपूत सम्बन्धों के प्रभाव से महलों में फव्वारे, छोटे बाग, गुम्बद, पतले खम्बे, मेहराब आदि नई विधाआंे का प्रयोग होने लगा। कुम्भलगढ़ और चित्तौड़ के महल सादगी के नमूने है। उदयपुर के अमरसिंह के महल, जगनिवास, जगमन्दिर, जोधपुर के फूल महल, आमेर के दिवाने-आम, दिवान ए खास, बीकानेर के रगं महल, कणर्म हल, शीषमहल, अनूपमहल तथा कोटा और जैसलमेर के महलों में मुगलस्थापत्य का प्रभाव दिखाई देता है।

मन्दिर स्थापत्य 
राजस्थान में मन्दिर स्थापत्य का प्रारम्भ प्राचीनकाल से माना जाता है। तेहरवीं शताब्दी तक मन्दिर स्थापत्य में शक्ति एवं शौर्य का मन्दिर, रणकपुर के जैन मन्दिर में दुर्ग स्थापत्य का प्रभाव है। इसी काल के जैन धर्म के मन्दिर देलवाड़ा माउन्ट आबू में है। यहाँ पहला मन्दिर विमलशाह द्वारा बनवाया गया है, इस मन्दिर में आदिनाथ की मूर्ति है, जिनकी आँखों में हीरे लगे हुए है। दूसरा मन्दिर वस्तुपाल और तेजपाल द्वारा बनवाया गया है। जिसमें ‘नेमिनाथ’ की मूर्ति है, यह मन्दिर तक्षणकला की दृष्टि से अपूर्व है। चितौड़ का सूर्य मन्दिर एवं बाडौली(चित्तौड़गढ़) के षिव मंदिर भी बड़े महत्त्व के है। डुंगरपुर के श्री नाथजी के मन्दिर, उदयपुर के जगदीश मन्दिर में हिन्दू स्थापत्य की प्रधानता है, जबकि जोधपुर के घनश्याममन्दिर तथा आमेर के जगत शिरोमणि मन्दिर में मुगल शैली का प्रभाव दिखाई देता है। 17वीं तथा 18वीं सदी में मुगल आक्रमणों के बचाव में श्री नाथजी(नाथद्वारा), द्वाराकाधीश (कांकरोली), मथुरेशजी (कोटा), गोविन्ददेव जी(जयपुर) के मन्दिरों का निर्माण राजपूत शासकों द्वारा करवाया गया था।

भवनस्थापत्य 
(अ) हवेलियाँ - राजस्थान में भवन स्थापत्य का विकास हवेलियों के निर्माण से हुआ है। राजस्थान के अनेक नगरों में सेठ और सामन्तों ने भव्य हवेलियों का निर्माण करवाया था। इनमें प्रमुख द्वार के अगल-बगल कलात्मक गवाक्ष, लम्बी पोल, चैड़ा चैक और चैक के अगल-बगल भव्य कमरे होते थे। जयपुर आरै शेखावाटी क्षेत्र में रामगढ़, नवलगढ़, फतहपुर , मुकुन्दगढ़, मण्डावा, पिलानी, सरदारशहर, रतनगढ़, सुजानगढ़ में बनी हवेलियाँ भवन स्थापत्य का उत्कृष्ठतम उदाहरण है। जैसलमेर में सालिमसिंह, नथमल तथा पटवों की हवेलियाँ पत्थर की जाली एवं नक्काशी के कारण विश्व पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बनी हुई है। इसी प्रकार वंशी पत्थर से निर्मित करौली, कोटा, भरतपुर की हवेलियां अपनी कलात्मक संगतराशि की दृष्टि से उत्कृष्ठ है।

(ब) विजय स्तम्भ (चित्तौड़गढ़) - महाराणा कुम्भा द्वारा मालवा के सुल्तान पर विजय की स्मृति में बनवाया गया विजय स्तम्भ जिसे कीर्तिस्तम्भ भी कहा जाता है भवन स्थापत्य का अद्भुत नमूना है। 122 फिट उँचे स्तम्भ में नौ मंजिले है, तथा इसके अन्दर उपर जाने के लिए सीढ़ियाँ बनी हुई है। हर मंजिल पर चारों ओर झरोखे बने है तथा हिन्दू देवताआंे की मूर्तियों को प्रतिष्ठित किया गया है।

(स) समाधियाँ (छतरियां) - देश की रक्षा में प्राण न्यौछावर करने वाले शासकों, सामन्तों और सेनानायकों की स्मृति मे समाधियों पर छतरियां बनायी गई जिन्हे देवलिया या देवल कहा जाता था। गेटोर (जयपुर), आहड़ (उदयपुर), जसवन्तथड़ा (जोधपुर), छत्रविलासबाग (कोटा), और बड़ाबाग (जैसलमेर) में बनी छतरियाँ भवन स्थापत्य और मन्दिर स्थापत्य का अद्भुत समन्वय है।
चित्रकला

राजस्थानी चित्रकला का उद्भवकाल पन्द्रहवीं शताब्दी माना जाता है। राजपूतकाल में भित्तिचित्र, पोथीचित्र, काष्ठपाट्टिका चित्र और लघुचित्र बनाने की परम्परा रही हैं। अधिकांश रियासतों के चित्र बनाने के तौर-तरीकों के स्थान के अनुसार मौलिकता और सामाजिक-राजनैतिक परिवेश के कारण अनेक चित्रशैलियों का विकास हुआ यथा-मेवाड़, मारवाड़, बून्दी, बीकानेर, जयपुर, किशनगढ़ और कोटा चित्रशैली। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि राजस्थानी चित्रकला का प्रारम्भिक और मौलिक रूप मेवाड़ शैली में दिखाई देता है, इसलिए इसे राजस्थानी चित्रशैलियों की जनक शैली कहा जाता है। 1260 में चित्रित श्रावक प्रतिक्रमणसम्पूर्णि नामक चित्रितीं ग्रंथ इसी शैली का प्रथम उदाहरण है।

मेवाड़ शैली - मेवाड़ राज्य राजस्थानी चित्रकला का सबसे प्राचीन केन्द्र माना जा सकता हैं। महाराणा अमरसिंह के शासनकाल में इस चित्रशैली का अधिक विकास हुआ। लालःपीले रंग का अधिक प्रयोग, गरूड़नासिका, परवल की खड़ी फांक से नत्रे , घुमावदारवलम्बी अंगुलियां, अंलकारों की अधिकता और चेहरों की जकड़न आदि इस शैली की प्रमुख विषेशताएँ हैं। मेवाड़ शैली के चित्रों का विषय श्रीमद्भागवत्, सूरसागर, गीतगोविन्द, कृष्णलीला, दरबार के दृष्य, शिकार के दृष्य आदि थे। इस चित्रशैली के चित्रकारों में मनोहर, गंगाराम, कृपाराम, साहिबदीन और जगन्नाथ प्रमुख हैं। राजा अमरसिंह के काल से इस षैली पर मुगल प्रभाव दिखाई देता है।

मारवाड़ शैली - मारवाड़ में रावमालदेव के समय इस शैली का स्वतन्त्र रूप से विकास हुआ। इस शैली में पुरूष लम्बे चैड़े गठीले बदन के, स्त्रियाँ गठीले बदन की, बादामी आँखें, वेशभूषा ठेठ राजस्थानी और पीले रंग की प्रधानता होती थी। चित्रों के विषय नाथचरित्र, भागवत, पंचतन्त्र, ढोला-मारू, मूमलदे, निहालदे, लोकगाथाएँ होती थी। चित्रकारों में वीर जी, नारायणदास, भारी अमरदास, छज्जूभाटी, किशनदास और कालूराम आदि प्रमुख हैं।

बीकानेर शैली - महाराजा अनूपसिंह के समय इस शैली का वास्तविक रूप में विकास हुआ। लाल, बेंगनी, सलेटी और बादामी रंगो का प्रयोग, बालू के टीलों का अंकन, लम्बी इकहरी नायिकाएं, मेघमंडल, पहाड़ों आैर फूल पत्तियों का आलेखन इस शैली की प्रमुख विषेशताएँ रही है। शिकार, रसिक प्रिया, रागमाला, शृंगारिक आख्यान विशेष रहे हैं। इस शैली पर पंजाब कलम, मुगल शैली और मारवाड़ शैली का प्रभाव पाया जाता है।

किशनगढ़ शैली - यह राजपतू कालीन चित्रकला की अत्यन्त आकर्षक शैली है। इस शैली का सर्वाधिक विकास राजानागरीदास के समय में हुआ। उभरी हुई ठोड़ी, नेत्रों की खंजनाकृति बनावट, धनुषाकार भौंए, गुलाबीअदा, सुरम्यसरोवरों का अंकन इस चित्रशैली के चित्रों की प्रमुख विषेशताएं है ‘बनी ठनी’ इस चित्रशैली की सर्वोत्तमकृति है, जिसे भारतीय चित्रकला का ‘मोनालिसा’ भी कहा जाता है। इसका चित्रण निहालचन्द ने किया था। इस षैली के चित्रों में कला, प्रेम और भक्ति का सर्वांगीण सामन्जस्य पाया जाता है।

जयपुर शैली - इस चित्रशैली का काल 1600 ई. से 1700 ई. तक माना जाता है। इस शैली पर राजस्थान मेंमुगल चित्रकला का सर्वाधिक प्रभाव रहा है। सफेद, लाल, पीले, नीले तथा हरे रंग का अधिक प्रयोग, सोने-चाँदी का उपयोग, पुरूष की बलिष्ठता और महिला की कोमलता इस शैली की प्रमुख विशेषता रही है। शाही सवारी, महफिलों, राग-रगं , शिकार, बारहमासा, गीत गोविन्द, रामायण आदि विषय प्रमुख रहें है।

बून्दी शैली - मेवाड़ से प्रभावित, राव सुरजन से प्रारम्भ बून्दी शैली उम्मेदसिंह के समय तक उन्नति के शिखर पर पहुँची थी। लाल, पीले रंगो की प्रचुरता, छोटा कद, प्रकृति का सतरंगी चित्रण इस चित्र शैली की विशेषता रही है। रसिकप्रिया, कविप्रिया, बिहारी सतसई, नायक-नायिका भेद, ऋतुवर्णन बून्दी चित्रशैली के प्रमुख विषय थे। इस शैली में पशु-पक्षियों का श्रेष्ठ चित्रण हुआ है, इसलिए इसे ‘पशु पक्षियों की चित्रशैली’ भी कहा जाता है। यहाँ के चित्रकारों में सुरजन, अहमदअली, रामलाल, श्री किशन और साधुराम मुख्य थे।

कोटा शैली - कोटा चित्रशैली में बून्दी तथा मुगल षैली का समन्वय पाया जाता है। स्त्रियों के चित्र पुतलियों के रूप में, आँखे बड़ी, नाक छोटी, ललाटबड़ा, लंहगे उँचे, वेणी अकड़ी हुई इस शैली की प्रमुख विशेषताएँ रही है। चित्रों के विषय शिकार, उत्सव, श्री नाथ कथा चित्रण, पयु-पक्षी चित्रण रहें हैं।

नाथद्वारा शैली - यह शैली अपनी चित्रण विलक्षणता के लिए प्रसिद्ध रही है। यहाँ श्रीनाथजी की छवियों के रूप में ‘पिछवाई चित्रण’ किया जाता है। इस प्रकार राजस्थान चित्रण की दृष्टि से सम्पन्न रहा है। यहाँ पोथीखाना (जयपुर), मानसिंह पुस्तक प्रकाश (जोधपुर), सरस्वती भण्डार (उदयपुर) और स्थानीय महाराजाआंे तथा सामन्तों के संग्रहालयों में चित्रकला का ऐसा समृद्ध भण्डार उपलब्ध है जो न केवल राजस्थान को धनी बनाये हुये है, वरन-भारत की कलानिधि का एक भव्य संग्रह भी है।

राजस्थान के प्रमुख त्यौंहार, उत्सव एवं मेले

त्यौंहार एवं उत्सव
यद्यपि राजस्थान की मरूभूमि शुष्क है फिर भी उत्सवों त्यौंहारों एवं पारस्परिक मेल-मिलाप से रगं -रसमय है। राजस्थान में हिन्दू-मुस्लिम और इसाइयों के सभी त्यौंहार उत्साह, उल्लासपूर्वक प्रेम भाई चारे के साथ सोहार्दपूर्ण वातावरण में मनाकर मानवीय एकता, सहिष्णुता का प्रदर्षन करते हैं। यहाँ के प्रमुख लोकोत्सव में गणगौर और तीज का महत्वपूर्ण स्थान है।
गणगौर का उत्सव होलिकात्सव से लेकर चैत्र षुक्ला तृतीया तक चलता है। सधवास्त्रियाँ आरै कुंवारियां सुहाग की अमरता एवं अच्छे वर की अभिलाषा में ईसर-ईसरी जी की पूजा करती है। यह उत्सव जयपुर, जोधपुर, उदयपुर आरै कोटा में गणगौर की सवारी निकालकर बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। तीज का त्यौंहार भाद्रपद कृश्णा तृतीया को बालिकाएँ एवं नवविवाहिताएँ प्रकृति के प्रांगण मंे गीतों का गायनकर, झूलों में झूलकर, नवीन पोषाक पहन कर, और मेहन्दी रचाकर मनाती हैं। जयपुर की तीज की सवारी प्रसिद्ध हैं। धामिर्क त्यौंहारों के अन्तगर्त हिन्दू दीपावली, हाली, दशहरा, अक्षयतृतीया, रक्षाबन्धन, जन्माष्टमी, गणेष चतुर्थी, शरदपूर्णिमा, बसन्तपंचमी, नागपंचमी, रामनवमी, हनुमान जयन्ती, षिवरात्री, अन्नकूट महोत्सव और गोवर्धन पूजा आदि परम्परागत तरीके से हर्षोल्लासपूर्वक मनाते हैं। जैन समाज में महावीर जयन्ती तथा भाद्रपद मास में पर्युषण पर्व व्रत, तप और अर्चना के साथ मनाते है। मुस्लिम समाज के प्रमुख त्यौहार इदुलजुहा, इदुलफितर, शबेरात, मोहर्रम और बारावफात उत्साह एवं भाईचारापूर्वक मनाए जाते हैं। इन त्योहारों में सभी समाज के लोगों में पे्रम, उल्लास और आनन्द का संचार होता है सामाजिक समरसता का विकास होता है तथा धार्मिक श्रृद्धा का संचार होता है। राजस्थान के प्रमुख त्यौहार एवं उनकी तिथियाँ निम्न हैः
प्रमुख त्यौहार एवं उनकी तिथियाँ
क्र.स. त्यौंहार तिथि
1. गणगौर फाल्गुन शुक्ल 15 से चेत्र षुक्ला 3 तक
2. महाषिवरात्री फाल्गनु कृष्ण पक्ष-13 (त्रयोदषी)
3. दीपावली कार्तिक कृष्ण पक्ष-अमावस्या
4. रक्षाबन्धन श्रावणमास पूर्णिमा
5. होली फाल्गुनमास पूर्णिमा
6. जन्माष्टमी भाद्रपदश्कृष्णपक्ष अष्टमी
7. गणेष चतुर्थी भाद्रपद शुक्लपक्ष चैथ
8. रामनवमी चेत्र षुक्ल पक्ष नवमी
9. क्रिसमस डे 25 दिसम्बर
10. मुहर्रम मुहर्रम माह की दस तारीख
11. ईद-उलफितर शव्वाल की पहली तारीख
12. तीज भाद्रपद कृष्णपक्ष तृतीया
13. पर्युषण भाद्रपद मास
14. दषहरा आश्विन शुक्लपक्ष दषमी
15. ईदउलजुहा जित्कार की दसवीं तारीख

मेले
राजस्थान के मेलें यहाँ की संस्कृति के परिचायक है। राजस्थान मंे मेलांे का आयोजन धर्म, लोकदेवता, लोकसंत और लोक संस्कृति से जुड़ा हुआ है। मेलों में नृत्य, गायन, तमाषा, बाजार आदि से लोगों में प्रेम व्यवहार, मेल-मिलाप बढ़ता है। राजस्थान के प्रत्येक अंचल में मेले लगते है। इन मेलों का प्रचलन प्रमुखतः मध्य काल से हुआ जब यहाँ के शासकों ने मेलों को प्रारम्भ कराया। मेले धार्मिक स्थलों पर एवं उत्सवों पर लगने की यहाँ परम्परा रही है जो आज भी प्रचलित है। राजस्थान मंे जिन उत्सवों पर मेले लगते है उनमें विशेष हैं- गणेश चतुर्थी, नवरात्र, अष्टमी, तीज, गणगौर, शिवरात्री, जनमाष्टमी, दशहरा, कार्तिक पूर्णिमा आदि। इसी प्रकार धार्मिक स्थलों (मंदिरों) पर लगने वाले मेलों में तेजाजी, शीतलामाता, रामदेवजी, गोगाजी, जाम्बेष्वर जी, हनुमान जी, महादेव, आवरीमाता, केलादेवी, करणीमाता, अम्बामाता, जगदीष जी, महावीर जी आदि प्रमुख है। राजस्थान के धर्मप्रधान मेलों में जयपुर में बालाजी का, हिण्डोन के पास महावीर जी का, अन्नकूट पर नाथद्वारा का, गोठमांगलोद में दधिमती माता का, एकलिंग जी में षिवरात्री का, केसरिया में धुलेव का, अलवर के पास भर्तहरि जी का और अजमेर के पास पुष्कर जी का मेला गलता मेला प्रमुख है। इन मेलों में लोग भाक्तिभावना से स्नान एवं अराधना करते हैं।  लोकसंतो और लोकदेवों की स्मृति एवं श्रद्धा में भी यहाँ अनेक मेलों का आयोजन होता है। रूणेचा में रामदवे जी का, परबतसर में तेजाजी का, काले गढ़ में पाबूजी का, ददेरवा में गोगाजी का, देशनोक में करणीमाता का, नरेणा(जयपुर)-शाहपुरा (भीलवाड़ा) में फूलडोल का, मुकाम में जम्भेष्वरजी का, गुलाबपुरा में गुलाब बाबा का और अजमेर में ख्वाजा साहब का मेला लगता है। यह मेले जीवन धारा को गतिषीलता एवं आनंद प्रदान करते है शान्ति, सहयोग और साम्प्रदायिक एकता को बढ़ाते है। मेलों का सांस्कृतिक पक्ष कला प्रदर्षन तथा सद्भावनाआंे की अभिवृद्धि है। मेलों का महत्त्व देवों और देवियों की आराधनाआंे की सिद्धि के लिए मनुष्य देवालयों में जाते हैं। मेलों से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सांस्कृतिक परिपाटी प्रवाहित होती है जो संस्कृति की निरन्तरता के लिए आवष्यक है। इसके अतिरिक्त मेले व्यापारिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है, विषेषकर पशु मेले तथा इसका मनोंरजन के लिये भी महत्व है।

Saturday, 19 February 2011

राजस्थान : लोक कलाएँ, लोक नाट्य, लोक नृत्य, लोक गीत, लोक वाद्य एवं लोक चित्रकला

लोक कलाएँ
          राजस्थान लोक कला के विविध आयामों का जनक रहा है। लोक कला के अन्तर्गत लोकगीत, लोकनाट्य, लोकनृत्य, लोकवाद्य और लोक चित्रकला आती है, इसका विकास मौखिक स्मरण और रूढ़ियों के आधार पर दीर्घ काल से चला आ रहा है। ये लोक कलाएँ हमारी संस्कृति के प्राण है। मनोंरजन का साधन है। लोक जीवन का सच्चा स्वरूप है।

लोक नाट्य          मेवाड़, अलवर, भरतपुर, करौली और जयपुर में लोक कलाकारों द्वारा लोक भाषा में रामलीला तथा रासलीला बड़ी लोकप्रिय है। बीकानेर ओर जैसलमेर में लोक नाट्यों में ‘रम्मत’ प्रसिद्ध है। इसमें राजस्थान के सुविख्यात लोकनायकों एवं महापुरूषों की ऐतिहासिक एवं धार्मिक काव्य रचना का मंचन किया जाता है। इन रम्मतों के रचियता मनीराम व्यास, फागु महाराज, सुआ महाराज, तेज कवि आदि है। मारवाड़ में धर्म और वीर रस प्रधान कथानकों का मंचन ‘ख्याल’(खेलनाटक) परम्परागत चला आ रहा है, इनमें अमरसिंह का ख्याल, रूठिराणी रो ख्याल, राजा हरिशचन्द्र का ख्याल प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय है। राजस्थान में ‘भवाईनाट्य’ अनूठा है जिसमें पात्र व्यंग वक्ता होते है। संवाद, गायन, हास्य और नृत्य इसकी प्रमुख विषेषताएँ है। मेवाड़ में प्रचलित ‘गवरी’ एक नृत्य नाटिका है जो रक्षाबन्धन से सवा माह तक खेली जाती है। गवरी वादन संवाद, प्रस्तुतिकरण आरै लोक-संस्कृति के प्रतीकों में मेवाड़ की ‘गवरी’ निराली है। गवरी का उद्भव षिव-भस्मासुर की कथा से माना जाता है। इसका आयोजन रक्षाबन्धन के दूसरे दिन से शुरू होता है। गवरी सवा महिने तक खेली जाती है। इसमें भील संस्कृति की प्रमुखता रहती है। यह पर्व आदिवासी जाति वर पौराणिक तथा सामाजिक प्रभाव की अभिव्यक्ति है। गवरी में पुरूष पात्र होते है। इसके खेलों में गणपति कान-गुजरी, जोगी, लाखा, बणजारा इत्यादि के खेल होते है।

लोक नृत्य
          राजस्थान में लाके नृत्य की परम्परा सदा से उन्नत रही है। यहाँ विभिन्न क्षेत्रों में लोकनृत्यों का विकास हुआ जिससे जनजीवन में आनन्द, जीवट और शौर्य के भावों की अभिवृद्धि हुई है।

(अ) गैर नृत्य - आदिवासी क्षेत्रों में होली के अवसर पर ढोल, बांकिया तथा थाली की संगत में पुरूष अंगरखी, धोती, पगड़ी पहनें हाथ में छड़िया लेकर गोल घेरे में नृत्य में भीली संस्कृति के दर्षन होते हैं।

(ब) गीदड़ नृत्य - शेखावाटी क्षेत्र में लोग होली का डण्डा रोपने से सप्ताह भर तक नंगाडे की ताल पर पुरूष दो छोटे डंडे लके र गीतों के साथ सुन्दर परिधान पहन कर नृत्य करतें है जिसे ‘गीदड़नृत्य’ कहा जाता है।

(स) ढोल नृत्य - मरूस्थलीय प्रदेष जालारे में शादी के समय माली, ढ़ोली, सरगड़ा और भील जाति के लोग ‘थाकना’ शैली में ढोलनृत्य करते हैं।

(द) बम नृत्य - अलवर और भरतपुर में फागुन की मस्ती मंे बड़े नगाड़े को दो बड़े डण्डों से बजाया जाता है, जिसे ‘बम’ कहते है। इसी कारण इसे ‘बमनृत्य’ कहते हैं।

(य) घूमर नृत्य - यह राजस्थान का सर्वाधिक प्रसिद्ध लोकनृत्य है, इसे मांगलिक पर्वों पर महिलाओं द्वारा हाथों के लचकदार संचालन से ढ़ोलनगाड़ा, शहनाई आदि संगत में किया जाता है।

(र) गरबा नृत्य - महिला नृत्य में गरबा भक्तिपूर्ण नृत्य कला का अच्छा उदाहरण है। यह नृत्य शक्ति की आराधना का दिव्य रूप है जिसे मुख्य रूप से गुजरात मंे देखा जाता है। राजस्थान में डूंगरपुर और बाँसवाड़ा में इसका व्यापक पच्र लन हैं।
इस तरह गजु रात आरै राजस्थान की संस्कृति के समन्वय का सुन्दर रूप हमें ‘गरबा’ नृत्य में देखने को मिलता है।

अन्य लोक नृत्य
          जसनाथी सिद्धों का अंगारा नृत्य, भीलों का ‘राईनृत्य’ गरासिया जाति का ‘वालरनृत्य’ कालबेलियाजाति का ‘कालबेलियानृत्य’ प्रमुख है। पेशेवर लोकनृत्यों में ‘भर्वाइ  नृत्य’ 'तेरह ताली नृत्य ' चमत्कारी कलाओं के लिए विख्यात है।

लोक गीत 
          राजस्थानी लाके गीत मौखिक परम्परा पर आधारित मानस पटल की उपज हैं जो शेडस संस्कारों, रीतिरिवाजों, संयोगवियोग के अवसरों पर लोक भाषा में सुन्दर अभिव्यक्ति करते है।  उदाहरणार्थ -‘खेलण दो गणगौर’, म्हारी घूमर छे नखराली एमाय, चिरमी आदि है।

लोक वाद्य 
          लोककला में राजस्थान के लाके वाद्यों का बड़ा महत्व है, इनके बिना नृत्य, संगीत भी अधूरा लगता है। यहाँ के प्रमुख लोक वाद्यों में ‘रावण हत्था’, तंदूरा, नंगाड़े, तीनतारा, जोगिया सारंगी, पूंगी और भपंग उल्लेखनीय हैं।

लोक चित्रकला
1. पथवारी - गांवो में पथरक्षक रूप में पूजा जाने वाला स्थल जिस पर विभिन्न प्रकार के चित्र बने होते हैं।
2. पाना - राजस्थान में कागज पर जो चित्र उकेरे जाते हैं, उन्हें पाना कहा जाता है।
3. मांडणा - राजस्थान में लोक चित्रकला की यह एक अनुठी परम्परा है। त्योहारों एवं मांगलिक अवसरों पर पूजास्थल चैक पर ज्यामितीयवतृ , वर्ग  या आडी़ तिरछी रेखाआंे के रूप में ‘मांडणा’ बनाये जाते हैं।
4. फड़ - कपड़ों पर किये जाने वाले चित्राकं न को ‘फड़’ कहा जाता है।
5. सांझी - यह गोबर के घर के आंगन, पूजास्थल अथवा चबुतरें पर बनाया जाता है।

लाके गीत, लाके नाटय् , लोकवाद्य, लाके चित्रकला राजस्थानी संस्कृति एवं सम्यता के प्रमुख अंग है। आदिकाल से लेकर आज तक इन कलाआंे का विविध रूपों में विकास हुआ है। इन विधाआंे के विकास में भक्ति, प्रेम, उल्लास और मनोरंजन का प्रमुख स्थान रहा है। इनके पल्लवन में लोक आस्था की प्रमुख भूमिका रही है। बिना आस्था और विष्वास के इन लोक कलाआंे के अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती। आज भी लोककला के मूल तत्त्व जन जीवन में विद्यमान हैं। त्योहार, नृत्य, संगीत, लोकवाद्य, लोक कलाआंे, विभिन्न बोलियों एवं परिणाम के कारण ही राजस्थान को ‘रंगीला राजस्थान’ की संज्ञा दी जाती है। राजस्थान की सांझी संस्कृति के दर्षन यहाँ के जन-जीवन के साथ साहित्य में भी देखे जा सकते हैं। धर्म समभाव एवं सुलह-कुल की नीति यहाँ के धार्मिक जीवन का इतिहास के काल से ही मूल मंत्र रहा है।

राजस्थान का भौतिक पर्यावरण - सामान्य परिचय

राजस्थान राज्य जहाँ एक ओर इसके गौरवशाली इतिहास के लिये पहचाना जाता है, वहीं दूसरी ओर इसका भौतिक स्वरूप भी विशिष्टता लिये हुए है। राज्य के भौतिक पर्यावरण ने यहाँ के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक वातावरण को सदैव से प्रभावित किया है और वर्तमान में भी राज्य के विकास में महती भूमिका निभा रहा है।

स्थिति एवं विस्तार
राजस्थान भारत के पश्चिमी भाग में २३ डिग्री ३ उत्तरी अक्षांश से लेकर ३० डिग्री १२ उत्तरी अक्षांश के मध्य तथा ६९ डिग्री ३० पूर्वी देशांतर से ७८ डिग्री १७ पूर्वी देशांतर के मध्य स्थित है।  कर्क रेखा अर्थात् 23 डिग्री अक्षांश राज्य के दक्षिण में बासँ वाड़ा-डूँगरपरु जिलों से गजुरती हैं। राज्य की पश्चिमी सीमा भारत-पाकिस्तान की अन्तर्राश्ट्रीय सीमा है, जो 11,070 किलोमीटर लम्बी है। राज्य की उत्तरी और उत्तरी-पूर्वी सीमा पंजाब तथा हरियाणा से, पूर्वी सीमा उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश से, दक्षिणी-पश्चिमी सीमा क्रमशः मध्य प्रदेश तथा गुजरात से संयुक्त है।

राजस्थान का क्षेत्रीय विस्तार 3,42,239 वर्ग किलोमीटर में है जो भारत के कुल क्षेत्र का 10.43 प्रतिशत है। अतः क्षेत्रफल की दृष्टि से यह भारत का सबसे बड़ा राज्य है। क्षेत्रफल की दृष्टि से यह विश्व के अनेक देशों से बड़ा है, उदाहरण के लिये इजराइल से 17 गुना, श्रीलंका से पांच गुना, इंग्लैण्ड से दुगना तथा नार्वे, पोलैण्ड, इटली से भी अधिक विस्तार रखता है। राजस्थान की आकृति विषम कोण चतुर्भुज के समान है। राज्य की उत्तर से दक्षिण लम्बाई 826 किलोमीटर तथा पूर्व से पश्चिम चैड़ाई 869 किलोमीटर है।

प्रशासनिक इकाईयाँ
          स्वतत्रंता के पश्चात् 1956 में राजस्थान राज्य के गठन के प्रक्रिया पूर्ण हुई। वर्तमान में राज्य को प्रशासनिक दृष्टि से सात संभागों, 33 जिलों और 241 तहसीलों में विभक्त किया गया है।

राज्य के संभाग एवं उनमें सम्मलित जिलें निम्न प्रकार से है-
1. जयपुर संभाग - जयपुर, दौसा, सीकर, अलवर एवं झुन्झुँनू जिले।
2. जोधपुर संभाग - जोधपुर, जालौर, पाली, बाड़मेर, सिरोही एवं जैसलमेर जिले।
3. भरतपुर संभाग - भरतपुर, धौलपुर, करौली एवं सवाई माधोपुर जिले।
4. अजमेर संभाग - अजमेर, भीलवाड़ा, टोंक एवं नागौर जिले।
5. कोटा संभाग - कोटा, बूंदी, बारां एवं झालावाड़ जिले।
6. बीकानेर संभाग - बीकानेर,, गंगानगर, हनुमानगढ़ एवं चूरू जिले।
7. उदयपुर संभाग - उदयपरु , राजसमंद, डगूं रपुर, बाँसवाड़ा, चित्तौड़गढ़ एवं प्रतापगढ़ जिले।

राजस्थान के उच्चावच अर्थात् धरातल एवं धरातलीय प्रदेश

         राजस्थान एक विशाल राज्य है अतः यहाँ धरातलीय विविधताओं का होना स्वाभाविक है। राज्य में पर्वतीय क्षेत्र, पठारी प्रदेश एवं मैदानी और मरूस्थली प्रदेशों का विस्तार है अर्थात् यहाँ उच्चावच सम्बन्धी विविधतायें हैं।

राजस्थान के उच्चावच के निम्न स्वरूप स्पष्ट होते है :

    1. उच्च शिखर - इसके अन्तर्गत वे पर्वतीय शिखर सम्मिलित हैं जो समुद्रतल से 900 मीटर से अधिक ऊँचे हैं। ये राजस्थान के कुल एक प्रतिशत क्षेत्र से भी कम हैं। इसमें अरावली का सर्वोच्च शिखर गुरुशिखर है जिसकी ऊँचाई समुद्र तल से 1722 मीटर है। दक्षिणी अरावली के अन्य उच्च शिखर सेर, अचलगढ़, देलवाड़ा, आबू, जरगा, कुम्भलगढ़ हैं।

    2. पर्वत शृंखला - इसमें 600 मीटर से 900 मीटर की ऊँचाई वाला क्षेत्र सम्मिलित है जो राज्य के लगभग 6 प्रतिशत भाग में विस्तृत है। सम्पूर्ण अरावली पर्वतमाला इसमें सम्मिलित है जो दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व तक अक्रमिक रूप में राजस्थान के मध्य भाग में विस्तृत है। इसका सर्वाधिक विस्तार सिरोही, उदयपुर, राजसमंद से अजमेर जिले तक है। इसके पश्चात् जयपुर और अलवर जिलों इन श्रेणियों का विस्तार अक्रमिक होता जाता है।

    3. उच्च भूमि एवं पठारी क्षेत्र- इनका विस्तार अरावली श्रेणी के दोनों ओर उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम तथा दक्षिणी-पूर्वी पठारी क्षेत्र में है। इस क्षेत्र की समुद्र तल से ऊँचाई 300 से 600 मीटर के मध्य है। यह राजस्थान के लगभग 31 प्रतिशत क्षेत्र पर विस्तृत है। इसका उत्तरी-पूर्वी भाग प्रायः समतल है जिसकी औसत ऊँचाई 400 मीटर है। जबकि दक्षिणी-पश्चिमी क्षेत्र उच्च भूमि है, जहाँ ऊबड़-खाबड़ धरातल है तथा औसत ऊँचाई 500 मीटर है। राज्य के दक्षिण-पूर्व में हाड़ौती का पठारी क्षेत्र है। चित्तौड़गढ़ तथा प्रतापगढ़ जिले में भी पठारी क्षेत्र है।

    4. मैदानी क्षेत्र- इसका विस्तार राज्य के लगभग 51 प्रतिशत भू-भाग पर है जिसकी समुद्र तल से ऊँचाई 150 से 300 मीटर है। इसके दो वृहत क्षेत्र हैंरू प्रथम-पश्चिमी राजस्थान का रेतीला मरूस्थली क्षेत्र एवं द्वितीय- पूर्वी मैदानी क्षेत्र। पूर्वी मैदान में बनास बेसिन, चम्बल बेसिन तथा छप्पन मैदान (मध्य माही बेसिन) हैं जो नदियों द्वारा निर्मित मैदान है तथा कृशि के लिये सर्वाधिक उपयुक्त है।
धरातलीय प्रदेश
         धरातलीय विशिष्टताओं के आधार पर राजस्थान को निम्नलिखित प्रमुख एवं उप विभागों में विभक्त किया जाता है-
1. पश्चिमी मरूस्थली प्रदेश
2. अरावली पर्वतीय प्रदेश
3. पूर्वी मैदानी प्रदेश
4. दक्षिणी-पूर्वी पठार (हाडौती का पठार)
1. पश्चिमी मरूस्थली प्रदेश

राजस्थान का अरावली श्रेणियों के पश्चिम का क्षेत्र शुष्क एवं अर्द्ध शुष्क मरूस्थली प्रदेश है। यह एक विशिष्ट भौगोलिक प्रदेश है, जिसे ‘भारत का विशाल मरूस्थल’ अथवा ‘थार मरूस्थल’ के नाम से जाना जाता है। इसका विस्तार बाड़मेर, जैसलमेर, बीकानेर, जोधपुर, पाली, जालौर, नागौर, सीकर, चूरू, झुन्झुनू, हनुमानगढ़ एवं गंगानगर जिलों में है। यद्यपि गंगानगर, हनुमानगढ़ एवं बीकानेर जिलों में सिंचाई सुविधाओं के विस्तार से क्षेत्रीय स्वरूप में परिवर्तन आ गया है।

सम्पूर्ण पश्चिमी मरूस्थली क्षेत्र समान उच्चावच नहीं रखता अपितु इसमें भिन्नता है। इसी भिन्नता के इसकों चार उप-प्रदेशों में विभिक्त किया जाता है, ये हैं-
(अ) शुष्क रेतीला अथवा मरूस्थली प्रदेश
(ब) लूनी-जवाई बेसिन
(स) शेखावाटी प्रदेश, एवं
(द) घग्घर का मैदान
          (अ) शुष्क रेतीला अथवा मरूस्थली प्रदेश- यह क्षेत्र शुष्क मरूस्थली क्षेत्र है जहाँ वार्षिक वर्षा को औसत 25 सेमी. से कम है। इसमें जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर जिले एवं जोधपुर और चूरू जिलों के पश्चिमी भाग सम्मलित है। इस प्रदेश में सर्वत्र बालुका-स्तूपों का विस्तार है। कुछ क्षेत्रों जैसे पोकर, जैसलमेर, रामगढ़ में चट्टानी संरचना दृष्टिगत होती है।

          (ब) लूनी-जवाई बेसिन- यह एक अर्द्ध-शुष्क प्रदेश है जिसमें लूनी एवं इसकी प्रमुख जवाई तथा अन्य सहायक नदियाँ प्रवाहित है। इसका विस्तार पाली, जालौर, जोधपुर जिलों एवं नागौर जिले के दक्षिणी भागांे मंे हैं। यह एक नदी निर्मित मैदान है जिसे ‘लूनी बेसिन’ के नाम से जाना जाता है।

          (स) शेखावटी प्रदेश- इसे ‘बांगर प्रदेश’ के नाम से भी जाना जाता है। षेखावटी प्रदेश का विस्तार झुन्झुनू, सीकर और चूरू जिले तथा नागौर जिले के उत्तरी भाग में है। यह प्रदेश भी रेतीला प्रदेश है जहाँ कम ऊँचाई के बालूका-स्तूपों का विस्तार हैं। इस प्रदेश में अनेक नमकीन पानी के गर्त (रन) हैं जिनमें डीडवाना, डेगाना, सुजानगढ़, तलछापर, परिहारा, कुचामन आदि प्रमुख हैं।

          (द) घग्घर का मैदान- गंगानगर, हनुमानगढ़ जिलों का मैदानी क्षेत्र का निर्माण घग्घर नदी के प्रवाह क्षेत्र की बाढ़ से हुआ है। वर्तमान में घग्घर नदी को ‘मृत नदी’ कहा जाता है क्योंकि इसका प्रवाह तल स्पष्ट नहीं है, किन्तु वर्षा काल में इसमें न केवल पानी प्रवाहित होता है, अपितु बाढ़ आ जाती है। घग्घर नदी प्राचीन वैदिक कालीन सरस्वती नदी है जो विलुप्त हो चुकी है। यह सम्पूर्ण मैदानी क्षेत्र है जो वर्तमान में कृषि क्षेत्र बन गया है।

2. अरावली पर्वतीय प्रदेश

अरावली पर्वत श्रेणियाँ राजस्थान का एक विशिश्ट भौगोलिक प्रदेश है। अरावली विश्व की प्राचीनतम पर्वत श्रेणी है जो राज्य में कर्णवत उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम तक फैली है। ये पर्वत श्रेणियाँ उत्तर में देहली से प्रारम्भ होकर गुजरात में पालनपुर तक लगभग 692 किमी. की लम्बाई में विस्तृत है। अरावली पर्वतीय प्रदेश का विस्तार राज्य के सात जिलों- सिरोही, उदयपुर, राजसमंद, अजमेर, जयपुर, दौसा और अलवर में।

अरावली पर्वत प्रदेश को तीन प्रमुख उप-प्रदेशों में विभक्त किया जाता है, ये हैं-
(अ) दक्षिणी अरावली प्रदेश
(ब) मध्य अरावली प्रदेश
(स) उत्तरी अरावली प्रदेश
          (अ) दक्षिणी अरावली प्रदेश- इसमंे सिरोही, उदयपुर और राजसमंद जिले सम्मलित हैं। यह प्रदेश पूर्णतया पर्वतीय प्रदेश है, जहाँ अरावली की श्रेणियाँ अत्यधिक सघन एवं उच्चता लिये हुए हैं। इस प्रदेश में अरावली पर्वतमाला के अनेक उच्च शिखर स्थित हैं। इसमें गुरुशिखर पर्वत राजस्थान का सर्वोच्च पर्वत शिखर है जिसकी ऊँचाई 1722 मीटर है जो सिरोही जिले में माउन्ट आबू क्षेत्र में स्थित है। यहाँ की अन्य प्रमुख उच्च पर्वत चोटियाँ हैं- सेर (1597 मीटर), अचलगढ़ (1380मीटर), देलवाड़ा (1442मीटर), आबू (1295 मीटर) और ऋषिकेश (1017मीटर)। उदयपुर-राजसमंद क्षेत्र में सर्वोच्च शिखर जरगा पर्वत है जिसकी ऊँचाई 1431 मीटर है, इस क्षेत्र की अन्य श्रेणियाँ कुम्भलगढ़ (1224मीटर) लीलागढ़ (874मीटर), कमलनाथ की पहाड़ियाँ (1001मीटर) तथा सज्जनगढ़ (938 मीटर) है। उदयपुर के उत्तर-पश्चिम में कुम्भलगढ़ और गोगुन्दा के बीच एक पठारी क्षत्रे हैं जिसे ‘भोराट का पठार’ के नाम से जाना जाता है।

          (ब) मध्य अरावली प्रदेश- यह मुख्यतः अजमेर जिले में फैला है। इस क्षेत्र में पर्वत श्रेणियों के साथ संकीर्ण घाटियाँ और समतल स्थल भी स्थित है। अजमेर के दक्षिण-पश्चिम भाग में तारागढ़ (870 मीटर) और पश्चिम मंे सर्पिलाकार पवर्त श्रेणियाँ नाग पहाड़ (795मीटर) कहलाती हैं। ब्यावर तहसील में अरावली श्रेणियों के चार दर्रे स्थित है जिनके नाम हैं :  बर, परवेरिया और शिवपुर घाट, सूरा घाट दर्रा और देबारी।

          (स) उत्तरी अरावली प्रदेश- इस क्षेत्र का विस्तार जयपुर, दौसा तथा अलवर जिलों में है। इस क्षेत्र में अरावली की श्रेणियाँ अनवरत न होकर दूर-दूर होती जाती हैं। इनमें शेखावाटी की पहाडियाँ, तोरावाटी की पहाड़ियों तथा जयपुर और अलवर की पहाड़ियाँ सम्मलित हैं। इस क्षेत्र में पहाड़ियों की सामान्य ऊँचाई 450 से 750 मीटर है। इस प्रदेश के प्रमुख उच्च शिखर सीकर जिल े मंे रघुनाथगढ़ (1055मीटर), अलवर में बैराठ (792 मीटर) तथा जयपुर में खो (920 मीटर) है। अन्य उच्च शिखर जयगढ़, नाहरगढ़, अलवर किला और बिलाली है।

3. पूर्वी मैदानी प्रदेश

 राजस्थान का पूर्वी  प्रदेश एक मैदानी क्षेत्र है जो अरावली के पूर्व में विस्तृत है। इसके अन्तर्गत भरतपुर, अलवर, धौलपुर, करौली, सवाई माधौपुर, जयपुर, दौसा, टोंक तथा भीलवाड़ा जिलों के मैदानी भाग सम्मलित है। यह प्रदेश ‘नदी बेसिन’ प्रदेश है अर्थात् नदियों द्वारा जमा की गई मिट्टी से इस प्रदेश का निर्माण हुआ है। इस मैदानी प्रदेश के तीन उप-प्रदेश हैं-
(अ) बनास-बाणगंगा बेसिन
(ब) चम्बल बेसिन और
(स) मध्य माही बेसिन अथवा छप्पन मैदान।
          (अ) बनास-बाणगंगा बेसिन- बनास और उसकी सहायक नदियों द्वारा निर्मित यह एक विस्तृत मैदान है। यह मैदान बनास और इसकी सहायक बाणगंगा, बेडच, कोठारी, डेन, सोहाद्रा, मानसी, धुन्ध, बांडी, मोरेल, बेड़च, वागन, गम्भीर आदि द्वारा निर्मित है। यह एक विस्तृत मैदान है, जिसकी समुद्रतल से ऊँचाई 150 से 300 मीटर के मध्य है तथा ढाल पूर्व की ओर है।

          (ब) चम्बल बेसिन- इसके अन्तर्गत कोटा, सवाई माधोपुर, करौली तथा धौलपुर जिलों का क्षेत्र सम्मलित है। कोटा का क्षेत्र हाडौती में सम्मलित है किन्तु यहाँ चम्बल का मैदानी क्षेत्र स्थित है। इस प्रदेश में सवाई माधोपुर, करौली एवं धौलपुर में चम्बल के बीहड़ स्थित है। यह अत्यधिक कटा-फटा क्षेत्र है, इनके मध्य समतल क्षेत्र स्थित है।

          (स) मध्य माही बेसिन अथवा छप्पन मैदान- इसका विस्तार उदयपुर के दक्षिण-पूर्व से, डूंगरपुर, बाँसवाड़ा और प्रतापगढ़ जिलों में है। यह माही नदी का प्रवाह क्षेत्र है जो मध्य प्रदेश से निकलकर इस प्रदेश से गुजरती हुई खंभात की खाड़ी में गिरती है। यह क्षेत्र असमतल है तथा सर्वत्र छोटी-छोटी पहाडियाँ है। यह क्षेत्र पहाड़ियों से युक्त तथा कटा-फटा होने के कारण इसे स्थानीय भाषा में ‘बांगड’ नाम से पुकारा जाता है। प्रतापगढ़ और बाँसवाड़ा के मध्य के भाग में छप्पन ग्राम समूह स्थित है अतः इसे ‘छप्पन का मैदान’ भी कहते है।

4. दक्षिणी-पूर्वी पठारी प्रदेश अथवा हाडौती

राजस्थान का दक्षिणी-पूर्वी भाग एक पठारी भाग है, जिसे ‘हाडौती के पठार’ के नाम से जाना जाता है। यह मालवा के पठार का विस्तार है तथा इसका विस्तार कोटा, बूंदी, झालावाड़ और बारां जिलों में है। इस क्षेत्र की औसत ऊँचाई 500 मीटर है तथा यहाँ अनेक छोटी पर्वत श्रेणियाँ हैं, जिनमें मुकन्दरा की पहाड़ियाँ और बूंदी की पहाड़ियाँ प्रमुख हैं। यहाँ चम्बल नदी और इसकी प्रमुख सहायक कालीसिंध, परवन और पार्वती नदियाँ प्रवाहित है, उनके द्वारा निर्मित मैदानी प्रदेश कृषि के लिये उपयुक्त है।

राजस्थान का अपवाह तन्त्र अर्थात् नदियाँ

अपवाह तन्त्र से तात्पर्य नदियाँ एवं उनकी सहायक नदियों से है जो एक तन्त्र अथवा प्रारूप का निर्माण करती हैं। राजस्थान में वर्श भर बहने वाली नदी केवल चम्बल है। राजस्थान के अपवाह तन्त्र को अरावली पर्वत श्रेणियाँ निर्धारित करती है। अरावली पर्वत श्रेणियाँ राजस्थान में एक जल विभाजक है और राज्य मे बहने वाली नदियों को दो भागों में विभक्त करती है। इसके अतरिक्त राज्य में अन्तः प्रवाहित नदियाँ भी हैं।

इसी आधार पर राजस्थान की नदियों को निम्नलिखित तीन समूहों में विभक्त किया जाता हैः

1. बंगाल की खाडी में गिरने वाली नदियाँ
2. अरब सागर में गिरने वाली नदियाँ
3. अन्तः प्रवाहित नदियाँ

1. बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियाँ 
इसके अन्तर्गत चम्बल, बनास, बाणगंगा और इनकी सहायक नदियाँ सम्मलित हैं।
चम्बल नदी- इसको प्राचीन काल में चर्मण्यवती के नाम से जाना जाता था। चम्बल नदी का उद्भव मध्य प्रदेश में महू के निकट मानपुर के समीप जनापाव पहाड़ी से हुआ। यह राजस्थान में चैरासीगढ़ (चित्तौड़गढ़ जिला) के निकट प्रवेश कर कोटा-बूंदी जिलों की सीमा बनाती हुई सवाई माधोपुर, करौली तथा धौलपुर जिलों से होते हुए अन्त में यमुना नदी में मिल जाती है। चम्बल नदी पर गाँधी सागर, जवाहर सागर, राणा प्रताप सागर बाँध तथा कोटा बैरा  बनाये गये हैं। चम्बल की प्रमुख सहायक नदियाँ बनास, कालीसिंध और पार्वती हैं।
बनास नदी- बनास नदी अरावली की खमनोर पहाड़ियों से निकलती है जो कुम्भलगढ़ से 5 किमी. दूर है। यह कुम्भलगढ़ से दक्षिण की आरे गोगुन्दा के पठार से प्रवाहित होती हुई नाथद्वारा, राजसंमद, रेल मगरा पार कर चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, टोंक जिले से होती हुई सवाई माधोपुर में चम्बल से मिल जाती है। बनास नदी को ‘वन की आशा’ भी कहा जाता है। इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ हैरू बेडच, कोठारी, खारी, मैनाल, बाण्डी, धुन्ध और मोरेल।
काली सिन्ध नदी- यह मध्य प्रदेश में देवास के निकट से निकल कर झालावाड़ और बारां जिले में बहती हुई नानेरा के निकट चम्बल नदीं में मिलती है। इसकी प्रमुख सहायक नदियां परवन, उजाड़, निवाज और आहू हैं।
पार्वती नदी- मध्य प्रदेश के सिहोर क्षत्रे से निकलकर बंारा जिले में बहती हुई सवाईमाधोपुर जिले में पालिया के निकट चम्बल में मिल जाती है।
वापनी (बाह्यणी) नदी - चित्तौड़गढ़ जिले में हरिपुर गाँव के निकट से निकलकर भैसरोड़गढ़ के निकट चम्बल में मिलती है।
मेज नदी - भीलवाड़ा जिले से निकलकर बूंदी में लाखेरी के निकट चम्बल में मिलती है।
बाणगंगा नदी - इसका उद्गम जयपुर जिले की बैराठ पहाड़ियों से है। यहाँ से यह पूर्व की ओर सवाई माधोपुर जिले और इसके पश्चात् भरतपुर जिले में प्रवाहित होती है, जहाँ इसका जल फैल जाता है।

2. अरब सागर में गिरने वाली नदियाँ
राजस्थान में प्रवाहित होती हुई अरब सागर में गिरने वाली नदियाँ है- लूनी, माही और साबरमती ।
लूनी नदी- लूनी नदी का उद्गम अजमेर का नाग पहाड़ है, तत्पश्चात यह जोधपुर, पाली, बाड़मेंर, जालौर के क्षेत्रौं में लगभग 320 कि.मी. प्रवाहित होती हुई अन्त में कच्छ के रन में चली जाती है। यह केवल वर्षा काल में प्रवाहित होती है। लूनी नदी की यह विशेशता है कि इसका पानी बालोतरा तक मीठा है उसके पश्चात् खारा हो जाता है। लूनी नदी की सहायक नदियाँ है- जवाई, लीलड़ी, मीठड़ी, सूखड़ी- प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय, बाड़ी- प्रथम एवं द्वितीय तथा सागी।
माही नदी- माही नदी मध्य प्रदेश के महू की पहाड़ियों से निकलकर राजस्थान में बाँसवाड़ा जिले में प्रवेश करती है तथा डूँगरपुर-बाँसवाड़ा जिले की सीमा बनाते हुए गुजरात में प्रवेश कर अन्त में खम्बात की खाडी में गिर जाती है। बाँसवाड़ा के निकट इस पर ‘माही-बजाज सागर’ बाँध बनाया गया हैं। इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ सोम, जाखम, अनास, चाप और मोरेन है।
साबरमती नदी- उदयपुर के दक्षिण-पश्चिम’ से निकलकर उदयपुर और सिरोही जिलों में प्रवाहित होकर गुजरात में प्रवेश कर खम्भात की खाड़ी में गिरती है। प्रारम्भ में यह वाकल नदी के नाम से जानी जाती है।

3. अंतः प्रवाहित नदियाँ
राजस्थान में अनेक छोटी नदियाँ इस प्रकार की हैं, जो कुछ दूरी तक बहकर रेत अथवा भूमि में विलीन होजाती हैं, इन्हीं को अंतः प्रवाहित नदियाँ कहते हैं। इस प्रकार की प्रमुख नदियाँ कातली, साबी तथा काकानी हैं।
कातली नदी- सीकर जिले की खण्डेला की पहाड़ियों से निकलती है। इसके पश्चात 100 किमी. दूरी तक सीकर, झुन्झुनू जिलों में बहती हुई रेतीली भूमि में विलुप्त हो जाती है।
साबी नदी- जयपुर की सेवर की पहाडियों से निकलकर बानासूर, बहरोड, किशनगढ़, मण्डावर एवं तिजारा तहसीलों में बहती हुई हरियाणा में जाकर विलुप्त हो जाती है।
काकानी अथवा काकनेय नदी- जैसलमेर से लगभग 27 किमी. दक्षिण में कोटरी गाँव से निकलकर कुछ किलोमीटर बहने के पश्चात् विलुप्त हो जाती है।
घग्घर नदी- यह एक विशिष्ट नदी है जिसे प्राचीन सरस्वती नदी का अवशेश माना जाता है। यह हरियाणा से निकलकर हनुमानगढ़, गंगानगर सूरतगढ़, अनूपगढ़ से होते हुए उसका जल पाकिस्तान में चला जाता है। इसमें वर्शाकाल में जल आता है जो सर्वत्र फैल जाता है। इस नदी को मृत नदी कहते हैं। वर्तमान में इस नदी के तल को स्थानीय भाशा में ‘नाली’ कहते हैं।
उक्त अंतः प्रवाहित नदियों के अतिरिक्त बाणगंगा और सांभर झील क्षेत्र की नदियाँ आन्तरिक प्रवाहित श्रेणी की हैं।

राजस्थान की झीलें

राजस्थान में अनेक झीलें हैं, उन्हें दो श्रेणियों में विभक्त किया जाता है, ये हैं -
(अ) खारे पानी की झीलें एवं
(ब) मीठे पानी की झीलें

इनका संक्षिप्त विवरण यहाँ प्रस्तुत है।


(अ) खारे पानी की झीलें
राजस्थान के पश्चिमी मरूस्थली क्षेत्र तथा अंतः प्रवाह वाले क्षत्रों में अनेक खारे पानी की झीलें हैं। इनमें सांभर, डीडवाना, पचपद्रा आरै लूनकरनसर झील प्रमुख हैं।
(1) सांभर झील- जयपुर जिले में जयपुर से लगभग 65कि.मी. पश्चिम में सांभर झील न केवल राजस्थान अपितु भारत की प्रमुख खारे पानी की झील है। इस झील के पानी से नमक उत्पादित होता है। झील का कुल क्षेत्रफल लगभग 150 वर्ग किमी. में है।
(2) डीडवाना झील- नागौर जिले में डीडवाना नगर के निकट यह खारे पानी की झील है। इस झील के जल से सोडियम लवण तैयार किया जाता है।
(3) पचपद्रा झील- बाड़मेर जिले के पचपद्रा नामक स्थान पर यह खारे पानी की झील है।
(4) लूनकरनसर झील- बीकानेर से लगभग 80 किमीदूर लूनकरसर में यह झील स्थित है।
उपर्युक्त प्रमुख खारे पानी की झीलों के अतरिक्त कुछ छोटी झीलें फलोदी, कुचामण, कावोद, कछोर, रेवासा
आदि में हैं।
(ब) मीठे पानी की झीलें
राजस्थान प्रदेश के लिये मीठे पानी की झीलों का विशेष महत्व है क्यांेकि राज्य में पानी की कमी हैं आरै मीठे पानी की झीलें पेय जल तथा सीमित रूप में सिंचाई हेतु जल प्रदान करती हैं। राज्य में मीठे पानी की प्राकृतिक झीलें भी है तथा अनेक झीलों का निर्माण बांध द्वारा पानी को रोक कर किया गया। राज्य में मीठे पानी की झीलें अनेक जिलों में स्थित है। यहाँ राज्य की प्रमुख एवं प्रसिद्ध मीठे पानी की झीलों का संक्षिप्त विवेचन प्रस्तुत किया जा रहा है।
(1) जयसमंद झील- इसका निर्माण वर्श 1685-91 में महाराणा जयसिंह द्वारा गोमती नदी पर बांध बनवाकर कराया गया था। यह झील उदयपुर से 51 किमी. दक्षिण-पूर्व में स्थित है। इसको ‘ढेबर-झील’ के नाम से भी पुकारा जाता है। यह राजस्थान की सबसे बड़ी प्राकृतिक झील है, जो पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
(2) राजसमंद झील- इसका निर्माण महाराणा राजसिंह ने सन् 1662 में कराया था। यह झील उदयपुर से 64 किमी दूर राजसमंद जिले में स्थित है। इस झील के किनारे सुन्दर घाट और नौ चैकी है, जहाँ संगमरमर के शिला लेखों पर मेवाड़ का इतिहास संस्कृत में अंकित है।
(3) पिछोला झील- उदयपुर नगर के पश्चिम में पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण पिछोला झील है। इस झील के दो टापुओं पर जग मंदिर और जग निवास नाम के सुन्दर महल बने हुए है।
(4) फतह सागर झील- उदयपुर नगर से सटी हुई फतेह सागर झील, पिछोला झील के उत्तर-पश्चिम में है जिसका निर्माण महाराणा फतेह सिंह ने करवाया था।
(5) आना सागर झील- अजमेर में स्थित इस झील का निर्माण सम्राट पृथ्वीराज चैहान के पितामह आनाजी ने करवाया था। इसके किनारे एक उद्यान ‘दौलत बाग’ एवं इसके तट पर सुन्दर संगमरमर की छतरियाँ (बारादरी) हैं जो पर्यटकों के आकर्शण का केन्द्र है।
(6) पुष्कर झील- अजमेर से 11 किमी. दूर पर्वतों से आवृत पुष्कर झील है। यह धार्मिक दृष्टि से अत्यधिक महत्व की है तथा पर्यटकों के लिए दर्शनीय है।
(7) सिलीसेढ़ झील- अलवर नगर से लगभग 12 किमी दूर अरावली की पहाड़ियों के मध्य यह सुरम्य झील है।
उपर्युक्त झीलों के अतिरिक्त नवलखा झील (बूंदी), कोलायत झील (कोलायत-बीकानरे ), शैव सागर (डूंगरपुर), गलता एवं रामगढ़ (जयपुर), बालसमंद झील (जोधपुर), कैलाना झील (जोधपुर), भरतपुर का बैरठा बांध तथा धौलपुर का तालाबशाही भी प्रसिद्ध है।

राजस्थान की जलवायु

राजस्थान की जलवायु शुष्क से उप-आर्द  मानसूनी जलवायु है। अरावली के पश्चिम में न्यून वर्षा, उच्च दैनिक एवं वार्षिक तापान्तर, निम्न आर्द्रता तथा तीव्र हवाओं युक्त शुष्क जलवायु है। दूसरी ओर अरावली के पूर्व में अर्द्धशुष्क एवं उप-आर्द्र जलवायु है। अक्षांशीय स्थिति, समुद्र से दूरी, समुद्रतल से ऊँचाई, अरावली पर्वत श्रेणियों की स्थिति एवं दिशा, वनस्पति आवरण आदि यहाँ की जलवायु को प्रभावित करते हैं।

राजस्थान की जलवायु की प्रमुख विशेशताएँ हैं :
(1) शुष्क एवं अर्द्ध-शुष्क जलवायु की प्रधानता।
(2) अपर्याप्त एवं अनिश्चित वर्शा।
(3) वर्षा का असमान वितरण।
(4) अधिकांश वर्षा जून से सितम्बर तक।
(5) वर्षा की परिवर्तनशीलता एवं न्यूनता के कारण सूखा एवं अकाल की स्थिति अधिक होना,  आदि।
जलवायु का ऋतु प्रारूप

भारतीय जलवायु के समान, राजस्थान की जलवायु का अध्ययन भी ऋतुओं के अनुसार किया जाता है। राज्य की जलवायु का स्वरूप निम्नलिखित तीन ऋतुओं से स्पष्ट होता है-
(अ) ग्रीष्म ऋतु (मार्च से मध्य जून)
(ब) वर्षा ऋतु (मध्य जून से सितम्बर)
(स) शीत ऋतु (अक्टूबर से फरवरी)
(अ) ग्रीष्म ऋतु (मार्च से मध्य जून)

ग्रीष्म ऋतु का प्रारम्भ मार्च से हो जाता है और इस समय सूर्य के उत्तरायण में होने के कारण क्रमिक रूप से तापमान में वृद्धि होने लगती है। मई-जून में सम्पूर्ण राजस्थान में उच्च तापमान हो जाता है। सम्पूर्ण राजस्थान विशेषकर पश्चिमी राजस्थान के जैसलमेर, बाडमेर, बीकानेर, जोधपुर, चूरू आदि में 400 से. से अधिक होता है। पूर्वी राजस्थान के जयपुर, दौसा, अलवर, सीकर तथा अजमरे , टोंक , चित्तौड़गढ़, डूँगरपुर, बाँसवाड़ा, में तापमान 360 से. से 400 से. होता। दक्षिणी अरावली के उच्च भागों में ऊँचाई के कारण तापमान कम होता हैं। हाड़ौती का पठार भी इस समय तपता रहता है और वहाँ तापमान 360 से. से 400 से. के मध्य होता है। इस समय गर्म और धूल भरी आँधियों का प्रकोप होता हैं। शुष्क प्रदेशों में रात्रि तापमान कम हो जाता है। इस समय हवा में नमी कम होती है और सम्पूर्ण राज्य गर्मी की चपेट में होता है।
(ब) वर्षा ऋतु (मध्य जून से सितम्बर)
मध्य जून तक सम्पूर्ण राज्य जब ग्रीष्म से तप्त हो जाता है तो वायु-दाव एवं हवाओं की दिशाओं में परिवर्तन के साथ ही हिन्द महासागर से मानसूनी हवाओं का प्रारम्भ हो जाता हैं राजस्थान में जून के अन्त में अथवा जुलाई के प्रथम सप्ताह में मानसून दक्षिणी और दक्षिणी-पूर्वी तथा पूर्वी राजस्थान में क्रमिक रूप से सक्रीय हो जाता है।
मानसूनी वर्षा  राजस्थान का े अपेक्षाकृत कम होती हैं क्योंकि -
(1) अरावली पर्वत शृंखला का विस्तार अरब सागर की मानसून शाखा की दिशा के समानान्तर होने के कारण मानसून राज्य में बिना वर्षा के उत्तर की तरफ चला जाता है।
(2) बंगाल की खाड़ी की ओर से आने वाले मानसून की राजस्थान में पहुँचते-पहुँचते आर्द्रता काफी कम हो जाती है।
(3) अरावली पर्वतमाला की ऊँचाई कम होने तथा उस पर वनस्पति कम होने का भी वर्षा पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। किन्तु इससे यह तात्पर्य नहीं कि राजस्थान में वर्षा नहीं होती। जून से सितम्बर तक राजस्थान में अधिकांशतः वर्षा होती है।
इसके पश्चिम का भाग जहाँ 40 से.मी. से कम वर्षा होती है। वह मरूस्थली है, दूसरी ओर पूर्वी एवं दक्षिणी-पूर्वी क्षेत्रों में अधिक वर्षा होती है। राज्य में सर्वाधिक वर्षा आबू पर्वत के निकटवर्ती क्षेत्रों में लगभग 150 से.मी. होती है। कोटा, झालावाड़, बारां, चित्तौड़गढ़, सिरोही में वार्षिक वर्षा का औसत 90 सेमी रहता है। राज्य में न्यूनतम वर्षा वाले जिले जैसलमेर, बाड़मेर, गंगानगर हैं जहाँ वर्षा 10 से 25 से.मी. तक होती है।
(स) शीत ऋतु (अक्टूबर से फरवरी तक) 

शीत ऋतु को दो भागों में विभक्त किया जाता है-
(1) मानसून के प्रत्यावर्तन का काल (अक्टूबर से मध्य सितम्बर)
(2) शीत ऋतु (मध्य दिसम्बर से फरवरी तक)
वर्षा ऋतु का समापन एकाएक न होकर क्रमिक रूप से होता है और मानसूनी हवाएँ अक्टूबर से वापस लौटने लगती है। इस समय अधिकतम तापमान 300 से 350 से. और न्यूनतम 200 से. तक होता है। यह मानसून के प्रत्यावर्तन अर्थात् लौटने का समय होता है। लौटता मानसून भी कुछ स्थानों पर हल्की वर्षा कर देता है। वास्तविक शीत ऋतु का प्रारम्भ राज्य मे दिसम्बर माह में होता है, क्यांेकि इस समय सूर्य दक्षिणानय में होता है। उत्तरी-पश्चिमी ठण्डी हवाएँ पूरे राज्य में चलने लगती हैं। इस समय पश्चिमी शीतोष्ण चक्रवात भी प्रदेश में आते है जिनसे कुछ वर्षा हो जाती है, इस वर्षा को ‘मावठ’ कहते है। यह वर्षा रबी की फसल के लिये वरदान होती है। जनवरी के माह में शीतकाल पूर्णता पर होता है। सम्पूर्ण प्रदेश में तापमान 50 से 150 से. होता है। चूरू, फलोदी, गंगानगर में तापमान शून्य डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है। इस समय बाडमेर, कोटा, बूंदी तथा दक्षिणी सवाई माधोपुर जिलों में तापमान 100 से अधिक होता है।

                         संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि राजस्थान का भौतिक पर्यावरण विशिष्ट है। राज्य के भौतिक विभागों में उच्चावच एवं जलवायु की अत्यधिक विविधता है। यहाँ के भौतिक पर्यावरण ने सदैव से आर्थिक एवं सामाजिक स्वरूप् को प्रभावित किया है और वर्तमान में भी कर रहा है। राज्य की विकास योजनाओं पर भी इनका प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।

Saturday, 12 February 2011

राजस्थान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

          राजस्थान का इतिहास हमारी गौरवमयी धरोहर है, जिसमें विविधता के साथ निरन्तरता है। परम्पराओं और बहुरंगी सांस्कृतिक विषेशताओं से ओत-प्रोत राजस्थान एक ऐसा प्रदेश है, जहाँ की मिट्टी का कण-कण यहाँ के रणबांकुरों की विजयगाथा बयान करता है। यहाँ के शासकों ने मातृभूमि की रक्षा हेतु सहर्श अपने प्राणों की आहूति दी। कहते हैं राजस्थान के पत्थर भी अपना इतिहास बोलते हैं। यहाँ पुरा सम्पदा का अटूट खजाना है। कहीं पर प्रागैतिहासिक शैलचित्रों की छटा है तो कहीं प्राचीन संस्कृतियों के प्रमाण हैं। कहीं प्रस्तर प्रतिमाओं का शैल्पिक प्रतिमान तो कहीं शिलालेखों के रूप में पाषाणों पर उत्कीर्ण गौरवशाली इतिहास। कहीं समय का एतिहासिक बखान करते प्राचीन सिक्के तो कहीं वास्तुकला के उत्कृष्ठ प्रतीक। उपासना स्थल, भव्य प्रासाद, अभेद्य दुर्ग एवं जीवंत स्मारकों का संगम आदि राजस्थान के कस्बों, शहरों एवं उजड़ी बस्तियों में देखने को मिलता है। राजस्थान के बारे में यह सोचना गलत होगा कि यहाँ की धरती केवल रणक्षेत्र रही है। सच तो यह है कि यहाँ तलवारों की झंकार के साथ भक्ति और आध्यात्मिकता का मधुर संगीत सुनने को मिलता है। लोकपरक सांस्कृतिक चेतना अत्यन्त गहरी है। मेले एवं त्योहार यहाँ के लोगों के मन में रचे -बसे हैं। लोकनृत्य एवं लोक गीत राजस्थानी संस्कृति के संवाहक हैं। राजस्थानी चित्रशैलियों में शृंगार सौन्दर्य के साथ लौकिक जीवन की भी सशक्त अभिव्यक्ति हुई है।
          राजस्थान की यह मरुभूमि प्राचीन सभ्यताओं की जन्म स्थली रही है। यहाँ कालीबंगा, आहड़, बैराठ, बागौर, गणेश्वर जैसी अनेक पाषाणकालीन, सिन्धुकालीन और ताम्रकालीन सभ्यताओं का विकास हुआ, जो राजस्थान के इतिहास की प्राचीनता सिद्ध करती है। इन सभ्यता-स्थलों में विकसित मानव बस्तियों के प्रमाण मिलते हैं। यहाँ बागौर जैसे स्थल मध्यपाषाणकालीन और नवपाषाणकालीन इतिहास की उपस्थिति प्रस्तुत करते हैं। कालीबंगा जैसे विकसित सिन्धुकालीन स्थल का विकास यहीं पर हुआ वहीं आहड़, गणेश्वर जैसी प्राचीनतम ताम्रकालीन सभ्यताएँ भी पनपीं।

आर्य और राजस्थान
          मरुधरा की सरस्वती और दृशद्वती जैसी नदियाँ आर्यों की प्राचीन बस्तियों की शरणस्थली रही है। ऐसा माना जाता है कि यहीं से आर्य बस्तियाँ कालान्तर में दोआब आदि स्थानों की ओर बढ़ी। इन्द्र और सोम की अर्चना में मन्त्रों की रचना, यज्ञ की महत्ता की स्वीकृति और जीवन-मुक्ति का ज्ञान आर्यों को सम्भवतः इन्हीं नदी घाटियों में निवास करते हुए हुआ था। महाभारत तथा पौराणिक गाथाओं से प्रतीत होता है, कि जांगल (बीकानेर), मरुकान्तार (मारवाड़) आदि भागों से बलराम और कृष्ण गुजरे थे, जो आर्यों की यादव शाखा से सम्बन्धित थे।


जनपदों का युग
          आर्य संक्रमण के बाद राजस्थान में जनपदों का उदय होता है, जहाँ से हमारे इतिहास की घटनाएँ अधिक प्रमाणों पर आधारित की जा सकती हैं। सिकन्दर के अभियानों से आहत तथा अपनी स्वतन्त्रता को सुरक्षित रखने को उत्सुक दक्षिण पंजाब की मालव, शिवि तथा अर्जुनायन जातियाँ, जो अपने साहस और शौर्य के लिए प्रसिद्ध थी, अन्य जातियों के साथ राजस्थान में आयीं और सुविधा के अनुसार यहाँ बस गयीं। इनमें भरतपुर का राजन्य जनपद और मत्स्य जनपद, नगरी का शिवि जनपद, अलवर का शाल्व जनपद प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त 300 ई. पू. से 300 ई. के मध्य तक मालव, अर्जुनायन तथा यौधेयों की प्रभुता का काल राजस्थान में मिलता है। मालवों की शक्ति का केन्द्र जयपुर के निकट था, कालान्तर में यह अजमेर, टोंक तथा मेवाड़ के क्षेत्र तक फैल गये। भरतपुर-अलवर प्रान्त के अर्जुनायन अपनी विजयों के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। इसी प्रकार राजस्थान के उत्तरी भाग के यौधेय भी एक शक्तिशाली गणतन्त्रीय कबीला था। यौधेय संभवतः उत्तरी राजस्थान की कुषाण शक्ति को नष्ट करने में सफल हुये थे जो रुद्रदामन के लेख से स्पष्ट है। लगभग दूसरी सदी ईसा पूर्व से तीसरी सदी ईस्वी के काल में राजस्थान के केन्द्रीय भागों में बौद्ध धर्म का काफी प्रचार था, परन्तु यौधेय तथा मालवों के यहाँ आने से ब्राह्मण धर्म को प्रोत्साहन मिलने लगा और बौद्ध धर्म के हृास के चिह्न दिखाई देने लगे। गुप्त राजाओं ने इन जनपदीय गणतन्त्रों को समाप्त नहीं किया, परन्तु इन्हें अर्द्ध आश्रित रूप में बनाए रखा। ये गणतन्त्र हूण आक्रमण के धक्के को सहन नहीं पाये और अन्ततः छठी शताब्दी आते-आते यहाँ से सदियों से पनपी गणतन्त्रीय व्यवस्था सर्वदा के लिए समाप्त हो गई।


मौर्य और राजस्थान
          राजस्थान के कुछ भाग मौर्यों के अधीन या प्रभाव क्षेत्र में थे। अशोक का बैराठ का शिलालेख तथा उसके उत्तराधिकारी कुणाल के पुत्र सम्प्रति द्वारा बनवाये गये मन्दिर मौर्यों के प्रभाव की पुश्टि करते हैं। कुमारपाल प्रबन्ध तथा अन्य जैन ग्रंथों से अनुमानित है कि चित्तौड़ का किला व चित्रांग तालाब मौर्य राजा चित्रांग का बनवाया हुआ है। चित्तौड़ से कुछ दूर मानसरोवर नामक तालाब पर राज मान का, जो मौर्यवंशी माना जाता है, वि. सं. 770 का शिलालेख कर्नल टाॅड को मिला, जिसमें माहेश्वर, भीम, भोज और मान ये चार नाम क्रमशः दिये हैं। कोटा के निकट कणसवा (कसुंआ) के शिवालय से 795 वि. सं. का शिलालेख मिला है, जिसमंे मौर्यवंशी राजा धवल का नाम है। इन प्रमाणों से मौर्यों का राजस्थान में अधिकार और प्रभाव स्पष्ट होता है।  हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद भारत की राजनीतिक एकता पुनः विघटित होने लगी। इस युग में भारत में अनेक नये राजवंशों का अभ्युदय हुआ। राजस्थान में भी अनेक राजपूत वंशों ने अपने-अपने राज्य स्थापित कर लिये थे, इसमें मारवाड़ के प्रतिहार और राठौड़, मेवाड़ के गुहिल, सांभर के चैहान, आमेर के कछवाहा, जैसलमेर के भाटी इत्यादि प्रमुख हंै। 
          शिलालेखों के आधार पर हम कह सकते हैं कि छठी शताब्दी में मण्डोर के आस पास प्रतिहारों का राज्य था और फिर वही राज्य आगे चलकर राठौड़ों को प्राप्त हुआ। लगभग इसी समय सांभर में चैहान राज्य की स्थापना हुई और धीरे-धीरे वह राज्य बहुत शक्तिशाली बन गया। पांचवीं या छठी शताब्दी में मेवाड़ और आसपास के भू-भाग में गुहिलों का शासन स्थापित हो गया। दसवीं शताब्दी में अर्थूंणा तथा आबू में परमार शक्तिशाली बन गये। बारहवी ं तथा तरे हवी ं शताब्दी क े आसपास तक जालारै , रणथम्भौर और हाड़ौती में चैहानों ने पुनः अपनी शक्ति का संगठन किया परन्तु उसका कहीं-कहीं विघटन भी होता रहा।


नामकरण
          वर्तमान राजस्थान के लिए पहले किसी एक नाम का प्रयोग नहीं मिलता है। इसके भिन्न-भिन्न क्षेत्र अलग-अलग नामों से जाने जाते थे। वर्तमान बीकानेर और जोधपुर का क्षेत्र महाभारत काल में ‘जांगल देश’ कहलाता था। इसी कारण बीकानेर के राजा स्वयं को ‘जंगलधर बादशाह’ कहते थे। जांगल देश का निकटवर्ती भाग सपादलक्ष (वर्तमान अजमेर और नागौर का मध्य भाग) कहलाता था, जिस पर चैहानों का अधिकार था। अलवर राज्य का उत्तरी भाग कुरु देश, दक्षिणी और पश्चिमी मत्स्य देश और पूर्वी भाग शूरसेन देश के अन्तर्गत था। भरतपुर और धौलपुर राज्य तथा करौली राज्य का अधिकांश भाग शूरसेन देश के अन्तर्गत थे। शूरसेन राज्य की राजधानी मथुरा, मत्स्य राज्य की विराटनगर और कुरु राज्य की इन्द्रप्रस्थ थी। उदयपुर राज्य का प्राचीन नाम ‘शिव’ था, जिसकी राजधानी ‘मध्यमिका’ थी। आजकल ‘मध्यमिका’ (मज्झमिका) को नगरी कहते हैं। यहाँ पर मेव जाति का अधिकार रहा, जिस कारण इसे मेदपाट अथवा प्राग्वाट भी कहा जाने लगा। डूँगरपुर, बाँसवाड़ा के प्रदेष को बागड़ कहते थे। जोधपुर के राज्य को मरु अथवा मारवाड़ कहा जाता था। जोधपुर के दक्षिणी भाग को गुर्जरत्रा कहते थे और सिरोही के हिस्से को अर्बुद (आबू) देश कहा जाता था। जैसलमेर को माड तथा कोटा और बूँदी को हाड़ौती पुकारा जाता था। झालावाड़ का दक्षिणी भाग मालव देश के अन्तर्गत गिना जाता था।          इस पक्र ार स्पष्ट ह ै कि जिस भू-भाग का े आजकल हम राजस्थान कहते है, वह किसी विशेष नाम से कभी प्रसिद्ध नहीं रहा। ऐसी मान्यता है कि 1800 ई. में सर्वप्रथम जाॅर्ज थाॅमस ने इस प्रान्त के लिए ‘राजपूताना’ नाम का प्रयोग किया था। प्रसिद्ध इतिहास लेखक कर्नल जेम्स टाॅड ने 1829 ई. में अपनी पुस्तक ‘एनल्स एण्ड एण्टीक्वीटीज आॅफ राजस्थान’ में इस राज्य का नाम ‘रायथान’ अथवा ‘राजस्थान’ रखा। जब भारत स्वतन्त्र हुआ तो इस राज्य का नाम ‘राजस्थान’ स्वीकार कर लिया गया।

Friday, 11 February 2011

राजस्थान की प्राचीन सभ्यताएँ

राजस्थान और प्रस्तर युग
          राजस्थान में आदिमानव का प्रादुर्भाव कब और कहाँ हुआ अथवा उसके क्या क्रिया-कलाप थे, इससे संबंधित समसामयिक लिखित इतिहास उपलब्ध नहीं है, परन्तु प्राचीन प्रस्तर-युग के अवशेष अजमेर, अलवर, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, जयपुर, जालौर, पाली, टोंक आदि क्षेत्रों की नदियों अथवा उनकी सहायक नदियों के किनारों से प्राप्त हुये हैं। चित्तौड़ और इसके पूर्व की ओर तो औजारों की उपलब्धि इतनी अधिक है कि ऐसा अनुमान किया जाता है कि यह क्षेत्र इस काल के उपकरणों को बनाने का प्रमुख केन्द्र रहा हो। लूनी नदी के तटों में भी प्रारम्भिक कालीन उपकरण प्राप्त हुये हैं। राजस्थान में मानव विकास की दूसरी सीढ़ी मध्य पाशाण एवं नवीन पाषाण युग है। आज से हजारों वर्षों से पूर्व लगातार इस यगु की संस्कृति विकसित होती रही। इस काल क े उपकरणांे की उपलब्धि पश्चिमी राजस्थान में लूनी तथा उसकी सहायक नदियाँ की घाटियों व दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान में चित्तौड़ जिले में बेड़च और उसकी सहायक नदियाँ की घाटियों में प्रचुर मात्रा में हुई है। बागौर और तिलवाड़ा के उत्खनन से नवीन पाषाणकालीन तकनीकी उन्नति पर अच्छा प्रकाश पड़ा है। इनके अतिरिक्त अजमेर, नागौर, सीकर, झुंझुनूं, कोटा, टोंक आदि स्थानों से भी नवीन पाषाणकालीन उपकरण प्राप्त हुये हैं। 
          नवीन पाषाण युग में कई हजार वर्ष गुजारने के पश्चात् मनुष्य को धीरे-धीरे धातुओं का ज्ञान हुआ। आज से लगभग 6000 वर्ष पहले धातुओं के युग को स्थापित किया जाता है, परन्तु समयान्तर में जब ताँबा और पीतल, लोहा आदि का उसे ज्ञान हुआ तो उनका उपयोग औजार बनाने के लिए किया गया। इस प्रकार धातु युग की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि कृषि और शिल्प आदि कार्यों का सम्पादन मानव के लिए अब अधिक सुगम हो गया और धातु से बने उपकरणों से वह अपना कार्य अच्छी तरह से करने लगा।

कालीबंगा
          यह सभ्यता स्थल वर्तमान हनुमानगढ़ जिले में सरस्वती-दृशद्वती नदियों के तट पर बसा हुआ था, जो 2400-2250 ई. पू. की संस्कृति की उपस्थिति का प्रमाण है। कालीबंगा में मुख्य रूप से नगर योजना के दो टीले प्राप्त हुये हैं। इनमें पूर्वी टीला नगर टीला है, जहाँ से साधारण बस्ती के साक्ष्य मिले हैं। पश्चिमी टीला दुर्ग टीले के रूप में है, जिसके चारों ओर सुरक्षा प्राचीर है। दोनों टीलों के चारों ओर भी सरु क्षा प्राचीर बनी हुई  थी। कालीबंगा से पूर्व-हड़प्पाकालीन, हड़प्पाकालीन और उत्तर हड़प्पाकालीन साक्ष्य मिले है। इस पूर्व-हड़प्पाकालीन स्थल से जुते हुए खेत के साक्ष्य मिले हैं, जो संसार में प्राचीनतम हैं। पत्थर के अभाव के कारण दीवारें कच्ची ईंटों से बनती थी और इन्हें मिट्टी से जोड़ा जाता था। व्यक्तिगत और सार्वजनिक नालियाँ तथा कूड़ा डालने के मिट्टी के बर्तन नगर की सफाई की असाधारण व्यवस्था के अंग थे। वर्तमान में यहाँ घग्घर नदी बहती है जो प्राचीन काल में सरस्वती के नाम से जानी जाती थी। यहाँ से धार्मिक प्रमाण के रूप में अग्निवेदियों के साक्ष्य मिले है। यहाँ संभवतः धूप में पकाई राजस्थान अध्ययन भाग-1 4 गई ईंटों का प्रयोग किया जाता था। यहाँ से प्राप्त मिट्टी के बर्तनों और मुहरों पर जो लिपि अंकित पाई गई है, वह सैन्धव लिपि से मिलती-जुलती है, जिसे अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। कालीबंगा से पानी के निकास के लिए लकड़ी व ईंटों की नालियाँ बनी हुई मिली हैं। ताम्र से बने कृषि के कई औजार भी यहाँ की आर्थिक उन्नति के परिचायक हैं। कालीबंगा की नगर योजना सिन्धु घाटी की नगर योजना के अनुरूप दिखाई देती है। कालीबंगा के निवासियों की मृतक के प्रति श्रद्धा तथा धार्मिक भावनाओं को व्यक्त करने वाली तीन समाधियाँ मिली हैं। दुर्भाग्यवश ऐसी समृद्ध सभ्यता का ह्नास हो गया, जिसका कारण संभवतः सूखा, नदी मार्ग में परिवर्तन इत्यादि माने जाते हैं।

आहड़
          वर्तमान उदयपुर जिले में स्थित आहड़ दक्षिण-पश्चिमी राजस्थान का सभ्यता का केन्द्र था। यह सभ्यता बनास नदी सभ्यता का प्रमुख भाग थी। ताम्र सभ्यता के रूप में प्रसिद्ध यह सभ्यता आयड़ नदी के किनारे मौजूद थी। यह ताम्रवती नगरी अथवा धूलकोट के नाम से भी प्रसिद्ध है। यह सभ्यता आज से लगभग 4000 वर्ष पूर्व बसी थी। विभिन्न उत्खनन के स्तरों से पता चलता है कि बसने से लेकर 18वीं सदी तक यहाँ कई बार बस्ती बसी और उजड़ी। ऐसा लगता है कि आहड़ के आस-पास ताँबे की अनेक खानों के होने से सतत रूप से इस स्थान के निवासी इस धातु के उपकरणों को बनाते रहें और उसे एक ताम्रयुगीय कौशल केन्द्र बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। 500 मीटर लम्बे धूलकोट के टीले से ताँबे की कुल्हाड़ियाँ, लोहे के औजार, बांस के टुकडे़, हड्डियाँ आदि सामग्री प्राप्त हुई हैं।
          अनुमानित है कि मकानों की योजना में आंगन या गली या खुला स्थान रखने की व्यवस्था थी। एक मकान में 4 से 6 बडे़ चूल्हों का होना आहड़ में वृहत् परिवार या सामूहिक भोजन बनाने की व्यवस्था पर प्रकाश डालते हैं। आहड़ से खुदाई से प्राप्त बर्तनों तथा उनके खंडित टुकड़ों से हमें उस युग में मिट्टी के बर्तन बनाने की कला का अच्छा परिचय मिलता है। यहाँ तृतीय ईसा पूर्व से प्रथम ईसा पूर्व की यूनानी मुद्राएँ मिली हैं। इनसे इतना तो स्पष्ट है कि उस युग में राजस्थान का व्यापार विदेशी बाजारों से था। इस बनास सभ्यता की व्यापकता एवं विस्तार गिलूंड, बागौर तथा अन्य आसपास के स्थानों से प्रमाणित है। इसका संपर्क नवदाटोली, हड़प्पा, नागदा, एरन, कायथा आदि भागों की प्राचीन सभ्यता से भी था, जो यहाँ से प्राप्त काले व लाल मिट्टी के बर्तनों के आकार, उत्पादन व कौशल की समानता से निर्दिष्ट होता है।

बैराठ
          वर्तमान जयपुर जिले में स्थित बैराठ का महाभारत कालीन मत्स्य जनपद की राजधानी विराटनगर से समीकरण किया जाता है। यहाँ की पुरातात्त्विक पहाड़ियों के रूप में बीजक डूँगरी, भीम डूँगरी, मोती डूँगरी इत्यादि विख्यात है। यहाँ की बीजक डूँगरी से कैप्टन बर्ट ने अशोक का ‘भाब्रू शिलालेख’ खोजा था। इनके अतिरिक्त यहाँ से बौद्ध स्तूप, बौद्ध मंदिर (गोल मंदिर) और अशोक स्तंभ के साक्ष्य मिले हैं। ये सभी अवशेष मौर्ययुगीन हैं। ऐसा माना जाता है कि हूण आक्रान्ता मिहिरकुल ने बैराठ का विध्वंस कर दिया था। चीनी यात्री युवानच्वांग ने भी अपने यात्रा वृत्तान्त में बैराठ का उल्लेख किया है।

सभ्यता के अन्य प्रमुख केन्द्र
          पाषाणकालीन सभ्यता के केन्द्र बागौर से भारत में पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्य मिले हैं। ताम्रयुगीन सभ्यता के दो वृहद् समूह सरस्वती तथा बनास नदी के कांठे में पनपे थे जिनका वर्णन ऊपर के पृष्ठों में किया गया है। इसी प्रकार राजस्थान में अन्य कई महत्त्वपूर्ण केन्द्र रहे हैं जो इस युग के वैभव की दुहाई दे रहे हैं। गणेश्वर, खेतड़ी, दरीबा, ओझियाना, कुराड़ा आदि से प्राप्त ताम्र और ताम्र उपकरणों का उपयोग अधिकांश राजस्थान के अतिरिक्त हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, रोपड़ आदि में भी होता था। सुनारी, ईसवाल, जोधपुरा, रेढ़ इत्यादि स्थलों से लोहयुगीन सभ्यता के अवशेष मिले है। 
          अतः सरस्वती-दृशद्वती, बनास, बेड़च, आहड़, लूनी इत्यादि नदियों की उपत्यकाओं में दबी पड़ी कालीबंगा, आहड़, बागोर, गिलूंड, गणेश्वर आदि बस्तियों से मिली प्राचीन वस्तुओं से एक विकसित और व्यापक संस्कृति का पता लगा है। ये सभ्यताएँ न केवल स्थानीय सभ्यता का प्रतिनिधित्व करती थी, अपितु चित्रकला, भाण्ड-शिल्प तथा धातु संबंधी तकनीकी कौशल में पश्चिमी एशिया, ईराक, अफ्रीका आदि देशों की प्राचीन सभ्यताओं से सम्पर्क में थी।

पूर्व मध्यकालीन राजस्थान

          इस काल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना युद्धप्रिय राजपूत जाति का उदय एवं राजस्थान में राजपूत राज्यों की स्थापना है। गुप्तों के पतन के बाद केन्द्रीय शक्ति का अभाव उत्तरी भारत में एक प्रकार से अव्यवस्था का कारण बना। राजस्थान की गणतन्त्र जातियों ने उत्तर गुप्तों की कमजोरियों का लाभ उठाकर स्वयं को स्वतन्त्र कर लिया। यह वह समय था जब भारत पर हूण आक्रमण हो रहे थे। हूण नेता मिहिरकुल ने अपने भयंकर आक्रमण से राजस्थान को बड़ी क्षति पहुँचायी और बिखरी हुई गणतन्त्रीय व्यवस्था को जर्जरित कर दिया। परन्तु मालवा के यशोवर्मन ने हूणों को लगभग 532 ई. में परास्त करने में सफलता प्राप्त की। परन्तु इधर राजस्थान में यशोवर्मन के अधिकारी जो राजस्थानी कहलाते थे, अपने-अपने क्षेत्र में स्वतन्त्र होने की चेष्टा कर रहे थे। किसी भी केन्द्रीय शक्ति का न होना इनकी प्रवृत्ति के लिए सहायक बन गया। लगभग इसी समय उत्तरी भारत में हर्षवर्धन का उदय हुआ। उसके तत्त्वावधान में राजस्थान में व्यवस्था एवं शांति की लहर आयी, परतु जो बिखरी हुई अवस्था यहाँ पैदा हो गयी थी, वह सुधर नहीं सकी।
          इन राजनीतिक उथल-पुथल के सन्दर्भ में यहाँ के समाज में एक परिवर्तन दिखाई देता है। राजस्थान में दूसरी सदी ईसा पूर्व से छठी सदी तक विदेशी जातियाँ आती रहीं और यहाँ के स्थानीय समूह उनका मुकाबला करते रहे। परन्तु कालान्तर में इन विदेशी आक्रमणकारियों की पराजय हुई, इनमें कई मारे गये और कई यहाँ बस गये। जो शक या हूण यहाँ बचे रहे उनका यहाँ की शस्त्रोपजीवी जातियों के साथ निकट सम्पर्क स्थापित होता गया और अन्ततोगत्वा छठी शताब्दी तक स्थानीय और विदेशी योद्धाओं का भेद जाता रहा।

राजपूतों की उत्पत्ति
          राजपूताना के इतिहास के सन्दर्भ में राजपूतों की उत्पत्ति के विभिन्न सिद्धान्तों का अध्ययन बड़ा महत्त्व का है। राजपूतों का विशुद्ध जाति से उत्पन्न होने के मत को बल देने के लिए उनको अग्निवंशीय बताया गया है। इस मत का प्रथम सूत्रपात चन्दरबदाई के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘पृथ्वीराजरासो’ से होता है। उसके अनुसार राजपूतों के चार वंश प्रतिहार, परमार, चालुक्य और चैहान ऋषि वशिष्ठ के यज्ञ कुण्ड से राक्षसों के संहार के लिए उत्पन्न किये गये। इस कथानक का प्रचार 16वीं से 18वीं सदी तक भाटों द्वारा खूब होता रहा। मुँहणोत नैणसी और सूर्यमल्ल मिश्रण ने इस आधार को लेकर उसको और बढ़ावे के साथ लिखा। परन्तु वास्तव में ‘अग्निवंशीय सिद्धान्त’ पर विश्वास करना उचित नहीं है क्योंकि सम्पूर्ण कथानक बनावटी व अव्यावहारिक है। ऐसा प्रतीत होता है कि चन्दबरदाई ऋषि वशिष्ठ द्वारा अग्नि से इन वंशों की उत्पत्ति से यह अभिव्यक्त करता हैं कि जब विदशी सत्ता से संघर्ष करने की आवश्यकता हुई तो इन चार वंशों के राजपूतों ने शत्रुओं से मुकाबला हेतु स्वंय को सजग कर लिया। गौरीशकंर हीराचन्द ओझा, सी.वी.वैद्य, दशरथ शर्मा, ईश्वरी प्रसाद इत्यादि इतिहासकारों ने इस मत को निराधार बताया है। 
          गौरीशंकर हीराचन्द ओझा राजपूतांे को सर्यू वंशीय  और चन्द्रवंशीय बताते हैं। अपने मत की पुष्टि के लिए उन्होंने कई शिलालेखों और साहित्यिक ग्रंथों के प्रमाण दिये हैं, जिनके आधार पर उनकी मान्यता है कि राजपूत प्राचीन क्षत्रियों के वंशज हैं। राजपूतों की उत्पत्ति से सम्बन्धित यही मत सर्वाधिक लोकप्रिय है। 
       राजपूताना के प्रसिद्ध इतिहासकार कर्नल जेम्स टाॅड ने राजपूतों को शक और सीथियन बताया है। इसके प्रमाण में उनके बहुत से प्रचलित रीति-रिवाजों का, जो शक जाति के रिवाजों से समानता रखते थे, उल्लेख किया है। ऐसे रिवाजों में सूर्य पूजा, सती प्रथा प्रचलन, अश्वमेध यज्ञ, मद्यपान, शस्त्रों और घोड़ों की पूजा इत्यादि हैं। टाॅड की पुस्तक के सम्पादक विलियम क्रुक ने भी इसी मत का समर्थन किया है परन्तु इस विदेशी वंशीय मत का गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने खण्डन किया है। ओझा का कहना है कि राजपूतों तथा विदेशियों के रस्मों रिवाजों में जो समानता कनर्ल टाॅड ने बतायी है, वह समानता विदेशियों से राजपूतों ने प्राप्त नहीं की है, वरन् उनकी सात्यता वैदिक तथा पौराणिक समाज और संस्कृति से की जा सकती है। अतएव उनका कहना है कि शक, कुषाण या हूणों के जिन-जिन रस्मों रिवाजों व परम्पराआें का उल्लेख समानता बताने के लिए जेम्स टाॅड ने किया है, वे भारतवर्ष में अतीत काल से ही प्रचलित थीं। उनका सम्बन्ध इन विदेशी जातियों से जोड़ना निराधार है। 
          डाॅ. डी. आर. भण्डारकर राजपूतों को गुर्जर मानकर उनका संबंध श्वेत-हूणों के स्थापित करके विदेशी वंशीय उत्पत्ति को और बल देते हैं। इसकी पुष्टि में वे बताते हैं कि पुराणों में गुर्जर और हूणों का वर्णन विदेशियों के सन्दर्भ में मिलता है। इसी प्रकार उनका कहना है कि अग्निवंशीय प्रतिहार, परमार, चालुक्य और चैहान भी गुर्जर थे, क्योंकि राजोर अभिलेख में प्रतिहारों को गुर्जर कहा गया है। इनके अतिरिक्त भण्डारकर ने बिजौलिया शिलालेख के आधार पर कुछ राजपूत वंशों को ब्राह्मणों से उत्पन्न माना है। वे चैहानों को वत्स गोत्रीय ब्राह्मण बताते हैं और गुहिल राजपूतों की उत्पत्ति नागर ब्राह्मणों से मानते हैं। 
          डाॅ. ओझा एवं वैद्य ने भण्डराकर की मान्यता को अस्वीकृत करते हुए लिखा है कि प्रतिहारों को गुर्जर कहा जाना जाति की संज्ञा नहीं है वरन उनका प्रदेश विशेष गुजरात पर अधिकार होने के कारण है। जहाँ तक राजपूतों की ब्राह्मणों से उत्पत्ति का प्रश्न है, वह भी निराधार है क्योंकि इस मत के समर्थन में उनके साक्ष्य कतिपय शब्दों का प्रयोग राजपूतों के साथ होने मात्र से है। 
          इस प्रकार राजपूतों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में उपर्युक्त मतों में मतैक्य नहीं है। फिर भी डाॅ. ओझा के मत को सामान्यतः मान्यता मिली हुई है। निःसन्देह राजपूतों को भारतीय मानना उचित है।  

पूर्व मध्यकाल में विभिन्न राजपूत राजवंशों का उदय 
          प्रारम्भिक राजपूत कुलों में जिन्होंने राजस्थान में अपने-अपने राज्य स्थापित किये थे उनमें मेवाड़ के गुहिल, मारवाड़ के गुर्जर प्रतिहार और राठौड़, सांभर के चैहान, तथा आबू के परमार, आम्बेर के कछवाहा, जैसलमेर के भाटी आदि प्रमुख थे। 
          1. मेवाड़ के गुहिल - इस वंश का आदिपुरुश गुहिल था। इस कारण इस वंश के राजपूत जहाँ-जहाँ जाकर बसे उन्होंने स्वयं को गुहिलवंशीय कहा। गौरीशंकर हीराचन्द ओझा गुहिलों को विशुद्ध सूर्यवंशीय मानते हैं, जबकि डी. आर. भण्डारकर के अनुसार मेवाड़ के राजाब्राह्मण थे। गुहिल के बाद मान्य प्राप्त शासकों में बापा का  नाम उल्लेखनीय हैं, जो मेवाड़ के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। डाॅ. ओझा के अनुसार बापा इसका नाम न होकर कालभोज की उपाधि थी। बापा का एक सोने का सिक्का भी मिला है, जो 115 ग्रेन का था। अल्लट, जिसे ख्यातों में आलुरावल कहा गया है, 10वीं सदी के लगभग मेवाड़ का शासक बना। उसने हूण राजकुमारी हरियादेवी से विवाह किया था तथा उसके समय में आहड़ में वराह मन्दिर का निर्माण कराया गया था। आहड़ से पूर्व गुहिल वंश की गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र नागदा था। गुहिलों ने तेरहवीं सदी के प्रारम्भिक काल तक मेवाड़ में कई उथल-पुथल के बावजूद भी अपने कुल परम्परागत राज्य को बनाये रखा।
          2. मारवाड़ के गुर्जर-प्रतिहार - प्रतिहारों द्वारा अपने राज्य की स्थापना सर्वप्रथम राजस्थान में की गई थी, ऐसा अनुमान लगाया जाता है। जोधपुर के शिलालेखों से प्रमाणित होता है कि प्रतिहारों का अधिवासन मारवाड़ में लगभग छठी शताब्दी के द्वितीय चरण में हो चुका था। चूँकि उस समय राजस्थान का यह भाग गुर्जरत्रा कहलाता था, इसलिए चीनी यात्री युवानच्वांग ने गुर्जर राज्य की राजधानी का नाम पीलो मोलो (भीनमाल) या बाड़मेर बताया है। 
          मुँहणोत नैणसी ने प्रतिहारों की 26 शाखाओं का उल्लेख किया है, जिनमें मण्डौर के प्रतिहार प्रमुख थे। इस शाखा के प्रतिहारों का हरिशचन्द्र बड़ा प्रतापी शासक था, जिसका समय छठी शताब्दी के आसपास माना जाता है। लगभग 600 वर्शों के अपने काल में मण्डौर के प्रतिहारों ने सांस्कृतिक परम्परा को निभाकर अपने उदात्त स्वातन्त्र्य प्रेम और शौर्य से उज्ज्वल कीर्ति को अर्जित किया। जालौर-उज्जैन-कन्नौज के गुर्जर प्रतिहारों की नामावली नागभट्ट से आरंभ होती है जो इस वंश का प्रवर्तक था। उसे ग्वालियर प्रशस्ति में ‘म्लेच्छों का नाशक’ कहा गया है। इस वंश में भोज और महेन्द्रपाल को प्रतापी शासकों में गिना जाता है। 
          3. आबू के परमार - ‘परमार’ शब्द का अर्थ शत्रु को मारने वाला होता है। प्रारंभ में परमार आबू के आसपास के प्रदेशों में रहते थे। परन्तु प्रतिहारों की शक्ति के हृास के साथ ही परमारों का राजनीतिक प्रभाव बढ़ता चला गया। धीरे-धीरे इन्होंने मारवाड़, सिन्ध, गुजरात, वागड़, मालवा आदि स्थानों में अपने राज्य स्थापित कर लिये। आबू के परमारों का कुल पुरुष धूमराज था परन्तु परमारों की वंशावली उत्पलराज से आरंभ होती है। परमार शासक धंधुक के समय गुजरात के भीमदेव ने आबू को जीतकर वहाँ विमलशाह को दण्डपति नियुक्त किया। विमलशाह ने आबू में 1031 में आदिनाथ का भव्य मन्दिर बनवाया था। धारावर्ष आबू के परमारों का सबसे प्रसिद्ध शासक था। धारावर्ष का काल विद्या की उन्नति और अन्य जनोपयोगी कार्यों के लिए प्रसिद्ध है। इसका छोटा भाई प ्र ह ्लादन देव वीर आ ैर विद्वान थ ा। उसने ‘पार्थ-पराक्रम-व्यायोग’ नामक नाटक लिखकर तथा अपने नाम स े पह्र लादनपरु (पालनपरु ) नामक नगर बसाकर परमारांे के साहित्यिक और सांस्कृतिक स्तर को ऊँचा उठाया। धारावर्ष के पुत्र सोमसिंह के समय में, जो गुजरात के सोलंकी राजा भीमदेव द्वितीय का सामन्त था, वस्तुपाल के छोटे भाई तेजपाल ने आबू के देलवाड़ा गाँव में लूणवसही नामक नेमिनाथ मन्दिर का निर्माण करवाया था। मालवा के भोज परमार ने चित्तौड़ में त्रिभुवन नारायण मन्दिर बनवाकर अपनी कला के प्रति रुचि को व्यक्त किया। वागड़ के परमारों ने बाँसवाड़ा के पास अर्थूणा नगर बसा कर और अनेक मंदिरों का निर्माण करवाकर अपनी शिल्पकला के प्रति निष्ठा का परिचय किया। 
          4. सांभर के चैहान - चैहानों के मूल स्थान के संबंध में मान्यता है कि वे सपादलक्ष एवं जांगल प्रदेश के आस पास रहते थे। उनकी राजधानी अहिच्छत्रपुर (नागौर) थी। सपादलक्ष के चौहानों का आदि पुरुष वासुदेव था, जिसका समय 551 ई. के लगभग अनुमानित है। बिजौलिया प्रशस्ति में वासुदेव को सांभर झील का निर्मातामाना गया है। इस प्रशस्ति में चैहानों को वत्सगौत्रीय  ब्राह्मण बताया गया है। प्रारंभ में चैहान प्रतिहारों के सामन्त थे परन्तु गुवक प्रथम जिसने हर्षनाथ मन्दिर का निर्माण कराया, स्वतन्त्र शासक के रूप में उभरा। इसी वंश के चन्दराज की पत्नी रुद्राणी यौगिक क्रिया में निपुण थी। ऐसा माना जाता है कि वह पुष्कर झील में प्रतिदिन एक हजार दीपक जलाकर महादेव की उपासना करती थी। 
          1113 ई. में अजयराज चैहान ने अजमेर नगर की स्थापना की। उसके  पुत्र अर्णोराज (आनाजी) ने अजमेर में आनासागर झील का निर्माण करवाकर जनोपयोगी कार्यों में भूमिका अदा की। चैहान शासक विग्रहराज चतुर्थ का काल सपादलक्ष का स्वर्णयुग कहलाता है। उसे वीसलदेव और कवि बान्धव भी कहा जाता था। उसने ‘हरकेलि’ नाटक और उसके दरबारी विद्वान सोमदेव ने ‘ललित विग्रहराज’ नामक नाटक की रचना करके साहित्य स्तर को ऊँचा उठाया। विग्रहराज ने अजमेर में एक संस्कृत पाठशाला का निर्माण करवाया। यहीं आगे फिर कुतुबुद्दीन  ऐबक ने ‘ढाई दिन का झोंपड़ा’ बनवाया। विग्रहराज चतुर्थ एक विजेता था। उसने तोमरों को पराजित कर ढिल्लिका(दिल्ली) को जीता। इसी वंशक्रम में पृथ्वीराज चैहानतृतीय  ने राजस्थान और उत्तरी भारत की राजनीति मेंअपनी विजयों से एक विशिष्ट स्थान बना लिया था। 1191 ई. में उसने तराइन के प्रथम युद्ध में मुहम्मद गौरी को परास्त कर वीरता का समुचित परिचय दिया। परन्तु 1192 ई. में तराइन के दूसरे युद्ध में जब उसकी गौरी से हार हो गई, तो उसने आत्म-सम्मान को ध्यान में रखते हुए आश्रित शासक बनने की अपेक्षा मृत्यु को प्राथमिकता दी। पृथ्वीराज विजय के लेखक जयानक के अनुसार पृथ्वीराज चैहान ने जीवनपर्यन्त युद्धों के वातावरण में रहते हुए भी  चैहान राज्य की प्तिभा को साहित्य और सांस्कृतिक क्षेत्र में पुष्ट किया। तराइन के द्वितीय युद्ध के पश्चात् भारतीय राजनीति में एक नया मोड़ आया। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं था कि इस युद्ध के बाद चैहानों की शक्ति समाप्त हो गई। लगभग आगामी एक शताब्दी तक चैहानों की शाखाएँ रणथम्भौर, जालौर, हाड़ौती, नाड़ौल तथा चन्द्रावती और आबू में शासन करती रहीं। और राजपूत शक्ति की धुरीबनी रहीं। इन्हांने  दिल्ली सुल्तानों की सत्ता का समय-समय पर मुकाबला कर शौर्य और अदम्य साहस का परिचय दिया।
          पूर्व मध्यकाल में पराभवों के बावजूद राजस्थान बौद्धिक उन्नति में नहीं पिछड़ा। चैहान व गुहिल शासक विद्वानों के प्रश्रयदाता बने रहे, जिससे जनता में शिक्षा एवं साहित्यिक प्रगति बिना अवरोध के होती रही। इसी तरह निरन्तर संघर्ष के वातावरण में वास्तुशिल्प पनपता रहा। इस समूचे काल की सौन्दर्य तथा आध्यात्मिक चेतना ने कलात्मक योजनाओं को जीवित रखा। चित्तौड़, बाड़ौली, आबू के मन्दिर इस कथन के प्रमाण हैं।

मध्यकालीन राजस्थान के कतिपय उज्ज्वल एवं गौरवशाली पक्ष 
          मध्यकाल में राजपूत शासकों और सामन्तों ने मुस्लिम शक्ति को रोकने की समय-समय पर भरपूर कोशिश की। राजपूतों द्वारा अनवरत तीव्र प्रतिरोध का सिलसिला मध्यकाल में चलता रहा। सत्ता संघर्ष में राजपूत निर्णायक लड़ाई नहीं जीत सके। इसका मुख्य कारण राजपूतों में साधारणतः आपसी सहयोग का अभाव, युद्ध लड़ने की कमजोर रणनीति तथा सामन्तवाद था। यह सोचना उचित नहीं है कि राजपूतों के प्रतिरोध का कोई अर्थ नहीं निकला। राणा कुम्भा एवं राणा सांगा के नेतृत्व में सर्वोच्चता की स्थापना राजपूताने में ही सम्भव हो सकती थी। यह स्मरण रहे कि आगे चलकर राणा प्रताप, चन्द्रसेन और राजसिंह ने मुगलों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा। यद्यपि अकबर की राजपूत नीति के कारण राजपूताना के अधिकांश शासक उसके हितों की रक्षा करने वाले बन गये।
          मध्यकालीन राजस्थान को बौद्धिक अधिसृष्टि से पिछड़ा मानना इतिहास के तथ्यों एवं अनुभवों के विपरीत होगा। जिस वीर प्रसूता वसुन्धरा पर माघ, हरिभद्रसूरी, चन्दबरदाई, सूर्यमल्ल मिश्रण, कवि करणीदास, दुरसा आढ़ा, नैणसी जैसे विद्वान लेखक तथा महाराणा कुम्भा, राजा रायसिंह, राजा सवाई जयसिंह जैसे प्रबुद्ध शासक अवतरित हुए हों, वह ज्ञान के आलोक से कभी वंचित रही हो,स्वीकार्य नहीं। जिस प्रदेश के रणबाँकुरों में राणा प्रताप,  राव चन्द्रसेन, दुर्गादास जैसे व्यक्तित्व रहे हों, वह धरती यश से वंचित रहे; सोचा भी नहीं जा सकता।
         ‘धरती धोरां री’ का इतिहास अपने-आप में राजस्थान का ही नहीं अपितु भारतीय इतिहास का उज्ज्वल एवं गौरवशाली पहलू है। मध्यकालीन राजस्थान के इतिहास में गुहिल-सिसोदिया (मेवाड़), कछवाहा (आमेर-जयपुर), चैहान (अजमेर, दिल्ली, जालौर, सिरोही, हाड़ौती इत्यादि के चैहान), राठौड़ (जोधपुर और बीकानेर के राठौड़) इत्यादि राजवंश नक्षत्र भांति चमकते हुये दिखाई देते हैं। 

गुहिल-सिसोदिया वंश -
          I. मेवाड़ के इतिहास में तेरहवीं शताब्दी के आरंभ से एक नया मोड़ आता है, जिसमें चैहानों की केन्द्रीय शक्ति का हृास होना और गुहिल जैत्रसिंह जैसे व्यक्ति का शासक होना बडे़ महत्त्व की घटनाएँ है। मेवाड़ के गुहिल शासक रत्नसिंह (1302-03) के समय चित्तौड़ पर दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने आक्रमण किया था। अलाउद्दीन के इस आक्रमण के राजनीतिक, आर्थिक और सैनिक कारणों के साथ रत्नसिंह की सुन्दर पत्नी पद्मिनी को प्राप्त करने लालसा भी बताया जाता है। पद्मिनी की कथा का उल्लेख मलिक मुहम्मद जायसी के ‘पद्मावत’ नामक ग्रंथ में मिलता है। अलाउद्दीन के आक्रमण के दौरान रत्नसिंह और गोरा-बादल वीर गति प्राप्त हुये तथा पद्मिनी ने 1600 स्त्रियों के साथ जौहर कर आत्मोत्सर्ग किया। इसी समय अलाउद्दीन ने 30,000 हिन्दुओं का चित्तौड़गढ़ में कत्ल करवा दिया था। अलाउद्दीन ने चित्तौड़ जीतकर उसका नाम खिज्राबाद कर दिया था। राजपूतों का यह बलिदान चित्तौड़ के प्रथम साके के नाम से प्रसिद्ध हैं जिसमें गोरा-बादल की वीरता एक अमर कहानी बन गयी। आज भी चित्तौड़ के खण्डहरों में गोरा-बादल के महल उनके साहस और सूझ-बूझ की कहानी सुना रहे हंै। पद्मिनी का त्याग और जौहर व्रत महिलाओं को एक नयी प्रेरणा देता है। गोरा-बादल का बलिदान हमें यह सिखाता है कि जब देश पर आपत्ति आये तो प्रत्येक व्यक्ति को अपना सर्वस्व न्योछावर कर देश-रक्षा में लग जाना चाहिए।
          रत्नसिंह के पश्चात् सिसोदिया के सरदार हम्मीर ने मेवाड़ को दयनीय स्थिति से उभारा। वह राणा शाखा का राजपूत था। राणा लाखा (1382-1421) के समय उदयपुर की पिछोला झील का बांध बनवाया गया था। लाखा के निर्माण कार्य मेवाड़ की आर्थिक स्थिति तथा सम्पन्नता को बढ़ाने में उपयोगी सिद्ध हुए। लाखा के पुत्र मोकल ने मेवाड़ को बौद्धिक तथा कलात्मक प्रवृत्तियों का केन्द्र बनाया। उसने चित्तौड़ के समिधेश्वर (त्रिभुवननारायण मंदिर) मंदिर के जीर्णोद्धार द्वारा पूर्व मध्यकालीन तक्षण कला के नमूने को जीवित रखा। उसने एकलिंगजी के मंदिर के चारों ओर परकोटा बनवाकर, उस मंदिर की सुरक्षा की समुचित व्यवस्था की।
          II. मोकल के पुत्र राणा कुंभा (1433 -1468) का काल मेवाड़ में राजनीतिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक उन्नति के लिए जाना जाता है। कुंभा को अभिनवभरताचार्य, हिन्दू सुरताण, चापगुरु, दानगुरु आदि विरुदों से संबोधित किया जाता था। राणा कंुभा ने 1437 में सारंगपुर के युद्ध में मालवा (मांडू) के सुल्तान महमूद खिलजी को पराजित किया था। इस विजय के उपलक्ष्य में कुंभा ने अपने आराध्यदेव विष्णु के निमित्त चित्तौड़गढ़ में कीर्तिस्तंभ (विजयस्तंभ) का निर्माण करवाया। कुंभा ने मेवाड़ की सुरक्षा के उद्देश्य से 32 किलों का निर्माण करवाया था, जिनमें बसन्ती दुर्ग, मचान दुर्ग, अचलगढ़, कुंभलगढ़ दुर्ग प्रमुख हैं। कुंभलगढ़ दुर्ग का सबसे ऊँचा भाग कटारगढ़ कहलाता है। कुंभाकालीन स्थापत्य में मंदिरों का बड़ा महत्त्व है। ऐसे मन्दिरों में कुंभस्वामी तथा शृंगारचैरी का मंदिर (चित्तौड़), मीरां मंदिर (एकलिंगजी), रणकपुर का मंि दर अनठू े ह।ंै कभ्ंु ाा वीर, यद्धु कुषल, कलापमे्र ी क े साथ-साथ विद्वान एवं विद्यानुरागी भी था। एकलिंगमहात्म्य से ज्ञात होता है कि कंुभा वेद, स्मृति, मीमांसा, उपनिषद, व्याकरण, साहित्य, राजनीति में बड़ा निपुण था। संगीतराज, संगीत मीमांसा एवं सूड़ प्रबन्ध कुंभा द्वारा रचित संगीत गं्रथ थे। कभ्ंु ाा न े चण्डीशतक की व्याख्या, गीतगाेि वन्द की रसिकपिय्र ा टीका और संगीत रत्नाकर की टीका लिखी थी। कुंभा का दरबार विद्वानों की शरणस्थली था। उसके दरबार में मण्डन (प्रख्यात शिल्पी), कवि अत्रि और महेश, कान्ह व्यास इत्यादि थे। अत्रि और महेश ने कीर्तिस्तंभ प्रशस्ति की रचना की तथा कान्ह व्यास ने एकलिंगमहात्य नामक गं्रथ की रचना की। इस प्रकार कंुभा के काल में मेवाड़ सर्वतोन्मुखी उन्नति पर पहुँच गया था।
          III. मेवाड़ के वीरों में राणा सांगा (1509-1528) का अद्वितीय स्थान है। सांगा ने गागरोन के युद्ध में मालवा के महमूद खिलजी द्वितीय और खातौली के युद्ध में दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी को पराजित कर अपनी सैनिक योग्यता का परिचय दिया। सांगा भारतीय इतिहास में हिन्दूपत के नाम से विख्यात है। राणा सांगा खानवा के मैदान में राजपूतों का एक संघ बनाकर बाबर के विरुद्ध लड़ने आया था परन्तु पराजित हुआ। बाबर के श्रेष्ठ नेतृत्व एवं तोपखानें के कारण सांगा की पराजय हुई। खानवा का युद्ध (17 मार्च, 1527) परिणामों की दृष्टि से बड़ा महत्त्वपूर्ण रहा। इससे राजसत्ता राजपूतों के हाथों से निकलकर, मुगलों के हाथों में आ गई। यहीं से उत्तरी भारत का राजनीतिक संबंध मध्य एशियाई देशों से पुनः स्थापित हो गया। राणा सांगा अन्तिम हिन्दू राजा था जिसके सेनापतित्व में सब राजपूत जातियाँ विदेशियों को भारत से निकालने के लिए सम्मिलित हुई। सांगा ने अपने देश के गौरव रक्षा में एक आँख, एक हाथ और टांग गँवा दी थी। इसके अतिरिक्त उसके शरीर क े भिन्न-भिन्न भागांे पर 80 तलवार के घाव लगे हुये थे। सांगा ने अपने चरित्र और आत्म बल से उस जमाने में इस बात की पुष्टि कर दी थी कि उच्च पद और चतुराई की अपेक्षा स्वदेश रक्षा और मानव धर्म का पालन करने की क्षमता का अधिक महत्त्व है।
          सांगा के पुत्र विक्रमादित्य (1531 -1536) के राजत्व काल में गुजरात के बहादुरशाह ने चित्तौड़ पर दो आक्रमण किये, जिसमें मेवाड़ को जन और धन की हानि उठानी पड़ी। इस आक्रमण के दौरान विक्रमादित्य की माँ और सांगा की पत्नी हाड़ी कर्मावती ने हुमायूँ के पास राखी भेजकर सहायता मांगी परन्तु समय पर सहायता न मिलने पर कर्मावती (कर्णावती) ने जौहर व्रत का पालन किया। कुँवर पृथ्वीराज के अनौरस पुत्र वणवीर ने अवसर पाकर विक्रमादित्य की हत्या कर दी। वह विक्रमादित्य के दूसरे भाई उदयसिहं का े भी मारकर निश्चिन्त हाके र राज्य भोगना चाहता था परन्तु पन्नाधाय ने अपने पुत्र चन्दन को मृत्यु शैया पर लिटाकर उदयसिंह को बचा लिया और चित्तौड़गढ़ से निकालकर कंुभलगढ ़ पहँुचा दिया। इस प्रकार पन्नाधाय ने देश प्रेम हेतु त्याग का अनुठा उदाहरण प्रस्तुत किया जिसका गान भारतीय इतिहास में सदियों तक होता रहेगा।
          IV. महाराणा उदयसिंह (1537 -1572) ने 1559 में उदयपुर की स्थापना की थी। उसके समय 1567-68 में अकबर ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया था परन्तु कहा जाता है कि अपने मन्त्रियों की सलाह पर उदयसिंह चित्तौड़ की रक्षा का भार जयमल मेड़तिया और फत्ता सिसोदिया को सौंपकर गिरवा की पहाड़ियाँ में चला गया था। इतिहास लेखकों ने इसे उदयसिंह की कायरता बताया है। कर्नल टाॅड ने तो यहाँ तक लिखा है कि यदि सांगा और प्रताप के बीच में उदयसिंह न होता तो मेवाड़ के इतिहास के पन्ने अधिक उज्ज्वल होते। परन्तु डाॅगोपीनाथ शर्मा की राय में उदयसिंह को कायर या देशद्रोही कभी नहीं कहा जा सकता क्योंकि उसने बणवीर, मालदेव, हाजी खाँ पठान आदि के विरुद्ध युद्ध लड़कर अपने अदम्य साहस और शौर्य का परिचय दिया था। अकबर से लड़ते हुये जयमल और फत्ता वीर गति को प्राप्त हुये। अकबर ने चित्तौड़ में तीन दिनों के कठिन संघर्ष के बाद 25 फरवरी, 1568 को किला फतह कर लिया। अकबर द्वारा यहाँ कराये गये नरसंहार से आज भी उसका नाम कलंकित है। अकबर जयमल और फत्ता की वीरता से इतना मुग्ध हुआ कि उसने आगरा किले के द्वार पर उन दोनों वीरों की पाषाण मूर्तियाँ बनवाकर लगवा दी।
          V. उदयसिंह के पुत्र महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई, 1540 को कटारगढ़ (कुंभलगढ़) में हुआ था। प्रताप ने मेवाड़ के सिंहासन पर केवल पच्चीस वर्षो तक शासन किया लेकिन इतने समय में ही उन्होंने ऐसी कीर्ति अर्जित की जो देश-काल की सीमा को पार कर अमर हो गई। वह आरै उनका मवे ाड ़ राज्य वीरता, बलिदान आरै दश्े ााभिमान के पर्याय बन गए। प्रताप को पहाड़ी भाग में ‘कीका’ कहा जाता था, जो स्थानीय भाषा में छोटे बच्चे का सूचक है। अकबर ने प्रताप को अधीनता में लाने के अनेक प्रयास किये परन्तु निष्फल रहे। जहाँ भारत के तथा राजस्थान के अधिकांश नरेशों ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली थी, प्रताप ने वैभव के प्रलोभन को ठुकरा कर राजनीतिक मंच पर अपनी कत्र्तव्य परायणता के उत्तरदायित्व को बडे़ साहस से निभाया। उसने अपनी निष्ठा और दृढ़ता से अपने सैनिकों को कत्र्तव्यबोध, प्रजा को आशावादी और शत्रु को भयभीत रखा।
          अकबर मेवाड़ की स्वतन्त्रता समाप्त करने पर तुला हुआ था और प्रताप उसकी रक्षा के लिए। दोनों की मनोवृत्ति और भावनाओं का मेल न होना ही हल्दीघाटी के युद्ध (18 जून, 1576) का कारण बन गया। अकबर के प्रतिनिधि मानसिंह और महाराणा प्रताप के मध्य ऐतिहासिक हल्दीघाटी (जिला राजसमंद) का युद्ध लड़ा गया। परन्तु इसमें मानसिंह प्रताप को मारने अथवा बन्दी बनाने में असफल रहा, वहीं प्रताप ने अपनी प्रिय घोडे़ चेतक की पीठ पर बैठकर मुगलों को ऐसा छकाया कि वे अपना पिण्ड छुड़ाकर मेवाड़ से भाग निकले। यदि हम इस युद्ध के परिणामों को गहराई से देखते हैं तो पाते हैं कि पार्थिव विजय तो मुगलों को मिली, परन्तु वह विजय पराजय से कोई कम नहीं थी। महाराणा प्रताप को विपत्ति काल में उसके मन्त्री भामाशाह ने सुरक्षित सम्पत्ति लाकर समर्पित कर दी थी। इस कारण भामाशाह को दानवीर तथा मेवाड़ का उद्धारक कहकर पुकारा जाता है।
          राणा प्रताप ने 1582 में दिवेर के युद्ध में अकबर के प्रतिनिधि सुल्तान खाँ को मारकर वीरता का प्रदर्शन किया। प्रताप ने अपने जीवनकाल में चित्ताडै ़ आरै माडं लगढ़ के अतिरिक्त मेवाड़ के अधिकांश हिस्सों पर पुनः अधिकार कर लिया था। प्रताप ने विभिन्न समय में कुंभलगढ़ और चावण्ड को अपनी राजधानियाँ बनायी थीं। प्रताप के सम्बन्ध में कर्नल जेम्स टाॅड का कथन है कि ‘‘अकबर की उच्च महत्त्वाकांक्षा, शासन निपुणता और असीम साधन ये सब बातें दृढ़-चित्त महाराणा प्रताप की अदम्य वीरता, कीर्ति को उज्ज्वल रखने वाले दृढ़ साहस और कर्मठता को दबाने में पर्याप्त न थी। अरावली में कोई भी ऐसी घाटी नहीं, जो प्रताप के किसी न किसी वीर कार्य, उज्ज्वल विजय या उससे अधिक कीर्तियुक्त पराजय से पवित्र न हुई हो। हल्दीघाटी मेवाड़ की थर्मोपल्ली और दिवेर मेवाड़ का मरे ाथन है।’’ अतएव स्वतन्त्रता का महान ् स्तभ्ं ा, सदक् ार्यांे का समर्थक और नैतिक आचरण का पुजारी होने के कारण आज भी प्रताप का नाम असंख्य भारतीयों के लिए आशा
का बादल है और ज्योति का स्तंभ है।
          प्रताप की मृत्यु (19 जनवरी, 1597) के पश्चात् उसके पुत्र अमर सिंह ने मेवाड़ की बिगड़ी हुई व्यवस्था को सुधारने के लिए मुगलों से संधि करना श्रेयस्कर माना। अमरसिंह ने 1615 को जहाँगीर के प्रतिनिधि पुत्र खुर्रम के पास संधि का प्रस्ताव भेजा, जिसे जहाँगीर ने स्वीकार कर लिए। अमरसिंह मुगलों से संधि करने वाला मेवाड़ का प्रथम शासक था। संधि में कहा गया था कि राणा अमरसिंह को अन्य राजाओं की भांति मुगल दरबार की सेवा श्रेणी में प्रवेश करना होगा, परन्तु राणा को दरबार में जाकर उपस्थित होना आवश्यक न होगा।
          VI. महाराणा राजसिंह (1652-1680) ने मेवाड़ की जनता को दुश्काल से सहायता पहुँचाने के लिए तथा कलात्मक प्रवृत्ति को प्रोत्साहन देने के लिए राजसमंद झील का निर्माण करवाया। राजसिंह ने युद्ध नीति और राज्य हित के लिए संस्कृति के तत्त्वों के पोषण की नीति को प्राथमिकता दी। वह रणकुशल, साहसी, वीर तथा निर्भीक शासक था। उसमें कला के प्रति रुचि और साहित्य के प्रति निष्ठा थी। मेवाड़ के इतिहास में निर्माण कार्य एवं साहित्य को इसके समय में जितना प्रश्रय मिला, कुंभा को छोड़कर किसी अन्य शासक के समय में न मिला। औरगंजेब जैसे शक्तिशाली मुगल शासक से मैत्री सम्बन्ध बनाये रखना तथा आवश्यकता पड़ने पर शत्रुता बढ़ा लेना राजसिंह की समयोचित नीति का परिणाम था।

कछवाहा वंश
          I. कछवाहा वंश राजस्थान के इतिहास मंच पर  बारहवीं सदी से दिखाई देता है। उनको प्रारम्भ में मीणों और बड़गुजरों का सामना करना पड़ा था। इस वंश के प्रारम्भिक शासकों ने दुल्हैराय व पृथ्वीराज बडे़ प्रभावशाली थे जिन्होंने दौसा, रामगढ़, खोह, झोटवाड़ा, गेटोर तथा आमेर को अपने राज्य में सम्मिलित किया था। पृथ्वीराज, राणा सांगा का सामन्त होने के नाते खानवा के युद्ध (1527) में बाबर के विरुद्ध लड़ा था। पृथ्वीराज की मृत्यु के बाद कछवाहों की स्थिति संतोषजनक नहीं थी। गृह कलह तथा अयोग्य शासकों से राज्य निर्बल हो रहा था। 1547 में भारमल ने आमेर की बागडोर हाथ में ली। भारमल ने उदयीमान अकबर की शक्ति का महत्त्व समझा और 1562 में उसने अकबर की अधीनता स्वीकार कर अपनी ज्येश्ठ पुत्री हरकूबाई का विवाह अकबर के साथ कर दिया। अकबर की यह बेगम मरियम-उज्जमानी के नाम से विख्यात हुई। भारमल पहला राजपूत था जिसने मुसलमानों (मुगल)  राजस्थान अध्ययन भाग-1 12 से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये थे।
         II. भारमल के पश्चात् कछवाहा शासक मानसिंह अकबर के दरबार का योग्य सेनानायक था। रणथम्भौर के 1569 के आक्रमण के समय मानसिंह और उसके पिता भगवन्तदास अकबर के साथ थे। मानसिंह को अकबर ने काबुल, बिहार और बंगाल का सूबेदार नियुक्त किया था। वह अकबर के नवरत्नों में शामिल था तथा उसे अकबर ने 7000 मनसब प्रदान किया था। मानसिंह ने आमेर में शिलादेवी मन्दिर, जगतशिरोमणि मन्दिर इत्यादि का निर्माण करवाया। इसके समय में दादूदयाल ने ‘वाणी’ की रचना की थी।
          मानसिंह के पश्चात् के शासकों में मिर्जा राजा जयसिंह (1621-1667) महत्त्वपूर्ण था, जिसने 46 वर्षों तक शासन किया। इस दौरान उसे जहाँगीर, शाहजहाँ और औरंगजेब की सेवा में रहने का अवसर प्राप्त हुआ। उसे शाहजहाँ ने ‘मिर्जा राजा’ का खिताब प्रदान किया। औरंगजेब ने मिर्जा राजा जयसिंह को मराठों के विरुद्ध दक्षिण भारत में नियुक्त किया था। जयसिंह ने पुरन्दर में शिवाजी को पराजित कर मुगलों से संधि के लिए बाध्य किया। 11 जून, 1665 को शिवाजी और जयसिंह के मध्य पुरन्दर की संधि हुई थी, जिसके अनुसार आवश्यकता पड़ने पर शिवाजी ने मुगलों की सेवा में उपस्थित होने का वचन दिया। इस प्रकार पुरन्दर की संधि जयसिंह की राजनीतिक दूरदर्शिता का एक सफल परिणाम थी। जयसिंह के बनवाये आमेर के महल तथा जयगढ़ और औरंगाबाद में जयसिंहपुरा उसकी वास्तुकला के प्रति रुचि को प्रदर्शित करते हैं। इसके दरबार में हिन्दी का प्रसिद्ध कवि बिहारीमल था।
          III. कछवाहा शासकांे मंे सवाई जयसिंह द्वितीय (1700-1743) का अद्वितीय स्थान है। वह राजनीतिज्ञ, कूटनीतिज्ञ, खगोलविद्, विद्वान एवं साहित्यकार तथा कला का पारखी था। वह मालवा का मुगल सूबेदार रहा था। जयसिंह ने मुगल प्रतिनिधि के रूप में बदनसिंह के सहयोग से जाटों का दमन किया। सवाई जयसिंह ने राजपूताना में अपनी स्थिति मजबूत करने तथा मराठों का मुकाबला करने के उद्देश्य से 17 जुलाई, 1734 को हुरड़ा (भीलवाड़ा) में राजपतू राजाआंे का सम्मेलन आयाेि जत किया। इसमें जयपरु , जोधपुर, उदयपुर, कोटा, किशनगढ़, नागौर, बीकानेर आदि के शासकों ने भाग लिया था परन्तु इस सम्मेलन का जो परिणाम होना चाहिए था, वह नहीं हुआ, क्योंकि राजस्थान के शासकों के स्वार्थ भिन्न-भिन्न थे। सवाई जयसिंह अपना प्रभाव बढ़ाने के उद्देश्य से बूँदी के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप कर स्वयं वहाँ का सर्वेसर्वा बन बैठा, परन्तु बूँदी के बुद्धसिंह की पत्नी अमर कुँवरि ने, जो जयसिंह की बहिन थी, मराठा मल्हारराव होल्कर को अपना राखीबन्द भाई बनाकर और धन का लालच देकर बूँदी आमंत्रित किया जिससे होल्कर और सिन्धिया ने बूँदी पर आक्रमण कर दिया।
          सवाई जयसिंह संस्कृत और फारसी का विद्वान होने के साथ गणित और खगोलशास्त्र का असाधारण पण्डित था। उसने 1725 में नक्षत्रों की शुद्ध सारणी बनाई और उसका तत्कालीन सम्राट के नाम पर ‘जीजमुहम्मदशाही’नाम रखा। उसने ‘जयसिंह कारिका’ नामक ज्योतिष गं्रथ की रचना की। सवाई  जयसिंह की महान् देन जयपुर है, जिसकी उसने 1727 में स्थापना की थी। जयपुर का वास्तुकार विद्याधर भट्टाचार्य था। नगर निर्माण के विचार से यह नगर भारत तथा यूरोप में अपने ढंग का अनूठा है जिसकी समकालीन और वर्तमानकालीन विदेशी यात्रियों ने मक्ु तकंठ स े पश््र ांसा की ह।ै जयपुर मंे जयसिहं न े सुदर्शनगढ़ (नाहरगढ़) किले का निर्माण करवाया तथा जयगढ़ किले में जयबाण नामक तापे बनवाई। उसने दिल्ली, जयपरु , उज्जनै , मथुरा और बनारस में पाँच वेधशालाओं (जन्तर-मन्तर) का निर्माण करवाया, जो ग्रह-नक्षत्रादि की गति को सही तौर से जानने के लिए बनवाई गई थी। जयपुर के जन्तर-मन्तर में सवाई जयसिंह द्वारा निर्मित ‘सूर्य घड़ी’ है जिसे ‘सम्राट यंत्र’ के नाम से जाना जाता है, जिसे दुनिया की सबसे बड़ी सूर्य घड़ी के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त है। धर्मरक्षक होने क े नाते उसने वाजपये , राजसूय आदि यज्ञांे का आयोजन किया। वह अन्तिम हिन्दू नरेश था, जिसने भारतीय परम्परा क े अनुकलू अश्वमेध यज्ञ किया। इस प्रकार सवाई जयसिंह अपने शौर्य, बल, कूटनीति और विद्वता के कारण अपने समय का ख्याति प्राप्त व्यक्ति बन गया था, परन्तु वह युग के प्रचलित दोषों से ऊपर न उठ सका।

राठौड़ वंश
          I. राजस्थान के उत्तरी और पश्चिमी भागों में राठौड़ राज्य स्थापित थे। इनमें जोधपुर और बीकानेर के राठौड़ राजपूत प्रसिद्ध रहे हैं। जोधपुर राज्य का मूल पुरुष राव सीहा था, जिसने मारवाड़ के एक छोटे भाग पर शासन किया। परन्तु लम्बे समय तक गुहिलों, परमारों, चैहानों आदि राजपूत राजवंशों की तुलना में राठौड़ों की शक्ति प्रभावशाली न हो पाई थी।
          II. राठौड़ शासक राव जोधा ने 1459 मे जोधपुर बसाकर वहाँ मेहरानगढ़ का निर्माण करवाया था। राव गांगा (1515-1532) ने खानवा के युद्ध में 4000 सैनिक भेजकर सांगा की मदद की थी। इस प्रकार सांगा जैसे शक्ति सम्पन्न शासक के साथ रहकर राव गांगा ने अपने राज्य का राजनीतिक स्तर ऊपर उठा दिया। राव मालदेव गांगा का ज्येष्ठ पुत्र था। वह अपने समय का एक वीर, प्रतापी, शक्ति सम्पन्न शासक था। उसके समय में मारवाड़ की सीमा हिण्डौन, बयाना, फतेहपुर-सीकरी और मेवाड़ की सीमा तक प्रसारित हो चुकी थी। मालदेव की पत्नी उमादे (जैसलमेर की राजकुमारी) इतिहास में ‘रूठी रानी’ के नाम से विख्यात है। मालदेव ने साहेबा के मैदान में बीकानेर के राव जैतसी को मारकर अपने साम्राज्य विस्तार की इच्छा को पूरी किया परन्तु मालदेव ने अपनी विजयांे स े जसै लमेर, मेवाड़ आरै बीकानरे स े शत्रुता बढा़ कर अपने सहयोगियांे की सख्ं या कम कर दी। शेरशाह से हारने के बाद हुमायूँ मालदेव से सहायता प्राप्त करना चाहता था परन्तु वह मालदेव पर सन्देह करके अमरकोट की ओर प्रस्थान कर गया। मालदेव की सेना को 1544 में गिरि-सुमेल के युद्ध में शेरशाह सूरी का सामना करना पड़ा। कहा जाता है कि इस युद्ध में पूर्व शेरशाह ने चालाकी का सहारा लेते हुये मालदेव के दो सेनापति जेता और कूंपा को जाली पत्र लिखकर अपनी ओर मिलाने का ढोंग रचा था। इस युद्ध में स्वामिभक्त जेता और कूंपा मारे गये तथा शेरशाह की विजय हुई। युद्ध समाप्ति के पश्चात् शेरशाह ने कहा था ‘‘एक मुट्ठी भर बाजरा के लिए वह हिन्दुस्तान की बादशाहत खो देता।’’
          III. मालदवे क े पत्रु चन्द्रसेन न े जा े एक स्वतन्त्र प्रकृति का वीर था, अपना अधिकांश जीवन पहाड़ों में बिताया परन्तु अकबर की आजीवन अधीनता स्वीकार नहीं की। वंश गौरव और स्वाभिमान, जो राजस्थान की संस्कृति के मूल तत्व हैं, हम चन्द्रसेन के व्यक्तित्व में पाते हैं। महाराणा प्रताप ने जैसे अपनी स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए मुगल अधीनता स्वीकार नहीं की, उसी प्रकार चन्द्रसेन भी आजन्म अकबर से टक्कर लेता रहा। चन्द्रसेन की मृत्यु के बाद अकबर ने चन्द्रसेन के बडे़ भाई मोटा राजा उदयसिंह को 1583 में मारवाड़ का राज्य सौंप दिया। इस प्रकार उदयसिंह मारवाड़ का प्रथम शासक था जिसने मुगलों की कृपा प्राप्त की थी। उदयसिंह ने 1587 में अपनी पुत्री मानीबाई (जोधपुर की राजकुमारी होने के कारण यह जोधाबाई भी कहलाती है) का विवाह जहाँगीर के साथ कर दिया। यह इतिहास में ‘जगतगुसाई’ के नाम से प्रसिद्ध थी। इसी वश्ं ा क े गजसिंह का पत्रु अमरसिंह राठाडै ़ राजकमु ारांे में अपने साहस और वीरता के लिए प्रसिद्ध है। आज भी इसके नाम के ‘ख्याल’ राजस्थान के गाँवों में गाये जाते हैं।
          IV. जसवन्त सिंह ने धर्मत के युद्ध (1658) में औरंगजेब के विरुद्ध शाही सेना की ओर से भाग लिया था परन्तु शाही सेना की पराजय ने जसवन्तसिंह को युद्ध मैदान से भागने पर मजबूर कर दिया। जसवन्त सिंह खजुआ के युद्ध (1659) मंे शुजा के विरुद्ध औरंगजेब की ओर से लड़ने गया था परन्तु वह मैदान में शुजा से गुप्त संवाद कर, शुजा की ओर शामिल हो गया, जो उसके लिए अशोभनीय था। हालांकि वह जैसा वीर, साहसी और कूटनीतिज्ञ था वैसा ही वह विद्या तथा कला प्रेमी भी था। उसने ‘भाषा-भूषण’ नामक गं्रथ लिखा। मँुहणोत नैणसी उसका मंत्री था। नैणसी द्वारा लिखी गई ‘नैणसी की ख्यात’ तथा ‘मारवाड़ रा परगना री विगत’ राजस्थान की ऐतिहासिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति के अध्ययन के अनुपम ग्रंथ हैं। जसवन्त सिंह मारवाड़ का शासक था जिसने अपने बल और प्रभाव से अपने राज्य का सम्मान बनाये रखा। मुगल दरबार का सदस्य होते हुए भी उसने अपनी स्वतन्त्र प्रकृति का परिचय देकर राठौड़ वंश के गौरव और पद की प्रतिष्ठा बनाये रखी। राठौड़ दुर्गादास ने औरंगजेब का विरोध कर जसवन्तसिंह के पुत्र अजीतसिंह को मारवाड़ का शासक बनाया। परन्तु अजीतसिंह ने अपने सच्चे सहायक और मारवाड़ के रक्षक, अदम्य साहसी वीर दुर्गादास को, जिसने उसके जन्म से ही उसका साथ दिया था, बुरे लोगों को बहकाने में आकर बिना किसी अपराध के मारवाड़ से निर्वासित कर दिया। उसकी यह कृतघ्नता उसके चरित्र पर कलंक की कालिमा के रूप में सदैव अंकित रहेगी।
          दुर्गादास ने अपनी कूटनीति से औरंगजेब के पुत्र शहजादा अकबर को अपनी ओर मिला लिया था। उसने शहजादा अकबर के पुत्र बुलन्द अख्तर तथा पुत्री सफीयतुनिस्सा को शरण देकर तथा उनके लिए कुरान की शिक्षा व्यवस्था करके साम्प्रदायिक एकता का परिचय दिया। वीर दुर्गादास राठौड़ों का एक चमकता हुआ सितारा है, जिससे इतिहासकार जेम्स टाॅड भी प्रभावित हुये बिना नहीं रह सका। जेम्स टाॅड ने उसे ‘राठौड़ों का यूलीसैस’ कहा है।
          V. जोधपुर के जोधा के पुत्र राव बीका ने 1488 में बीकानेर बसाकर उसे राठौड़ सत्ता का दूसरा केन्द्र बनाया। बीका के पुत्र राव लूणकर्ण को इतिहास में ‘कलयुग का कर्ण’ कहा गया है। बीकानेर के जैतसी का बाबर के पुत्र कामरान से संघर्ष हुआ जिसमें कामरान की पराजय हुई। 1570 में अकबर द्वारा आयोजित नागौर दरबार में राव
कल्याणमल ने अपने पुत्र रायसिंह के साथ भाग लिया। तभी से मुगल सम्राट और बीकानेर राज्य का मैत्री संबंध
स्थापित हो गया। बीकानेर के नरेशों में कल्याणमल प्रथम व्यक्ति था जिसने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली थी।
          VI. महाराजा रायसिंह न े मगु लांे की लिए गुजरात, काबुल और कंधार अभियान किये। वह अपने वीरोचित तथा स्वामिभक्ति के गुणों के कारण अकबर तथा जहाँगीर का विश्वास पात्र बना रहा। रायसिंह ने बीकानेर के किले का निर्माण करवाया, जिस पर मुगल प्रभाव दिखाई देता है। रायसिंह स्वभाव से उदार तथा दानवीर शासक था। इसी आधार पर मंुशी देवीप्रसाद ने उसे ‘राजपूताने का कर्ण’ कहा है। बीकानेर महाराजा दलपतसिंह का आचरण जहाँगीर के अनुकूल न होने के कारण जहाँगीर ने उसे कैद कर मृत्यु दण्ड दिया था। महाराजा कर्णसिंह को ‘जगं लधर बादशाह’ कहा जाता था। इस उपाधि का उपयागे बीकानेर के सभी शासक करते हैं।
          VII. महाराजा अनूपसिंह वीर, कूटनीतिज्ञ और विद्यानुरागी शासक था। उसने अनूपविवेक, कामप्रबोध, श्राद्धप्रयोग चिन्तामणि और गीतगोविन्द पर ‘अनूपोदय’ टीका लिखी थी। उसे संगीत से प्रेम था। उसने दक्षिण में रहते हुए अनेक ग्रंथों को नष्ट होने से बचाया और उन्हें खरीदकर अपने पुस्तकालय के लिए ले आया। कंुभा के संगीत गं्रथों का पूरा संग्रह भी उसने एकत्र करवाया था। आज अनूप पस्ु तकालय (बीकानरे ) हमार े लिए अलभ्य पस्ु तकांे का भण्डार है, जिसका श्रेय अनूपसिंह के विद्यानुराग को है। दक्षिण में रहते हुये उसने अनेक मूर्तियों का संग्रह किया और उन्हंे नष्ट हाने े से बचाया। यह मूर्तियांे का संग्रह बीकानेर के ‘‘तैतीस करोड़ देवताओं के मंदिर’’ में सुरक्षित है।
          VIII. किशनगढ़ में भी राठौड़ सत्ता का पृथक् केन्द्र था। यहाँ का प्रसिद्ध शासक सावन्त सिंह था, जो कृष्ण भक्त होने के कारण ‘नागरीदास’ के नाम से प्रसिद्ध था। इसके समय किशनगढ़ में चित्रकला का अद्भुत विकास हुआ। किशनगढ़ चित्रशैली का प्रसिद्ध चित्रकार ‘निहालचन्द था, जिसने प्रसिद्ध ‘बनी-ठणी’ चित्र चित्रित किया।

चैहान वंश
          I. हम चैहानों के अधिवासन और प्रारम्भिक विस्तार में बारे में विगत पृष्ठों में अध्ययन कर चुके हैं। बारहवीं शताब्दी के अन्तिम चरण में शाकम्भरी के चैहान शासक पृथ्वीराज चैहान तृतीय न े अपनी विजयांे स े उत्तरी भारत की राजनीति में एक विशिष्ट स्थान प्राप्त कर लिया था। उसने चन्देल शासक परमार्दीदेव के देशभक्त सेनानी आल्हा और ऊदल को मारकर 1182 को महोबा को जीत लिया। कन्नौज के गाहड़वाल शासक जयचन्द का दिल्ली को लेकर चैहानों से वैमनस्य था। हालांकि पृथ्वीराज चैहान तृतीय भी अपनी दिग्विजय में कन्नौज को शामिल करना चाहता था। इस प्रकार पृथ्वीराज चैहान तृतीय और जयचन्द की महत्त्वाकांक्षा दोनों के वैमनस्य का कारण बन गयी। पृथ्वीराजरासो दोनों के मध्य शत्रुता का कारण जयचन्द की पुत्री संयोगिता को बताता है। पृथ्वीराज तृतीय ने 1191 में तराइन के प्रथम युद्ध में मुहम्मद गौरी का े पराजित कर भारत मंे तर्कु  आक्रमण का े धक्का पहँुचाया। तुर्कों के विरुद्ध लड़े गये युद्धों में तराइन का प्रथम युद्ध हिन्दू विजय का एक गौरवपूर्ण अध्याय है। परन्तु पृथ्वीराज चैहान द्वारा पराजित तुर्की सेना का पीछा न किया जाना इस युद्ध में की गयी भूल के रूप में भारतीय भ्रम का एक कलंकित पृष्ठ है। इस भूल के परिणामस्वरूप 1192 में महु म्मद गौरी न े तराइन के दूसरे यद्धु मंे पृथ्वीराज चाहै ान तृतीय को पराजित कर दिया। इस हार का कारण राजपूतों का परम्परागत सैन्य संगठन माना जाता है। पृथ्वीराज चैहान अपने राज्यकाल के आरंभ से लेकर अन्त तक युद्ध लड़ता रहा, जो उसके एक अच्छे सैनिक और सेनाध्यक्ष होने को प्रमाणित करता है। सिवाय तराइन के द्वितीय युद्ध के, वह सभी युद्धों में विजेता रहा। वह स्वयं अच्छा गुणी होने के साथ-साथ गुणीजनों का सम्मान करने वाला था। जयानक, विद्यापति गौड़, वागीश्वर, जनार्दन तथा विश्वरूप उसके दरबारी लेखक और कवि थे, जिनकी कृतियाँ उसके समय को अमर बनाये हुए हैं। जयानक ने पृथ्वीराज विजय की रचना की थी। पृथ्वीराजरासो का लेखक चन्दबरदाई भी पृथ्वीराज चैहान का आश्रित कवि था।
          II. रणथम्भारै क े चाहै ान वंश की स्थापना पृथ्वीराज चैहान के पुत्र गोविन्द राज ने की थी। यहाँ के प्रतिभा सम्पन्न शासकों में हम्मीर का नाम सर्वोपरि है। दिल्ली के सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी ने हम्मीर के समय रणथम्भौर पर असफल आक्रमण किया था। अलाउद्दीन खिलजी ने 1301 में रणथम्भौर पर आक्रमण कर दिया। इसका मुख्य कारण हम्मीर द्वारा अलाउद्दीन खिलजी के विरुद्ध मंगोल शरणार्थियों को आश्रय देना था। किला न जीत पाने के कारण अलाउद्दीन ने हम्मीर के सेनानायक रणमल और रतिपाल को लालच देकर अपनी ओर मिला लिया। हम्मीर ने आगे बढ़कर शत्रु सेना का सामना किया पर वह वीरोचित गति को प्राप्त हुआ। हम्मीर की रानी रंगादेवी और पुत्री ने जौहर व्रत द्वारा अपने धर्म की रक्षा की। यह राजस्थान का प्रथम जौहर माना जाता है। हम्मीर के साथ ही रणथम्भौर के चैहानों का राज्य समाप्त हो गया। हम्मीर के बारे में प्रसिद्ध है ‘‘तिरिया-तेल, हम्मीर हठ चढे़ न दूजी बार।’’
          III. जालौर की चैहान शाखा का संस्थापक कीर्तिपाल था। प्राचीन शिलालेखों में जालौर का नाम जाबालिपुर और किले का सुवर्णगिरि मिलता है, जिसको अपभ्रंष में सोनगढ़ कहते हैं। इसी पर्वत के नाम से चैहानों की यह शाखा ‘सोनगरा’ कहलायी। इस शाखा का प्रसिद्ध शासक कान्हड़दे चैहान था। दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने जालौर को जीतने से पूर्व 1308 में सिवाना पर आक्रमण किया। उस समय चैहानांे क े एक सरदार जिसका नाम सातलदेव था, दुर्ग का रक्षक था। उसने अनेक स्थानों पर तुर्कों को छकाया था। इसलिए उसके शौर्य की धाक राजस्थान में जम चुकी थी। परन्तु एक राजद्रोही भावले नामक सैनिक द्वारा विश्वासघात करने के कारण सिवाना का पतन हो गया और अलाउद्दीन ने सिवाना जीतकर उसका नाम खैराबाद रख दिया। इस विजय के पश्चात् 1311 मंे जालौर का भी पतन हो गया और वहाँ का शासक कान्हड़देव वीर गति को प्राप्त हुआ। वह शूरवीर योद्धा, देशाभिमानी तथा चरित्रवान व्यक्ति था। उसने अपने अदम्य साहस तथा सूझबूझ से किले निवासियों, सामन्तों तथा राजपूत जाति का नेतृत्व कर एक अपूर्व ख्याति अर्जित की थी।
          IV. वर्तमान हाड़ौती क्षेत्र पर चैहान वंशीय हाड़ा राजपूतों का अधिकार था। प्राचीनकाल में इस क्षेत्र पर मीणाओं का अधिकार था। ऐसा माना जाता है कि बून्दा मीणा के नाम पर ही बूँदी का नामकरण हुआ। कुंभाकालीन राणपुर के लेख में बूँदी का नाम ‘वृन्दावती’ मिलता है। राव देवा ने मीणाओं को पराजित कर 1241 में बूँदी राज्य की स्थापना की थी। बूँदी के प्रसिद्ध किले तारागढ़ का निर्माण बरसिंह हाड़ा ने करवाया था। तारागढ़ ऐतिहासिक काल में भित्तिचित्रों के लिए विख्यात रहा है। बूँदी के सुर्जनसिंह ने 1569 में अकबर की अधीनता स्वीकार की थी। बूँदी की प्रसिद्ध चैरासी खंभों की छतरी शत्रुसाल हाड़ा का स्मारक है, जो 1658 में शामूगढ़ के युद्ध में औरंगजेब के विरुद्ध शाही सेना की ओर से लड़ता हुआ मारा गया था। बुद्धसिंह के शासनकाल में मराठों ने बूँदी रियासत पर आक्रमण किया था। प्रारम्भ में कोटा बूँदी राज्य का ही भाग था, जिस े शाहजहा ँ न े बँदू ी स े अलग कर माधोसिंह को सौंपकर 1631 ई. में नये राज्य के रूप में मान्यता दी थी। कोटा राज्य का दीवान झाला जालिमसिंह इतिहास चर्चित व्यक्ति रहा है। कोटा रियासत पर उसका पूर्ण नियन्त्रण था। कोटा में ऐतिहासिक काल से आज तक कृष्ण भक्ति का प्रभाव रहा है। इसलिए कोटा का नाम ‘नन्दग्राम’ भी मिलता हैं। बूँदी-कोटा में सांस्कृतिक उपागम के रूप में यहाँ की चित्रशैलियाँ विख्यात रही हैं। बूँदी में पशु-पक्षियों का श्रेष्ठ अकं न हुआ है, वहीं काटे ा शलै ी शिकार के चित्रांे के लिए विख्यात रही है।

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